बाबा मायाराम द्वारा लिखी गयीं सशक्त रिपोर्टों से चिट्ठा जगत परिचित है । ’सतपुड़ा के बाशिन्दे’ नामक उनकी किताब का लोकार्पण कल इटारसी में हुआ ।
इस अवसर पर प्रबुद्ध नागरिकों के अलावा उन क्षेत्रों के ग्रामीण भी शामिल थे, जिनके बारे में इस पुस्तक में विवरण है।
इटारसी स्थित पत्रकार भवन में पर्यावरण बचाओ, धरती बचाओ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में इस पुस्तक का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार और प्राचार्य श्री कश्मीर उप्पल और समाजवादी जन परिषद के उपाध्यक्ष श्री सुनील ने किया। इस संगोष्ठी में पर्यावरण के कई पहलुओं पर चर्चा की गई। वनों का विनाश, नदियों का सूखना, रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव आदि ऐसे मानव जीवन से जुड़े कई मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया।
बाबा मायाराम ने पिछले एक शवर्ष में उन्हें प्रदत्त दो फैलोशिप के तहत हो्शंगाबाद जिले के वनांचलों में घूम-घूमकर यह पुस्तक तैयार की है जिसमें यहां रहने वाले आदिवासियों की जिंदगी में चल रही उथल-पुथल, आकांक्षाओं और विस्थापन की त्रासदियों का जीवंत चित्रण किया गया है। इस पुस्तक की प्रस्तावना देश के जाने-माने प्रसिद्ध पत्रकार भारत डोगरा ने लिखी है और संपादन डॉ. सुशील जोशीने किया है। उल्लेखनीय है कि बाबा मायाराम पिछले दो दशकों से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। पूर्व में वे कई समाचार पत्र-पत्रिकाओं से संबद्ध रह चुके हैं। विभिन्न मुद्दों पर उनके लेख, रिपोर्टस व टिप्पणियां देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में छपती रही हैं।
पुस्तक से कुछ विचारणीय मुद्दे :
- आजादी के बाद अब तक जितनी विकास परियोजनायें बनी हैं उनमें सबसे ज्यादा विस्थापन का शिकार आदिवासियों को होना पड़ा है । आंकड़ों में सिर्फ प्रत्यक्ष विस्थापन ही शामिल है । काफ़ी विस्थापन अप्रत्यक्ष होता है ।
- एक बार विस्थापित होने के बाद लोगों की जिन्दगी फिर व्यवस्थित नहीं हो पाती । उलटे लोगों की हालत बदतर हो जाती है । विस्थापन का समाधान पुनर्वास से नहीं होता ।
- वन्य प्राणी संरक्षण के सन्दर्भ में ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ है कि मानवविहीन करके ही वन तथा वन्य जीवों को बचाया जा सकता है । बल्कि बोरी अभ्यारण्य के अनुभव से तो लगता है कि वन , वन्य जीव तथा वनवासियों का सहअस्तित्व संभव है ।
- वन्य जीवों के संरक्षण से जुड़ा है वन संरक्षण । जंगली जानवर जंगल में ही रहते हैं । यह विडंबना ही है कि वन्य प्राणी संरक्षण योजना की शुरुआत वनों को काट कर की जाए ।
- वन्य संरक्षण की योजनायें व नीतियां विरोधाभासी हैं । एक तरफ़ तो शेरों को बसाने के लिए लोगों को उजाड़ा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ़ पर्यटकों के लिए सैर सपाटे के इंजाम किए जा रहे हैं ।
- एक दलील यह दी जाती है कि जंगलों में बसे आदिवासियों का विकास नहीं हो रहा है । तथ्य यह है कि जो गाँव विस्थापित किए गए हैं उनमें हर दृष्टि से लोगों की जिन्दगी पहले से बदतर हुई है ।
प्रकाशक व उपलब्धि केन्द्र - किसान आदिवासी संगठन , ग्रा/पो केसला , जिला – होशंगाबाद , मध्य प्रदेश,४६११११
मूल्य – पच्चीस रुपये ।


is jaanakaaree ke liye dhanyavaad और बाबा माया राम जी को बधाई
MUBAARAK BAD SWIKAAR KIJIYE.BAHUT KHSHI HUI.HAM AAPKE SAATH HAI, HAR DAM!
MAYA RAAM JI KE SAATH GUZAARE PAL HAMESHA PRERIT KARTE HAIN.
इस महत्वपूर्ण पुस्तक के उल्लेख का आभार । इस पुस्तक के लिये किये गये श्रम का उल्लेख आपकी इस प्रविष्टि से हो जाता है हमें, और मुद्दे जो उठाये गये हैं अत्यन्त विचारणीय हैं ।
nice