कुश के चिट्ठे पर हमारे मित्र संजय बेंगाणी ( जिनसे हमारी भी कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है) ने कहा -
अफ्लातुनजी से व्यक्तिगत कोई शिकायत नहीं, हम में मित्रता है. उन्हे मैं बताना चाहुंगा की आतंकवादियों में और हिन्दु संगठनो में जो सबसे बड़ा फर्क है वह है भारत के प्रति निष्ठा. अगर आपको यह नजर नहीं आता तो क्या कहें!
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हमें इन हिन्दू संगठनों की भारत के प्रति निष्ठा भी राष्ट्रतोड़क लगती है । देश में फैली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में भगवा झंडे को हिंदू राष्ट्र के ध्वज के रूप में सलाम करने की सीख दी जाती है और अबोध बच्चों को यह बताया जाता है कि सिर्फ हिंदू ही इस राष्ट्र के असली नागरिक हैं । दूसरे धर्म वालों के खिलाफ़ नफ़रत भरी जाती है । इक़बाल के गीत में कहा गया है कि , ‘ सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा,हम बुलबुलें हैं इसकी,यह गुलिस्तां हमारा’ । इन शाखाओं में प्रचलित इसी तर्ज के एक गाने में कहा गया है , ‘ उन बुलबुलों को कह दो कहीं और चमन ढूँढें ‘ । यह स्पष्ट रूप से गैर हिन्दुओं को देश छोड़ने को कहना है । अगर देश के करोड़ों बच्चों के मन में इस तरह का जहर भर दिया गया तो हमारा राष्ट्र क्या बनेगा ?
कुछ ही दिन पहले संजय , जिनका पूर्वोत्तर से विशेष नाता है ने काश्मीर से तुलना करते हुए वहाँ अन्य प्रान्तों के नागरिकों को जमीन खरीदने पर रोक आदि का जिक्र किया था। हमने संजय से गुजरात ( जहाँ वे रहते हैं ) में आदिवासी की जमीन खरीद सकते हैं ,क्या ? - यह सवाल किया था। गुजरात के इस प्रगतिशील भूमि सुधार कानून को यदि वे समझ लेते तब शायद पूर्वोत्तर की बात भी समझ पाते । परन्तु वे महटिया गए ।

अफलातून जी, मैं आप की बात से सहमत नहीं हूँ. हिन्दू संगठनों की भारत के प्रति निष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. आज अगर इसाई और मुसलमान संगठन हिंदू धर्म परिवर्तन का दुराग्रह छोड़ दें तो इन संगठनों की आवश्यक्यता ही नहीं रहेगी. सीमा पार बफदारी रखने वाले संगठनों से इन राष्ट्रवादी संगठनों की तुलना करना राष्ट्रद्रोहिओं को राष्ट्रविरोधी कार्यवाहियों करने के लिए उकसाना है.
सिर्फ एक और सिर्फ एक ही चीज सिखाई जाती है संघ की शाखाओं मैं कि
(तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहैं न रहैं).और श्रीमान जिस गीत का उल्लेख आप ने किया है वैसा कोई गीत हमने तो पिछले 20 वर्षों मैं सुना नहीं बाकि यदि आपके पास उपलब्ध हो तो बतायें …सुनना चाहेंगे,
आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि जीवन मैं सिर्फ एक बार आप संघ की शाखा मैं सारे पूर्वाग्रह छोङकर जाकर देखें आपको सिर्फ एक ही बात सुनाई पङे गी भारत माता की जय
सही बात।
सुंदर लेख है. (मेरा मतलब, मात्रा के गलतियाँ नहीं हैं.)
वकिलों से और राजनेताओं से तर्क करना आसान नहीं, बात को खेत से खलिहान तक ले जाते हैं
बात फिर भी देश के प्रति निष्ठा पर अटकी है, हिन्दु संगठन अगर नफरत सिखाते भी है तो भी भारत से उनसे कोई दुश्मनी नहीं, जबकि आतंकियो को भारत से कोई निष्ठा नहीं.
रही बात जमीन की तो कश्मीर, मिजोरम में और गुजरात के जमीन सम्बन्धी कानून को एक ही तरह का कैसे माना जा सकता है?
अफ़लातुन जी। आपकी पोस्ट और दुसरे हमारे भाईयों के विचार से मीलकर मैं अपनी एक कविता अपने देशको समर्पित करती हुं । वही मेरी कमेन्ट है।
मेरे वतन, मेरे वतन, मेरे वतन हिंदोसतां।
अपना गगन, अपना चमन, अपना वतन हिंदोस्तां।
गाते चलें ये गीत हम, बढ़ते रहे अपने कदम।
सब साथ हैं तो क्या है ग़म, जीतेंगे हम, हममें है दम। मेरे वतन..(2)
हिंदू भी हैं, मुस्लिम भी हैं, यहां शिख़ भी ईसाई भी।
ऐसे रहें हमारा संग-संग जैसे रहे परछाई भी.. मेरे वतन..(2)
यहां मंदिरों में आरती और मस्जिदों में अज़ान है।
गीता के श्लोक यहाँ कभी, कभी आयतें कुरान है।.. मेरे वतन..(2)
त्यौहारों का ये देश है, यहां ईद और दीवाली है,
रंगत यहाँ राखी की है और रंगबिरंगी होली है।.. मेरे वतन..(2)
गंगा यमुना सरस्वती, गोदावरी और नर्मदा,
नदियां हमारे देश की, बहती रहे हरदम सदा।.. मेरे वतन..(2)
ये धरती, गांधी, नहेरु की, ये धरती है सरदार की,
जिसने दी अपनी जान वो भगत सिंह और आज़ाद की।.. मेरे वतन..(2)
कश्मीर से कन्याकुमारी तक बसा मेरा वतन,
नज़रें उठाये कोई क्या? ईस पर लुटादें जानो तन।॥ मेरे वतन..(2)
kya bakwas kar rahe ho huzur. na jane kahan aap dekh liya ki abodh bachcho mein nafrat bhari jati hai. wahan bus ek baat sikhaya jata hai. arun ye madhumay desh hamara
jo is desh ko madhumay manta hai ise pyar karta hai wo hindu hai aur jo nahi karta hai wo ahindu hai
wahan sikhaya jata hai
mat samjhana hindu ka matlab keval murti pujak hai
is desh par marne wale sare sare hindu suchak hai
wah janab aap bhi gahazab dha rahe ho main janta hun aap apne blog ko hit karwane ke liye ye likh rahe ho. itna bhi niche nahi girna nahi chahiye.
shriman ji aap un logo mein ho jo husain jab chitra banata hai to use abhivyakti ki swantantra kah kar samarthan kar dete ho lekin wahin denish kartoonist ke mamle mein chuppi laga jata ho. RSS lakho masoom naunihal mein skissha gyan ka prasar karti hai. usme se padhe na jane kitne aaj computer engineer, professor, station master , IAS, PCS bane hue hai. aur aap unki tulna un terroristo se kar rahe ho.
aap jara ek atankvadi ka nam batao jo baal bharti mein padha ho. sakha jata ho. hai ko namo ki suchi. lekin har muslim atankvadi madrase ki upaj hai.
———————- vampanthi ho ———shayad isliye——-apka vampanth bahut udar hai lekin kabhi bangal ke sima se aage nahi nikal paya
aur bengal mein bhi isliye ke unhone bangladeshi ghuspatiyon ko basa diya hai. RSS ki BJP ko 181 seat tak mili thi aur aaj dekho kitne rajyo mein wo hai. kitne logo ne use vote diya hai kya aap mante ho ko itne logo se samjhdar ho. ye aap hi ho mahashay ki jiske chalte atankvadi bamvisphot karte hai. ye aap jaise log ho ki afjal bacha hua hai. aur antankvadiyon ke hausale buland hai.. ki jab parliament par attack karne wale ka kuchh nahi hua to koi hamara kya ukhad lega.
kripya blog mein ye sab bakwas likhna band kare aur kuch mithe geet likhe jisase ki hum ga sake.
aapki sari chal samjh mein aa gayi
badnam hoge to kya nam nahi hoga.
chalo shubh vida
kuch kahna ho to ek blog yahan bhi hai
http://www.pandeyalok.wordpress.com
atankiyon aur RSS mein isase bada antar kya hoga ki RSS mein padhe likhe logo ko log rashtra aur rajya ki satta dete hai. kyonki unhe malun hai ki inke hatho mein desh surkashit hai.
par aap to simi ko rashtra ki stta dinlana chahte ho ? kyo nahi jab dono ko ek hi nazar se dekh rahe ho. aapko maloom hai ki RSS ke bare mein gandhi , jaiprakash narayan, General karriappa, khuswant sing , mahraja mahendra, BR Ambedkar ne kya kaha hai. kal apne blog par likhunga aana jaroor aur tab main aapse ye puchhunga ki agar RSS atankvadi hai to uprokt mahan log bhi atanki kahlana pasand krenge.
huzur mujhe upload kar lena. disapporve mat karna.
http://www.pandeyalok.wordpress.com
इन कथित हिन्दू संगठनों की भारत के प्रति निष्ठा पर उंगली कोई नहीं उठा रहा है। पर वह निष्ठा वैसी ही है जैसी रावण को शिव और लंका के प्रति थी और कंस को मथुरा के प्रति।
वक्त की नजाकत को पहचानना होगा .वर्तमान स्थिती क्या इंगित कर रही है . इस बात के लिए लोगों को स्वयं को सोचना होगा की कौन कान्हा खड़ा है .
रज़ियाजी कविता बहुत सुन्दर है. यह भावना खुब फैले. देश पर मजहबी कब्जे का स्वप्न देखने वाले नष्ट हो…
धरती, गांधी, नहेरु की, ये धरती है सरदार की…
क्षमा करें यह धरती उनकी भी है जिन्होने कालापानी की सजा भोगी, वन्दे मातरम कहते हुए फाँसी पर झूल गए….
‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ जयशंकर प्रसाद का ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक में लिखा यह गीत ‘शाखा’ में भी सिखाया जाता है ? गीत की दूसरी पंक्ति कोई भी स्वयंसेवक स्वीकार करता है,क्या? – जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को , मिलता एक सहारा
महात्मा गांधी संघ के ‘हिन्दू राष्ट्र के सिद्धान्त’ के बारे में क्या सोचते थे,शाखा में गये तो क्या संवाद हुआ , यहाँ और यहाँ पढ़ें ।
किशन पटनायक द्वारा ‘सामयिक वार्ता’ के लिए जेपी से ‘संघ’ पर लिया गया यह साक्षात्कार पहले जेपी ने देखा था,तब छपा था – नेट पर पढिए |
बाबा साहब यह मानते थे कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ की समाज व्यवस्था वर्णाधारित होगी इसलिए ऐसे तत्वों के प्रति अपने समर्थकों को सावधान करते थे।
अव्वल तो ऐसी कोई देश तोड़क बात सिखाई ही नहीं जाती.
पर ये बुलबुले ऐसा सोचते हैं, और उन्हें लगता है की काफिर कुछ ज़्यादा ही परशान कर रहे हैं, तो बंगलादेश और पाकिस्तान काटकर उनके नाम किए जा चुके हैं, चले जायें, उन्ही की सारी जागीर है. रोका किसने है?
हिन्दुत्व को भारतीय राष्ट्रवाद से अलग नही किया जा सकता है। जहां तक अन्य धर्मो का सवाल है, अगर वे भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध न हो तो हिन्दुत्व और उन मे कोई टकराव पैदा ही नही हो सकता है। आपके विचार चतुर चर्च से प्रायोजित लगते है, जो हिन्दुत्व और ईस्लाम के बीच टकराहट बढा कर अपना हित साधना चाहता है।
बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता राष्ट्रवाद का आवरण पहन कर आती है.
सामूहिक हत्याओं का दोषी वस्तुतः आतंक वादी ही है चाहे उसकी निष्ठा भारत के अन्दर हो या बाहर. जी हाँ दोनों एक ही हैं.
बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता राष्ट्रवाद के भेष में घूमती है.
सामूहिक हत्याओं के दोषी वस्तुतः आतंकवादी ही हैं चाहे उनकी निष्ठा देश के अन्दर हो या बाहर
वस्तुतः दोनों एक ही हैं. जी हाँ कोई फर्क नही कश्मीर , दिल्ली , गुजरात, कंधमाल हर जगह
अफ़लातूनजी
मैं आपसे बिलकुल सहमत हूँ। लेकिन मैं यह भी कहूंगा के संघ परिवार के आतंक और इस्लामी कट्टरवादी आतंक में फर्क है, मगर फर्क वह नहीं है जो यहाँ comments में बार बार दोहोराया जा रहा है. यानी फर्क यह नहीं है के एक राष्ट्रवादी है या patriotic है , या भारत से प्रेम करता है और दूसरा नहीं करता. बल्कि फर्क यह है के संघ परिवार का आतंकवाद बहुमत का आंतंकवाद है, और इसलिए बहुत ज्यादा खतरनाक भी है. इस का मतलब यह नहीं के देश के सारे हिन्दू, या ज़्यादातर हिन्दू संघ परिवार के अनुयायी हैं, मगर यह बात ज़रूर है के संघ परिवार का आतंकवाद majority के नाम पर किया जा रहा है और इसलिए उसे “राष्ट्रवादी” या patriotic कहा जाता है. वह patriotism के ढोंग के पीछे ज़्यादा आसानी से छुप सकता है.
ज़ाहिर है, अगर “भारत” की परिभाषा ही बदल दी जाए और उसे “हिन्दू राष्ट्र” कहा जाए, तो संघ परिवार सच में राष्ट्रवादी कहेलायेगा. मगर हम अगर भारत की परिभाषा कुछ और दें, उसे कई समूहों का एक बहुवादी लोकतंत्र कहें, तो क्या संघ परिवार के यह सारे “राष्ट्रवादी” उस भारत से भी उतना ही प्रेम करेंगे? राष्ट्र की परिभाषा निश्चित किये बगैर, राष्ट्रवाद की बात करना बेकार है। लेकिन यह तमाम संघ परिवार के समर्थक (या जो समर्थक न होते भी संघ की कड़ी आलोचना करने से हिचकिचाते हैं) इसे प्रकार का तर्क इस्तेमाल करते नज़र आते हैं।
यानि आप मानते हैं कि संजय बैंगाणी की सोच भी राष्ट्र तोड़क है?
आप जैसे सेकुलर सोच के लोगों से ये देश महँ कहलाता है…बस दुःख यही है की ये गिनती बेहद कम है लेकिन तसल्ली है तो इतनी की है…देश को कट्टरता के दलदल में धकेलने वाले भी आतंकवादी हैं…
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