” हम एक अरसे से इस बात को मानने के आदी बन गये हैं कि आम जनता को सत्ता या हुकूमत सिर्फ़ धारासभाओं के (विधायिका) जरिये मिलती है । इस खयाल को मैं अपने लोगों की एक गंभीर भूल मानता रहा हूँ । इस भ्रम या भूल की वजह या तो हमारी जड़ता है या वह मोहिनी है , जो अंग्रेजों के रीति – रिवाजों ने हम पर डाल रखी है । अंग्रेज जाति के इतिहास के छिछले या ऊपर – ऊपर के अध्ययन से हमने यह समझ लिया है कि सत्ता शासन – तंत्र की सबसे बड़ी संस्था पार्लमेण्ट से छनकर जनता तक पहुंचती है । सच बात यह है कि हुकूमत या सत्ता जनता की बीच रहती है , जनता की होती है और जनता समय – समय पर अपने प्रतिनिधियों की हैसियत से जिनको पसंद करती है , उनको उतने समय के लिए सौंप देती है । यही क्यों , जनता से भिन्न या स्वतंत्र पर्लमेण्टों की सत्ता तो ठीक , हस्ती तक नहीं होती । पिछले इक्कीस बरसों से भी ज्यादा अरसे से मैं यह इतनी सीधी – सादी बात लोगों के गले उतारने की कोशिश करता रहा हूँ । सत्ता का असली भण्डार या खजाना तो सत्याग्रह की या सविनय कानून-भंग की शक्ति में है । एक समूचा रा्ष्ट्र अपनी धारासभा के कानूनों के अनुसार चलने से इनकार कर दे , और इस सिविल नाफ़रमानी के के नतीजों को बरदाश्त करने के लिए तैयार हो जाए तो सोचिए कि क्या होगा ! ऐसी जनता सरकार की धारासभा को और उसके शासन – प्रबन्ध को जहाँ का तहाँ , पूरी तरह , रोक देगी । सरकार की , पुलिस की या फौज की ताकत , फिर वह कितनी ही जबरदस्त क्यों न हो , थोड़े लोगों को ही दबाने में कारगर होती है । लेकिन जब समूचा राष्ट्र सब कुछ सहने को तैयार हो जाता है , तो उसके दृढ़ संकल्प को डिगाने में किसी पुलिस की या फौज की कोई जबरदस्ती काम नहीं देती ।
फिर पार्लमेण्ट के ढंग की शासन – व्यवस्था तभी उपयोगी होती है , जब पार्लमेण्ट के सब सदस्य बहुमत के फैसलों को मानने के लिए तैयार हों । दूसरे शब्दों में , इसे यों कहिए कि पार्लमेण्टरी शासन – पद्धति का प्रबन्ध परस्पर अनुकूल समूहों में ही ठीक – ठीक काम देता है ।
यहाँ हिन्दुस्तान में तो ब्रिटिश सरकार ने कौमी तरीके पर मतदाताओं के अलग – अलग गिरोह खड़े कर दिए हैं , जिसकी वजह से हमारे बीच ऐसी बनावटी दीवारें खड़ी हो गयी हैं , जो आपस में मेल नहीं खातीं ; और ऐसी व्यवस्था के अंदर हम पार्लमेण्ट के ढंग की शासन – पद्धति का दिखावा करते आये हैं । ऐसी अलग – अलग और बनावटी इकाइयों को , जिनमें आपसी मेल नहीं है , एक ही मंच पर एक से काम के लिए इकट्ठा करने से जीतती – जागती एकता कभी पैदा नहीं हो सकती । सच है कि इस तरह की धारासभाओं के जरिए राजकाज का काम ज्यों-त्यों चलता रहता है ; लेकिन इन धारासभाओं के मंच पर इकट्ठा हो कर हम तो आपस में लड़ते ही रहेंगे , और जो भी कोई हम पर हुकूमत करता होगा , उसकी तरफ़ से समय – समय पर मिलने वाले हुकूमत के टुकड़ों को बाँट खाने के लिए हम तरसते रहेंगे । हमारे ये हाकिम कड़ाई के साथ हमें काबू में रखते हैं ,और परस्पर विरोधी तत्वों को आपस में झगड़ने से रोकते हैं । ऐसी शर्मनाक हालत में से पूर्ण स्वराज्य प्रकट होना मैं बिलकुल असंभव मानता हूँ ।
धारासभाओं के और उनके काम के बारे में मेरे खयाल इतने कड़े हैं ; फिर भी मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि जब तक चुनावों के जरिए बनने वाली प्रातिधिक संस्थाओं के लिए गलत उम्मेदवार खड़े रहते हैं , तब तक उन संस्थाओं में प्रगतिविरोधी लोगों को घुसने से रोकने के लिए हमें अपने उम्मीदवार खड़े करने चाहिए ।
- ( गांधी जी , अनुवादक – काशीनाथ त्रिवेदी , रचनात्मक कार्यक्रम,१३-११-१९४५, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर,पृष्ट- १० से १२ )
लोगों की एक गंभीर भूल : महात्मा गांधी
अप्रैल 12, 2009 अफ़लातून अफलू द्वारा

democracy is far the people,buy the people n off the people.गलत मे से सबसे कम गलत को चुनने की मज़बूरी है चुनाव्।
बात बहुत गंभीर और विचारणीय है। लेकिन हमेशा सत्याग्रह करते भी तो नहीं रहा जा सकता है। कोई तो राज्यव्यवस्था अपनानी होगी। भारतीय परिस्थितियों में तंत्र कैसा होना चाहिए? यह तो शोध का विषय है।
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