मीडिया और सेक्स-उद्योग की मन्दी और विकृतियाँ

[ इस पोस्ट में सेक्स तथा यौनिकता आदि पर भी चर्चा है। जिन्हें यह विषय अनुचित लगता हो कृपया आगे न पढ़ें ।]

उद्योग- व्यवसाय में सरकार का हस्तक्षेप  उत्तरोत्तर कम होता चला जाए – यह ग्लोबीकरण का एक प्रमुख औजार था । बहरहाल , चक्की उलटी चलनी शुरु हुई है । विभिन्न बड़े उद्योगों को दीवालिया होने से बचाने के लिए सरकारी खजानों से मदद देना शुरु हो गया है । अमेरिकी सरकार ने सब से पहले बैंक/बीमा और फिर मोटरगाड़ी उद्योग को बड़ी मदद देने की घोषणाएं की हैं ।

अमेरिकियों की यौनेच्छा को जागृत करने के लिए पोर्न उद्योग के कर्णधारों ने भी दो दिन पहले अमेरिकी सरकार से एक प्रेस कॉन्फ़रेन्स बुला कर ५ अरब डॉलर की मदद की गुहार लगाई है। इन पुरोधाओं का कहना है कि चूँकि अमेरिकी संसद प्रमुख उद्योगों को मदद देने की बात सोच रही है इसलिए १३ अरब डॉलर के इस उद्योग पर भी विचार किया जाए । ‘हसलर’ पत्रिका के मालिक लैरी फ़्लिन्ट और टेलिविजन कार्यक्रम ‘गर्ल्स गॉन वाइल्ड’ के निर्माता जो फ़्रन्सिस ने यह प्रेस कॉन्फ़रेंस बुलायी थी । फ़्लिन्ट का कहना है कि लाजमी तौर पर मन्दी के दौर में अमेरिकियों की यौनेच्छा कम हो गयी है तथा भले ही मो्टर गाड़ियां न खरीदी जाए लेकिन इस बीमारी को व्यापक होने नहीं दिया जा सकता है ।

मिलते – जुलते सन्दर्भों में भारतीय मीडिया और यौन- उद्योगपर दृष्टिपात करें । मेरे अन्दाज से भारतीय यौन-उद्योग बाजार का असंगठित क्षेत्र अखबार और टेलिविजन से प्रभावित नहीं होता । मजमा लगा कर जन सम्प्रेषण हेतु ‘लकड़ी पर मारोगे बोलेगा खट – खट , लोहे पर मारोगे बोलेगा टन टन्न’ जैसे मन्त्रोच्चार द्वारा जरूरतमन्दों को अपने उत्पाद बेचने वाले समूह आधुनिकता के इस दौर में पूरी तरह लुप्त नहीं हुए हैं । बल्कि,हिन्दी अखबार मन्दी के इस दौर में यौन-मन्दी को  एक व्यापक महामारी का दरजा देते हुए लगता है अपनी मन्दी दूर करना चाहते हैं । मेरे घर हिन्दुस्तान अखबार आता है और यह अखबार ऐसे विज्ञापनों से अटा पड़ा रहता है । अखबार की की्मत तीन से साढे तीन करते वक्त बिड़ला का यह अखबार हॉकरों का कमीशन नहीं बढ़ाता है और विज्ञापन की आमदनी के लिए इन विज्ञापनों द्वारा युवाओं में भ्रम झूट और भय फैलाने में गुरेज नहीं करता ।

हास्यास्पद यह है कि यही विज्ञापन उसी प्रकाशन के अंग्रेजी अखबार Hindustan Times में नहीं छपते ! क्या अंग्रेजी जा्नने वाले इन ‘व्याधियों’ से पीड़ित नहीं होते? या उन्हें इन झोला छाप डॉक्टरों तथा भ्रामक उत्पादों की आवश्यकता नहीं होती? वे बड़े अस्पतालों के प्रजनन क्लीनिकों में जाते होंगे !

इन विज्ञापनों की एक बानगी देखें :

सदियों से स्त्री की सुंदरता को देखकर पुरुष युवावस्था में अपने मन में अलग-२ विचारधाराएं बनाता और सोचता है और मनघडंत खयालों में उलझ कर उस पर मोहित होता आया है । जिसके फलस्वरूप कामदेव के तीर के प्रभाव में आकर वह अपने हाथों से अपने जोश को शांत करने की कोशिश में अलग-२ प्रक्रियाएं करता अहता है । अपनी अज्ञानता व नासमझी के कारण वह इन्द्रियों व नसों के विकास को रोक देता है और विभिन्न प्रकार की व्याधियों जैसे कि स्वप्नावस्था में ही शरीर की सबसे कीमती धातु का निकल जाना,… आदि को जाने अनजाने में निमन्त्रण दे बैठता है ।

–  मैं पी.के. चतुर्वेदी उम्र ४५ वर्ष अपनी कुछ कमजोरियों व बचपन की गलतियों की वजह से वैवाहिक जीवन का सुख न तो ले पा रहा था नाही पत्नी को वैवाहिक जीवन का सुख दे पा रहा था ।—— फिर मुझे ऐसा लगा कि मेरी कमजोरी की वजह से मेरी पत्नी दूसरों की तरफ आकर्षित होने लगी है । … जापानी तेल लगाना शुरु करने के बाद मुझे कुछ आराम मिलना शुरु हुआ । सुबह शाम रोजाना लगाना शुरु किया जिससे मेरा आत्म वि्श्वास बढ़ना शुरु हुआ और एक महीने के अन्दर सालों पुरानी मेरी समस्या जिसके कारण मेरी पत्नी मुझसे दूर हो रही थी उस समस्या से मुझे जापानी तेल से बहुत आराम मिला।

इसी तेल का एक अन्य विज्ञापन कहता है ,’आप के शरीर का एक एक अंग अनमोल है कृपया साधारण तेल लगाने से बचें ।

इन विज्ञापनों द्वारा तरुणों में हस्त मैथुन , स्वप्नदोष की बाबत भ्रम , भय फैलाने और उस आधार पर अपने उत्पाद बेचने की मंशा रहती है । क्या इन अखबारों के प्रकाशन हेतु जिम्मेदार इन सामान्य से तथ्यों को नहीं जानते कि यह विज्ञापन भ्रामक ,झूटे और भय पैदा करने वाले हैं तथा हस्त मैथुन किसी स्थायी व्याधि का कारण नहीं है ?

क्या प्रेस काउंसिल ऑफ़ इण्डिया ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती ?

हिन्दी अखबारों के विज्ञापनों में यौनिकता की विकृतियों के बारे में कभी और चर्चा करेंगे ।


8 Responses

  1. bahut badiya likhne par apko badhayi, bilkul sahi bat ap likh rahe hai… ise app continue rakhe

  2. संक्षिप्त में… विज्ञापन पाठक वर्ग की मानसिकता के आधार पर दिये जाते है. यहाँ गुजराती अखबार में ना-ना प्रकार के विज्ञापन छप रहे है, मानो भारतीयों की यौन क्षमता समाप्त होने की कगार पर हो. मगर जो अंग्रेजी का अखबार है उसमें यह विज्ञापन नहीं है. क्योंकि उसे जो वर्ग उसे पढ़ता है उसे “जापानी तेल” में कोई रूची नहीं. वियाग्रा हो तो बात बने.

    विज्ञापन क्या लेना है, क्या नहीं लेना यह अखबार की अपनी नीति हो सकती है. नैतिकता की आशा बेमानी है. मगर जिस प्रकार के विज्ञापन आ रहे है उसके लिए पाठक, उनकी रूचियाँ व उत्पादक जिम्मेदार है. अखबार नहीं.

  3. एक शरारती बात मेरे मन में ये उठ रही थी कि अफलातूनजी ने लिखा तो सही व चिंतनशील है पर गूगल ठहरा बेदिमाग की मशीन भर अब कल से हस्‍तमैथून से लेकर, वियाग्रा, नस, तेल, कामदेव,स्‍वप्‍नदोष ये सब कीवर्ड आपके जिम्‍मे हो गए…अगर ब्‍लॉग ही अश्‍लील करार देकर चंति न कर दिया गया तो इन्‍हीं शब्‍दों के खोजक आपके द्वारे नजर आएंगे
    :) )

  4. पढें- अगर ब्‍लॉग ही अश्‍लील करार देकर वंचित न कर दिया गया

  5. अभी दो चार दिन पहले की ही बात है बिल्कुल यही बात दिल्ली में नये-नये लांच हुए नई दुनिया के बारे में कोई बता रहा था.

    हिन्दी पिछड़ों और असभ्यों की भाषा है. उस पर तुर्रा यह कि बिजनेस भी करना है. जाहिर सी बात है ऐसे असभ्यों के लिए यौन-शिक्षा की बड़ी जरूरत है.

    अब हम जैसे मूर्ख पत्रकार इन बातों को न समझ पायें तो इसमें बुद्धिमानी जमात का क्या दोष?

    अच्छा सवाल

  6. बचपन में सिनेमा हॉल के बाहर दो आने में सिनेमा के गानों की पुस्तिका मिलती थीं, उनके पीछे कुछ ऐसे ही विज्ञापन होते थे। लगता है हिन्दी समाचार पत्रों को इन विषयों पर कुछ जानकारीप्रद लेख भी प्रकाशित करने चाहिए।
    घुघूती बासूती

  7. Aap bahut acha kam kar rahe hai. Is samay desh ki janta ko apas men jodne ke jaroorat hai, Netaon ne is desh ko barbad kar ke rakh dia hai. Lekin sirf kahne ya likhne se kuch hone wala nahi. Azadi to 61 baras ho gaye hen aur halat din-ba-din bad se badtar hote ja rahe hain. Mayawati ho ya Mulayam Singh sab ek ke BAAP ek hain. Mera anurodh hai ki hum aap mil kar ek alakh jagain, logo ko ek doosre se joden taki ek nai shuruaat ki ja sake, halaki ye kahne jitne aasan hai karna utna hi mushkil hai, lekin shuruaat to karni hi padegi.
    Shrikrishna Verma
    Dehradun
    15-01-2009 9:25:00 A.M.

    EK REQUEST – MEN HINDI ME LIKHNA CHAHATA HUN, KRIPYA HELP KAREN KI HINDI ME KAISE LIKHU.

  8. हमारे अखबारों ने लालच के आगे घुटने टेक दिए हैं। इन अखबारों के मालिक, विभिन्‍न समारोहों में मुख्‍य अतिथि अथवा अध्‍यक्ष के रूप में नैतिकता के भाषण झाडते हैं और अपने ही अखबारों में ऐसे विज्ञापन छापते हैं।
    ये अखबार अपनी ‘हिमालयी’ प्रसार संख्‍या का हवाला ‘गर्जन-तर्जन’ करते हुए देते हैं किन्‍तु पांच-पांच सौ के विज्ञपानों के सामने औंधे सो जाते हैं। यदि इनकी प्रसार संख्‍या सचमुच वे वैसी ही है जैसी कि ये घोषणा करते हैं तब तो ये अखबार विज्ञापनदाताओं की मजबूरी होने चाहिए थे किन्‍तु हो रहा है एकदम उल्‍टा।
    यह कहना ठीक नहीं है कि ऐसे विज्ञापनों के लिए पाठक समुदाय जिम्‍मेदार है। दिल्‍ली प्रेस अपने प्रकाशनों में शराब और तम्‍बाखू उत्‍पादों के विज्ञपानों सहित ऐसे विज्ञापन नहीं छापता और तदनुसार घोषणा भी करता है।

Leave a Reply