यह मणिपुरी कवियत्री और कार्यकर्ता ईरोम शर्मिला चनू की भूख हड़ताल का दसवां साल है । शर्मिला अपने राज्य में पिछले ५१ सालों से लागू आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट , १९५८ ( सैन्य बल विशेष शक्तियाँ कानून , १९५८ ) या ” आफ़्स्पा ” के खिलाफ़ सत्याग्रह कर रही हैं। इस राक्षसी कानून के अन्तर्गत सैन्य बलों को –
- बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तारी और तलाशी की छूट
- सिर्फ शक के बिना पर गोली चलाकर जान से मारने की छूट
- आम कानूनी कार्रवाई से छूट (दण्ड मुक्ति) मिली हुई है ।
१९४२ में भारत छोड़ो आन्दोलन को दबाने के लिए जो अधिनियम बना था लगभग हूबहू वही ’आफ़्स्पा ’ के रूप में आजाद भारत की सरकार ने अपने देश के कुछ हिस्सों पर लगाया । इस कानून की आड़ में पिछले ५० साल से सेना ने अपना बर्बर राज मणिपुर व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में चला रखा है । लूट , बलात्कार , मार-पीट , हत्या आदि का इस्तेमाल आम जनता के खिलाफ़ तथाकथित रूप से उग्रवाद को दबाने के लिए किया जाता है परन्तु सच यह है कि पिछले ५० सालों में इस क्षेत्र में राज्य के दमन और मुख्य धारा से काटे रखने की प्रतिक्रियास्वरूप उग्रवाद बढ़ा ही है । मालोम गाँव के बस स्टॉप पर बस के इन्तेज़ार में खडे़ १० निहत्थे नागरिकों को उग्रवादी होने के सन्देह पर मार दिया गया – इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप २ नवम्बर २००० को शर्मीला ने आफ़्स्पा हटाये जाने के लिए आमरण अनशन शुरु किया । ६ नवम्बर को उन्हें “आत्महत्या करने के प्रयास” के जुर्म में गिरफ़्तार किया गया । २० नवम्बर २०० को जबरन उनकी नाक में तरल पदार्थ डालने की कष्टदायक नली डाली गयी । पिछले ९ सालों से इसी हालत में उन्हें कैद रखा गया है ।
शासकीय दमन के खिलाफ़ शर्मिला अकेली आवाज नहीं हैं । २००४ में असम राईफल के जवानों ने मनोरमा नाम की महिला का बलात्कार कर उसकी नृशंस हत्या कर दी । इस घटना के विरोध स्वरूप अधेड़ मणिपुरी महिलाओं ने सी आर पी एफ़ के मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया । इंसान से उसकी गरिमा और लोकतांत्रिक अधिकार छीन लेने वाले प्रशासन के प्रति यह इन महिलाओं के गुस्से का इजहार था और आधुनिक भारतीय राष्ट्र के लिए के शर्मनाक घटना । दूसरी तरफ शर्मिला के इस संघर्ष में कई और जांबाज साथिनें भी 10 दिसंबर 2008 से जुड़ गई हैं- मणिपुर के कई महिला संगठन पिछले साल से ही रिले भूख हड़ताल पर प्रतिदिन बैठ रहे हैं. सैन्य दमन की सभी घटनाओं में सरकार द्वारा दोषियों के खिलाफ़ सन्तोषजनक कार्रवाई नहीं की गई है ।
” आफ़्स्पा ” कानून जम्मू और कश्मीर में भी लगाया गया है और पिचले २५ सालों में सेना के बढ़ते अत्याचार और केन्द्र सरकार द्वारा राज्य की लोकतांत्रिक पेक्रियाओं से खिलवाड़ की प्रतिक्रिया स्वरूप यहाँ भी उग्रवाद और आतंकवाद बढ़ता ही जा रहा है । कश्मीर पिछले कई महीनों से शोपियां काण्ड को लेकर उबलता रहा है और इस आन्दोलन में भी काफ़ी लोगों की जानें गई हैं । सेना के जवनों द्वारा दो लड़कियों के बलात्कार और हत्या की इस घटना में राज्य सरकार ने आरोपियों को बचाने का ही काम किया है ।
अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे लोगों को राज्य सत्ता द्वारा हमेशा ही दबाया जाता रहा है । नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत प्राकृतिक संसाधनों की लूट देश के सभी राज्यों की सरकारों ने चला रखी है । कृषि भूमि को छीन कर एस.ई.ज़ेड (विशेष आर्थिक क्षेत्र) में बदला जा रहा है और जंगलों से आदिवासियों को खदेड़ कर खनिजों को औने-पौने दामों में निजी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले किया जा रहा है । जल – जंगल – जमीन के हक के लिए लोग आन्दोलन कर रहे हैं और इन जनान्दोलनों को दबाने के लिए सरकारी दमन बढ़ता ही जा रहा है । काशीपुर , कलिंगनगर , सिंगूर , नन्दीग्राम आदि में राज्य सरकारों द्वारा आंदोलनकारियों की हत्या , प्रताड़ना , बलात्कार , लूट आदि की घटनायें सामने आई हैं । इसके अलावा भी देश भर में प्रदर्शनकारियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को झूठे आरोपों में बन्द करना और हिरासत में प्रताड़ित करना भी सरकारी रणनीति के तहत होता रहता है । इस प्रकार सरकार लोकतांत्रिक विरोध के सभी तरीके बन्द करती जा रही है ।
समाजवादी जनपरिषद यह माँग करती है कि जम्मू और कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों से तत्काल ’आफ़्स्पा’हटाया जाए और जैसा कि एक लोकतांत्रिक सरकार से अपेक्षा की जाती है , इन क्षेत्रों के लोगों की मूलभूत समस्याओं का राजनैतिक समाधान किया जाए । इसके अलावा जनान्दोलनों के कार्यकर्ताओं पर पुलिसिया दमन बन्द किया जाए ।
इरोम शर्मिला को रिहा करो ! आफ़्स्पा कानून रद्द करो !! जनान्दोलनों का सरकारी दमन बन्द करो !!!
- ले. प्योली
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इस बहादुर महिला को दिल से सलाम करता हूं। अफ़सोस तो इस बात का है कि परंपरागत मीडिया इन जैसे लोगों को तवज्जो ही नहीं देता है।
‘महादेश का महालोकतंत्र संगीनों के संरक्षण में’
इरोम शर्मिला को नमन !
शासक वर्ग की पार्टियों और उनके साथियों ने दस साल से इरोम शर्मिला के गांधीवादी तरीके को इग्नोर किया है. उधर इनकी समस्या यह भे एही कि कोई हथियार न उठा ले. अगर जन भावनाओं का तिरस्कार होता रहेगा तो जनतांत्रिक व्यवस्था का क्या होगा? अगर दिल्ली की सत्ता तय कर ले तो पूर्वोत्तर या आदिवासी इलाकों के जन असंतोष को समझने के लिए शर्मिला के मामले को मानदंड के रूप में इस्तेमाल कर सकती है . लेकिन पता नहीं यह लोग ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं . शायद शर्मिला उनके वर्ग हित के लिए उपयोगी नहीं है.
यह भारतीय लोकतंत्र की हकीकत है।
ईरोम शर्मिला चनू को सलाम! देश के लाखों लोग उन के साथ हैं।
इरोम शर्मीला का व्यक्तित्व व कृतित्व हम सभी के लिए प्रेरणा दायक हैं |
उनके एवं मणिपुर की तमाम साथियों के संघर्ष को सबके सामने रखने का शुक्रिया |
साथी प्योली को इस पर्चे के सुन्दर व मार्जित लेखन के लिए बधाई | हर संघर्षशील महिला की तरह,घर व बाहर दोनों मोर्चे पर काम करते हुए भी सक्रिय होने की विशेष बधाई |
कार्यक्रम के स्तर पर समाजवादी जनपरिषद ‘आफ़्स्पा’ के मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करने जा रहा हैं,यह एक स्वागत योग्य कदम हैं |
जिंदाबाद !
स्वाति
बहुत सराहनीय प्रयास हैं शर्मिला जी का और इस ब्लागर का
इरोम शर्मिला के संघर्ष को हमारा समर्थन है।
उनके लोकतांत्रिक अधिकार बहाल होने चाहिए।
paracha bahut achchha hai. sharmila irom par penguin se deepti priya mehrotra ki kitab bhi aa gai hai. sunil
Sangharsh ka doosra naam hai Irom Sharmila. Us mahaan mahila ke aatmabal aur nishttha ka naman karta hun. Afsa jald se jald vapas le liya jaye, yehi aasha karta hun.
शर्मिला जी को नमन, यह मुद्दा चैनल्स की टीआरपी और सरकार के लिए सही होगा क्या , वैसे ध्यान दिलाने के लिए आभार , समाजवादी को इस की अगुवाई के लिए आभार..
इस मुद्दे को पूरा समर्थन है, भाई अफलातून।
दिलीप
Jujharu saathi SHARMILA ji ko salam. Sarkar ko kab sharam aaayegi.
क्या सरकार और जनता के मध्य यह लड़ाई ऐसे ही चलती रहेगी? कोइ मौजू हल नही हो सकता !
baahar hone ke kaaran is parche ko der se padh sakaa. satyaagrahi Irom Sharmila ke loktaantrik, nyaaysangat, nirbhay naagarik pratirodh aur sangharsh ke liye sacche hriday se samarthan.
bhaarat me loktantra kaa astitva sarkaar aur fauz ke hone se naheen, Irom Sharmila jaisi sangharshsheel vyaktitvon ki vazah se banaa huaa hai.
Irom ko samarthan loktantra ko samarthan hai.
[...] कवियित्री एवं जुझारू कार्यकर्ता ईरोम शर्मिला चानू के साहसिक संघर्ष के … पर उनके समर्थन में रखा गया था । सभा में [...]
इरोम शर्मिला का साहसिक संघर्ष राज्य की दमनकारी नीति के बरक्स न्याय और मानवाधिकारों की स्थापना के लिये एक व्यक्ति के असाधारण प्रतिवाद का उदाहरण है . हम,इस देश के आम नागरिक,उनके इस प्रेरक संघर्ष के साथ हैं .
आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट , १९५८ ( सैन्य बल विशेष शक्तियाँ कानून , १९५८ ) या ” आफ़्स्पा ” तुरंत हटाया जाना चाहिए .
इरोम शर्मिला चानू को उनके संघर्ष में सफ़ल होने की कामना करता हूं!
[...] Comments अनूप शुक्ल on इरोम शर्मिला का सत्याग्रह:सैन्…प्रियंकर on आफ़्स्पा ( AFSPA ) के खिलाफ़ [...]
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इक दीप-सी जलती रही इरोम शर्मिला
सबके लिये चलती रही इरोम शर्मिला
इक दिन यहाँ इन्साफ मिलेगा इसीलिये
हर दर्द को सहती रही इरोम शर्मिला
इस देश में बहाल नहीं लोकतंत्र क्यूं
सब से यहाँ कहती रही इरोम शर्मिला
जोखिम में जान डाल कर भूखी रही है वो
मिटती रही, बनती रही इरोम शर्मिला
रोके से रुक सकी नहीं कमाल कर दिया
बन के नदी बहती रही इरोम शर्मिला
खुशियों के मकानात बनें इसलिए सुनो
हर पल यहाँ ढहती रही इरोम शर्मिला
निर्मम हमारे देश की सरकार क्या कहें
किस मुल्क में रहती रही इरोम शर्मिला
औरत पे जुल्म ढा रहे गुंडे हैं ड्रेस में
इस बात पे हंसती रही इरोम शर्मिला
खा-पी के अघाए हुए इस देश में पंकज
कुर्सी को ही खलती रही इरोम शर्मिला
sharmila ko dil se salaam. hamari media yadi anna hajare ki tarah hi irom sharmila ko bhi apna vyapak jansamarthan de to nishchit rup se har aam aadmi irom aur uske satyagrah ko jan jayega sath hi ye bhi jan jayega ki hamari sarkaron ka kis tarah ka udasin ravaiya hai.
[...] इरोम शर्मिला का सत्याग्रह:सैन्य दमन क… [...]