[ लेखक सुनील समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उनका ई-ठिकाना sjpsunil@gmail.com है । ]
एक छोटी-सी खबर पर मेरी नजर अटक गई । खबर का शीर्षक था – ‘ पासपोर्ट तक नहीं है नोबेल विजेता के पास ‘ । इसमें बताया गया था कि भौतिकी में शोध के लिए वर्ष २००८ का साझा नोबेल पुरस्कार जीतने वाले जापान के वैज्ञानिक तोशिहिदे मस्कावा बेहद सादगीपसंद और अपने काम में ही व्यस्त रहने वाले इंसान हैं । उन्हें विदेश यात्रा पसंद नहीं है और उनके पास पासपोर्ट तक नहीं है । नोबेल पुरस्कार ग्रहण करने के लिए स्टाकहोम के समारोह में जाने के पहले उन्हें पासपोर्ट हासिल करने के लिए आवेदन करना होगा । वे अंग्रेजी भी ठीक से नहीं बोल पाते हैं तथा अंग्रेजी बोलते हुए खुद को असहज महसूस करते हैं ।
[ चित्र : क्योटो विश्वविद्यालय] तोशिहिदे मस्कावा
मेरा मन तत्काल इसकी तुलना भारत के वैज्ञानिकों , विशेषज्ञों , प्रोफेसरों आदि से करने लगा । भारत के लगभग हर विषय के बड़े विद्वान तो विदेश जाते ही रहते हैं । अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों , सम्मेलनों व कार्यशालाओं में उनका आना-जाना लगा रहता है । कह सकते हैं कि उनका एक पैर विदेश में ही रहता है । उनके कई शोध-प्रोजेक्ट विदेशी – अनुदान से ही चलते हैं , उसके सिलसिले में भी उन्हें जाना पड़ता है । इस प्रक्रिया में कई लोग वहीं बस जाते हैं । यदि लौटकर आते हैं , तो ‘फ़ोरेन रिटर्न्ड’ के रूप में प्रतिष्ठा पाते हैं । विदेशी संस्थानों के फेलो , ‘एफ़ आर सी एस ‘ जैसी उपाधियाँ भी वे बड़े गर्व से लगाते हैं ।
कुल मिलाकर , भारत के बड़े विद्वानों , वैज्ञानिकों , समाज – विज्ञानियों आदि के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती है कि उनमें से किसी के पास विदेश जाने का पासपोर्ट तक न हो । छोटे शहरों व कस्बों के प्राध्यापक , शोधकर्ता , अफसर भी विदेश जाने को लालायित रहते हैं । उनमें से किसी को अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का निमंत्रण मिले , तो इस समाचार को फोटो सहित अखबारों में छापा जाता है ।
भारतीय बुद्धिजीवियों का यह विदेश – प्रेम इतना आम , इतना स्वीकार्य और सर्वमान्य हो गया है कि इसकी उपयोगिता , प्रासंगिकता , जरूरत और इसके औचित्य पर बहुत कम सवाल उठाये जाते हैं । लेकिन इन विदेश – यात्राओं के बारे में कुछ बातें गौरतलब हैं ।
पहली सच्चाई तो यह है कि इनमें से ९० फीसदी यात्राएं सम्युक्त राज्य अमेरिका , कनाडा , यूरोप , आस्ट्रेलिया , जापान जैसे अमीर पूंजीवादी मुल्कों के लिए ही होती है । यह ठीक है कि हमें कूपमंडूक नहीं बनना है और दुनिया के साथ हमारा वैचारिक , वैज्ञानिक , शैक्षणिक आदान-प्रदान चलते रहना चाहिए । लेकिन हमारी यह ‘दुनिया’ सिर्फ गोरी चमड़ी वाले इन थोड़े-से देशों तक क्यों सीमित हो जाती है ? एशिया , अफ़्रीका व लातीनी अमेरिका के विशाल भूभागों में जहाँ दुनिया की ८० फीसदी आबादी रहती है और जहाँ की दशाएं हमसे ज्यादा मिलती हैं , वहाँ हमारे बुद्धिजीवी और विद्वान क्यों नहीं जाते ?
इसका जवाब भी बहुत सीधा है । दरअसल इन विदेश यात्राओं और सेमिनारों – सम्मेलनों के लिए धन इन्हीं गोरे अमीर देशों से आता है । यही नहीं , शोध व अनुसंधान की ज्यादातर योजनाओं की धनराशि का स्रोत भी ये ही देश होते हैं । उनका एक डॉलर भारत के पचास रुपये का होता है । गरीब देशों के बुद्धिजीवी एवं वैज्ञानिक इन्हीं डॉलरों , पाउन्डों ,मार्कों , येनों की ताकत से आकर्षित कर लिये जाते हैं । गरीब देशों से प्रतिभा पलायन भी इनकी ही ताकत से होता है । प्रतिभाओं का जन्म तो गरीब देशों में होता है , लालन – पालन वहीं होता है , शिक्षा – दीक्षा भी वहीं होती है , लेकिन जब देश या समाज के लिए कुछ करने की उम्र होती है , तो वे अमीर देशों में चली जाती हैं । उनकी सेवाएं अमीर देशों को मिलती हैं । उन्हीं की प्रगति में उनका योगदान होता है । इस प्रतिभा पलायन के दुष्चक्र के चलते गरीब देश गरीब और पिछड़े बने रहते हैं ।
लेकिन जो प्रोफेसर , वैज्ञानिक व शोधकर्ता अपने देशों में रहते हैं , इन विदेश – यात्राओं की बदौलत , और शोध – अनुसंधा-अध्ययन की विदेशी फन्डिंग के चलते , वे भी बहुधा विदेशों से ही नियंत्रित – निर्देशित तथा परिचालित – प्रेरित रहते हैं । उनकी दिशा और उनका एजेण्डा बहुत हद तक विदेशों से ही तय होता है । इसके चलते हमारे शिक्षण , शोध , अनुसंधान , प्रशान और नीतियों में एक पश्चिमी प्रभाव एवं पूर्वाग्रह आ जाता है । अपने देश की परिस्थितियों , प्राथमिकताओं एवं जरूरत के मुताबिक मौलिक बौद्धिक कार्य हमारे देश में नहीं हो पा रहा है , इसका संभत: यह एक प्रमुख कारण है ।
[ जारी ]
विषय से सम्बन्धित अन्य लेख :
बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख़्त – ले. अफ़लातून , भाग -२

थोड़ा सा अध्ययन करके एक बच्चा भी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि भारतीय पढ़ा-लिखा/सरकारी नौकर) सर्वाधिक बेइमान जीव है। वह बौद्धिक गुलाम है; वह मौलिक काम करने की दृष्टि से पंगु है; वह विदेशी जूठन खाता रहता है लेकिन अपने सगे बन्धुओं पर इसी के बदौलत रोब जमाने से नहीं हिचकता। वह कोई भी मेहनत वाला काम करने से घोर नफ़रत करता है। वह गोरी चमड़ी का गुलाम है और अपने पिछड़े भाइयों को अपना गुलाम बनाये रखने के लिये तरह-तरह के प्रपंच करता है।
और भी बहुत से कारण हैं। जिन्होंने भारत में ही रहना पसन्द किया वे भी आज अपने इस निर्णय के कारण अपना सिर धूनते मिल जाएँगे। प्रतिभा को कैसे बुझाया जाता है यह आपको हमारे संस्थानों में खूब देखने को मिलेगा। यह भी गौर करने की बात है कि बहुत से विद्धार्थी विदेशों में शोध करने तब जाते हैं जब उन्हें भारत में दाखिला नहीं मिलता। जिन्हें भारत में दाखिला मिलता है वे उन से बेहतर होते हुए भी जीवन की दौड़ में पीछे रह जाते हैं।
मैं अपने ही परिवार में ऐसा उदाहरण देख रही हूँ। और अब सोचती हूँ बच्चों को राष्ट्र प्रेम का भाषण देना अधिक सरल था और जीवन जीना अधिक कठिन। यह सब देखकर लगता है जिसे जहाँ अवसर मिले उसका लाभ उठा ही लेना चाहिए बस नैतिकता के दायरे में रहकर। एक वैज्ञानिक को देशप्रेम से अधिक अपने काम से प्रेम होता है। उसका पहला दायित्व विज्ञान के प्रति बनता है। फिर अपने प्रति, या फिर पहले अपने प्रति फिर विज्ञान के प्रति। जब कुछ बन जाओ तो देश हाथों हाथ ले ही लेगा। तब शायद यहाँ भी कुछ कर दिखाने का अवसर मिल जाएगा।
घुघूती बासूती
घुघूती जी से सहमत हूँ, मेरे आसपास भी कई युवा हैं जिन्होंने पहले देशप्रेम की भावना के चलते अमेरिका जाना मंजूर नहीं किया, लेकिन यहाँ की “व्यवस्था”(?) से लड़कर अब वे लगभग मनोरोगी बन चुके हैं, और दिन रात यही सोचते हैं कि जब हमारी प्रतिभा के साथ यहाँ सरेआम अन्याय हो रहा है तब हम यहाँ क्या करें…
गोरी चमडी वाले पूँजीपति देशोँ मेँ जा बसे “बुध्धीजीवी” वर्ग के बर्ताव या उनके प्रति अच्छा या बुरा कहने से बेहतर होगा अगर भारत मेँ बसे नागरिक भारत की हर व्यवस्था को बेहतर और उन्नत करने मेँ ध्यान लगायेँ और श्रम करेँ–
[...] बुद्धिजीवियों का विदेश-प्रेम [ पिछले भाग से आगे ] : इसके अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं [...]
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ऐसे लोगों पर सख्त कानून चलना चाहिए…