ब्लॉगिंग का एक मूल स्वरूप रोजनामचा लिखने का रहा है । वेब + लॉग में ’लॉग’ के लिए हिन्दी शब्द फादर कामिल बुल्के के अनुसार – रोजनामचा , यात्रा – दैनिकी , कार्य- पंजी भी है । इस हिन्दी सेवी ऋषि की जन्म-शताब्दी वर्ष पर उनके कोश का उपयोग करते हुए ,पुण्य स्मरण के साथ यह पोस्ट ।
तो, पिछले सत्तर से ज्यादा वर्षों से रोजनामचा या दैनिन्दनी लिखने वाले ब्लॉगिंग विरोधी एक सज्जन यह मानते रहे हैं कि इन्टरनेट पर लेखन और प्रकाशन फौरी-तुष्टीकरण ( instant gratification) मात्र का जरिया है । – ’फौरी तुष्टीकरण’ को ’तात्कालिक सन्तुष्टि’ कह देने पर मैं उनके आरोप को कबूलने के लिए तैयार था । उनका आगे कहना था कि ’कागज पर छपे का भविष्य के लिए महत्व है ’ (इन्टरनेट पर छपा हुआ मानो लम्बी अवधि तक नहीं देखा जाएगा) ।
सामाजिक जीवन-यात्रा में गुजराती , हिन्दी और अंग्रेजी में चार दर्जन से अधिक छोटी – बड़ी पुस्तकें लिख चुके इन महाशय को खादी पर लिखी मेरी पोस्ट का प्रिन्ट आउट मेरी भान्जी चारुस्मिता (दुआ) ने दिया । उन्होंने उसी दिन एक पोस्ट कार्ड उसकी बाबत मुझे लिख भेजा ।
यह कहने में मुझे लेशमात्र दुविधा नहीं है कि दिसम्बर , २००३ से अब तक हुई मेरी चिट्ठेकारी (शुरुआत अंग्रेजी से हुई थी । तब ब्लॉगर को गूगल ने नहीं खरीदा था।) पर की गई यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण टिप्पणियों में एक है ।
टिप्पणी प्रस्तुत करने के पहले टिप्पणीकार की बाबत कुछ जरूरी बातें । वे सेवाग्राम में गांधीजी द्वारा स्थापित ’खादी विद्यालय’ के शुरुआती विद्यार्थियों में थे । (चिट्ठेकार संजीत त्रिपाठी के पिता भी उस वक्त उनके सहपाठी थे ।)
४ – ५ साल की उम्र से चरखा चलाना सीखा तथा ११-१२ वर्ष की उम्र में इन्होंने टाइपिंग सीखी । महात्मा गांधी द्वारा हिटलर को भेजा गया एक ऐतिहासिक पत्र उन्होंने टाइप किया था, यह उन्हें स्मरण है । चरखा चलाने के पराक्रम में दो कातने वालों द्वारा दिन-रात लगातार चरखा चलाना उल्लेखनीय है। अपनी पुस्तक ’बापू की गोद में’ (ब्लॉग-किताब के रूप में उपलब्ध) में टिप्पणीकार अपने शैशव में चरखे और कातने के महत्व पर गौर कराने वाली यह बातें लिखते हैं :
…लेकिन इस तरह के धार्मिक और सामाजिक त्योहारों को भी पीछे छोड़ने वाली याद चरखा – जयन्ती ( रेटियो बारस ) की है । बापू के आश्रम में बापू का ही जन्मदिन? यह कैसा शिष्टाचार ? लेकिन इस जन्मदिन को बापू ने अपना जन्मदिन माना ही नहीं था ।यह तो चरखे का जन्मदिन था । इसलिए स्वयं बापू भी हमारे साथ उसी उत्साह से उसमें शरीक हो जाते थे । लोगों से बचने के लिए उस रोज उनको कहीं भाग जाना नहीं पड़ता था और न उस दिन के नाटक का उनको प्रमुख पात्र बनना पड़ता । उस दिन बापूजी एक सामान्य आश्रमवासी की तरह ही रहते थे । कभी हमारी दौड़ की स्पर्धा में समय नोट करने का काम करते , तो कभी – कभी हमसे बड़े लड़कों के कबड्डी के खेल में हिस्सा लेते । कभी – कभी हम लोगों के साथ साबरमती नदी में ( बाढ़ न हो तब ) तैरते भी थे । शाम को हमें भोजन परोसते और रात को अन्य आश्रमवासियों की तरह नाटक देखने के लिए प्रेक्षक के रूप में बैठ जाते । उस दिन का प्रमुख पात्र होता था चरखा । चरखा – द्वादशी का दिन गांधी – जयन्ती का भी दिन है , यह तो दो – चार चरखा – द्वादशियों को मनाने के बाद मालूम हुआ .
आजकल चरखा – द्वादशी के दिन बापू की झोपड़ी या बापू के मन्दिर खड़े किये जाते हैं । उनके फोटो की तरह – तरह से पूजाएँ की जाती हैं और सूत की की अपेक्षा टूटन का ही अधिक प्रदर्शन दिखाई देता है । लेकिन उन दिनों का जो दृश्य मेरी आँखों के सामने आता है , उसमें बापू का फोटो कहीं भी नहीं देखता हूँ । अखण्ड सूत्रयज्ञ उस समय भी चलते थे । विविध प्रकार के विक्रम ( रेकार्ड ) तोड़ने में हम बच्चों को अपूर्व आनन्द और उत्साह रहता था। कोई सतत आठ घण्टे कात रहा है तो दो साथी एक के बाद एक करके २४ घण्टे अखण्ड चरखा चालू रखते हैं । दिनभर काते हुए सूत के तारों की संख्या नोट कराने में एक – दूसरे की स्पर्धा चलती ।
अपने पिता महादेव देसाई की जीवनी ’अग्नि कुंडमा खिलेलू गुलाब’ के लिए उन्हें केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था तथा महात्मा गांधी की वृहत जीवनी ’मारू जीवन ए ज मारी वाणी’ के लिए ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार । लाजमी तौर पर ’गांधी और खादी’ जीने के प्रयास के अलावा उनके ग्रन्थों के लिए किए गए शोध के भी विषय रहे हैं ।
(चित्र : संजय पटेल,इंदौर के सौजन्य से। सभी चित्रों को बड़े आकार में देखने के लिए उन पर खटका मारें)
हांलाकि इनकी लिखावट पाठकों के लिए ’हिंसक’ नहीं है फिर भी पत्र का मजमून टाइप कर दे रहा हूँ :
१५.१०.२००९(त्रृटि) (१८.९. की मुहर)
संपूर्ण क्रांति विद्यालय
प्यारे आफ़लू ,
आज खादी संबंधी तुम्हारे लेख (?) का प्रिन्ट आउट दुआने दिया। सुना कि तुमने सूत की गुण्डी के नाप संबंधी हिसाबमें तो तुमने दुरुस्ती कर ली है : (एक) गुण्डी = १००० मीटर ।
need – greed वाला उद्धरण गांधी का नहीं है । हालाँकि प्यारेलालजी ने लास्टफेजमें पार्ट II पृ. ५५२ पर इसका उपयोग गांधीजी के नाम से किया है । जान पड़ता है यह चमात्कारिक उद्धरण गांधीजी ने भी किया होगा । Oxford Dictionary of Quotations (ने) इसके लेखक का नाम Frank Buchman बताया जो उनकी Legacy of Frank Buchman में Legacy Chapter 15 में छपा है ।
यह जानकारी तुम कहाँ से लाये कि “जब आचार्यजी कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव थे तब जवाहरलाल नेहरू चवन्निया सदस्य भी नहीं थे?” आचार्य कई वर्षों तक कांग्रेस महासचिव जरूर थे । उसमें से कुछ वर्ष जवाहरलालजी अध्यक्ष थे ।
खादी का बुनियादी नियम यह था कि खादी के दाम पर व्यवस्था खर्च अमुक प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए । इसलिए खादी कमीशन की वर्तमान नीति पर तुम्हारी आलोचना सटीक है ।
प्यार,
बाबूभाई.
सूत की गुण्डी सम्बन्धी सूचना में किसी अन्य पाठक द्वारा मेरी भूल को सुधार दिया जाएगा , मैं इस खुशफ़हमी में था । अतएव, साल भर के लिए जरूरी कपड़े के लिए एक व्यक्ति द्वारा १००० किलोमीटर सूत कातने की आवश्यकता होती है ।
आचार्यजी का कथन मैंने गांधी विद्या संस्थान,वाराणसी के अतिथि भवन में जेपी आन्दोलन के दौर में उनके मुख से सुना था तथा स्मृति के आधार पर उद्धृत किया था । अब लगता है कि मुमकिन है यह बात उन्होंने श्रीमती इन्दिरा गांधी के बारे में कही हो। इस बाबत और जानकारी जुटाने की जरूरत है ।
टिप्पणी के अंतिम वाक्य द्वारा इन्टरनेट सम्बन्धी टिप्पणीकर्ता की धारणा (’हृदय’ नहीं कह रहा) में कोई तब्दीली आई होगी , क्या यह माना जा सकता है ?
—x—x—x—
जनसत्ता के समांतर स्तंभ में मेरे ब्लॉग से ली गई इसी प्रविष्टी को पढ़कर सुश्री नीला हार्डीकर ने मुझे एक पत्र लिखा है। मेरे साथियों से फोन नम्बर मालूम कर उन्होंने यह बताया कि वे नेट पर हिन्दी टाइपिंग नहीं जानती इसलिए हाथ से लिखा ख़त भेज रही हैं । नीला हार्डीकर अवकाशप्राप्त शिक्षिका हैं तथा मध्य प्रदेश के जन आन्दोलनों से कई दशकों से जुड़ी रही हैं । उन्होंने ’सिंथेटिक वस्त्र’ पर अपनी स्वतंत्र टिप्पणी भी भेजी है जिसे अलग से प्रकाशित किया जाएगा । फिलहाल , ’खादी की राखी’ पर उनकी मूल्यवान टिप्पणी का चित्र तथा टाइप किया हुआ पाठ :
मुरेना (म.प्र.)
२८ सितम्बर,२००९
प्रिय अफलातून ,
२४.९.०९ के जनसत्ता में ’खादी की राखी’ पढ़ा । मुद्दे महत्वपूर्ण उठाए हैं आपने , जैसे वस्त्र का बाजार धीरूभाई को उपलब्ध कराना । मैं इतने साल से सोच रही हूँ – राजीव गांधी को क्या रिश्वत मिली होगी इसके लिए । अब अगली स्टेप है ए डी बी की मदद से खादी बेचना ।
मुझे लगता (है) सरकार के उस छोटे फैसले के जो बड़े नतीजे निकले उनका अच्छी तरह अध्ययन होना चाहिए । एक ग्रूप हो जो यह काम करे । कई आयामों पर एक साथ तथ्य संकलन , विश्लेषण करना होगा । उदाहरण के लिए
१. सिन्थेटिक कपड़ों के लाभ नुकसान.
२. गांव , कस्बों के बाजार से और गरीब घरों से सूती वस्त्र गायब होना.
३. बुनकरों की दुर्गति .
४. रंगों की फैक्टरियां खत्म , रंगरेजों का भट्टा बैठना .
५. डिटर्जण्ट्स आदि का जमीन तथा जलस्रोतों पर प्रभाव .
६. सिन्थेटिक धागा non bio-degradable होना.
७. ——-
छानबीन इस सवाल की भी होनी चाहिए कि ADB के लिए महौल बना कैसे ? शायद इस तरह :
अ) कि , खादी अब गरीब का वस्त्र बचा नहीं .
ब) कि , खादी = सादगी से शुरु करके खादी = सत्ता के रास्ते हम खादी = पाखण्ड तक पहुंच चुके हैं .
स) कि, गांधी के चरखे से अब बी.टी. कॉटन का सूत कतता है ।
जब स्वालंबन का बीज ’ मोन्सेण्टो’ के हाथों गिरवी है , तब स्वाव्लंबन के सूत्र संभालना काफी है ? संभव है ?
ये सारे ( और भी कई ) पहलुओं का एकसाथ अध्ययन करके , स्थिति का qualitative के साथ quantitative आकलन करके क्या हम विकल्प का रास्ता ढूंढ़ सकते हैं ?
मैं उपरोक्त बिन्दुओं में से कुछेक पर अपने निरीक्षण लिख रही हूँ । इनमें बहुतों को बहुत कुछ जोड़ना होगा । किसी सामूहिक अध्ययन की कोशिश संभव हो तो बताएं ।
मेरा परिचय स्वाति थोड़ा बहुत देंगी । रिटायर्ड शिक्षिका हूँ । सुनील , स्मिता से मिलती रहती हूँ ।
शुभेच्छाओं सहित,
नीला
९४२५१ २८८३६ , hneelaATyahooDOTcom
नीलाजी ने विषय को जरूरी एवं गंभीर विस्तार दिया है । मुझे उम्मीद है कि उनका ख़त और ’सिंथेटिक वस्त्र ’ विषयक टिप्पणी ( अगली पोस्ट में प्रकाश्य ) एक पहल की शुरुआत होंगे। दोनों टिप्पणीकर्ताओं का अत्यंत आभारी हूँ । नीलाजी को नेट पर हिन्दी टाइप करने , मेल करने आदि की बाबत लिख रहा हूँ ।




खादी पर आपकी पोस्ट भी पढ़ी थी और बाद में ‘जनसत्ता’ में इसका पुनर्मुद्रण भी। लेकिन आज अंत तक आते-आते सुश्री नीला हार्डीकर के पत्र ने जैसे खादी के बहाने हमारे सारे ‘उत्तर-औपनिवेशिक’ अर्थतंत्र या सत्ता-तंत्र एक ऐसा क्रिटीक निर्मित किया है, जिसमें हमारे मौज़ूदा ‘विकास का माडल’ ही प्रश्नों के घेरे में आ जाता है। बिना श्रम केंद्रित उत्पादन और मूल सामाजिक इकाइयों की आत्मनिर्भरता के कोई ‘स्वाधीन’ लोकतांत्रिक देश या समाज बन नहीं सकता। ऐसा लगता है। गांधी के चरखे से मोसांटो काटन के सूत कातने के उदाहरण ने भीतर तक विचलित कर डाला।
आप लोग बहुत नहत्वपूर्ण काम में लगे हुए हैं। मेरे जैसे अदना हिंदी लेखक की सारी शुभकामनाएं आपके प्रयासों के साथ हैं।
इतनी महत्वपूर्ण टिप्पणी पाकर संतुष्टि होना स्वाभाविक है। यह टिप्पणी नारायण देसाई जी की धारणा बदलाव की चाहे स्वीकारोक्ति ना भी हो तो भी उस दिशा में उठता एक कदम तो है ही! देर सबेर वे इस माध्यम के सामाजिक महत्व को स्वीकारेंगे ही। जैसे जैसे हिंदी चिट्ठों के पाठकों की संख्या में वृद्धि होगी, इस विधा का महत्व बढ़ता ही जाएगा, विशेषकर तब जब लेखन सामाजिक मुद्दों पर हो।
नीला जी की टिप्पणी इस विधा के महत्व को और भी बढ़ा देती है। अपनी बात को प्रस्तुत करने का इससे अधिक सुविधाजनक व स्वतंत्र माध्यम और कोई नहीं हो सकता।
बधाई।
घुघूती बासूती
मैने सालो बाद बापू की जयंती पर चरखा देखा।कार्यक्रम ्मे मंचस्थ सभी अतिथियों (जिनमे मै भी शामिल हूं) मे से एक ने भी खादी नही पहनी हुई थी।बापू के आदर्शो का अंशमात्र भी हम अपने जीवन मे नही उतार पाये है और उस पर बेशर्मी देखिये बापू पर भाषण भी देते हैं।मुझे बहुत अफ़्सोस हुआ कि जिन्होने बापू और उनकी खादी को जीवन मे ढाल लिया है वे खामोश दरी पर बैठे गांधियन एरा की माडलिंग करते नज़र आ रहे थे और हम जो ज़िंदगी मे सच के सिवाय सब बोलते है ठाठ से अंग्रेज़ो की छोडी कुर्सियो पर बैठे थे। हमे फ़ुलमालाओं से लाद दिया गया,पता नही क्यों,क्या इसी को गांधी जयंती मनाना कहते हैं,इस सवाल ने मुझे रात भर सोने नही दिया।क्या किया जा सकता है?अफ़सोस है बापू सिर्फ़ मुर्तियो,चित्रो और सारी बुराईयों की जड़ नोटों पर जड़ हो गये हैं,काश हम उन्हे दिल मे उतार पाते।मैने इस बात को दिल मे नही रखा और कार्यक्रम के मंच से कह दिया और उस पर भी गुस्सा कम नही हुआ तो अपने ब्लाग पर भी लिख दिया लेकिन क्या इससे फ़र्क़ पडेगा?पता नही?ये सवाल भी मेरा है और जवाब भी मेरा।यदी कोई धृष्टता हुई हो तो क्षमा करियेगा।
खादी के कपडों में जो सूत इस्तेमाल होता है, उसकी रुई की खेती की तबाही पिछले पचास साल से दुनिया देख रही है. और उसके लिए कोई एक आदमी जिम्मेदार नहीं है .. नीला जी जिज्ञासा, कि राजीव गाँधी ने कितनी रिश्वत ली होगी , एक सीधे सादे इंसान की जिज्ञासा है. खादी की तबाही के लिए साठ के दशक के नेता जिम्मेदार हैं . महात्मा गाँधी के नाम पर धंधा कर रहे लोग भी जिम्मेदार हैं जो गाँधी के नाम स्थापित किये गए संस्थानों पर कुंडली मार कर बैठे थे. आज जो हो रहा है , उसे आज के राजाओं के लिए रोकना संभव नहीं होगा क्योंकि इतिहास की गति रोक पाना बहुत आसान नहीं होता. उसके लिए तो फिर एक गाँधी की ज़रुरत पड़ेगी.
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[...] नीला हर्डीकर से पूर्व परिचित हैं – इन दो पोस्टों के माध्यम से [...]
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