दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक लक्ष्मीनारायण मित्तल । इन्हें इस्पात-नरेश भी कहा जाता है । भारतीय मूल का होने के कारण उन पर कई मध्यम वर्गीय भारतीय फक्र करते हैं । शायद इन मध्यम वर्गीय नागरिकों से ज्यादा फक्र हमारी सरकारों को है – इन पर और इनके जैसे अनिवासियों पर । इन विभूतियों को पद्म भूषण , पद्म विभूषण जैसे अलंकरणों से नवाजा जाना भी शुरु हो चुका है ।
इस्पात और अल्युमिनियम जैसी धातुओं के अयस्क के खनन से लेकर निर्माण की प्रक्रिया में मित्तल और अनिल अग्रवाल ( वेदान्त समूह ) दुनिया के पैमाने पर चोटी के उद्योगपति हैं ।
हमारे देश में इन अयस्कों के निर्यात और तैयार धातु विदेशों से आयातित करने को देश विरोधी मूर्खता माना जाता रहा है । जिस मुल्क में कपास पैदा करवा कर मैनचेस्टर की मिलों को बतौर कच्चा माल दिया जाता रहा हो वहाँ आम आदमी इस दोहरी लूट की प्रक्रिया का अंदाज सहज ही लगा सकता है ।
आधुनिक अर्थशास्त्र के जनक माने जाने वाले मार्शल के छात्र प्रो. जे.सी. कुमारप्पा अयस्क निर्यात को गलत मानते थे । बहरहाल , अब ओड़िशा , झारखण्ड की बॉक्साइट (अल्युमिन्यम अयस्क) तथा लौह अयस्क खदानों से मनमाने ( अनियंत्रित ) तरीके से अयस्क निकालने और देश के बाहर भेजने के अनुबंध हो रहे हैं । बिना टोका-टाकी निर्यात के लिए पारादीप में एक नया बंदरगाह तक ऐसी एक कम्पनी पोस्कों (कोरियाई) का होगा ।
मेरी पिछली बोकारो यात्रा के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित प्राधिकरण स्टील ऑथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया (सेल) के एक वरिष्ट अधिकारी से मित्तल , अग्रवाल , जिन्दल जैसों की व्यावसायिक करतूतों के बारे में सुन कर मैं हक्का-बक्का रह गया । अपने उन मित्र के प्रति हृदय से आभार प्रकट करते हुए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ ।
सेल की इस्पात – जगत में बहुत अच्छी छाप है । इस प्राधिकरण से जुड़े इंजीनियर अत्यन्त योग्य , मेहनती और समर्पित माने जाते हैं । लक्ष्मीनारायण मित्तल के दुनिया भर में फैले इस्पात साम्राज्य के आधार स्तम्भ सेल के पूर्व अधिकारी हैं । भिलाई , राउरकेला , दुर्गापुर और बोकारो जैसी हमारी इस्पात नगरियों के होटल में मित्तल के ‘मछुआरे’ डेरा डालते हैं और सार्वजनिक क्षेत्र के हमारे सर्वाधिक अनुभवी और योग्यतम इंजीनियरों पर जाल फेंकते हैं । मित्तल की मेक्सिको , चेक्स्लोवाकिया और पोलैण्ड जैसी इकाइयां ही नहीं भारत में में उसकी कारगुजारियों की जिम्मेदारी भी सेल के पूर्व अधिकारियों को हाथों में है । मसलन उसके ‘ऑडिशा-ऑपरेशन्स’ की जिम्मेदारी राउरकेला स्टील प्लान्ट के पूर्व निदेशक देखते हैं । एक अनुमान के अनुसार सेल में एक्सिक्यूटिव डाइरेक्टर के स्तर के व उससे ऊपर के २५ फीसदी अधिकारी मित्तल के चंगुल में आ जाते हैं । भविष्य में सार्वजनिक क्षेत्र का यह पूरा प्राधिकरण मित्तल के हाथों में चला जाए तो चौंकिएगा नहीं । अलबत्ता , तब इन अधिकारियों से ऊपर बिकने को तैयार बैठे मन्त्री की भूमिका गौरतलब हो जाएगी ।
अल्युमिनियम/फौलाद की इंग्लैण्ड की विशाल कम्पनी वेदान्त/स्टरलाइट के मालिक अनिल अग्रवाल ओड़िशा के कई छोटे पहाड़ों को खा जाने का ठेका नवीन पटनायक से पा चुके हैं । अनिल अग्रवाल के पिता साठ के दशक में पटना में लोहे की सरिया बेचते थे । उदारीकरण के दौर में ही यह संभव है कि एक पीढ़ी में ही अचानक इतनी दौलत इकट्ठा हो जाए । कई बार सरकारों के छोटे से फैसले से अथवा किसी जालसाजी कदम से कोई व्यक्ति राजा से रंक बन जाता है। अम्बानी , सुब्रत राय , अमर सिंह इसके उदाहरण हैं । क्या ३० – ३५ साल पहले इनमें से कोई भी टॉप टेन पूँजीपतियों में था ? उ.प्र. के पूर्व मुख्य मन्त्री वीरबहादुर सिंह की इकट्ठा दौलत का प्रबन्धन देखते-देखते अमर सिंह उनके मरने पर अमीर हो गया और उसके बेटे सड़क पर आ गए , ऐसा माना जाता है । हमारे गाँवों का गरीब सूती कपड़े पहनता था । अमेरिका में टेरलीन / टेरीकॉट सूती से सस्ता है यह जान कर तब आश्चर्य होता था । कपड़ा नीति में फेरबदल से सूती कपड़ा उद्योग से जुड़े किसान बुनकर , श्रमिक संकट में आ गये । सूती कपड़ों की जगह सिंथेटिक कपड़े गरीबों के तन पर आ गए – इससे अम्बानी देश का सबसे बड़ा औद्योगिक समूह हो गया ।
लोहे की पटरियां भिलाई में बनती हैं । १०० मीटर की पटरियां बनाने की एक परियोजना वहां शुरु हो नी थी । १०० मीटर की पटरियों से फिश प्लेट , नट , बोल्ट आदि जोड़ने के पुर्जों की आवश्यकता कम हो जाएगी , यह मकसद था । भिलाई के तकालीन प्रबन्ध निदेशक ने इस परियोजना को जानबूझकर लटकाए रखा । जब पता चला का निजी क्षेत्र की जिन्दल- समूह भी १०० मीटर की पटरियां बना रहा है तब उक्त अधिकारी से जवाब तलब किया गया । महोदय , इस्तीफा दे कर एक महीने के भीतर उक्त निजी कम्पनी में शामिल हो गये ।
देश के लिए अनिवार्य केन्द्रित बड़े उद्योग सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र में होने चाहिए । इन कारखानों में ठेकेदारी-प्रथा आदि भ्रष्टाचार की जड़ों पर डॉ. लोहिया करते थे । इन्हें आधुनिक तीर्थ कहने वाले नेहरू इन आलोचनाओं से सबक लेने के बजाए कम्युनिस्टों से लोहिया को गाली दिलवाते – मानों उन तीर्थों के मन्दिरों में कोई विधर्मी घुस गया हो । मन्दी के मौजूदा दौर में फिर राष्ट्रीयकरण द्वारा मदद की नौबत आ गयी है – इस प्रक्रिया को कभी आगे समझने की कोशिश होगी ।


आंखे खोल देने वाली पोस्ट है। जब माली ही फलों का सफाया कर रहा हो तो भगवान ही मालिक है।
व्यक्ति अपने विकास के लिए जहाँ भी अवसर मिलेगा जाएगा ही। आज इंडस्ट्री में म्युजिकल चेअर्स हर समय चलती रहती हैं । हाँ, जहाँ काम कर रहे हो, वहाँ का विस्तार रोक कर जहाँ जाना है, वहाँ का करने में सहायता करना गलत है। कोई भी समझदार कम्पनी ऐसे अधिकारी पर विश्वास नहीं कर सकती । जैसा द्रोह वह पहली कम्पनी के साथ करके आया है वैसा ही नई कम्पनी के साथ भी कर सकता है ।
सरकारी संस्थानों में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो काम करना असंभव है। अधिकारी निर्णय लेने से डरते हैं।
CCI के लगभग दर्जन भर कारखानों में से आज शायद केवल एक चल रहा है। शेष या तो बिक गए हैं या बंद पड़े हैं । मुझे एक बिके हुए कारखाने के एक कर्मचारी से की गई बात याद आती है। बात बात में मैंने कहा था कि यदि उत्पादन नहीं होगा तो वेतन कहाँ से मिलेगा ? उसका मासूम सा जवाब था कि वेतन का उत्पादन से क्या सम्बंध ? पहले भी तो जब उत्पादन नहीं होता था तब वेतन मिलता था । मेरा उत्तर था, भाई तब करदाता तुम्हारा वेतन देते थे,अब निजी कम्पनी का वेतन करदाता नहीं देंगे । निजी कम्पनी में काम करने वाला जानता है कि वेतन चाहिए, सुविधाएँ चाहिएँ,पदोन्नति चाहिए तो उत्पादन बढ़ाना होगा । सो राष्ट्रीयकरण की बात कहाँ तक ठीक है इसपर विचार करना चाहिए । कोयले की खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ, कभी वहाँ जाकर देखना चाहिए कि कितना कोयला कहाँ जा रहा है । किसी मजदूर को रोकने या कुछ कहने का दुस्साहस शायद ही कोई अधिकारी करे । हो सकता है किसी समय में निजी संस्थानों में मजदूरों के साथ कुछ या शायद अधिक भी, अन्याय होता रहा हो परन्तु आज किसी भी बड़े संस्थान में यह संभव नहीं है।
शायद अयस्कों का निर्यात गलत हो, परन्तु क्या उन्हीं से निर्मित वस्तुओं का निर्यात करना जो लोगों को रोजगार देगा भी गलत है इसपर विचार करना होगा । कोई भी विचारधारा पूर्णतया सही या गलत नहीं होती । सही या गलत केवल उसपर अम्ल करने का तरीका होता है । यही तर्क समाजवादी व पूँजीवादी विचारधारा पर भी लागू होता है । हमें यह भी देखना होगा कि कोई विचारधारा हमें कहाँ पहुँचा रही है । यदि हम फिर से चाहते हैं कि हमारे बच्चे दो तरह के स्कूटर या कार में से जो भी मिले उसे लेने के लिए पाँचसाला लाइन लगाएँ, गैस , फोन आदि चीजों को एश्वर्य की चीजें मानें, जैसे हम बचपन में मानते थे, तो निजीकरण अवश्य होना चाहिए । हर वस्तु का होना चाहिए । यदि जीवन एक अभिशाप की तरह जीना ही जीवन का अर्थ है तो पचास या साठ के दशक को वापिस लाना ही चाहिए ।
पूँजीवाद तब ही चल सकता है जब कुछ सुरक्षा के उपाय हों, जैसे चट्टानों पर चढ़ने वालों को रस्सी का, सर्कस में झूलों पर करतब दिखाने वालों को जाल का सहारा होता है । किसी तरह का बीमा हो सकता है ताकि जब तक नौकरी है, बीमा की रकम भरते रहो और जब दुर्भाग्य से नौकरी जाए या नौकरी करने की क्षमता चली जाए तो जीवन यापन के लिए कुछ पैसा मिलता रहे । अन्यथा ऊपर चढ़ना ही वर्जित करा जा सकता है और समाजवाद की सपाट कहीं न जाने वाली सड़क पर चलते हुए जीवन बिताया जा सकता है ।
शशांक शेखर
sateek!!!! dono ne padhaa…
ऐसे आधारभूत बिन्दुओं पर बात करने और विचार करने वाले लोग अब नजर नहीं आते । लोगों के सोचने पर मानो वशीकरण फेर दिया गया हो । आपने समस्या की जड उजागर कर दी है । लोहिया के सारे अनुयायी सत्ता के दास हो गए । जैसी बातें आप करते हैं वह अरण्य रूदन जैसा लगता है । चारों ओर अंधेरा, निराशा और हताशा छाई हुई है । बेचैनी को कोई रास्ता नहीं मिलता और इस दशा के लिए अपने आप पर गुस्सा आता है । सूझ नहीं पडता – क्या करें ।
****** परिजनों व सभी इष्ट-मित्रों समेत आपको प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। मां लक्ष्मी से प्रार्थना होनी चाहिए कि हिन्दी पर भी कुछ कृपा करें.. इसकी गुलामी दूर हो.. यह स्वाधीन बने, सशक्त बने.. तब शायद हिन्दी चिट्ठे भी आय का माध्यम बन सकें..
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मैं भी इंडियन आयल के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा हूँ! रिलायंस में भी यही हाल हैं! तेल कंपनियों के भी उच्च अफसर रिटायर्मेंट के दो तीन साल पहले से ही अपनी सेवाए रिलायंस को देनी शुरू कर देते हैं!
[...] ‘आधुनिक तीर्थों’ के ‘पण्डा’ ? [...]
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