[ ' खादी की राखी ’ पर मेरी एक पोस्ट पर नीला हार्डीकर ने एक गंभीर टिप्पणी डाक से भेजी थी । इसे मैंने अलग पोस्ट के रूप में प्रकाशित किया था । इसके साथ ही नीलाजी ने ’सिंथेटिक वस्त्रों’ पर एक सुन्दर नोट भी भेजा था। इसे आज प्रकाशित किया जा रहा है । कपड़ा नीति के बारे में इन तीन पोस्टों से जो चर्चा शुरु हुई है उनकी बाबत यदि कोई पाठक अपने विचार भेजना चाहे तो उनका स्वागत है ।
नीला हार्डीकर अवकाश प्राप्त शिक्षिका हैं और मध्य प्रदेश के मुरेना में महिलाओं और दलितों के साथ काम करती हैं । नर्मदा बचाओ आन्दोलन और मध्य प्रदेश में चलने वाले आदिवासियों , स्त्रियों , विस्थापितों के जन आन्दोलनों के साथ वे सक्रीयता से जुड़ी हैं । उनके प्रति आभार के साथ यह नोट प्रकाशित करते हुए मुझे खुशी हो रही है । ]
सिंथेटिक वस्त्र
गर्मी के के दिनों में मध्यप्रदेश में ४० डिग्री से ५० डिग्री तापमान आम बात है । ऐसे में , बस अड्डों पर, हाट – बाजारों में धूलधक्कड़-भरी दोपहरी में गरीब और मध्यम वर्गीय महिलायें सिंथेटिक साड़ियों में बैठी हमेशा ही मिलती हैं । इनमें वृद्धाएं , गर्भवती और बीमार महिलाएं भी होती हैं । पहले कभी ऐसे ताप में सूती वस्त्र शरीर को कुछ आराम पहुंचाते थे । अब , उस आराम की गरीब जन कल्पना भी नहीं करतीं , शायद कभी अनुभव भी नहीं किया है , क्योंकि , दो दशक से गांव , कस्बों की दुकानों से और गरीब घरों से सूती साड़ियां और अन्य वस्त्र गायब ही हो गये हैं । नवजात शिशुओं को भी सिंथेटिक वस्त्र पहनाए जाते हैं ।
रसोई घरों में मसालों की कपड़छान या भीगी दालों को बांधने के लिए सूती कपड़ा अब मुश्किल से मिलता है । चूल्हे से बर्तन उतारने के लिए सूती कपड़ा अब खरीदना पड़ता है ; घरों में चादरें भी सिंथेटिक होती हैं ।
सिंथेटिक का खतरा : सिंथेटिक वस्त्रों के उपयोग में सावधानियां लोगों को न उद्योग ने सिखाई , न स्कूलों ने । एक लड़की (जबलपुर जिले की घटना है ) स्टोव जला रही थी कि उसके दुपट्टे ने आग पकड़ ली । कुर्ता भी सिंथेटिक , सो आग जल्दी भड़की । इतना ही नहीं , जैसे ही लड़की की मां को पता चला , उसने आग बुझाने की नीयत से गुदड़ी निकाली और उसे लड़की के ऊपर डाला । किंतु हाय! वह गुदड़ी सिंथेटिक साड़ियों की बनी थी !! किस्सा ख़तम ।
महाराष्ट्र की महिलायें नौ गज की धोती पहनती हैं , जो शरीर से खूब चिपकी रहती है । २५ डिग्री से अधिक ताप में इस धोती का स्पर्श सतत अनचाहा होता है ।
ब्लाउज , कुर्ते , सलवार , शर्ट , पुरुषो और बच्चों के अन्य कपड़े – गरीबों के लिए सिर्फ सिंथेटिक ही उपलब्ध हैं ।
ये कपड़े सस्ते होने का लाभ किसको मिलता है ? क्या निम्न आय वर्ग इन्हें खरीदकर खुश है ? पता करना चाहिए । ज्ञात तथ्य यह है कि गांव , कस्बों , छोटे शहरों के बाजार में सूती वस्त्र मिलता ही नहीं । १९८० के दशक के मध्य तक कॉपरेटिव सोसायटियों में सूती धोतियां रियायती दर पर मिलती थीं । इनका वितरण बन्द कर दिया गया । यानी गरीबों और ग्रामीणों को मजबूर किया गया सिंथेटिक वस्त्र खरीदने और पहनने के लिए ।
सिंथेटिक वस्त्रों का उत्पादन सस्ता रखने में सरकारी हस्तक्षेप की कितनी भूमिका है ? इसके अलावा उसकी पर्यावरणीय कीमत क्या है ? इन वस्त्रों के उपयोग के अन्त में कचरा किस चीज को कितना प्रदूषित करता है ? इस सब का आंकलन लगाना चाहिए ।
सिंथेटिक धोती के लाभ एक महिला ने गिनाए : ” धोती चमकदार होती है और टिकती ज्यादा है । “
- नीला हार्डीकर
(सम्पर्क – hneelaATyahooDOTcom)


आपके समाजवादी जनपरिषद नामक ब्लौग पर “सिंथेटिक वस्त्र” पर पोस्ट पढ़ा| नीला जी को और आपको भी धन्यवाद कि उन्होंने हम सब को सोचने पर मज़बूर किया | ‘ओनली विमल ‘ देश में नारा ही नहीं,यथार्थ बन गया देश कि सरकार की मदद से |
बहुत साल पहले “हिन्दू” में एक लेख निकला था| लेखिका ने चेन्नई की कामगार महिलाओं से साक्षात्कार लिया था, और उनके माध्यम से पता चला की गर्मी में भी सिंथेटिक कपडे पहनना क्यों उनकी मज़बूरी हैं |
इस वस्त्र उद्योग से उपजे कचरे,व प्रदूषण पर उन्होंने जो ध्यान दिलाया हैं वो काबिले गौर हैं | सरकार को कपडा नीति बदलने से अगर मज़बूर किया जाए, तो बुनकरों व कारीगरों को रोज़गार मिलेगा, व गरीब भी शायद सूती कपडे पहन पायें ! प्रदूषण भी घटेगा निश्चित ही|
स्वाति
ye baat jo aap logo ne likha hai bahut sahi hai aur baar baar dimag me aati bhi hai.aajkal khadi ya sooti vastr pahanana sabke bus ke baat nahi kucch khas varg ke log jinke paas paisa hai vo hi inhe khareed aur pahan sakte hai.ye bahut hi dhukh ki baat hai aur jab tak is poori vyavshta ko badalkar sarkar ko sooti aur khadi kapde kam damo par logo ko uplabdh karane ke liye majboor n kiya gaya tab tak is sthiti me parivartan mushkil lagata hai.(angreji lipi me likhane ke liye mafi chahti hoon)
सिंथेटिक वस्त्र लोगों की मजबूरी है। कपास की खेती तो बरबाद कर दी गई है। हाँ यह अन्वेषण जरुरी है कि सिंथेटिक वस्त्र सस्ते रखने में सरकार का क्या योगदान है?
नीला जी का पत्र एक बहुत ही बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को उठाता है। यह विडंबना ही है कि शारीरिक श्रम कर पसीना बहाते,ए सी व पंखे की सुविधा से वंचित लोग सिंथेटिक वस्त्र पहनने को अभिशप्त हैं जबकि ए सी की सुविधा में रहने वाले व पसीने से नाता न रखने वाले सूती कपड़े पहनने का आनंद ले पाते हैं। युगों से लोग वस्त्र जलवायु के आधार पर पहनते थे।
शीघ्र ही मैं भी इस विषय पर, जो मुझे भी सालों से अचंभित करता रहा है, लिखूँगी।
नीला जी व आपका आभार।
घुघूती बासूती
यह सही है की सिंथेटिक कपडे सस्ते और सहज उपलब्ध है, लेकिन सूती और खास तौर से खादी का कोई जवाब नहीं.
गर्म जल-वायु वाले इलाकों में ढीले और हवादार कपडा पहनना आरामदायक है.लकिन अब तो हर चीज की नक़ल की जा रही है. कपड़ो में भी यही हो रहा है.
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