काशी विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से जुड़े़ सभी बहुत फक्र से कहा करते थे कि यहाँ का विद्यार्थी गुंडों को हरा देता है । पूर्व अध्यक्ष और राजनारायण के निकट सहयोगी मार्कण्डेय सिंह के जमाने में गुंडा दामोदर सिंह हो अथवा बाद में मोहन प्रकाश के जमाने में माफ़िया वीरेन्द्र साही का सहयोगी उपेन्द्र विक्रम सिंह अथवा मेरे चुनाव लड़ना शुरु करने पर उपेन्द्र विक्रम का साथी भगवती सिंह – आपराधिक पृष्टभूमि के सभी धुरंधरों को छात्रों ने नकारा ।
मेरे छात्रावास (बिड़ला) का छात्रावास – अध्यक्ष बिना चुनाव के बना राजेन्द्र पहलवान था । उसका बहनोई हिटलर सिंह भी उसी छात्रावास में रहता था । ’हॉस्टल – डे’ पर रंडी का नाच कराने के नाम पर कमरे – कमरे हिटलर चन्दा मांगने निकले । मेरे कमरे कमरा नं २८६ में पहुंचे तब मैंने चन्दा देने से इनकार कर दिया ।
हिटलर – ’अभी पांच रुपैय्या नहीं दे रहे हो , कल शाम तक इन्हीं पांवों पर पांच सौ रुपये रखोगे ”
मैं – “रमाकान्त सिंह (उसका वास्तविक नाम यही है) जब पैसा देने से इनकार कर कर दिया तब उसका परिणाम भी झेलने की तैयारी है ।”
इसके बाद राजेन्द्र पहलवान कमरे में पहुंचे और हिटलर को पकड़ कर ले गये । मैंने अपनी लॉबी के अन्य कमरों में भी उस ’सांस्कृतिक – कार्यक्रम’ के लिए चन्दा देने से लड़कों को मना कर दिया । फलस्वरूप वे मेरी लॉबी को छोड़कर चले गये । अगले दिन परिसर में इस छोटी सी घटना की चर्चा तेजी से फैल गयी । मेरे कमरे में मनोबल बढ़ाने के लिए समाजवादी युवजन राधेश्याम , समाजवादी शिक्षक आनन्द कुमार और छात्र संघ अध्यक्ष मनोज सिन्हा अलग – अलग पहुंचे । उक्त ’सांस्कृतिक कार्यक्रम’ नहीं हुआ और रमाकान्त सिंह ने मुझे नमस्कार करना शुरु कर दिया । यह उलझन वाली बात थी लेकिन हमारे संगठन की इकाई के उद्घाटन के लिए जब हमारे नेता किशन पटनायक ब्रोचा छात्रावास में बोले तब उन्होंने कहा -’गुंडा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और खुद से मजबूत के पांव चाटता है’।
पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रमुख माफ़िया सरगना मोख्तार अन्सारी बनारस से बहुजन समाज पार्टी का उम्मीदवार है । अपराध की दुनिया में उसके प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी बृजेश सिंह का भतीजा सुशील सिंह भी इसी पार्टी का विधायक है । बनारस के अलग अलग मोहल्लों से एक साथ ३० से ४५ के समूह में लोगों को गाजीपुर के जिला कारागार में मोख्तार से मिलाने ले जाया जाता है । जेल से रुपये भी बाँटे जाते हैं। चुनाव आयोग के निर्देश पर आज उसका स्थानान्तरण कानपुर जेल हुआ है ।
मोख्तार को अपराधियों की ’आचार – संहिता’ की भी परवाह नहीं करता । बनारस के प्रमुख व्यवसाई नन्दकिशोर रुँगटा के अपहरण के बाद उसने फिरौती की मोटी रकम भी वसूली उसके बाद उनकी निर्मम हत्या कर दी थी ।
अक्सर भाषणों में लोग कहते हैं कि अपराधियों की जाति नहीं होती । यह कह कर मानो वे जाति को कोई पुनीत संस्था साबित करना चाहते हैं । जातियों का ध्रुवीकरण हमेशा मजबूतों के लिए होता है । इसलिए मुझे यह कहना ज्यादा उचित लगता है कि अपराधियों की ही जाति होती है । बनारस में तीन प्रमुख सवर्ण उम्मीदवारों के मुकाबले मोख्तार के लिए मुसलिम और दलित के अलावा कुछ पिछड़ों का भी जुड़ाव हो रहा है । बहुजन समाज पार्टी यदि यादवों के बीच सभा कर रही है तो उसके मंच पर पुलिस मुटभेड़ में मारे गये सपा के अपराधी सभासद बाबू यादव की विधवा अथवा एक अन्य मृत अपराधी अभिषेक यादव ’गुड्ड” के स्वजनों को बैठाती है। यानी- बिरादरी के गुंडे का नुकसान मतलब बिरादरी का नुकसान । जातिवाद जाति के प्रति प्रेम से ज्यादा जाति का उपयोग जाति के मजबूत लोगों की स्वार्थ – सिद्धि के लिए करना होता है ।
आज ही बिहार आन्दोलन के एक सिपाही मुजफ़्फ़रपुर के रमण कुमार से भेंट हुई। तिब्बती केन्द्रीय विश्वविद्यालय में चल रहे ’हिन्द स्वराज” की शताब्दी के मौके पर आयोजित एक शिबिर में भाग लेने वे सारनाथ आये हुए हैं । उन्होंने बताया उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी सहयोगी विहीन कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रत्याशी जुटाने का संकट था इसलिए उसने अपराधियों को थोक में अपना उम्मीदवार बना डाला है ।

सही है, अपराधियों की भी जाति होती है। हम तो मानते हैं जाति केवल दो, कमेरों और लुटेरों की होती हैं।
“गुंडा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और खुद से मजबूत के पांव चाटता है।”
“अपराधियों की ही जाति होती है।”
“जाति का उपयोग जाति के मजबूत लोगों की स्वार्थ-सिद्धि के लिए करना जातिवाद है।”
– उपर्युक्त परिभाषाएं भारतीय समाज के (शर्मसार करने वाले) यथार्थ से उपजी हैं, इसलिए बहुत सटीक और प्रासंगिक हैं।
‘गुण्डों की ही जाति होती है’ सुनना बहुत अच्छा लगा। यह जाति शब्द जिससे मेरी पीढ़ी के बहुत से लोग सोचते थे कि हमने मुक्ति पा ली है आज दिन रात बेशर्मी से उछाला जा रहा है। किसी को भी इसका दुरुपयोग(क्या इसका कोई सदुपयोग भी होता है?) करते हुए लेशमात्र भी लज्जा नहीं आती। मन, आत्मा यह शब्द पढ़ पढ़कर तिक्त हो गई है। धर्मनिर्पेक्षता का दिनरात पाठ करने वाले जितना जाति के नाम को भुनाते हैं उतना तो शायद अपने को धार्मिक कहने वाले भी न भुनवाते हों। क्या धर्मनिरपेक्षता के साथ जाति निर्पेक्षता की आवश्यकता नहीं है?
जाति का चुनावों व राजनीति में इतना महत्व हो गया है कि भारतीय कहलाने में लज्जा आती है। हम जैसे लोग जिन्होंने जाति को कभी महत्व नहीं दिया व जाति से बाहर विवाह करके जातिविहीन हो गए, लगता है कि इस जातिवाद के चलते किसी दिन देशविहीन भी हो जाएँगे। हर राजनैतिक दल जाति के आधार पर उम्मीदवार खड़ा कर रहा है। जो अपवाद हैं उनके बारे में कोई जानकारी ही नहीं मिलती। मतदान करने की इच्छा ही नहीं होती। जब जाति को ही नहीं मानती तो जाति के नाम पर खड़े किए गए उम्मीदवार को अपना मत देने को आत्मा गवाही नहीं देती।
बहुत दिन से जाति विषय पर लिखने का मन था। आज यहाँ पर अपना क्षोभ व्यक्त कर रही हूँ।
घुघूती बासूती
“अक्सर भाषणों में लोग कहते हैं कि अपराधियों की जाति नहीं होती । यह कह कर मानो वे जाति को कोई पुनीत संस्था साबित करना चाहते हैं । जातियों का ध्रुवीकरण हमेशा मजबूतों के लिए होता है । इसलिए मुझे यह कहना ज्यादा उचित लगता है कि अपराधियों की ही जाति होती है ।”
” गुंडा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और खुद से मजबूत के पांव चाटता है ।”
सहमति में मेरा भी हाथ उठा है .
आपके विचारों में वह ज्वाला देख रहा हूँ जो सिर्फ १) प्रबुद्ध, २) सशक्त, और ३) छात्रों में होती है। इन गुंडों के खिलाफ चुनाव लड़ने के बारे में क्यों नहीं सोचते?
अपराध व राजनीति आज पर्याय बन गए हैं। कोई भी शालीन व्यक्ति राजनीति में कदम नहीं रख सकता जब तक उसका किसी माफिया से कोई समझौता नहीं है।
सहमत हूं आपसे …
विभीन्न वादों से परे ‘गुन्डावाद’ पर आपके विचार
अछे लगे..
अपराधियों की जाति और वर्ण व्यवस्था अलग होती है, और जिसकी लाठी में जितना जोर होगा वह उतना उच्च वर्णीय होगा.
हम सभी इनसे लढने की सोच नही सकते जब तक हम भी इनकी जाति में शामिल नही हो जाते. गुण्डो के पिरामिड का शीर्श स्थान पर मगर एक नेता होता है.
Gundagardi ko shabdon ke chalave mein chupne nahin dena chahiye.
’गुंडा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और खुद से मजबूत के पांव चाटता है’।
‘जातियों का ध्रुवीकरण हमेशा मजबूतों के लिए होता है । इसलिए मुझे यह कहना ज्यादा उचित लगता है कि अपराधियों की ही जाति होती है ।’
यही वे उक्तियां हैं जो आपको वि्श्वसनीय और हम सबका प्रिय बनाती हैं. ये उक्तियां बिना उत्कट जीवनानुभव और बिना कठिन सामाजिक संघर्ष के निकल नहीं सकतीं.
सबसे पहले तो हमें एक ‘आधुनिक’ और ‘सामंती’ mindset से मुक्त समाज बनाने के लिए लड़्ना होगा. पढ़्ते हुए आप्के बारे में और जानने का मौका मिला.
uday prakash
’गुंडा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और खुद से मजबूत के पांव चाटता है’।
Kishan ji ki yeh paribhasha acchi lagi. Aap apna yeh sateek samaalokan jari rakhen.
Fr. Anand
बहुत बढ़िया पोस्ट है अफ्लू भाई…अक्षरशः एक एक बात सही है। इन्हीं अनुभवों का प्रासंगिक प्रसाद समय समय पर आप हमे देते हैं। हम तो यूं ही पा जाते हैं…क्योंकि प्रसाद पाने का बुलावा भी मिल जाता है…:)
आभार, क्रम बना रहे…
Aapki baten bilkul sahi hain…lekin gundon ki taqat isliye badhi hai aur unhe ek vaidhata mili hai kyonki rajya logon ko nyay aur shushan dene me vifal ho gaya hai…gundon ne ek samanantar vyavashtha khadi kar di hai…rajya ne unke aage ghutane take diye hain…
[...] का नाम भी आ रहा है । गत दिनों लिखी मेरी एक पोस्ट पर आनन्द प्रधान की टिप्पणी का स्मरण [...]
[...] अपराधियों की ही जाति होती है [...]
[...] अपराधियों की ही जाति होती है [...]
[...] अपराधियों की ही जाति होती है [...]
आजकल आसपास जातिवादी लोग कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं, जो अपने टुच्चे स्वार्थों के लिए जाति का इस्तेमाल करने का कोई रास्ता नहीं चूकते. सवर्णों के जातिवाद से तो हम नफ़रत करते ही हैं, अब उसी तर्ज पर दलितों और ओबीसी का जातिवाद भी दिखने में आ रहा है, ताक़तवर के पक्ष में जाति का इस्तेमाल! आपने सही कहा अपराधियों की ही जाति होती है. मैं जोड़ना चाहता हूं कि ग़रीबों और न्यायप्रिय लोगों की कोई जाति नहीं होती.
सही और सटीक बात जोड़ी , भूपेन । शुक्रिया ।
बिलकुल सही कहा आपने , राजनैतिक दल भी चुनाव छेत्रो का जातिगत सर्वेक्षण कर ही उमीदवार तय करते है , हद तो तब हो जाती है जब जाति के लोगो का समर्थन अच्छे और नेक इन्सान को नहीं मिलकर अपराधी चरित्र वाले उमीदवारो को मिलता है और वे चुनाव जीत जाते है ! ऐसा प्रतीत होता है कि अब जातियों का अपराधीकरण हो रहा है !
हाँ जी। जाति तो होती है इनकी।
Aap se hum sahamat hain,jaati ko hindustan se mita dena chahiye!!!
‘गुंडा वह है जो अपने से मजबूत के पांव चाटता है तथा अपने से कमजोर को सताता है’
यह वाक्य लोहिया जी ने भी कहा है, ऐसा मैने कहीं पढ़ा है या किसी से सुुना है परन्तु अफसोस है कि मै इसका ब्पजंजपवद अभी नहीं दे पा रहा हूँ। परन्तु अफलातून जी के अनुसार गुंडे की यह परिभाषा किशन पटनायक जी ने बिरला छात्रावास में अपने आगमन के दौरान दी थी।
जो भी हो लेकिन उपरोक्त समाजवादियों के अलावा इस सूक्ति का प्रयोग माक्र्स ने अपने लेख ‘अंग्रेज बुर्जुआ वर्ग’ में किया है जिसका उल्लेख 1981 में प्रगति प्रकाशन मास्को से प्रकाशित पुस्तक ‘माक्र्सं, एंगेल्स: साहित्य तथा कला’ के पृष्ठ 357 पर है। इस पृष्ठ की स्कैन्ड कापी मै यहां चस्पा कर रहा हूँ।
इस लेख में माक्र्स यथार्थवादी अंग्रेज उपन्यासकारों जैसे दिकेन्स, थैक्रे इत्यादि के कार्यो के महत्व के बारे में चर्चा कर रहे है जिन्होंने बुर्जुआ वर्ग की विभिन्न श्रेणियों का चरित्र चित्रण किया है। यथार्थवादी अंग्रेज उपन्यासकारों के अनुसार बुर्जुआ वर्ग की विभिन्न श्रेणियों का चरित्र ऐसा है जो अपने से उँचे का तलवा चाटते है तथा अपने से नीचे के प्रति निरंकुशता बरतते हैं।
बुर्जुआ समाज के इस आम चारित्रिक विशेषता को किसी खास तरह के व्यक्तियों या समुदाय के साथ सीमित कर देना उचित नहीं हैं क्योंकि यह लोगों को सच्चाई की समझदारी से दूर ले जाती है। इस सन्दर्भ में तो सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण के तौर पर तेज तर्रार पत्रकार और एक बड़े बुद्धिजीवी श्री आनन्द प्रधान जी की टिप्पणी को हम देख सकते है। आनन्द प्रधान जी के अनुसार गुंडो की ताकत इसलिए बढ़ी है क्योंकि राज्य लोगों को न्याय और सुशासन देने में विफल रहा है। आनन्द प्रधान जी के इस टिप्पणी से स्पष्ट हो जाता है कि न तो उन्हे पदानुक्रम ढांचे पर आधारित पूंजीवादी समाज के विभिन्न श्रेणियों के आम चरित्र के बारे में कुछ पता है और न तो स्वंय राज्य के चरित्र के बारे में ही। क्योंकि अगर वह देख पाते तो उन्हें यह पता चल जाता कि राज्य स्वंय एक सर्वशक्तिमान गुंडे के रूप में काम करता है, जिससे आनन्द प्रधान न्याय की मांग कर रहे हैं। ऐसे में आनन्द प्रधान की समझदारी पर शेक्सपीयर के शब्दों में हम कह सकते है जो उसने मैकबेथ से कहलवाया था श्। ज्ंसम जवसक इल ंद प्कपवजए ूपजी निसस ेवनदक ंदक नितलए ेपहदपलिपदह दवजीपदहश्