भोपाल गैस काण्ड के २५ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं | दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी से जुड़े सवाल ज्यों के त्यों खड़े हैं | हाल ही में इस बाबत मनमोहन सिंह से जब प्रश्न किए गए तो उन्होंने इन सवालों को भूल जाने की हिदायत दी | राजेन्द्र राजन की ये कविताएं भी पिछले २५ वर्षों से आस्तीन के इन साँपों को बेनकाब करने की कोशिश में हैं |
१
मुनाफ़ा उनका है
श्मशान अपना है
जहर उनका है
जहरीला आसमान अपना है
अन्धे यमदूत उनके हैं
यमदूतों को नेत्रदान अपना है
हमारी आँखों में जिस विकास का अँधेरा है
उनकी आँखों में उसी विकास का सपना है
२
जितना जहर है मिथाइल आइसो साइनेट में
हाइड्रोजन साइनाइड में
फास्जीन में
उससे ज्यादा जहर है
सरकार की आस्तीन में
जिसमें हजार- हजार देशी
हजार – हजार विदेशी सांप पलते हैं ।
३
यह कैसा विकास है जहरीला आकाश है
सांप की फुफकार सी चल रही बतास है
आदमी की बात क्या पेड़ तक उदास है
आह सुन , कराह सुन , राह उनकी छोड़ तू
विकास की मत भीख ले
भोपाल से तू सीख ले
भोपाल एक सवाल है
सवाल का जवाब दो .
४
आलाकमान का ऐलान है
कि हमें पूरे देश को नए सिरे से बनाना है
और इसके लिए हमने जो योजनायें
विदेशों से मँगवाकर मैदानों में लागू की हैं
उन्हें हमें पहाड़ों पर भी लागू करना है
क्योंकि हमें मैदानों की तरह
पहाड़ों को भी ऊँचा उठाना है
५
अब मुल्क की हर दीवार पर लिखो
कोई बाजार नहीं है हमारा देश
कोई कारागार नहीं है हमारा देश
हमारे जवान दिलों की पुकार है हमारा देश
मुक्ति का ऊँचा गान है हमारा देश
जो गूँजता है जमीन से आसमान तक
सारे बन्धन तोड़ .
- राजेन्द्र राजन

यह कविता नहीं भीतर उफनता लावा है ।
हुजूर !
दुर्भाग्य है देश का जो
इतने संवेदनहीन लोग हुकूमत पर काबिज
हो गए हैं ……………..
अच्छी कविता ……………
बेहतरीन….
मन को हिला दिया।
——–
अदभुत है हमारा शरीर।
क्या अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद सफल होगा?
बेहद खूबसूरत कवितायें । आभार ।
यह मात्र कविता नहीं है . इस महादेश की पुकार है .
अपने नागरिकों से एक गुहार है कि अब भी वक्त है,चेत जाओ . तथाकथित विकास के विनाश को समझो . अपना रास्ता, भले ही वह पगडंडी क्यों न हो,अपनी मिट्टी और अपनी जमीन के हिसाब से चुनो . किसी आलाकमान के डिक्टेट पर अपना विवेक न्यौछावर मत करो . और :
“अब मुल्क की हर दीवार पर लिखो
कोई बाजार नहीं है हमारा देश
कोई कारागार नहीं है हमारा देश
हमारे जवान दिलों की पुकार है हमारा देश
मुक्ति का ऊँचा गान है हमारा देश
जो गूँजता है जमीन से आसमान तक
सारे बन्धन तोड़ .”
बेचारों ने लाचारों ने स्वयंभू नताओं / गुंडों / माफियाओं में से एक एक को चुन चुन के संसद में भेजा उर ये कई कई बापों की नाजाय j औलादें श्री कृष्ण भगवान की “वर्णसंकर जायते ” वाली बात को सही साबित करते हुवे आज पूरे लोकतंत्र को जड़ों सहित चाट चुके है |
आम आदमी के पास लिख बोल कर भड़ास निकालने के सिवा क्या रास्ता छोड़ा गया है ?
लेकिन हाँ न्यायपालिका और मानवाधिकार व प्रयावरण सम्बन्धी अंतर्राष्ट्रीय मंच कुछ आशा जगाते है , अगर आप हम जैसे चाँद जागरुक लोग मिलकर जनजागरण का काम यु ही करते रहे तो भी दिए से दिया जलता चला जाएगा |
[...] साल पहले राजेन्द्र राजन ने इस मसले पर कवितायें लिखी थीं , इस निर्णय के बाद यह कविता लिखी है [...]
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