बचपन में एटलस देखते वक्त दो देशों के रंग जरूर आपको भी याद होंगे – बड़े-से द्वीप ग्रीनलैण्ड का हरा और उसके पड़ोस के छोटे-से द्वीप आइसलैण्ड का सफ़ेद । लगता था कि आइसलैण्ड में बर्फ़ ही बर्फ़ होगी । दुनिया पर मँडरा रहे वित्तीय संकट के दौर में फिर चर्चा में आया है जब उसके प्रमुख तीन बैंकों के राष्ट्रीयकरण का वहाँ की संसद को फैसला लेना पड़ा , प्रधान मन्त्री ने वक्तव्य दे दिया कि मुल्क दीवालिया हो सकता है ।
सवा तीन लाख से कम आबादी वाले इस मुल्क में टैक्सी ड्राइवर की राष्ट्रपति से जै रम्मी हो जाया करती है । मुल्क का माहौल ऐसा है मानो सब सब से रक्त , राजनीति अथवा व्यापार से जुड़े हों । गत कुछ वर्षों में विदेशी बाजारों में इस देश का असर इस कदर बढ़ा था कि यह दुनिया के सर्वाधिक प्रति व्यक्ति आय वाले देशों में एक हो गया था। एक तरफ़ दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति भी इस देश में पाए जाने लगे , दूसरी तरफ़ सबसे कर्जदार भी होने लगे ।
कहा जाता है आइसलैण्ड के तेज उन्नति में उसके एल्युमिनयम निर्माण का बुनियादी योगदान रहा है । मजे की बात है कि एल्युमिनयम उत्पादन के लिए अयस्क ( बॉक्साइट ) सुदूर जमैका से आयातित होता है । १९७३ तक आइसलैण्ड का मुख्य उत्पादन मछली का था इसलिए विश्व बैंक उसे विकासशील देशों में गिनता था । एल्युमिनियम उत्पादन के लिए बिजली से चलने वाली दुनिया की सबसे बड़ी भट्टियां (smelters) चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है। बिजली उत्पादन के लिए अल्युमिनियम कम्पनियों ने बड़े बाँध बनाए हैं । जैसा एल्युमिनियम उत्पादन में हर जगह होता है – जितनी पूंजी इनके पास थी उससे ५० गुना धन इस देश ने ऋण के रूप में लिया । कर्ज के इस पैसे से रातों रात कुछ लोग अमीर बने । मौजूदा संकट के दस दिन पहले तक क्रेडिट रेटिंग वाली एजेन्सियां आइसलैण्ड में पूंजी निवेश की सलाह दे रही थीं । आइसलैण्ड खुद को कर्ज की गुलामी में बेच रहा था । उस मुल्क के मुष्टिमेय पर्यावरण प्रेमी जरूर आन्दोलनरत थे किन्तु ग्रीन पीस , फ़्रेन्ड्स ऑफ़ अर्थ और वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ़ फ़न्ड जैसी बड़ी-बड़ी दुकाने इस मुद्दे पर चुप थीं – आइसलैण्ड के आन्दोलनकारियों के हक में बयान तक देने के लिए तैय्यार नहीं थीं , क्योंकि अकूत धन राशि दाँव पर लगी थी और बड़ी कम्पनियाँ खैरात भी बाँटा करती हैं । यह एल्युमिनियम कहां जा रहा है ? मोटर गाड़ियों में ( खाद्य , यातायात और निर्माण उद्योग के विस्फोट के कारण खप रहा) तथा अस्त्र -आयुध निर्माण में । आम तौर पर एलुमिनियम से इन चीजों के तादात्म्य को हम नहीं देख पाते हैं ।
बुनियादी तौर पर ओडिशा में भी यही हो रहा है । विशाल विदेशी पूंजी निवेश की बात है – किन्तु किसान अपनी खेती की जमीन देने के लिए तैय्यार नहीं है । आन्दोलन के कारण वेदान्त २ बिलियन डॉलर तथा मित्तल २० बिलियन डॉलर का नुकसान झेल चुके हैं।
नवीन पटनायक जो ओड़िया नहीं बोल पाते और इंग्लैण्ड और अमेरिका में पढ़े हुए हैं ने १९९३ में आयुर्वेदिक पौधों पर एक किताब लिखी थी – द गार्डेन ऑफ़ लाइफ़ । किताब की भूमिका में उन्होंने लिखा था -” ऐसा व्यक्ति जो समग्र जीव-जगत से तादात्म्य को पहचानता है ,एक मजबूत आत्मा का मालिक होता है , चूँकि वह अपनी ही उर्जा और प्रकृति की शक्ति से पृथक नहीं होता । जीवों में सर्वश्रेष्ट होने के कारण वह इसका संरक्षक भी होता है , यह जानते हुए कि उसका अपना अस्तित्व प्रकृति के नाजुक सन्तुलन पर निर्भर है । यदि मनुष्य जानबूझ कर इस सन्तुलन को बिगाड़ता है तो अनिवार्य तौर पर वह अपना नुकसान भी करता है ।”
पिछले कुछ माह में ओडिशा ने जो संकट झेले हैं उन्हें आँकड़ों के जरिए देखने पर आप पाएंगे – बड़े बांधों से आई बाढ़ से १,८०,००० लोग विस्थापित हुए , हिन्दुत्व की वैमनस्यकारी हिंसा में ५०,००० दलित ईसाई सरकारी शिबिरों में डरे हुए रह रहे हैं ( और कुछ भाग कर माओवादियों की शरण में चले गए हैं ) । इन सब से ज्यादा विस्थापन और पर्यावरण का नाश तीन बड़ी कम्पनियों ( वेदान्त ,टाटा और पॉस्को ) द्वारा हो रहा है जो पानी के मोल लौह तथा एल्युमिनियम अयस्क लूटने आए हैं ।

हिन्दुत्व की वैमनस्यकारी हिंसा में ५०,००० दलित ईसाई…… आपको चर्च द्वारा स्वामी जी की हत्या की जानकारी नही है क्या ?
IP : 220.226.30.26
दलित ईसाई का क्या अर्थ है? क्या ईसाई बनने के बाद भी कोई दलित रहता है क्या?
IP 220.226.30.26
सही समय पर सही बात।
सही है. ईश्वर करे ओड़िशा के कुछ उद्यमी बच्चे नवीन पटनायक को आइसलैण्ड ही छोड़ आयें..
सही बात।
रमेश = पीटर = IP : 220.226.30.26
ये भी खूब रही।
[...] पर पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ़ 220.226.30.26 की घिनौनी हरकत पर नाक बन्द कर गौर करें । राही मासूम [...]
charch se vahi paisa shayad aap tak bhi pahunch gaya hoga.
On the hindutva killings – the maoists’ killing of swami saraswati was an act of hate & stupidity. In their note they said it was because he had stirred up communal tensions last christmas, which led to killings then also. But the scale of the recent killings and continuing inaction of the govt against the perpetrators is a shame on Orissa and a grief for any true Hindu or Christian. If religion is real, it should be bringing us together not tearing us apart. Committing violence in the name of religion blackens the religion.
On the aluminium industry, what’s happened to Iceland should be a real lesson for Orissa. Foreign investment there is not a free gift. It’s in the form of loans that have enslaved one country & region after another, with a single aim: getting the state’s land, minerals, water and people’s labour dirt cheap. If all the aluminium & steel projects go through there’ll be a short-lived, insane boom & new money, followed by terrible poverty, which the farmers already feel, which is why they are resisting so strongly. Vedanta, Mittal, Posco, Tata are orchestrating a loot of India’s resources of a magnitude the East India Company only dreamt of, & most of their profits disppear abraod.
ज़रा-सा और ग़ौर इस IP पर:
direct link if first not work:
http://s356.photobucket.com/albums/oo3/vinayprajapati/?action=view¤t=APC-200810142221-0013d.jpg
प्रमोद भाई के स्वर में मेरा भी स्वर है .
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[...] नन्हा-सा देश आईसलैण्ड गत वर्षों में बड़ी उथल-पुथल से गुजरा है। बॉक्साइट न पाए जाने के [...]
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