फाउन्टेन पेन बनाने वाली जर्मन कम्पनी मों ब्लां द्वारा ’डांडी यात्रा से प्रेरित हो कर’ कुल २४१ की संख्या में गांधी-छाप फाउन्टेन पेन बनाने की खबर आप सब जानते हैं । इस कलम की कीमत भारत में ११.३९ लाख है ,यह भी जानते हैं। गांधी के प्रति समझदारी और आदर से प्रेरित हो कर भारत वर्ष के कई नागरिकों ने इस व्यावसायिक कदम पर अपनी राय और गुस्सा प्रकट किया ।
इस मौके पर ताज महल होटल में हुई प्रेस कॉन्फ़रेंस में पहली बार भारत पधारे कलम कम्पनी के सी ई ओ लुट्ज़ बेथगे और १९९४ से भारत में मों ब्लां कलम बेचने का अधिकार प्राप्त कम्पनी एन्ट्रैक के अध्यक्ष दिलीप दोशी के अलावा एक विशिष्ट व्यक्ति मौजूद था । यह था, अरुण मणिलाल गांधी का पुत्र तुषार गांधी ! गांधीजी का वह प्रपौत्र जो पहले सपा में फिर कांग्रेस में रहा !
उस कमरे के एक छोर पर लकड़ी की एक संग्रहालयों में पाया जाने वाली किस्म की मेज थी। इस पर ’महात्मा गांधी लिमिटेड एडिशन २४१’ कलम तथा गांधी जैसा एक चश्मा दैदिप्यमान थे और गांधी-छाप लेबल लगी लाल स्याही की एक दवात भी रखी हुई थी । 
कमरे के दूसरे छोर पर चाय – कॉफ़ी नाश्ता था । सुनने वाले सिर्फ़ पत्रकार ही नहीं थे- कुछ फैशनजादे और अफ़सर भी थे । बेथगे ने बताया कि चूँकि डाँडी यात्रा में गाँधी २४१ मील चले थे इसलिए कुल इस कलम के २४१ ही सेट बनाये गये हैं ।
जर्मन सी ई ओ ने हर्मन के उपन्यास ’सिद्धार्थ’ का उदाहरण दिया – यह जताने के लिए कि जर्मन लोग भारत को कितना प्यार करते हैं । दोशी ने यह बताया कि मों ब्लां को सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की कितनी परवाह है और यह कलम हासिल करना संग्रहकर्ताओं के लिए कितनी जरूरी होगी !
तुषार ने कहा कि बैरक ओबामा को यह कलम हासिल करनी चाहिए और उसीसे शान्ति करारों पर दस्तख़त करने चाहिए । तुषार को कम्पनी की तरफ़ से कलम का पहला सेट तथा उसकी निजी दुकान ’ महात्मा गांधी फाउन्डेशन’ के लिए ७२ लाख रुपये दिए गए । उसने बताया कि कुछ साल पहले उसने डांडी यात्रा के मार्ग पर यात्रा की थी ।
मित्रों , इस समूचे प्रकरण के सन्दर्भ में कदाचित गांधी क्या करते ? सौ खण्डों में छपे सम्पूर्ण गांधी वांग्मय के मूल रचयिता का कलम – दवात से क्या मजबूत नाता रहा होगा ? खुद से व्यावसायिकता को जोड़ने की बाबत कितना सौम्य प्रतिवाद जताते,बापू ? एक खूबसूरत चित्र और स्केच सहित गोपालकृष्ण गांधी ने अपने करुणा-प्रेरित अन्वेषण को दो अक्टूबर के ’द हिन्दू’ में अभिव्यक्ति दी है । वह लेख करोड़ों लोगों के आघात की न्यायपूर्ण अभिव्यक्ति है ।
( विवरण संयुक्ता शर्मा के ब्लॉग के आधार पर है ।
मों ब्लां कलम-कम्पनी से तुषार गांधी ने ७२ लाख रुपये लिए हैं
अक्टूबर 5, 2009 Aflatoon अफ़लातून द्वारा

कुछ आप से मिलती जुलती अभिव्यक्ति मैंने अपने ब्लॉग की नयी पोस्ट में एक कविता के रूप में दिल है . जरा गौर फरमाए
शुक्रिया
तुषार गांधी, अपने दादा महात्मा गांधी के नाम पर कलंक है। महात्मा गांधी जिंदा होते तो इसकी करतूते देखकर यानी पैसा वसूली नीति से इसे अपना मानने से इनकार कर देते। तुषार देश के महानायक का सौदागर है…..पैसे वसूल करते जाओ, तुषार…।
महात्मा गांधी आज पेन की नीब पर है। किसी दिन किसी कंपनी ने दस करोड दे दिए तो तुषार उन्हें चडडी पर छपवा देगा कि महात्मा गांधी ने अफ्रीका में सौ चडिडया पहनी थी इसलिए सौ चडडी जारी की है। तुषार को शर्म आनी चाहिए
गांधीजी इस कार्पोरेट युग के दबावों को किस
तरह से स्वीकार करते या बीच का रास्ता निकालते इस पर
कल्पना में विचरण करने की बजाय उनकी चौथी पीढ़ी क्या कर रही है उसी नज़रिये से देखा जाए।
गांधी की चौथी पीढ़ी यानी इस देश की चौथी पीढ़ी। गांधी युग जैसी कोई बात कभी नहीं रही। वैसा हुआ होता तो पाकिस्तान भी नहीं बनता। गांधी के वक्त में ही बहुत बड़ा तबका उनका अंध समर्थन नहीं करता था। उनके घर में ही उन्हें सौ फीसद समर्थन नहीं था।
पेन तो अब बिक रहा है। भाई लोगों ने गांधी के नाम पर बहुत कुछ दशकों पहले बेचना शुरू कर दिया था।
छि छि गांधी के वंशधर ही उन्हें बेंचे दे रहे हैं !
तुषार में बिजनेस सेंस ही नही है, काश हमारे दादाजी भी गांधी जितने फ़ेमस होते, तो डिज्नीलैंड की तर्ज पे गांधीलैंड बना देते हम!
mujhe pen bechne se utni aapatti nahi hai jitni unke naam ko bechkar desh par rajya karne se hai. bechne wale apna dharm nibha rahe hain kintu unke naam ko bhunakar rajneeti se adhik aappatti hai. veh adharm hai.
roman lipi ke liye kshama yaachna.
gb
इस हमाम में सभी नंगे हैं.
घुघूती जी से सहमत
गांधीजी ने कहा था विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करो…तुषार कुछ तो शर्म करो।
पिछली व आजकी, दोनों प्रविष्टियाँ पढी |
नीला जी के सुझाव पढने का इंतज़ार हैं |
गोपाल गांधीजी का लेख हिन्दू में पढ़ कर, मित्र रॉबी को पढ़वाया था | उसने मौन्ट ब्लांक (हम तो भाई, भारतीय उच्चारण ही लिखेंगे) पेन वाली खबर मुझे भेजी थी|
पढ़ कर तुषार गाँधी को मन ही मन गालियाँ दी , कि एक पौत्र गोपाल गाँधी हैं, और एक प्रपौत्र यह हैं|
हम लोगों ने अमरीकी मूल वासी कबीले के प्रमुख का सन्देश पढ़ा हैं,कि हम पृथ्वी से उतना ही ग्रहण करें जितना ज़रूरी हो , ताकि हमारी चौथी पीढी के लिए हरियाली धरती व उसके संसाधन बचे रहे| तुषार गाँधी जैसी चौथी पीढी के नमूने हो तो उस सन्देश को बदल कर तीसरी पीढी तक ही संसाधन बचाने का मन करता हैं!
किसीने टिपण्णी की हैं , की क्या पता तुषार चड्ढियो का विज्ञापन करने लगे पर्याप्त(उनके लिए) मूल्य मिलने पर | संभव ही हैं | शायद सामाजिक भर्त्सना की बाढ़ अगर देश में आये तो शर्म खाए |
इसी उम्मीद से की ऐसा संभव हो ,लिखते रहिये|
स्वाति
paisa kise pyaara nahi . tushaar to der me jaage usse pahle farji gandhiyo ne to kya kya nahi becha
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वाह भाई तुषार। गाँधी जी का अँचार बनाओ। रोकेगा कौन?