अयोध्या , १९९२ : कुँवरनारायण

अयोध्या , १९९२

हे राम ,

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकव्य !

                    तुम्हारे बस की नहीं

                     उस अविवेक पर विजय

                      जिसके दस बीस नहीं

                      अब लाखों सिर – लाखों हाथ हैं

                       और विवेक भी अब

                        न जाने किसके साथ है ।

 

इससे बड़ा क्या हो सकता है

हमारा दुर्भाग्य

एक विवादित स्थल में सिमट कर

रह गया तुम्हारा साम्राज्य

 

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं

योद्धाओं की लंका है ,

‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं

चुनाव का डंका है !

 

हे राम , कहाँ यह समय

       कहाँ तुम्हारा त्रेता युग ,

         कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

                   और कहाँ यह नेता – युग !

 

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ

किसी पुराण – किसी धर्मग्रंथ में

             सकुशल सपत्नीक….

अब के जंगल वो जंगल नहीं

          जिनमें घूमा करते थे बाल्मीक !

- कुँवरनारायण

9 Responses

  1. हे राम,

    आप धन्य हैं कि आपके जमाने में ये नपुंसक नहीं थे,

    अन्यथा आपको यही दिया जाता सलाह ।

    एक स्त्री के हरण पर इतना परेशान होना उचित नहीं,

    कर लीजिये, दूसरा विवाह!!

  2. हे राम , कहाँ यह समय

    कहाँ तुम्हारा त्रेता युग ,

    कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

    और कहाँ यह नेता – युग !
    bilkul satik baat.

  3. राम तो राम हैं,
    यहीं रहेंगे,
    आपका कहा नहीं मानेंगे,
    कहीं नहीं जाएंगे ।
    उनके चरित्र को ‘ये’
    आचरण में उतारें
    या
    बेच खाएं,
    अपनी कृपा,
    वे
    सब पर,
    निरन्‍तर, अनवरत बरसाएंगे ।

  4. बहुत सुंदरता से यथार्थ को अभिव्यक्त करती कविता।

  5. Aflatoon Bhai,
    Maaf kijiye, mein hindi me type nahi kar pa raha hun. Kunwar Narayan Ji ki itni sargarbhit evam sundar kavita ko yahan post karne ke liye bahut dhanyawad…
    Prakash

  6. श्री कुँवर नारायणजी की कविता के लिये शुक्रिया -

  7. एकदम सामयि‍क कवि‍ता पढ़वाई। बहुत-बहुत अच्‍छी लगी।

  8. शुक्रिया इस कविता को यहाँ प्रस्तुत करने के लिये !

  9. एक विवादित स्थल में सिमट कर

    रह गया तुम्हारा साम्राज्य

    अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं

    योद्धाओं की लंका है ,

    ‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं

    चुनाव का डंका है !

    हे राम , कहाँ यह समय

    कहाँ तुम्हारा त्रेता युग ,

    कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

    और कहाँ यह नेता – युग !

    एक विवादित स्थल में सिमट कर

    रह गया तुम्हारा साम्राज्य

    अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं

    योद्धाओं की लंका है ,

    ‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं

    चुनाव का डंका है !

    हे राम , कहाँ यह समय

    कहाँ तुम्हारा त्रेता युग ,

    कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

    और कहाँ यह नेता – युग !

    सटीक यतार्थ चित्रण

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