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	<title>&#8216;आधुनिक तीर्थों&#8217; के &#8216;पण्डा&#8217; ? पर टिप्पणियाँ</title>
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	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
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		<title>By: गत चार वर्षों की टॉप पोस्ट्स &#171; समाजवादी जनपरिषद</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2008/10/22/public_sector_executives_steel/#comment-2795</link>
		<dc:creator><![CDATA[गत चार वर्षों की टॉप पोस्ट्स &#171; समाजवादी जनपरिषद]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 15 Aug 2010 03:06:06 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[[...] &#8216;आधुनिक तीर्थों&#8217; के &#8216;पण्डा&#8217; ? [...]]]></description>
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		<title>By: चार साल की चिट्ठेकारी में छिपे आँकड़े &#171; यही है वह जगह</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2008/10/22/public_sector_executives_steel/#comment-2593</link>
		<dc:creator><![CDATA[चार साल की चिट्ठेकारी में छिपे आँकड़े &#171; यही है वह जगह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Aug 2010 17:19:47 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[[...] &#8216;आधुनिक तीर्थों&#8217; के &#8216;पण्डा&#8217; ? [...]]]></description>
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		<title>By: महेंद्र गौड़</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2008/10/22/public_sector_executives_steel/#comment-2004</link>
		<dc:creator><![CDATA[महेंद्र गौड़]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Aug 2009 14:23:01 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[मैं भी इंडियन आयल के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा हूँ! रिलायंस में भी यही हाल हैं! तेल कंपनियों के भी उच्च अफसर रिटायर्मेंट के दो तीन साल पहले से ही अपनी सेवाए रिलायंस को देनी शुरू कर देते हैं!]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं भी इंडियन आयल के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा हूँ! रिलायंस में भी यही हाल हैं! तेल कंपनियों के भी उच्च अफसर रिटायर्मेंट के दो तीन साल पहले से ही अपनी सेवाए रिलायंस को देनी शुरू कर देते हैं!</p>
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		<title>By: अशोक पाण्‍डेय</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2008/10/22/public_sector_executives_steel/#comment-1569</link>
		<dc:creator><![CDATA[अशोक पाण्‍डेय]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 27 Oct 2008 16:58:57 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[****** परिजनों व सभी इष्ट-मित्रों समेत आपको प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। मां लक्ष्‍मी से प्रार्थना होनी चाहिए कि हिन्‍दी पर भी कुछ कृपा करें.. इसकी गुलामी दूर हो.. यह स्‍वाधीन बने, सश‍क्‍त बने.. तब शायद हिन्‍दी चिट्ठे भी आय का माध्‍यम बन सकें.. :) ******]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>****** परिजनों व सभी इष्ट-मित्रों समेत आपको प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। मां लक्ष्‍मी से प्रार्थना होनी चाहिए कि हिन्‍दी पर भी कुछ कृपा करें.. इसकी गुलामी दूर हो.. यह स्‍वाधीन बने, सश‍क्‍त बने.. तब शायद हिन्‍दी चिट्ठे भी आय का माध्‍यम बन सकें.. <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  ******</p>
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	<item>
		<title>By: विष्‍णु बैरागी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2008/10/22/public_sector_executives_steel/#comment-1566</link>
		<dc:creator><![CDATA[विष्‍णु बैरागी]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Oct 2008 17:59:14 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[ऐसे आधारभूत बिन्‍दुओं पर बात करने और विचार करने वाले लोग अब नजर नहीं आते । लोगों के सोचने पर मानो वशीकरण फेर दिया गया हो । आपने समस्‍या की जड उजागर कर दी है । लोहिया के सारे अनुयायी सत्‍ता के दास हो गए । जैसी बातें आप करते हैं वह अरण्‍य रूदन जैसा लगता है । चारों ओर अंधेरा, निराशा और हताशा छाई हुई है । बेचैनी को कोई रास्‍ता नहीं मिलता और इस दशा के लिए अपने आप पर गुस्‍सा आता है । सूझ नहीं पडता - क्‍या करें ।]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ऐसे आधारभूत बिन्‍दुओं पर बात करने और विचार करने वाले लोग अब नजर नहीं आते । लोगों के सोचने पर मानो वशीकरण फेर दिया गया हो । आपने समस्‍या की जड उजागर कर दी है । लोहिया के सारे अनुयायी सत्‍ता के दास हो गए । जैसी बातें आप करते हैं वह अरण्‍य रूदन जैसा लगता है । चारों ओर अंधेरा, निराशा और हताशा छाई हुई है । बेचैनी को कोई रास्‍ता नहीं मिलता और इस दशा के लिए अपने आप पर गुस्‍सा आता है । सूझ नहीं पडता &#8211; क्‍या करें ।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>By: parul</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2008/10/22/public_sector_executives_steel/#comment-1565</link>
		<dc:creator><![CDATA[parul]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Oct 2008 16:32:43 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[sateek!!!! dono ne padhaa...]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>sateek!!!! dono ne padhaa&#8230;</p>
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	<item>
		<title>By: shashamkshekhar</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2008/10/22/public_sector_executives_steel/#comment-1564</link>
		<dc:creator><![CDATA[shashamkshekhar]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Oct 2008 12:00:07 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[व्यक्ति अपने विकास के लिए जहाँ भी अवसर मिलेगा जाएगा ही। आज इंडस्ट्री में म्युजिकल चेअर्स हर समय चलती रहती हैं । हाँ, जहाँ काम कर रहे हो, वहाँ का विस्तार रोक कर जहाँ जाना है, वहाँ का करने में सहायता करना गलत है। कोई भी समझदार कम्पनी ऐसे अधिकारी पर विश्वास नहीं कर सकती । जैसा द्रोह वह पहली कम्पनी के साथ करके आया है वैसा ही नई कम्पनी के साथ भी कर सकता है ।
सरकारी संस्थानों में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो काम करना असंभव है। अधिकारी निर्णय लेने से डरते हैं। 
CCI के लगभग दर्जन भर कारखानों में से आज शायद केवल एक चल रहा है। शेष या तो बिक गए हैं या बंद पड़े हैं । मुझे एक बिके हुए कारखाने के एक कर्मचारी से की गई बात याद आती है। बात बात में मैंने कहा था कि यदि उत्पादन नहीं होगा तो वेतन कहाँ से मिलेगा ? उसका मासूम सा जवाब था कि वेतन का उत्पादन से क्या सम्बंध ? पहले भी तो जब उत्पादन नहीं होता था तब वेतन मिलता था । मेरा उत्तर था, भाई तब करदाता तुम्हारा वेतन देते थे,अब निजी कम्पनी का वेतन करदाता नहीं देंगे । निजी कम्पनी में काम करने वाला जानता है कि वेतन चाहिए, सुविधाएँ चाहिएँ,पदोन्नति चाहिए तो उत्पादन बढ़ाना होगा । सो राष्ट्रीयकरण की बात कहाँ तक ठीक है इसपर विचार करना चाहिए । कोयले की खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ, कभी वहाँ जाकर देखना चाहिए कि कितना कोयला कहाँ जा रहा है । किसी मजदूर को रोकने या कुछ कहने का दुस्साहस शायद ही कोई अधिकारी करे । हो सकता है किसी समय में निजी संस्थानों में मजदूरों के साथ कुछ या शायद अधिक भी, अन्याय होता रहा हो परन्तु आज किसी भी बड़े संस्थान में यह संभव नहीं है।
शायद अयस्कों का निर्यात गलत हो, परन्तु क्या उन्हीं से निर्मित वस्तुओं का निर्यात करना जो लोगों को रोजगार देगा भी गलत है इसपर विचार करना होगा । कोई भी विचारधारा पूर्णतया सही या गलत नहीं होती । सही या गलत केवल उसपर अम्ल करने का तरीका होता है । यही तर्क समाजवादी व पूँजीवादी विचारधारा पर भी लागू होता है । हमें यह भी देखना होगा कि कोई विचारधारा हमें कहाँ पहुँचा रही है । यदि हम फिर से चाहते हैं कि हमारे बच्चे दो तरह के स्कूटर या कार में से जो भी मिले उसे लेने के लिए पाँचसाला लाइन लगाएँ, गैस , फोन आदि चीजों को एश्वर्य की चीजें मानें, जैसे हम बचपन में मानते थे, तो निजीकरण अवश्य होना चाहिए । हर वस्तु का होना चाहिए । यदि जीवन एक अभिशाप की तरह जीना ही जीवन का अर्थ है तो पचास या साठ के दशक को वापिस लाना ही चाहिए ।
पूँजीवाद तब ही चल सकता है जब कुछ सुरक्षा के उपाय हों, जैसे चट्टानों पर चढ़ने वालों को रस्सी का, सर्कस में झूलों पर करतब दिखाने वालों को जाल का सहारा होता है । किसी तरह का बीमा हो सकता है ताकि जब तक नौकरी है, बीमा की रकम भरते रहो और जब दुर्भाग्य से नौकरी जाए या नौकरी करने की क्षमता चली जाए तो जीवन यापन के लिए कुछ पैसा मिलता रहे । अन्यथा ऊपर चढ़ना ही वर्जित करा जा सकता है और समाजवाद की सपाट कहीं न जाने वाली सड़क पर चलते हुए जीवन बिताया  जा सकता है ।
शशांक शेखर]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>व्यक्ति अपने विकास के लिए जहाँ भी अवसर मिलेगा जाएगा ही। आज इंडस्ट्री में म्युजिकल चेअर्स हर समय चलती रहती हैं । हाँ, जहाँ काम कर रहे हो, वहाँ का विस्तार रोक कर जहाँ जाना है, वहाँ का करने में सहायता करना गलत है। कोई भी समझदार कम्पनी ऐसे अधिकारी पर विश्वास नहीं कर सकती । जैसा द्रोह वह पहली कम्पनी के साथ करके आया है वैसा ही नई कम्पनी के साथ भी कर सकता है ।<br />
सरकारी संस्थानों में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो काम करना असंभव है। अधिकारी निर्णय लेने से डरते हैं।<br />
CCI के लगभग दर्जन भर कारखानों में से आज शायद केवल एक चल रहा है। शेष या तो बिक गए हैं या बंद पड़े हैं । मुझे एक बिके हुए कारखाने के एक कर्मचारी से की गई बात याद आती है। बात बात में मैंने कहा था कि यदि उत्पादन नहीं होगा तो वेतन कहाँ से मिलेगा ? उसका मासूम सा जवाब था कि वेतन का उत्पादन से क्या सम्बंध ? पहले भी तो जब उत्पादन नहीं होता था तब वेतन मिलता था । मेरा उत्तर था, भाई तब करदाता तुम्हारा वेतन देते थे,अब निजी कम्पनी का वेतन करदाता नहीं देंगे । निजी कम्पनी में काम करने वाला जानता है कि वेतन चाहिए, सुविधाएँ चाहिएँ,पदोन्नति चाहिए तो उत्पादन बढ़ाना होगा । सो राष्ट्रीयकरण की बात कहाँ तक ठीक है इसपर विचार करना चाहिए । कोयले की खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ, कभी वहाँ जाकर देखना चाहिए कि कितना कोयला कहाँ जा रहा है । किसी मजदूर को रोकने या कुछ कहने का दुस्साहस शायद ही कोई अधिकारी करे । हो सकता है किसी समय में निजी संस्थानों में मजदूरों के साथ कुछ या शायद अधिक भी, अन्याय होता रहा हो परन्तु आज किसी भी बड़े संस्थान में यह संभव नहीं है।<br />
शायद अयस्कों का निर्यात गलत हो, परन्तु क्या उन्हीं से निर्मित वस्तुओं का निर्यात करना जो लोगों को रोजगार देगा भी गलत है इसपर विचार करना होगा । कोई भी विचारधारा पूर्णतया सही या गलत नहीं होती । सही या गलत केवल उसपर अम्ल करने का तरीका होता है । यही तर्क समाजवादी व पूँजीवादी विचारधारा पर भी लागू होता है । हमें यह भी देखना होगा कि कोई विचारधारा हमें कहाँ पहुँचा रही है । यदि हम फिर से चाहते हैं कि हमारे बच्चे दो तरह के स्कूटर या कार में से जो भी मिले उसे लेने के लिए पाँचसाला लाइन लगाएँ, गैस , फोन आदि चीजों को एश्वर्य की चीजें मानें, जैसे हम बचपन में मानते थे, तो निजीकरण अवश्य होना चाहिए । हर वस्तु का होना चाहिए । यदि जीवन एक अभिशाप की तरह जीना ही जीवन का अर्थ है तो पचास या साठ के दशक को वापिस लाना ही चाहिए ।<br />
पूँजीवाद तब ही चल सकता है जब कुछ सुरक्षा के उपाय हों, जैसे चट्टानों पर चढ़ने वालों को रस्सी का, सर्कस में झूलों पर करतब दिखाने वालों को जाल का सहारा होता है । किसी तरह का बीमा हो सकता है ताकि जब तक नौकरी है, बीमा की रकम भरते रहो और जब दुर्भाग्य से नौकरी जाए या नौकरी करने की क्षमता चली जाए तो जीवन यापन के लिए कुछ पैसा मिलता रहे । अन्यथा ऊपर चढ़ना ही वर्जित करा जा सकता है और समाजवाद की सपाट कहीं न जाने वाली सड़क पर चलते हुए जीवन बिताया  जा सकता है ।<br />
शशांक शेखर</p>
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		<title>By: हरि जोशी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2008/10/22/public_sector_executives_steel/#comment-1563</link>
		<dc:creator><![CDATA[हरि जोशी]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Oct 2008 10:36:10 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[आंखे खोल देने वाली पोस्‍ट है। जब माली ही फलों का सफाया कर रहा हो तो भगवान ही मालिक है।]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आंखे खोल देने वाली पोस्‍ट है। जब माली ही फलों का सफाया कर रहा हो तो भगवान ही मालिक है।</p>
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