कुंवर नारायण की तीन कविताएं (ज्ञानपीठ की घोषणा की खुशी में)

जल्दी में

प्रियजन

मैं बहुत जल्दी में लिख रहा हूं

क्योंकि मैं बहुत जल्दी में हूं लिखने की

जिसे आप भी अगर

समझने की उतनी ही बड़ी जल्दी में नहीं हैं

तो जल्दी समझ नहीं पायेंगे

कि मैं क्यों जल्दी में हूं ।

 

जल्दी का जमाना है

सब जल्दी में हैं

कोई कहीं पहुंचने की जल्दी में

तो कोई कहीं लौटने की …

 

हर बड़ी जल्दी को

और बड़ी जल्दी में बदलने की

लाखों जल्दबाज मशीनों का

हम रोज आविष्कार कर रहे हैं

ताकि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती हुई

हमारी जल्दियां हमें जल्दी से जल्दी

किसी ऐसी जगह पर पहुंचा दें

जहां हम हर घड़ी

जल्दी से जल्दी पहुंचने की जल्दी में हैं ।

 

मगर….कहां ?

यह सवाल हमें चौंकाता है

यह अचानक सवाल इस जल्दी के जमाने में

हमें पुराने जमाने की याद दिलाता है ।

 

किसी जल्दबाज आदमी की सोचिए

जब वह बहुत तेजी से चला जा रहा हो

-एक व्यापार की तरह-

उसे बीच में ही रोक कर पूछिए,

            ‘क्या होगा अगर तुम

           रोक दिये गये इसी तरह

            बीच ही में एक दिन

            अचानक….?’

 

वह रुकना नहीं चाहेगा

इस अचानक बाधा पर उसकी झुंझलाहट

आपको चकित कर देगी ।

उसे जब भी धैर्य से सोचने पर बाध्य किया जायेगा

वह अधैर्य से बड़बड़ायेगा ।

‘अचानक’ को ‘जल्दी’ का दुश्मान मान

रोके जाने से घबड़ायेगा । यद्यपि

आपको आश्चर्य होगा

कि इस तरह रोके जाने के खिलाफ

उसके पास कोई तैयारी नहीं….

क्या वह नहीं होगा

क्या फिर वही होगा
जिसका हमें डर है ?
क्या वह नहीं होगा
जिसकी हमें आशा थी?

क्या हम उसी तरह बिकते रहेंगे
बाजारों में
अपनी मूर्खताओं के गुलाम?

क्या वे खरीद ले जायेंगे
हमारे बच्चों को दूर देशों में
अपना भविष्य बनवाने के लिए ?

क्या वे फिर हमसे उसी तरह
लूट ले जायेंगे हमारा सोना
हमें दिखाकर कांच के चमकते टुकडे?

और हम क्या इसी तरह
पीढी-दर-पीढी
उन्हें गर्व से दिखाते रहेंगे
अपनी प्राचीनताओं के खण्डहर
अपने मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे?

अजीब वक्त है

अजीब वक्त है -

बिना लड़े ही एक देश-का देश

स्वीकार करता चला जाता

अपनी ही तुच्छताओं की अधीनता !

 

कुछ तो फर्क बचता

धर्मयुद्ध और कीटयुद्ध में -

कोई तो हार जीत के नियमों में

स्वाभिमान के अर्थ को

फिर से ईजाद करता ।

- कुंवर नारायण

[ वरिष्ट कवि कुंवर नारायण की राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'कोई दूसरा नहीं' तथा 'सामयिक वार्ता' (अगस्त-सितंबर १९९३) से साभार ]

 

8 Responses

  1. सार्थक कविताएँ।

  2. बहुत बढिया रचनाएं प्रेषित की हैं आभार।

    कुछ तो फर्क बचता

    धर्मयुद्ध और कीटयुद्ध में -

    कोई तो हार जीत के नियमों में

    स्वाभिमान के अर्थ को

    फिर से ईजाद करता ।

  3. कुँवर नारायण ने किया, इन्डिया का चित्रांकन.
    चौंक पङेगा देख कर, भारत-भक्त सरल मन.
    भारत-भक्त सरल मन,बैठ के दो पल सोचे.
    क्या गन्तव्य है, क्या प्राप्तव्य है-ध्यान से सोचे.
    कह साधक अब ध्यान स्वयं उतरा बाज़ार में.
    समझ ना पायें क्या होगा कि भीङ-भाङ में.

    भीङ के संग में भाङ का, चोली-दामन योग.
    विश्व जल रहा भाङ में, कैसा सटीक योग.
    कितना सटीक योग,शब्द बन जाते दर्पण.
    शब्दों से ही करते उस अशब्द का तर्पण.
    इस साधक कविने, कहकर मन प्रसन्न किया.
    इन्डिया का चित्रांकन, कुँवर-नारायण ने किया.

  4. shukriyaa!

  5. shabdon me samay ko bahdhna ise hi kahte hain.
    bahut sunadr..

  6. कुँवर नारायण जी को हम पाठकों की ओर से भी बधाई । हमारा सौभाग्य है जो आप हमें इनकी कविताएँ पढ़वाते रहते हैं । धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

  7. आपने कुँवर नारायण जी की कविता पढवा कर अच्छा किया — shukriya –
    – लावण्या

  8. bhut aacha shukriya

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