नर – नारी समता और निजी कानून : डॉ. स्वाति

[ वरिष्ट अधिवक्ता एवं लोकप्रिय चिट्ठेकार दिनेशराय द्विवेदी ने कल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक नि:संतान हिन्दू विधवा द्वारा अर्जित सम्पत्ति पर विवाह के तीन माह बाद गुजर गये पति के वारिसों का हक मुकर्रर करने के फैसले का विवरण अपने चिट्ठे पर दिया था । दिनेशजी ने उक्त पोस्ट में फैसले की बारीकियों को अत्यन्त सरल ढंग से हिन्दी ब्लॉगजगत के पाठकों के समक्ष रखा , जिसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं । हमारे देश में प्रचलित विभिन्न धर्मों के निजी कानूनों में स्त्री को अशक्त बनाये रखने के लिए नाना प्रकार के प्रावधान किए गए हैं । देश के संविधान निर्माताओं की मंशा के अनुरूप समान नागरिक संहिता लागू करने की हर ईमानदार कोशिश को निजी कानूनों के स्त्री विरोधी स्वरूप को बदल कर सफल बनाया जा सकता है । समाजवादी जनपरिषद द्वारा १६ नवम्बर १९९६ को दिल्ली में इस विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई थी । दल की तत्कालीन राष्ट्रीय सचिव तथा उक्त संगोष्ठी की संयोजक डॉ. स्वाति ने उक्त विषय पर यह परचा प्रस्तुत किया था । विषय के विभिन्न पहलुओं पर गहराई से विचार करने में यह लेख सहायक होगा। - अफ़लातून ]

किसी भी देश के कानून उसके समाज के नियमों का सार या निचोड़ होते हैं । कानून परंपरा व सांस्कृतिक धारावाहिकता का व्यावहारिक रूप धर लेते हैं । इसीलिए आज बाल – विवाह व सती प्रथा के खिलाफ कानून है । यह जरूर गौरतलब है कि बाल विवाह ग्रामीण समाजों में अबाध रूप से होते रहे हैं , हो रहे हैं । दहेज विरोधी कानून होने के बावजूद धन , उपभोक्ता सामान , उपयोगी – अनुपयोगी वस्तुओं से वधु को लैस कर ससुराल भेजा जाता है ताकि उसे सहज स्वीकारा जाए । दहेज प्रथा को सामाजिक कलंक की जगह सामाजिक प्रतिष्ठा का मनदण्ड बना लिया गया है । राजाओं से उपजा यह विवाह का विधान हिंदू ही नहीं , मुसलमान व ईसाई समाज को प्रभावित कर रहा है । मुस्लिम समाज में भी दहेज के कारण बहुएँ जलाई तक जाने लगी हैं । कुप्रथाओं को जड़ जमाने में देर नहीं लगती ।

अँग्रेजों ने अपने राज के समय विभिन्न धर्मों के कानूनों को न छेड़ना ही लाभप्रद समझा था ताकि इनको हटाने से उपजे विद्रोह को झेलना न पड़े । अपराधों के खिलाफ़ तो एक सर्वमान्य भारतीय दंड संहिता थी और आज भी है । परंतु व्यक्तिगत मामलों में विभिन्न धर्मों के भिन्न निजी कानून (पर्सनल कोड ) थे । आज भी भिन्न भिन्न निजी कनून हैं । जीवन के जिन क्षेत्रों को वे प्रभावित करते हैं , वे हैं :

  1. संपत्ति का उत्तराधिकार , विरासत का हक़
  2. विवाह तथा विवाह-विच्छेद (तलाक )
  3. गोद लेने का हक़
  4. पुत्र व पुत्री के अभिवावकत्व (गार्जियनशिप ) का अधिकार
  5. परित्यक्ता व तलाकशुदा को गुजारा मिलने का हक़

कुछ हिंदूवादी लोगों व संस्थाओं के लगातार प्रचार से भारतीय समाज में यह धारणा आम है कि सिर्फ इस्लाम से जुड़े निजी कानून औरत के हक़ के खिलाफ़ हैं । इस धारणा को बल देने के लिए वे मुसलमानों में बहुपत्नी प्रथा ( पुरुष को चार शादियाँ करने का हक़ ) व जबानी तलाक़ या तलाके बिद्दत को उदाहरणार्थ पेश करते हैं । यह प्रचार भी होता है कि स्वाधीनता के बाद सभी धर्मों ने अपने – अपने धार्मिक कानून छोड़ दिए , विशेषत: हिंदुओं ने ने , जो उदारवादी हैं परंतु मुसलमान अपने कठमुल्लापन के कारण अपने निजी कानून को नहीं बदलने देते ।

वस्तुस्थिति कुछ और है

भारत के तीन प्रमुख धर्मों के निजी कानून हैं । इनके अलावा पारसी व पुर्तगाली सिविल कोड है । सिख , जैन , बौद्ध व आदिवासी अपने विवाह , विवाह-विच्छेद (छुटकारा) अपनी अपनी सामाजिक रीतियों के अनुसार करते हैं – मगर कानून इन्हें हिंदू ही माना गया है ।

सर्वप्रथम हिंदू धार्मिक कानूनों के बारे में चर्चा करें । संपत्ति के उत्तराधिकार के नियम हिंदू कोड में पुरुष सत्तात्मक समाज की प्रथा से बँधे हुए हैं । कहने को तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में पुत्र – पुत्रियों को समान अधिकार प्राप्त है परंतु जिस प्रवर समिति ने यह अधिनियम बनाया था उसने पुराने कानून “मिताक्षर” को समाप्त करने की राय दी थी । परंतु तत्कालीन भारत सरकार भी शायद अँग्रेजों की तरह झंझटों से बचना चाहती थी इसलिए मिताक्षर सह-उत्तराधिकार प्रणाली को नहीं हटाया और अभी भी वह कानून में है । हिंदु संयुक्त परिवार प्रणाली की व्यवस्था है कि उत्तराधिकार का हक़ प्रत्यावर्तन द्वारा हो न कि महज संतान होने के हक़ से । और संयुक्त परिवार के सदस्य केवल पुरुष ही होंगे । इस प्रणाली में पुत्र जन्म से ही पिता की संपत्ति का वारिस बनता है व पुत्री पिता की मृत्यु के बाद ही । पुत्र-पुत्री में सही माने में बराबरी का हिस्सा नहीं बनता ।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम ( 1956 ) की धारा 4(2) के मुताबिक जोत की जमीन का विभाजन रोकने के लिए अथवा जमीन की अधिकतम सीमा निर्धारण के लिए , पुत्री को जमीन की विरासत का अधिकार नहीं दिया गया । महिलाओं को काश्तकारी से वंचित किया गया । वे खेत में काम कर सकती हैं मगर उसकी मालिक नहीं बन सकती ।

विवाहोपरान्त पति की व्यक्तिगत संपत्ति का आधा हिस्सा अधिकारस्वरूप माँगने पर तर्क दिया जाता है कि पैतृक व पति की , दोनों संपत्ति का हक़ औरत को क्यों मिले ? सच्चाई यह है कि विशेष विवाह अधिनियम ( स्पेशल मैरेज एक्ट 1954 ) के अंतर्गत विवाह करने के बाद भी पुरुष उत्तराधिकार संबंधी नियमों में पुरानी धार्मिक प्रथाओंद्वारा बनी प्रणाली से उत्तराधिकार तय कर सकता है । उत्तराधिकार अधिनियम की धारा – 30 के अंतर्गत वह वसीयत द्वारा अपनी संपत्ति किसी के भी नाम लिख सकता है ।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा – 23 के अधीन यदि किसी स्त्री को एक मकान विरासत में मिला है और उसमें उसके पैतृक परिवार के सदस्य रह रहे हैं तो उसे उस मकान का बँटवारा करने का कोई अधिकार नहीं है । और कि वह स्वयं उसमें तब ही रह सकती है जब वह अविवाहित हो या तलाकशुदा । अगर कोई निस्संतान विधवा हिंदू स्त्री वसीयत किए बिना मरती है तो उसकी संपत्ति उसके पति के वारिसों को सौंप दी जाएगी । अपवाद स्वरूप अगर उसे कोई संपत्ति माता – पिता से मिली हो तो उपर्युक्त परिस्थिति में वह उसके पिता के वारिसों को मिलेगी । यह यदि पितृसत्तात्मक व्यवस्था का न्याय नहीं है तो और क्या है ? हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956 ) के अलावा हिंदू विवाह अधिनियम (1955 ) , हिंदू दत्तक व भरण पोषण अधिनियम (1956) जैसे कानून महिलाओं के प्रति विषम दृष्टिकोण के ज्वलंत उदाहरणों से भरे हैं ।

( जारी )

7 Responses

  1. Till the time society gets over this “purak” comcept nothing can be done . purak means when two individuals complete each other and it was when woman were not earning and man were sole bread winners .
    concepts of our society are obslete in todays context and the law is also based on these concepts

    हिन्दू उत्तराधिकार कानून बदलाव — यानी सफर “पूरक ” के लेवल से उठा कर ” इंडिविजुअल आईडनटिटी ” तक

    woman wether married on unmaaried dont really bother about laws they rather want to reamin protected under man so no change in society is possible till woman themselfs come out at all levels and ASK FOR THEIR RIGHTS GIVEN BY CONSTITUTION AND LAW .
    how to bring this awerness in woman is most tedious task because woman are INDIFFERENT

  2. आलेख बहुत उपयोगी और जानकारी युक्त है। लेकिन …

    ….. संयुक्त परिवार के सदस्य केवल पुरुष ही होंगे । इस प्रणाली में पुत्र जन्म से ही पिता की संपत्ति का वारिस बनता है व पुत्री पिता की मृत्यु के बाद ही । पुत्र-पुत्री में सही माने में बराबरी का हिस्सा नहीं बनता ।….

    हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 के संशोधन लागू होने पर यह स्थिति बदल गई है। अब लड़कियाँ भी संयुक्त परिवार की संपत्ति में उसी तरह भागीदार हैं जैसे कि पुरुष हैं। उन्हें समान अधिकार दे दिए गए हैं। नई धारा –6 का अवलोकन करें….

    6. Devolution of interest in coparcenary property.-(1) On and from the commencement of the Hindu Succession (Amendment) Act, 2005, in a Joint Hindu family governed by the Mitakshara law, the daughter of a coparcener shall,-

    (a) by birth become a coparcener in her own right in the same manner as the son;

    (b) have the same rights in the coparcenary property as she would have had if she had been a son;

    (c) be subject to the same liabilities in respect of the said coparcenary property as that of a son,

    and any reference to a Hindu Mitakshara coparcener shall be deemed to include a reference to a daughter of a coparcener:

    Provided that nothing contained in this sub-section shall affect or invalidate any disposition or alienation including any partition or testamentary disposition of property which had taken place before the 20th day of December, 2004.(2) Any property to which a female Hindu becomes entitled by virtue of sub-section (1) shall be held by her with the incidents of coparcenary ownership and shall be regarded, notwithstanding anything contained in this Act, or any other law for the time being in force, as property capable of being disposed of by her by testamentary disposition.

    (3) Where a Hindu dies after the commencement of the Hindu Succession (Amendment) Act, 2005, his interest in the property of a Joint Hindu family governed by the Mitakshara law, shall devolve by testamentary or intestate succession, as the case may be, under this Act and not by survivorship, and the coparcenary property shall be deemed to have been divided as if a partition had taken place and,-

    (a) the daughter is allotted the same share as is allotted to a son;

    (b) the share of the pre-deceased son or a pre-deceased daughter, as they would have got had they been alive at the time of partition, shall be allotted to the surviving child of such pre-deceased son or of such pre-deceased daughter; and

    (c) the share of the pre-deceased child of a pre-deceased son or of a pre-deceased daughter, as such child would have got had he or she been alive at the time of the partition, shall be allotted to the child of such pre-deceased child of the pre-deceased son or a pre-deceased daughter, as the case may be.

    Explanation.- For the purposes of this sub-section, the interest of a Hindu Mitakshara coparcener shall be deemed to be the share in the property that would have been allotted to him if a partition of the property had taken place immediately before his death, irrespective of whether he was entitled to claim partition or not.

    (4) After the commencement of the Hindu Succession (Amendment) Act, 2005, no court shall recognise any right to proceed against a son, grandson or great-grandson for the recovery of any debt due from his father, grandfather or great-grandfather solely on the ground of the pious obligation under the Hindu law, of such son, grandson or great-grandson to discharge any such debt:
    Provided that in the case of any debt contracted before the commencement of the Hindu Succession (Amendment) Act, 2005, nothing contained in this sub-section shall affect-

    (a) the right of any creditor to proceed against the son, grandson or great-grandson, as the case may be; or

    (b) any alienation made in respect of or in satisfaction of, any such debt, and any such right or alienation shall be enforceable under the rule of pious obligation in the same manner and to the same extent as it would have been enforceable as if the Hindu Succession (Amendment) Act, 2005 had not been enacted.

    Explanation.-For the purposes of clause (a), the expression “son”, “grandson” or “great-grandson” shall be deemed to refer to the son, grandson or great-grandson, as the case may be, who was born or adopted prior to the commencement of the Hindu Succession (Amendment) Act, 2005.(5) Nothing contained in this section shall apply to a partition, which has been effected before the 20th day of December, 2004.Explanation.- For the purposes of this section “partition” means any partition made by execution of a deed of partition duly registered under the Registration Act, 1908 (16 of 1908) or partition effected by a decree of a court.
    (The whole of the Sec.6 is substituted by THE HINDU SUCCESSION (AMENDMENT) ACT, 2005 NO. 39 OF 2005.)

    लेकिन अभी भी धारा -15 व 16 अपरिवर्तित हैं।

    वास्तविकता तो यह है कि जहाँ भी स्त्रियों के प्रति कानून में असमानता है वह दूर की जानी चाहिए।
    समाज तो अपनी गति से बदलेगा, लेकिन कानून तो बदला जा सकता है। यह बदलाव समाज को बदलने में सकारात्मक भूमिका अदा करेगा।

  3. Kuch anjaan pahluon se ru-ba-ru karati hai yeh post.

  4. बहुत ही उपयोगी लेख, बहुत सही समय पर पढ़वाने के लिए डॉक्टर स्वाति व आपका धन्यवाद।
    सोचने की बात है कि पितृसत्ता में नियम , कानून, रीति रिवाज, धर्म सब वे ही होंगे जो पुरुषों के लिए लाभदायक हों। यह स्वाभाविक है। नियम गढ़ने वाला स्वाभाविक रूप से अपना ध्यान रखेगा। यदि हम चाहते हैं कि स्त्री को न्याय मिले तो पितृसत्ता को तोड़ना सबसे पहला कदम होगा। कोई नया कानून व जीवन प्रणाली, जो कि सबके लिए न्यायपूर्ण हो, को लाना होगा।
    जब किसी पुरानी प्रथा का अन्त होगा तो नई प्रथा को समझने व उसके अनुसार मानसिकता विकसित करने में समय भी लगेगा और नए का विरोध भी होगा। पुरुष इतनी सरलता से अपना विशेष सामाजिक व आर्थिक रुतबा, दर्जा व प्रतिष्ठा नहीं छोड़ेगा। बहुत सी स्त्रियाँ भी इस प्रथा के अन्त का विरोध करेंगी। जब तक सब ठीक चल रहा है वे ‘don’t fix what is not broken’ की अवधारणा के अन्तर्गत जो चल रहा है चलने दो ही कहेंगी। किन्तु सड़क पर आने से पहले ही यदि अपने अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ तो बेहतर है। प्रत्येक स्त्री के लिए कानून की कमियों को समझने से पहले स्वयं आग से गुजरना पड़े यह आवश्यक नहीं होना चाहिए।
    जब तक ऐसे कानून नहीं बदलते तब तक जो स्त्रियाँ स्वयं सम्पत्ति का सृजन कर समझदारी से अपने जीवनकाल में ही अपनी वसीयत बनाकर अपनी बेटियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य रच रही हैं, उनको मेरा सलाम। वे नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं,वे काँटों भरे जंगल में चलकर जो पगडंडी बना रही हैं वह देखते ही देखते सपाट सड़क बन जाएगी जिसपर भविष्य की युवतियाँ आराम से चल पाएँगीं।
    लेख के शेष भाग की प्रतीक्षा है।
    घुघूती बासूती

  5. डा. स्वाति जी का आलेख बहुत सी जानकारी दे गया साथ ही सभी की टीप्पणियाँ भी और बता रहीँ हैँ
    आभार …
    – लावण्या

  6. Thanks for bringing your perspective and taking this issue into action.

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