कभी कभी हम कोई अच्छा काम करना भी चाहते हैं तब भी यदि हमारी नीयत साफ न हो तो वह प्रयत्न व्यर्थ जाता है। यही सेंगर जी के प्रयास के साथ हुआ। वैसे यह भी मुमकिन है कि वे अच्छा नहीं करना चाहते थे इसीलिए अच्छे उपाय अपना कर उसमें उलझ गये हैं ।
मैं महिला नहीं हूँ लेकिन नारीवादी होने के नाते इस पोस्ट पर अपनी राय देना चाहता हूँ ।
सेंगरजी ने इस पोस्ट को लिखने के लिए यह सूची जुटाई है । उनके स्रोत अंग्रेजी के रहे हैं क्योंकि Chaudhary या Chaudhury को देवनागरी में वे दो नामों के साथ चैधरी लिख रहे हैं । इन दो नामों के साथ उन्होंने ’चैधरी ’ ट्रान्सलिटरेशन द्वारा जोड़ लिया है ।
कुमारेन्द्र सेंगर के बुझौव्वल प्रस्तुत करने के इस दम्भपूर्ण और फूहड़ तरीके के कारण ही कुछ महिला साथी प्रतिक्रिया में इन महान स्वतंत्रता सेनानियों और बड़ी सामाजिक हस्तियों को ’राजकुमारियाँ’ कह कर खारिज करने की हद तक चली गयी हैं, जो अच्छी बात नहीं है। स्वप्नदर्शीजी, राजे ,रानियाँ और राजकुमारियाँ ज्यादातर अंग्रेजों के साथ हुआ करते थे , जनता के आन्दोलनों के साथ नहीं । मुझे लगता है कि ये महिला नेता यदि आज जीवित होतीं तो स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का समर्थन करतीं । अपने जीवन काल में इनके कर्म से स्त्री-पुरुष समता के लिए आन्दोलन को बल मिला। इस प्रकार सेंगर न सिर्फ़ सामयिक नारीवादी लेखिकाओं - कार्यकर्ताओं के प्रति विद्वेषपूर्ण दिखते हैं अपितु इन महान स्त्रीवादी सामाजिक परिवर्तन की पुरोधाओं के प्रति भी अपमानजनक प्रतीत होते हैं। चूंकि मौजूदा पीढ़ी में इनकी बाबत सूचना न होने के पीछे भी पुरुष सत्ता्त्मक समाज का योगदान कहा जा सकता है ।
हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान ही सामाजिक परिवर्तन के प्रयास भी जारी थे जिनमें लाजमी तौर पर स्त्री मुक्ति एक अहम मसला था। अहिन्सक संघर्ष की शक्ति रचनात्मक कार्यों से पैदा होती थी । इसलिए सत्याग्रह जब भी तीव्र होता इन रचनात्मक कार्यों के केन्द्रों पर भी अंग्रेज सरकार का दमन होता। मैं अपने चिट्ठे पर इन महिलाओं के संघर्ष की कहानियाँ दूँगा। इनमें ऐसी शक्सीयते भी हैं जिन्होंने अपनी बेटियों के कान नहीं छिदवाये । कौन से मूल्य दे रही थीं, अपनी संतानों को ये ? कितनों ने राष्ट्रीय आन्दोलन के संचालन के लिए गहने दे दिए ।
इनमें कोई अपने शहर की पहली महिला साईकिल चलाने वाली थीं । बरसों रा्ष्ट्रीय आन्दोलन में जेल काटते हुएअथवा भूमिगत आन्दोलन का नेतृत्व करते वक्त उन्हें अपने बच्चों के बारे में भी सोचना पड़ता होगा ? एक नाम ऐसा है जिनकी बेटी १९४२ में १४ बरस की उमर में अपनी माँ , बड़ी बहन , ताई के साथ जेल गयी और करीब पौने सत्रह बरस की उमर में निकली । पढ़ाई – लिखाई जेल में !
लाठियों से सिर फोड़कर समुद्र के पानी में सत्याग्रहियों को छोड़ दिया जाता उसका नेतृत्व करने वाली भी थीं। (सेंगर बतायेंगे कौन थीं ये महिलायें ,आपके द्वारा दिए हुए नामों में से ?जवाब विकी में नहीं मिलेगा ! )
स्वप्नदर्शीजी, राजे ,रानियाँ और राजकुमारियाँ ज्यादातर अंग्रेजों के साथ हुआ करते थे , जनता के आन्दोलनों के साथ नहीं । मुझे लगता है कि ये महिला नेता यदि आज जीवित होतीं तो स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का समर्थन करतीं ।
मेरा प्रयास होगा कि ऐसी महिला नेताओं के बारे में कुछ लिखूँ । मौजूदा स्त्री विमर्श करने वाली साथियों को नीचा दिखाने की यह कोशिश नहीं होगी । स्त्री पुरुष समता की लड़ाई को मजबूत करने के लिए होगी।

nice
पहले आप निश्चित हो लें की सेंगर साहब क्या करना चाहते थे ?
फिर हमें बता दीजिएगा |
वैसे दोनों चीजे हो सकती हैं ………
वैसे भी सेंगर साहब को महिलाओं के मसले पर ठन्डे को भी फूंक फूंक कर पीना चाहिए था |
पर किसी ……वादी होने पर अपन को बहुत भरोसा नहीं ?
Dear Aflatoonji,
I agree that my comment was very reactionary and almost came out of anger. I value your perspective. But my point was not to undervalue these women, but the attitude that the failure to share social space and gender inequalities is contributed by inbuilt or accepted incapability/desires of women.
Most of the time, people use these examples, that if you are capable, you will survive and shine like a bright star, without looking at the social context. In similar distorted manner people also coat Darwin and almost most educated people here and there say”survival of the fittest”
which is stupidity when you apply it to the social competition. people forget that Darwin refers to the changes and adaptability over millions of years and the process of change in genes and environment.
I could have written about all of these women, but the intent of using these examples makes me mad to some extent. I will look forward to your articles.
आपने बहुत सही बात कही है। चोखेरबाली ब्लॉग पर कमेंट किया है जिसे कि यहां भी डाल रहा हूं-
सेंगर साहब की इस पोस्ट पर मुझे एक विज्ञापन याद आ रहा है-मथुज गोल्ड का। उसमें एक बंदा कहता है- लोन लेने आए हैं,कोई एमए करने नहीं आए हैं। अब मैं कहता हूं- ब्लॉगिंग करने आए हैं,कोई एम.ए करने नहीं आए है।
पिछले दिनों राष्ट्रपति निवास,शिमला में स्त्री-विमर्श पर चली बहस में रोहिणी अग्रवाल ने भी अपने पर्चे में भारतीय और पाश्चाच्य के सवाल के बीच स्त्री-विमर्श को देखने-समझने की कोशिश की। मैंने उस समय उनसे यही सवाल किया कि स्त्री-विमर्श का सवाल सिर्फ अवधारणा से जुड़ा हुआ नहीं है,ये मुक्ति का सवाल है। इसलिए इस बात से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता कि ये कहां से आया? मुक्ति का पाठ चाहे कहीं का भी हो,उसे पढ़ा जाना चाहिए।
सेंगर साहब आप जिस सूची को हमारे सामने रखकर स्मार्ट होने के नमूने पेश करना चाह रहे हैं,उससे साफ हो जाता है कि आप कितने अक्लमंद किस्म के पुरुष हैं?
एक लिस्ट मैं भी जारी करुं और पूछूं कि इनमें से आप कितनों को जनते हैं तो आप उसे किस रुप में लेगें? ब्लॉगिंग को अगर आप सचमुच में टाइम पास की चीज समझ रहे हैं तो बेहतर हो कि इसके लिए अलग से कोई ब्लॉग बना लें। लेकिन चोखेरबाली जैसे कम्युनिटी ब्लॉग पर इस तरह की अनर्गल बातें लिखकर हमारा टाइम खोटा न किया करें। पोस्ट पढ़ने में टाइम लगता है,जबाब देने में टाइम लगता है। अबकी बार तो जबाब दे दिया लेकिन आगे से बाकी सदस्यों से अपील करुंगा कि इस तरह की पोस्टों का सामूहिक बहिष्कार करें। आप स्त्री-विमर्श के स्वर को मजबूत नहीं कर सकते,मत कीजिए। लेकिन उसी की जमीन पर खड़े होकर उसी के खिलाफ अनर्गल बातें करें,ये हमें बर्दाश्त नहीं।
असहमति अलग बात है लेकिन असहमति के नाम पर बाहियात किस्म की बातें करना अलग बात है। इस मंच के दुरुपयोग किए जाने पर आपको सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी चाहिए।
क्यों भाई सेंगर क्या गलत लिख दिया उन्हों ने तो बड़ी दूर की बात की, उन महिलाओं की जिन्होने उस दौर में तहे दिल से अन्दोलनों को गले लगाया, स्तरीय किताबें लिखी, अब तो सब दिखावटी है अपवाद छॊड़कर, पुरूषॊ की तो दशा और खराब है।
पुरुषों की दशा हमेशा से खराब रही है तो क्या कहना चाह रहे हैं आप? सेंगर साहब ने पोस्ट लिखकर अच्छा ही किया,इससे एक जमात के लोगों से इकठ्ठे मिलना हो जाएगा। एक सेंगर साहब,एब कृष्णा साहब,लिस्ट आगे तक जाएगी। छी:
सेंगर जी की विवादित पोस्ट तो अधूरी है ! उनसे अपील है कि वे नारीवादी आंदोलन और नारीवारी स्त्रियों की अन्य न्यूनताओं और खामियों का उल्लेख करते जिनकी वजह से स्त्री मुक्ति की आकांक्षा की वैलिडिटी को खारिज किया जाए ! आपसे आग्रह है मृणाल पांडे का चर्चित लेख ‘ मित्र से संलाप पढ लें ! शायद आपको अपने भीतर झांकने की कोई दृष्टि मिल जाए !
( वैसे आपकी सहायता के लिए ) पुरुषों द्वारा नारीवादी स्त्रियों पर लगाए गए आरोपों की फेहरिस्त दे रही हूं !
नारीवादी स्त्रियों में आपसी एकता और परस्पर एकता की भावना नहीं होती !
औरत ही औरत की दुश्मन होती है !
सारी फेमेनिस्ट औरतें तर्क विमुख होती हैं !
फेमेनिज़्म एक पश्चिमी दर्शन है ! कोकाकोला की तरह झागदार और लुभावना आयात भर है!
नारी संगठन बस नारेबाज़ी और गोष्ठियों का आयोजन भर करते हैं !गावों में इनकी कोई रुचि नहीं !
मध्यवर्गीय कामकाजी औरतें घर से बाहर कामकाज के लिए नहीं मटरगश्ती के लिए निकलती हैं !
पारिवारिक शोषण की शिकायत करने वाली स्त्रियां ऎडजस्ट करना नहीं जानती !
{
achcha lagtaa haen jab aap ko is behas mae shamil daekhtee hun
aur rehgayee baat us post ki to dr sanger abhi wahii tak haen jitnae naam unhonae ginae haen aaj sae das saal baad jab wo post likhaegae to usmae neelima , sujata , rachna , swapandarshi , anuradha , pratibha aur bhi kayee naam hogae jinkae vishay mae wo aap nayee peedhi ki naariyon sae puchhae gae ki inkae baarey mae jaatee haen kyaa
its was a stupid post not worth commenting but i really enjoyed the way woman readers asked “him right to test them ” wow that is what woman needs to do to stand up and speak
नीलिमा जी ने बिल्कुल ठीक कहा, पर कुछ भाई लोग महिलाओं की तरफ़दारी की बात इस लिये कर रहे है यहां क्योंकि वल लल्लूलाल हैं और लार टपकाते घूमां करते हैं ब्लाग्स पर या फ़िर किसी महिला से कभी आदर से कभी बात नही की सोच रहे है ब्लाग पर ही सही किसी फ़ेमनिस्ट की वाह-वाही लूट ले
अरे भाई महिला कोई अलग प्रजाति है क्य जो हल्ला मचाये हो वह तो समाज़ के आधे हिस्से की मालिक है और पुरूष या स्त्री को एक दूसरे से अलग कर समाज़ की कल्पना नही की जा सकती फ़िर क्यो आंदोलन चलाकर इन दोनो को अलग प्रजाति बनाने पर जुटे हो
निक्कमें ब्लागेर्स जिन्होने जीवन में कुछ भी बेहतर नही किया और न ही सम्मान पाया किसी राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दरवाजे नही गये वहां कुछ कहना तो दूर छपने की बात क्या कहें जिन्होने कभी पेड़ नही लगाये वह मशीन पर बैठ कर अन्तर्जाल पर पेड़ लगाने की बात करते हैं जिन्होनें नारी के शोषण की बात की या सोची कर नही पाये वह नारी आंदोलनों के सहयोग की बात करते है। जिन्होने हमेशा सर्वहारा को अन्दोलनों में ढ़केल कर उसकी रोजी-रोटी पर ग्रहण लगाया और अखबारों मे खुद सुर्खियों में रहकर वाह-वाही बटोरी और लगातार गरीब के वोट और गोट दोनों का भक्षण कर रहे है उन लोगो से यहां क्या उम्मीद, लिखे रहो भैया नीला घोड़ा आप का है और विदेशियों ने आप को साइबर पर जगह दे दी है लिखो……लिखो मगर शर्म मत खाना……
आपके नज़रिये से सहमत !
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