भारत में खेल , संगीत और कला के क्षेत्र में उपभोक्तावाद का अनुप्रवेश ढाई -तीन दशक पहले भली-भाँति हो चुका था । संगीत सम्मेलनों ,कला-प्रदर्शनियों और खेल-कूद स्पर्धाओं को कम्पनियाँ प्रायोजित करने लगी थीं । क्रिकेट मैच में पुरस्कार ,खिलाड़ियों के लिबास , बल्लों पर लगी कम्पनियों की चिप्पियाँ हमारे देश के लिए नई नहीं हैं । बांग्ला भाषा का एक बड़ा लेखक वक्त से आगे चल रहा था – नाँच-गाने , कला और संगीत से ताल-मिलाते हुए । उसने ढाई-तीन दशक पहले ही नं. 10 नामक एक सस्ती सिगरेट का विज्ञापन करना शुरु कर दिया था । यह उल्लेखनीय है बतौर मॉडल वह इस सस्ती ब्राण्ड का विज्ञापन करता था लेकिन खुद उससे मँहगी ब्राण्ड पीता था । बाँग्ला के सफल लेखकों की स्थिति हिन्दी लेखकों से यूँ भी बेहतर होती है चूँकि बाँग्ला किताबें ज्यादा खरीदी जाती हैं – मुख्यत:पुस्तकालयों में खरीद पर निर्भर हिन्दी लेखकों से यह कहीं बेहतर स्थिति है। अनुमान है कि साहित्य की विभिन्न विधाओं में छपी १५० के करीब इनकी किताबों से हर साल कम-से-कम २०-२२ लाख रुपये की रायल्टी इन महाशय को जरूर मिल जाती होगी। इसके बावजूद इन्हें अपनी लोकप्रियता को मॉडलिंग के माध्यम से भुनाना भाता रहा है । दस नम्बरी सिगरेट के विज्ञापन के उपरान्त इन्होंने मलावरोध दूर करने के किसी उपाय का मॉडल बनना उचित समझा । भ्रम न हो इसलिए यह बताना जरूरी है मलावरोध दूर करने के लिए नं. 10 सिगरेट पीने को उपाय नहीं बताया था , यह अलग उपाय का इश्तेहार था। इन महोदय के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पारटी से निकट सम्बन्ध सर्व विदित हैं ।
देश की सर्वोच्च सरकारी साहित्यिक संस्था की बागडोर यदि ऐसे महानुभाव के हाथों में आ जाए तब क्या हो सकता है ? इनकी सदारत में साहित्य अकादमी ने कोरियाई सरकार से समझौता किया है । इस समझौते के तहत सैमसुंग कम्पनी के पैसे से भारतीय भाषाओं के साहित्य के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम पर पुरस्कार दिए जा रहे हैं। चूँकि इस साल गणतंत्र दिवस पर कोरियाई राष्ट्रपति सरकारी मेहमान थे इसलिए उनकी पत्नी के हाथों ये पुरस्कार प्रदान किए गए । यह गौरतलब है कि इस प्रायोजित पुरस्कार देने के प्रस्ताव को साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी नामंजूर कर चुकी थी । साहित्य अकादमी का पुरस्कार सरकारी पैसों से दिया जाता रहा है । पूँजीपतियों द्वारा स्थापित न्यास भारत में साहित्यिक पुरस्कार देते रहे हैं लेकिन साहित्य अकादमी के पुरस्कार की एक अलग गरिमा रही है । साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे गये हिन्दी कवि ज्ञानेन्द्रपति ने याद किया कि मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी की हत्या के आरोपी एक उद्योगपति द्वारा भी साहित्यिक पुरस्कार दिए जा रहे थे। गुजरात साहित्य परिषद के अधुअक्ष तथा केन्द्रीय साहित्य अकादमी से नवाजे गये नारायण देसाई सैमसुंग-पुरस्कार के विषय में जानकर दु:खी होकर बोले कि साहित्य अकादमी को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए । उन्होंने कहा कि मुझे संतोष है कि जब मुझे यह पुरस्कार मिला था तब वह किसी कम्पनी द्वारा प्रायोजित नहीं था।
सैमसुंग दक्षिण कोरिया की उन सात कम्पनियों में से एक है जिनके ऊपर राष्ट्रपति चुनाव में घूस देने , सैन्य तख्ता-पलट तथा तानाशाही के विरोध को दबाने के लिए क्वांगजू में हुए नरसंहार में दो सैनिक तानाशाहों को मदद करने का आरोप साबित हुआ था । इन कम्पनियों के अध्यक्षों को इस जुर्म में पाँच साल की कैद हुई थी,सैमसुंग के अध्यक्ष को दो साल की सजा हुई जिसे बाद में निलम्बित कर दिया गया था। जिन्हें यह घूस दी गई थी वे उस मुल्क के बदनाम सैनिक तानाशाह थे । इन सैनिक तानाशाह राष्ट्राध्यक्षों चुन डू व्हान तथा रो ताई व्हू की इस ऐतिहासिक मामले में गिरफ़्तारी हुई थी। बाद में इन उद्योगपतियों और पूर्व राष्ट्राध्यक्षों को छोड़ दिया गया। उद्योगपतियों की सजा तत्कालीन प्रधान मन्त्री की अध्यक्षता में हुई काबीना बैठक में माफ़ करते वक्त कोरिया के न्याय मन्त्री ने कहा था, ’ व्यापारियों का मनोबल उठाने के लिए यह कदम लिया जा रहा है ताकि देश की अर्थव्यवस्था की उन्नति में वे फिर लग सकें । ’
कोरिया की कुख्यात खूफ़िया एजेन्सी (कोरियन इन्टेलिजेंस एजेन्सी, के.सी.आई.ए.) का प्रमुख पार्क चुंग-ही मजदूरों द्वारा संगठित होने के हर प्रयास को कुचल देता था। १९८७ में किए गए अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सर्वेक्षण के मुताबिक कोरियाई मजदूरों के काम के घण्टे पूरे विश्व में सर्वाधिक थे , औद्योगिक दुर्घटनाएं १९६० से १९८८ में तिगुनी हो गई थीं तथा यह भी दुनिया भर में सर्वाधिक थी ; उत्पादन के क्षेत्र में मजदूरी अमेरिका में मिलने वाली मजदूरी की ग्यारह फ़ीसदी तथा जापान में दी जाने वाली मजदूरी का १४ फ़ीसदी थी । कोरियाई मजदूर राजनैतिक माँगे भी करने लगे हैं तथा श्रम कानूनों में सुधार की माँग उठने लगी है ।
कोरियाई जनता में सर्वाधिक प्रिय मजदूर नेता ली सो सुन का कहना है , ” सरकार का दावा है कि अर्थव्यवस्था सफ़ल रही है । किन्तु इस ’सफ़लता ’ में हमारे हिस्से कुछ भी नहीं आया है ! ’
एक नं. टेन सिगरेट प्रेमी जनवादी लेखक की अध्यक्षता में चल रही साहित्य अकादमी दक्षिण कोरिया सरकार तथा सैमसुंग कम्पनी के ऊपर वर्णित कारनामों से अनभिज्ञ तो नहीं होगी ।
( फरवरी २, २०१० के ’जनसत्ता’ से साभार ) jansatta4
दस नम्बरी अध्यक्ष और सैमसुन्ग – साहित्य अकादमी गठजोड़ / जनसत्ता / अफ़लातून
फ़रवरी 2, 2010 अफ़लातून अफलू द्वारा

सही है.. अज्ञान के लिए क्षमा लेकिन हैं कौन ये दस नम्बरी ?
औद्योगिक प्रतिष्ठानों ( देशी – विदेशी ) से स्पॉन्सर्ड पुरस्कारों के बारे में समझ बढ़ानी जरूरी है । ये लुटेरे अपने नाम सरकारी / NGO संस्थाओं के साथ जोड़कर अपनी वैधता बनाते हैं (TISS,TERI,मैग्सेसे,फोर्ड,…). वैसे ईनाम ,पेटेन्ट/कॉपीराईट और प्रतिस्पर्धा ही कुछ पेचीदा अवधारणायें हैं । लेख सार्थक है और संघर्ष को बढ़ाने की सख़्त जरूरत है ।
@ अभय भाई,
२०-२५ साल पहले नं 10 सिगरेट तथा हाल में मलावरोध नाशक(इसमें सौमित्रो भी शरीक थे) का विज्ञापन करने वाले सज्जन ही आज-कल साहित्य अकादमी के सदर हैं – सुनील गंगोपाध्याय ।
भाई अफ्ले,
बढ़िया लिखते हो समाजवादी तर्रारी के साथ. पढ़ते वक़्त ऐसा लगा कि परसाई की कांच लपकने को हो. बाबू भाई के अलावा एक दो दूसरे लोगों की राय भी बतियाई होती तो हमारे जैसो और भी अच्छा लगता. तुमने राय मांगी थी , ईसीलिए यह सब कुछ लिख रहा हूँ
मैं मार्च ४ को तिपनिया के कबीर मेले में जाने के लिए सोंच रहा हूँ. अगर तुम्हारी सलाह हो तो होशंगाबाद हो आऊं.
बस मस्त रहो. डाक्टर जी को प्रणाम
ढेरो प्यार
सुरेसवा
चंचल दादा को राम राम
ज्ञानवर्धक और मज़ेदार भी।
गंगो को तो गंगू बना डाला आपने।
इसी दोहरे चरित्र ने तो भारत के साम्यवादियों का और साम्यवादियों ने साहित्य का.
इसी दोहरे चरित्र ने तो भारत के साम्यवादियों का नाश किया है और ऐसे ही साम्यवादियों ने साहित्य का.
आलेख से इन कम्पनियों की करतूत तो पता चली !
बहुत कुछ जानने को मिलता रहता है मुझे ।
आभार ।
इस अत्यन्त जरूरी जानकारी को तीखी और पैने विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करने के लिए शुक्रिया !
nice explosion
साहित्य से बड़ा मलनाशक और मलावरोधनाशक क्या हो सकता है . पर जब मल वहीं अवरुद्ध होने लगे तब आशा की किरण कहां है ? विदेशी उच्छिष्ट/मल्टीनेशनल मल की दुर्गंध चहुंदिश फैल रही है .
[...] दस नम्बरी अध्यक्ष और सैमसुन्ग – साहि… [...]
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