प्यारे आफ़्लू, वेड़छी/०१/०८/०९
रक्षाबन्धन के बहाने कम से कम एक पत्र लिख देती हूँ – मुझे ही आश्चर्य होता है । फोन, ईमेल , चैट का जमाना है । पिछले एक सप्ताह से बारिश के कारण ’मोडेम’ खराब हो गया है । फोन दो दिनों से कर्कश स्वर से नाम के वास्ते चालू हुआ है। कभी बंद , कभी चालू ऐसे ही बाहरी धूप-छाँव की तरह चल रहा है ।
इस वर्ष मेरे वस्त्रविद्या कार्यक्रम में एक नया मोड़ आया है । वार्षिक आवश्यकता का २५ मीटर कपड़ा ३० जनवरी २०१० तक बनाना है । १०० गुण्डी सूत लगेगा । ७५ गुण्डी हो चुका है। बारिश खतम होते अपने हाथों से कुछ सूत रंग कर दिसम्बर में बुनाई करना है । यरवड़ा चक्र से रोज के एक से देढ़ घण्टा कताई करने से हो जायेगा । बीच – बीच में प्रवास में रहती हूँ इसलिए आज कल रोज तीन घण्टा कताई करती हूँ । अंबर चरखा (दो तकुआ) से तो पूरे परिवार की कपड़ों की आवश्यकता पूरी की जा सकती है – एक घण्टा प्रति दिन समय देकर । मुझे अंबर रुचता नहीं है ।
बाबूभाई आजकल एक किताब लिखने में व्यस्त हैं । अभी तो पढ़ाई कर रहे हैं । विभाजन और गांधी । अगस्त की २२ तारीख तक घर पर ही हैं । अभी तो किताब हाथ में लिये बैठे बैठे सो रहे हैं !
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५ या ६ को रक्षाबन्धन है । जब भी हो प्यार से बाँधना ।
खूब खूब प्यार -
उमादीदी .
बहन के हाथ – कते सूत से बनी यह राखी हाथ – लिखे इस ख़त के साथ ही मिल सकती थी , इन्टरनेट से नहीं । आज बात हुई तो पता चला ९३ गुण्डी सूत कात चुकी है । एक गुण्डी यानी १०० मीटर , १० गुण्डी = एक किलोमीटर और उसकी सालाना जरूरत की १०० गुण्डी मतलब १० किलोमीटर सूत । हाल ही में पढ़ी हबीब तनवीर की कविता याद आई – एक जरूरी हिसाब यह भी होता !
आज पिताजी से पूछा , ’आप बड़े या गांधी की खादी ?’ उन्होंने बताया कि खादी के प्रसार और विकास के लिए बना संगठन (अखिल भारत चरखा संघ ) उनके जन्म के कुछ माह बाद १९२५ में गठित हुआ था लेकिन १९२१ में मदुरै में काठियावाड़ी पग्गड़ छोड़ने के बाद गांधी ने खादी अपना ली थी । पारम्परिक चरखा एक बड़े चक्र और तकुए वाला था । उसे यात्रा में ले कर चलना कठिन था । यरवदा जेल से साबरमती आश्रम में मगनलाल गांधी और श्री आशर को गांधी चरखे में सुधार के बारे में लगातार ख़त लिखते – ’ एक की जगह दो चक्र लगाओ , एक बड़ा और एक छोटा । क्या दोनों चक्र एक बक्से (’पेटी’ शब्द मराठी – गुजराती में चलता है ) में अट सकते हैं ?’ गांधी की इन चिट्ठियों की मदद से साबरमती और बारडोली आश्रम के ’सरंजाम केन्द्रों’(वर्कशॉप) में पोर्टेबल पेटी चर्खा बना – यरवदा चक्र । मगनलाल गांधी ने एक डिबरी भी विकसित की थी – इसका मगन-दीप नाम पड़ा ।
यूँ तो हमारे बाप की पैदाईश के वक़्त भी उनका गू-मूत खादी के कपड़े से हुआ होगा । उसका महत्व नहीं है । बाप – दादा के कारण खादी अपनाने को अपनाना नहीं कहा जा सकता । ’ कातो ,समझ – बूझ कर कातो । जो काते से पहने , जो पहने सो काते ’ – इसे अपनाना असल बात है । वस्त्र स्वावलंबन का मर्म समझाने वाली इन काव्यमय पंक्तियों के रचयिता गांधी थे ।
We need production by masses not mass production.
अथवा The Earth has enough to fulfill everyone’s need but does not have enough to satisfy even a single person’s greed.
गांधी के मानवीय अर्थशास्त्र के उसूलों को इन काव्यमय सूक्तियों से आत्मसात करना कितना आनन्दकर है ।
पिछली सरकार द्वारा असंगठित क्षेत्र के अध्ययन के लिए बनी सेनगुप्ता कमिटी के अनुसार देश की ८७ फीसदी आबादी असंगठित क्षेत्र से जुड़ी है । बचपन से सुनते आए थे कि असंगठित क्षेत्र में रोजगार देने वाला सबसे बड़ा धन्धा हथकरघा है । हमारे पूर्वांचल में ही आजमगढ़ , मऊ , मोहम्मदाबाद, बस्ती , गोरखपुर, बस्ती , बहराईच, अकबरपुर , फैजाबाद में हथकरघे पर बेशकीमती साड़ियाँ ही नहीं आम आदमी की जरूरत को पूरा करने वाला सूती कपड़ा , चादर ,धोती,गमछा,शर्टिंग बनता था ।
राजीव गांधी सरकार की कपड़ा नीति ढाका की मलमल बनाने वाले कारीगरों के अंगूठे काटने वाली नीति के समान थी । इस नीति की बदौलत एक अन्जान व्यक्ति देश का सबसे अमीर बन गया और साथ – साथ रोजगार देने वाला सबसे बड़ा हथकरघा क्षेत्र अत्यन्त सिकुड़ गया । सिंथेटिक तागे और डिटर्जेन्ट बनाने में सरकारी रियायत और छूट की नीति के चलते गरीब आदमी के तन से सूती कपड़ा हटा , सिंथेटिक कपड़ा आ गया । किसानों की तरह बुनकर भी खुदकुशी करने को मजबूर होने लगे । सरकार के छोटे से फैसले से कैसे बना – बनाया बाजार , गारण्टीशुदा मुनाफ़ा- बिना खर्च मिल जाता है ! मानिए सरकार फैसला ले कि देश भर के पुलिस थाने में मारुति कम्पनी की जिप्सी रखी जाएगी तो इससे बिना विज्ञापन आदि के खर्च के हजारों जिप्सी बिक जाती हैं । ठीक इसी प्रकार अम्बानी समूह को छोटे छोटे फैसलों से करोड़ों – अरबों का मुनाफ़ा पहुंचाया गया ।
मुझे बनारस में सुना चौधरी चरण सिंह का भाषण याद है जिसमें उन्होंने माचिस बनाने वाली एकमात्र विदेशी (और ऑटॉमैटिक संयंत्र वाली) विमको को बन्द करने के फैसले के औचित्य को बखूबी समझाया था ।
वैसे ही आपातकाल के दौरान गांधी आश्रम के एक खादी भण्डार के उद्घाटन की याद आती है । अंग्रेजी राज में पूर्वी उत्तर प्रदेश में खादी उत्पादन की प्रमुख संस्था – गांधी आश्रम की स्थापना धीरेन्द्र मजुमदार और आचार्य जे. बी. कृपलानी जैसे नेताओं ने की थी । कमलापति त्रिपाठी इन लोगों द्वारा प्रशिक्षित हुए थे । आपातकाल के दरमियान बनारस के शास्त्री नगर के खादी भंदार के उद्घाटन कार्यक्रम में गुरु (आचार्य कृपलानी) – शिष्य (कमलापति ) दोनों मंच पर मौजूद थे । पंडितजी रेल मन्त्री थे । सभा में आचार्यजी ने पंडितकी को सलाह दी थी कि रेल महकमा चाहे तो खादी की कितनी खपत कर सकता है । यह गौरतलब है कि स्वतंत्रता-पूर्व जब आचार्यजी कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव थे तब जवाहरलाल नेहरू चवन्निया सदस्य भी नहीं थे । वरिष्टता के कारण आपातकाल में गिरफ़्तार न किए जाने के शायद एक मात्र अपवाद भी वे ही थे । उस सभा में आचार्यजी द्वारा सरकार की आलोचना सुन कर लोकपति त्रिपाठी यह बड़बड़ाते हुए बहिर्गमन कर गए थे कि , ’ बाबू बैठे हैं नहीं तो इस बूढ़े को बन्द करवा देता ’ । राजीव गांधी और लोकपति की कांग्रेसी पीढ़ी खादी के मर्म को भूल चुकी थी।
बहन और पिताजी ने गांधीजी के वस्त्र स्वावलम्बन के सूत्र(कातो समझ-बूझ कर कातो,…..) को समझ – बूझ कर अपनाया है । आज खादी कमीशन की अध्यक्षा द्वारा युवा पीढ़ी के नाम पर खादी – सुधार (’फेसलिफ़्ट’) के लिए एशियाई विकास बैंक से कर्जा लेकर नये शो-रूम बनाने की बात एक साक्षात्कार में पढ़ी तो मुझे सदमा लगा और कोफ़्त हुई । बहन के विद्यार्थी-जीवन को याद किया । उसने कोलकाता के सियालदह स्थित नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी पढ़ी । कॉलेज की दीवारों पर तब माओ-त्से-तुंग की स्टेन्स्लि के साथ नारे लिखे होते थे , ’ चीनेर चेयरमैन – आमादेर चेयरमैन’ । फिर पूर्व पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के बीच मेडिकल छात्र- छात्राओं की टीम बनाकर शरणार्थी शिबिरों में टीकाकरण आदि में लगी । तब इन तरुण – तरुणियों का नारा होता था - ’ओपार थेके आश्छे कारा ?-आमादेरी भाई बोनेरा ।’ कॉलेज यूनियन की वह महामन्त्री चुनी गयी थी ।
खादी का एक बुनियादी सिद्धान्त है कि शोरूम ,विक्रेता-वेतन ,प्रचार पर एक निश्चित प्रतिशत से ज्यादा खर्च नहीं किया जाना चाहिए ताकि कत्तिनों और बुनकरों के श्रम की कीमत इन फिजूल के खर्चों में न जाए तथा कत्तिनों और बुनकरों को ज्यादा लाभ दिया जा सके । दिक्कत यह है कि जो सरकार बुनकर और कत्तिन विरोधी कपड़ा नीति अपनाती है वह खादी का क्ल्याण करे यह कैसे मुमकिन है ? विदेशी वित्तीय एजेन्सी पर अवलम्बन स्वावलम्बन के अस्त्र का पराभव है ? लगता है खादी वालों को विनोबा के सूत्र के सहारे अब चलाना होगा – अ-सरकारी = असरकारी । खादी की मूल भावना के प्रचार से सरकार क्यों भाग रही है ?



बहुत ही सुन्दर।
ऐसा सार्थक और लिखे,इसी कामना के साथ,
आपकी साथी
स्वाति
सार्थक गंभीर लेखन।। सरकार हर सार्थक और सौद्धेश्य कर्म के प्रति उदासीन ही रहेगी।
विमर्श का वितान नितांत निजी आत्मीय संसार से शुरू होकर जिस तरह वृहत्तर फलक पर जाकर उद्भासित होता है, और जिस तरह ’गांधी के मानवीय अर्थशास्त्र के उसूल’ विमर्श की धुरी बन जाते हैं, वह अनूठा है — अद्भुत !
बेहद प्रेरक और उद्बोधक .
खादी कमीशन की अध्यक्षा महोदया को उद्बोधित कैसे किया जाए ? उन्हें कैसे बताया जाए कि नेत्र देखने के लिये होते हैं,कोटरों की शोभा के लिये नहीं . यह तो बैसाखी के बदले स्वावलंबन के सपने को गिरवी रखना होगा . कोई चिट्ठी तैयार कीजिए जो हम सब उन्हें भेजें, उनके सुझाव/निर्णय का अनौचित्य समझाते हुए .
सबसे अच्छा तो यह हो कि हम उन्हें मुक्तिबोध की कहानी ’पक्षी और दीमक’ मढ़वा कर उपहार में दे दें .
हिन्दी हर भारतीय का गौरव है
उज्जवल भविष्य के लिए प्रयास जारी रहें
इसी तरह जानकारी पूर्ण चर्चाएँ , लिखते रहें
जिन्हें शुभ रचना कर्म से जुड़े रहना है ..वे कार्य करते रहें .
मुझे खादी बहुत पसंद है –
गांधी जी के वाक्य
कितना बड़ा सत्य कहते हैं
अति मार्मिक अपने वक्त का मार्मिक चित्रण. नरेगा के नाम पर अरबो खरबों खर्च करने वाली सरकार, खादी पर कुछ नहीं करना चाहती . चूँकि लडाई स्वावलंबन और परजीवी बनाने की है . नरेगा कार्यकर्म से वोट,नोट और भ्रस्टाचार तो प्राप्त होता हे ,एक स्वावलंबी समाज का निर्माण नहीं हो सकता.
एक वृद्ध महिला पुरुष कात्तने
का काम तो कर सकता हे पर मिटटी काटने का काम उनके लिए कठिन हे. उनके लिए कहा जाता हे की २०० रूपया महिना पेंशन मिलेगी . उसमे भी अनेक दलाल छुट भैये नेता खा जाते हे. भिखारी या स्वावलंबन ये सवाल है मेरे भाई.
आजकल विश्व बैंक के आदेश पर अनेक “प्रगतिवादी ” गरीब लोगो को फ़ूड कूपन देने की बात कर रहे है. उनका मानना है इस से भ्रस्टाचार रुकेगा !!! हल में आंध्र प्रदेश के दौरे से लोटा हूँ , नेल्लोर जिले के एक गाँव में पुच्छा कितने लोगो को २ रूपया किलो रसन मिलता हे ? बुजुर्ग लोगो ने बताया २१ परिवारों को कूपन दिखाए पता किया कितना रसन मिलता हे एक माह में २५ किलो ,किरासिन तेल १ लीटर . कूपन के हिसाब से प्रत्यक परिवार को ३५ किलो अनाज और ३ लीटर किरासिन तेल मिलना चाहिये .
इसके आलावा अनेक कार्ड बोगस थे . तथा उन बुजुर्गो को जिनको बी पि एल कार्ड से राशन मिलता हे उनकी वर्धा पेन्सन बंद.
तो मुद्दा बहुत व्यापक हे मेरे भाई !!
साधुवाद
अच्छी प्रस्तुति….बहुत बहुत बधाई…
मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग “मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी”में पिरो दिया है।
आप का स्वागत है…
गजाननन माधव मुक्तिबोध की कहानी ’पक्षी और दीमक’ :
एक था पक्षी। वह नीले आसमान में खूब ऊंचाई पर उड़ता जा रहा था। उसके साथ उसके पिता और मित्र भी थे। सभी बहुत ऊंचाई पर उड़नेवाले पक्षी थे। उनकी निगाहें भी बड़ी तेज़ थीं। उन्हें दूर-दूर तक की भनक और दूर-दूर तक की महक भी मिल जाती। एक दिन वह नौजवान पक्षी ज़मीन पर चलती हुई एक बैलगाड़ी देख लेता है। उसमें बड़े-बड़े बोरे भरे हुए हैं। गाड़ीवाला चिल्ला-चिल्लाकर कहता है, “दो दीमकें लो, एक पंख दो।” उस नौजवान पक्षी को दीमकों का बड़ा शौक था।
वैसे तो ऊंचे उड़नेवाले पंछियों को हवा में ही बहुत-से कीड़े तैरते हुए मिल जाते हैं, जिन्हें खाकर वे अपनी भूख थोड़ी-बहुत शांत कर लेते हैं। लेकिन दीमकें सिर्फ ज़मीन पर ही मिलती थीं। कभी-कभी पेड़ों पर – ज़मीन से तने पर चढ़कर, ऊंची डाल तक, वे अपना मटियाला लंबा घर बना लेतीं। लेकिन ऐसे कुछ ही पेड़ होते और वे सब एक जगह न मिलते। वह पक्षी अपनी ऊंचाइयां छोड़कर मंडराता हुआ नीचे उतरता है और पेड़ की एक डाल पर बैठ जाता है। गाड़ीवान से बात करता है। दोनों का सौदा तय हो जाता है। अपनी चोंच से एक पर खींचकर तोड़ने में उसे तकलीफ भी होती है। लेकिन उसे वह बरदाश्त कर लेता है। मुंह में बड़े स्वाद के साथ दो दीमकें दबाकर वह नौजवान पक्षी फुर्र से उड़ जाता है।
अब उस पक्षी को गाड़ीवाले से दो दीमकें खरीदने और एक पर देने की बात बड़ी आसान मालूम हुई। वह रोज़ तीसरे पहर नीचे उतरता और गाड़ीवाले को एक पर देकर दो दीमकें खरीद लेता। कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। एक दिन उसके पिता ने देख लिया। उन्होंने समझाने की कोशिश की कि बेटे, दीमकें हमारा स्वाभाविक आहार नहीं हैं। और, उनके लिए अपने पंख तो हरगिज़ नहीं दिए जा सकते। लेकिन उस नौजवान ने बड़े ही गुरूर से अपना मुंह दूसरी ओर कर लिया। उसे ज़मीन पर उतरकर दीमकें खाने की चट लग गई थी। अब उसे न तो दूसरे कीड़े अच्छे लगते, न फल, न ही अनाज के दाने। दीमकों का शौक उस पर हावी हो चुका था।
लेकिन ऐसा कितने दिनों तक चलता? उसके पंखों की संख्या लगातार घटती चली गई। अब वह ऊंचाइयों पर अपना संतुलन साध नहीं सकता था, न बहुत समय तक पंख उसे सहारा दे सकते थे। आकाश-यात्रा के दौरान उसे जल्दी-जल्दी पहाड़ी चट्टानों, पेड़ों की चोटियों, गुंबदों और बुर्ज़ों पर हांफते हुए बैठ जाना पड़ता। उसके परिवारवाले और मित्र ऊंचाइयों पर उड़ते हुए आगे बढ़ जाते। वह बहुत पीछे रह जाता। फिर भी दीमक खाने का उसका शौक कम नहीं हुआ। दीमकों के लिए गाड़ीवाले को वह अपने पंख तोड़-तोड़कर देता रहा।
फिर उसने सोचा कि आसमान में उड़ना ही फिज़ूल है। वह मूर्खों का काम है। असल में उसकी हालत यह हो गई थी कि अब वह आसमान में उड़ ही नहीं सकता था। वह सिर्फ एक पेड़ से उड़कर दूसरे पेड़ तक पहुंच पाता। धीरे-धीरे उसकी यह शक्ति भी कम होती गई। और एक समय वह आया, जब वह बड़ी मुश्किल से पेड़ की एक डाल से लगी दूसरी डाल पर चलकर, फुदककर पहुंचता। लेकिन दीमक खाने का शौक नहीं छूटा। बीच-बीच में गाड़ीवाला गच्चा दे जाता। वह कहीं नज़र न आता। पक्षी उसके इंतज़ार में घुलता रहता। लेकिन दीमकों का शौक जो उसे था। उसने सोचा, “मैं खुद दीमकें ढूंढूंगा।” इसलिए वह पेड़ से नीचे उतरकर ज़मीन पर आ गया और घास के लहराते हुए एक गुच्छे में सिमटकर बैठ गया।
फिर, एक दिन उस पक्षी के जी में न मालूम क्या आया। वह खूब मेहनत से ज़मीन में से दीमकें चुन-चुनकर, खाने के बजाय उन्हें इकट्ठा करने लगा। अब उसके पास दीमकों के ढेर के ढेर हो गए। फिर एक दिन एकाएक वह गाड़ीवाला दिखाई दिया। पक्षी को बड़ी खुशी हुई। उसने पुकारकर कहा, “गाड़ीवाले, ओ गाड़ीवाले! मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।” पहचानी आवाज़ सुनकर गाड़ीवाला रुक गया। तब पक्षी ने कहा, “देखो, मैंने कितनी सारी दीमकें जमा कर ली हैं।” गाड़ीवाले को पक्षी की बात समझ में नहीं आई। उसने सिर्फ इतना कहा – तो मैं क्या करूं। पक्षी ने जवाब दिया – ये सारी दीमकें ले लो और मेरे पंख मुझे वापस कर दो।
गाड़ीवाला ठठाकर हंस पड़ा। उसने कहा, “बेवकूफ, मैं दीमक के बदले पंख लेता हूं। पंख के बदले दीमक नहीं!” गाड़ीवाले ने ‘पंख’ शब्द पर बहुत ज़ोर दिया था। फिर…
गाड़ीवाला चला गया। पक्षी छटपटाकर रह गया। एक दिन काली बिल्ली आई और अपने मुंह में उसे दबाकर चली गई। तब उस पक्षी का खून टपक-टपककर ज़मीन पर बूंदों की लकीर बना रहा था।
भाई अफलातून को ऐसे सोद्देश्य लेखन के लिए शुभकामनाएं और एक और शुभकामना आज दिनांक 24 सितम्बर 2009 को आपकी यह पोस्ट दैनिक जनसत्ता में संपादकीय पेज पर समांतर स्तंभ में प्रकाशित हुई है। सरकार न सही पर, असरकारी अखबार तो इसका नोटिस ले ही रहे हैं।
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अचानक आपके ब्लॉग पर नज़र गयी. अच्छा लगा. मै बचपन से ही खादी पहनता आया हूँ. पिताजी श्री कृष्णप्रसाद उपाध्याय खादी भंडार के संचालक रहे है. सबसे वरिष्ठ खादी कार्यकर्ताओं में से है. उम्मीद करता हूँ, की अब आपसे नियमित रूप से सम्बन्ध बना रहेगा. आप भी मुझे अपना समझ कर अपने साथ जोड़ ले.
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खादी की राखी और खादी की रक्षा नाम शीर्षक से आपका लेख पड़ा वह मेरे लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। मैं इस तरह के लेख के लिए लालायित रहता हूँ।