इन छोटे-छोटे जनांदोलनों की जो कमी या विफलता है, वह यह है कि वे मिलकर व्यवस्था-परिवर्तन की कोई बड़ी धारा नहीं बना पा रहे हैं। एक-एक मुद्दे वाले इन आंदोलनों में कई बार वैचारिक-राजनैतिक दृष्टि का अभाव रहता है। इसीलिए वे कोई बड़ी शक्ल नहीं ले पा रहे हैं और कोई निरंतरता भी उनमें नहीं दिखाई देती है। उनके नेतृत्व की व्यक्तिवादिता तथा एनजीओ की भारी घुसपैठ भी दो बड़ी बाधाएं हैं। वास्तव में यह एक बड़ी चुनौती है। इन छोटे-छोटे जनांदोलनों में भी एक समय के बाद ठहराव आ जाता है। उनकी ऊर्जा को समेटते हुए, एक वैचारिक प्रक्रिया चलाते हुए, राजनैतिक दिशा देते हुए, एक देशव्यापी परिवर्तनवादी आंदोलन खड़ा करने का समय आ गया है।

माओ
पिछले महीने , २७-२८ मार्च को इलाहाबाद में देश के जनांदोलनों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े करीब एक सौ लोगों की बैठक इसी मकसद से हुई थी । इसका कोई ठोस नतीजा निकलेगा या नहीं,इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है । लेकिन इतना तय है कि अब छोटे ,एक-लक्ष्यी आंदोलनों से काम नहीं चलेगा । देश को बचाने के लिए परिवर्तन की धारा बहे , यह वक्त की पुकार है । आज के हालात १९७३ -७४ से ज्यादा अलग नहीं हैं ।
माओवादियों की विकास नीति क्या है ?
माओवादियों के रास्ते के बारे में भी कई सवाल स्वयं अरुंधती राय के वृतांत को पढ़ते हुए खड़े होते हैं। एक तो किस तरह का बर्बरीकरण सरल आदिवासी समाजों का हो रहा है, जब 17 साल की लड़की कमला कहती है कि उसे कोई और फिल्म अच्छी नहीं लगती ? वह सिर्फ एम्बुश (घात लगाकर हमला) वीडियो देखती है, जिनमें मानव शरीरों के परखच्चे उड़ जाते हैं। या फिर वह मां, जिसके बेटे को पुलिस ने मार दिया और लाश भी नहीं दी। वह कहती है कि वह खून का बदला खून से लेगी। या माओवादियों द्वारा विरोधी खेमे के आदिवासियों की सामूहिक हत्या। या किसी पुलिस के सिपाही का सिर धड़ से अलग कर देना। जब हम अदालतों द्वारा दी गई फांसी और मृत्युदंड को भी गलत मानते हैं और उनके विरुद्ध अभियान चलाए जाते हैं तब क्या इस तरह की हत्याएं उचित ठहराई जा सकती हैं ? हरियाणा की खाप पंचायतें और तालिबानी जन अदालतें हमें भयानक लगती हैं तब क्या गारंटी है कि माओवादी जन-अदालतों एवं बंदूकों की ताकत का दुरुपयोग नहीं होगा ?
अंतहीन हिंसा के इस दुष्चक्र में आखिरकार कौन मारे जा रहे हैं ? क्या गरीब आदिवासी या पुलिस व अर्ध फौजी बलों के सिपाही नहीं ? नारायणपुर में रहने वाले 4000 मुखबिर कौन होंगे ? क्या साधारण छोटे लोग नहीं ? सलवा जुडुम में भी तो शामिल आदिवासी लड़के ही हैं। अरुंधती को एक माओवादी आदिवासी युवक ने बताया कि उसका सगा भाई सलवा जुडुम का ’विशेष पुलिस अधिकारी’ है। वह चाहे भी तो अब कभी लौट नहीं सकता। ऐसा कैसे हो गया कि आदिवासी एक दूसरे को मार रहे हैं ? हर समाज में कुछ गलत तत्व होते हैं, जो लालच एवं दुष्टता के शिकार हो जाते हैं। लेकिन क्या उनकी सजा मौत ही होगी ? क्या पश्चाताप सुधार या माफी की कोई गुंजाईश नहीं होगी ? यदि इस तरह की हिंसा को उचित माना जाएगा तो क्या तालिबानी आतंकवादियों को गलत कहा जा सकेगा ? अपनी समझ के मुताबिक वे भी तो एक महान और पवित्र उद्देश्य के लिए दूसरों को बम से उड़ा रहे हैं।
अरुंधती राय इन हालातों के लिए भारतीय राजसत्ता को दोषी ठहराती है। वे बहुत हद तक सही हैं। लेकिन क्या किशोरों और किशोरियों के हाथों में बंदूके थमाने वाले माओवादियों की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? सोच समझकर चुना गया चारु मजूमदार का ‘जन-संहार’ (एनिहिलेशन) का यह रास्ता कहां पहुंचाएगा ? क्या सचमुच इसकी राख से नया इंसानी समाज निकल पाएगा ?
माओवादी नेता किशनजी कहते हैं कि वे 2050 तक दिल्ली में अपना झंडा फहरा देंगें। इसे मान भी लिया जाए तो इसका मतलब है कि 40 साल तक हिंसा का यह भयानक दौर चलता रहेगा। इसका क्या नतीजा होगा ? क्या बाद के समाज पर भी इसकी छाया नहीं रहेगी ? अभी तक जितनी भी हिंसक क्रांतियां हुई हैं, उन्होंने तानाशाही को ही जन्म दिया है। कारण बहुत साफ है। जिनके पास बंदूक की ताकत होती है, उनको उसका नशा भी चढ़ जाता है। फिर लंबे समय तक हथियारबंद युद्ध लड़ने वाले क्रांतिकारी संगठनों का ढांचा लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। युद्ध में बहस या मतभेदों की जगह नहीं होती। वहां तो कमांडर को हुक्म मानना ही है। इसीलिए नक्सलवादियों में जरा भी मतभेद होने पर टूट हो जाती है और कल तक का साथी आज का दुश्मन नं० एक हो जाता है।

गांधी
ऐसे भूमिगत संघर्षों में असुरक्षा की भावना भी बहुत हावी रहती है। क्या मालूम कब कौन पुलिस का एजेन्ट निकल जाए ? इसलिए जिन औजारों और तरीकों से आप लड़ रहे हैं , लड़ाई का नतीजा और वैकल्पिक समाज का चरित्र भी कहीं न कहीं उनसे प्रभावित होगा । गांधी ने साधन और साध्य की सम्गति की बात अकारण या अमूर्त सिद्धान्त के तौर पर नहीं की थी । उसके पीछे मानव समाज के ठोस अनुभव थे ।
तर्क के लिए यह कहा जा सकता है कि पूंजीवादी व्यवस्था और राजसत्ता में भी बहुत हिंसा और तानाशाही छिपी है। और टूट तो गैर-हथियारबंद आंदोलनों में भी होती है। व्यक्तिवादिता, गुटबाजी और तानाशाही उनमें भी बहुत है। किन्तु दूसरों का दोष दिखानें से अपना दोष कम नहीं हो जाता। नया समाज गढ़ने की इच्छा रखने वालों को नये तरीके भी गढ़ने होंगें। खास तौर पर जब पिछली एक-डेढ़ सदी के अनुभव हमारे सामने हैं, जिनसे हम सीख सकते हैं।
हिंसा- अहिंसा की बहस अंतहीन है, क्योंकि अंत में यह मामला तर्क का नहीं, विश्वास का बन जाता है। लेकिन एक ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है विकास के मॉडल का, जो अरुंधती राय के मन में भी उठा है। जो माओवादी पार्टी आज बॉक्साईट या लौह अयस्क के खनन का विरोध कर रही है, कल उसका राज आएगा तो क्या होगा ? आधुनिक जीवन-शैली, भोगवाद, समृद्धि, आधुनिक उद्योगों, आधुनिक तकनालाजी, पर्यावरण आदि के बारे में उसके क्या विचार है ? आधुनिक विकास में तो इस तरह का खनन, विस्थापन और विनाश नीहित है।
कुछ समय पहले समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने खनन परियोजनाओं के संदर्भ में यह बात उठाई थी कि मामला सिर्फ विस्थापन और जंगलों के विनाश का नहीं है। इतना ज्यादा खनिज निकालने की जरुरत क्या है और यह किसके लिए है ? फेलिक्स और समरेन्द्र दास की ताजा किताब से और इसके पहले विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र की खनन पर केन्द्रित नागरिक रपट से भी इसी तरह के सवाल निकलते हैं। इनके बारे में माओवादियों के विचार क्या है ? क्या वे आधुनिक विकास का मोह छोड़ने के लिए तैयार हैं ?
ये सवाल पूछना इसीलिए जरुरी है क्योंकि मार्क्सवादी समूहों में इन पर काफी संभ्रांति, उलझन और अस्पष्टता रही है। नेपाल के दोनों प्रमुख माओवादी नेताओं प्रचण्ड और बाबूराम भट्टराई के जो साक्षात्कार 2008 में प्रकाशित हुए, वे हैरान करने वाले थे। उन्होंने कहा कि वे पनबिजली के लिए बड़े बांध बनाएंगे, पर्यटन को बढ़ावा देंगे, खेती का आधुनिकीकरण करेंगे, सरकारी-निजी भागीदारी को बढ़ावा देंगे और विदेशी पूंजी को भी आमंत्रित करेंगे। विश्व व्यापार संगठन से बाहर आने के बारे में उनका कोई फैसला नहीं है। भारत के माओवादियों के विचार भी क्या इसी तरह के हैं या इनसे अलग है? अलग हैं तो कितना ?
अरुंधती राय ने इस बात पर चुटकी ली कि कभी नक्सलवाद के प्रणेता चारु मजूमदार जो कहते थे, उस मंत्र का जाप आज नक्सलियों का दमन करने वाली भारत सरकार कर रही है – ‘चीन का रास्ता हमारा रास्ता है’। सवाल यह है कि चीन इस मुकाम पर कैसे पहुंचा ? तीसरी दुनिया के अनूठे एवं प्रेरणास्पद साम्यवादी मॉडल से वह घोर पूंजीवादी मुकाम पर कैसे पहुंच गया ? क्या इसके पीछे भी कहीं चीन के साम्यवादी शासकों के मन में आधुनिक विकास एवं समृद्धि की वही अवधारणा नहीं थी, जो पूंजीवादी औद्योगिक देशों की है ? भारतीय माओवादियों की मंजिल क्या है ? आज के चीन और उसके ‘बाजार समाजवाद’ के बारे में वे क्या सोचते हैं ? अच्छा होता यदि अरुंधती राय इन सवालों को मन में न रखकर माओवादी नेताओं से पूछती, कुरेदती और उनके जबाब बाकी लोगों को बताती। उन पर एक बहस चल सकती थी। आखिर चीन की क्रांति भी बड़ी जबरदस्त थी, लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानियां दी थी। क्या फिर भारत में भी उतनी कुर्बानियां देकर उसी मुकाम पर पहुंचना है ?
जब दंतेवाडा का पुलिस अधीक्षक अरुंधति राय से कहता है कि अगर हर आदिवासी को एक टीवी दे दिया जाए तो उनका प्रतिरोध टूट सकता है,तो वह एक गहरी बात कह रहा है । अगर आदिवासी आज के वैश्विक बाजार , उपभोक्ता संस्कृति और उसकी ललक का हिस्सा बन गए तो उन्हें परास्त करना आसान हो जाएगा । मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम बताया था,पर समाजवादी चिंतक सच्चिदानन्द सिन्हा ने उपभोक्तावादी संस्कृति को गुलाम मानसिकता की अफ़ीम निरूपित किया है। इस तरह दंतेवाड़ा में दो अलग संस्कृतियों,सोच और जीवन मूल्यों की टकराहट भी है। आधुनिक विकास की टक्कर माओवादियों के अस्तित्व से हो रही है ।सवाल है कि माओवादियों की इस बारे में क्या दृष्टि है?
जैसे ही आधुनिक विकास पर सवाल उठते हैं, गांधी प्रासंगिक हो जाते हैं। अरुंधती राय ने माओवादियों को बंदूकधारी गांधीवादी कहा है। किन्तु गांधी के इस पक्ष हिंसा-अहिंसा पर माओवादी क्या सोचते हैं ? कोई अरुंधती को भी बता दे कि गांधी का मतलब सिर्फ भूख हड़ताल या जंगल में मजबूरी में सादगी से रहना नहीं है। न ही गांधीगिरी का मतलब महज किसी को फूल भेंट करना है। गांधी के पास एक वैकल्पिक विकास और वैकल्पिक सभ्यता की सोच है, जो समय के साथ ज्यादा जरुरी और ज्यादा प्रासंगिक होती जा रही है।
बीसवीं सदी में तीसरी दुनिया में दो बड़े क्रांतिकारी हुए है – गांधी और माओ। दोनों में कुछ समानताएं होते हुए भी दोनों की नयी दुनिया की कल्पनाएं अलग-अलग थी। माओ का रास्ता आजमाया जा चुका है। गांधी के सत्याग्रह के तरीके का उपयोग आजादी के आंदोलन में हुआ, किन्तु आजाद भारत के शासकों के विश्वासघात के कारण उनके विचारों का ‘स्वराज’ नहीं आ सका। अब दोनों विचारकों, उनकी विचारधाराओं और उनके प्रयोगों की सफलताओं – असफलताओं से सीखकर ही इक्कीसवीं सदी की क्रांति का पथ प्रशस्त हो सकेगा।
संदर्भ:
1. अरुंधती राय, ‘वाकिंग विद द कॉमरेड्स’, आउटलुक, 29 मार्च 2010
2. किशन पटनायक, ‘विजन्स ऑफ डेवलपमेंट: द इनएविटेबल नीड फॉर आल्टरनेटिव्ज’
फ्यूचर्स, नं. 36, 2004
3. सुनील, ‘नेपाली माओवादियों की सीमाएं‘, जनसत्ता, 23जून, 2008
4. सुनील, ‘लोकतंत्र और सत्याग्रह’, जनसत्ता, 2 दिसंबर, 2009
5. फेलिक्स पैडल एवं समरेन्द्र दास, ‘आउट ऑफ दिस अर्थ: ईस्ट इंडिया आदिवासीज़ एंड द एल्युमिनियम कार्टेल’, 2010
लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।
- सुनील
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111
मोबाईल 09425040452

जाहिर है समस्या अब विस्फोटक है …….पर अब इसका हल क्या है ?हल कौन ढूंढेगा ?ओर उसे क्रियान्वित कैसे करेगे ?क्यूंकि समाज सिस्टम तो आम लोगो से बना है ….क्या उन्हें बदल पायेगे ?उनके बीच जो लालच नैतिक .आसानी से उपलब्ध होने वाली वास्तु पर अधिकार भावना ….. मूल्यों के ह्रास की जो प्रवति दिव लप हो गयी है .उसे कैसे बद्लेगे .आखिरकार सरकार भी तो लोगो से ही बनती है …..सब समस्या की बात करते है ….हल की कोई नहीं कर रहा ?
nice
क्या शब्दों में, विचारों में इतनी धार, इतनी ऊर्जा नहीं आ सकती कि वे अस्त्रों से कहीं अधिक कारगर औजार बन सकें, न्याय और समानता के लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में ! जरूरत है चरित्र, निष्ठा और निष्कामता से भरा ऐसा नेतृत्व जो केवल शब्दों को हथियार में बदल कर जनांदोलनों में ज्वार भर सके।
प्रश्न अनुतरित रह गए ..यह तो सब ही कह रहे हैं ..पर जो सवाल हैं उनका जवाब कौन देगा.
समस्या को संतुलित ढंग से विश्लेषित करने में लेखक सफल रहे हैं। जब तक आपसी अविश्वास का कचव नहीं टूटेगा तब तक समस्या का हल नहीं निकल सकता।
बढ़िया आलेख. बधाई.
“हिंसा- अहिंसा की बहस अंतहीन है….ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है विकास के मॉडल का” मुझे लगता है कि यही वह आधार है जिसपर व्यापकतम पहल होनी चाहिए.
माओवादियों से यह सवाल वाजिब है कि उनकी विकास-नीति क्या है? अरुंधती रॉय अपने लेख में इस सवाल पर रुकती ज़रूर हैं कि क्या हो अगर कल पार्टी तय कर ले कि उसे बौक्साईट पहाड़ से बाहर निकालना है, लेकिन अगली ही पंक्ति में यह कह के किनारा कर लेती हैं कि हम भविष्य की अटकलों को वर्त्तमान की लड़ाई के आड़े क्यों आने दें?
लेकिन क्या ये कोई भविष्य का सवाल है? क्या माओवादियों ने रूस और चीन में अपनाए गए विकास के मॉडल को ईमानदारी से मुड कर देखने-समझने की कोशिश की है, बजाय उन व्यवस्थाओं के उत्कर्ष और पतन को नायकों, प्रतिनायकों और विश्वासघातियों में समेट कर देखने के. पूरा समाजवाद का सपना क्या इसलिए भहराकर गिर पडा कि कहीं गोर्बाचेव पैदा हो गए तो कहीं देंग श्याओ पेंग? माओवादी पार्टी का आदिवासी जीवनपद्धति, संस्कृति और जल-जंगल-जमीन को बचाने का नारा क्या सिर्फ एक तात्कालिक ज़रुरत नहीं है, क्योंकि उनका मूल कार्यक्रम अभी भी उसी समाजवाद तक पहुँचने का है जो अनिवार्यतः पूजीवाद से गुजरते हुए आता है. और फ़िर माओवादी ही क्यों, बाकी वामपन्थ में भी इस पर कोई साफ़ समझ कहाँ है. वामपंथ की इतनी सारी जो पार्टियाँ हैं, उनमें बहस और विभाजन समाजवाद और विकास और जीवन के बेहतर मॉडलों को लेकर नहीं है . ज़्यादातर भिड़ंत उन तरीकों को लेकर है जिनसे वहाँ पहुँचना है – संसद से या हथियार से या दोनों से, खेतिहर मजदूर के सहारे, किसानों के आंदोलन से या औद्योगिक मजदूरोन की गोलबंदी से. लेकिन कहाँ पहुँचना है, क्या करना है और इस पूरे रास्ते में अपने किसी साथी ने भी सवाल उठाया तो उससे कैसे निबटना है, यह सबकुछ जैसे तय हो चुका है.
साथ ही, सुनील जी का इस बात पर जोर देना भी अच्छा रहा कि साधन और साध्य की सम्गति की बात अकारण या किसी अमूर्त नैतिक सिद्धान्त के तौर पर नहीं है, यह भी एक राजनीतिक सवाल है. हथियार को अपनी राजनीतिक पहचान के रूप में भाँजने वाले भी यह तो स्वीकार करते ही हैं कि उनका रास्ता भी काफ़ी लम्बा है. बंदूकवादी जमात भी कम-से-कम चालीस साल पुरानी हो चली है और किशन जी की भी मानें तो कम-से-कम 2050 तक ही दिल्ली पर कब्जा हो जायेगा. तो ऐसे में, कब तक निहत्थे देखेंगे वाला रूमानी जस्टिफ़िकेशन वैसे ही ध्वस्त हो जाता है. फिर हथियार से जुड़े मुद्दों पर खुल के सोचना चहिए.
- जैसे अहिंसक/संसदीय/खुली राजनीति के अपने पेंच हैं, थकान हैं, लोभ-भ्रष्टाचार-भटकाव हैं, बन्दूक के साथ भी इस तरह की चीजें पैकेज में आती हैं. हथियार हासिल करने और हथियारबंद कारवाइयों के लिए कई किस्म के संरक्षण जुटाने पड़ते हैं, दस्ते के सदस्यों तक में आपस में अविश्वास और असुरक्षा-बोध बहुत आम बात रही है.
- हथियारों के इर्द-गिर्द ना तो सच में कोई व्यापक गोलबंदी हो पाती है न आमजीवन से कोई सीधा सम्पर्क रह पाता है. बूढ़े लोग, बच्चे, और औरतें ऐसे कारवाइयों में दूसरे दर्जे का कोई रोल ही निभा सकते हैं और इसी क्रम में ऐसी क्रांतियों के बावजूद और उनके भीतर ही hierarchy बनी रहती है.
गांधी और माओ को तीसरी दुनिया में दो बड़े क्रांतिकारियों के बतौर देखना मुझे भी भाता रहा है. इसलिए भी कि पिछली सदी की ज़्यादातर क्रांतियाँ राष्ट्रीय आन्दोलनों के सिरे चढ़कर आईं और अंततः उनका हश्र अलग-अलग रंगों वाले राष्ट्रीय पूंजीवाद की में हुआ . गांधी और माओ दोनों का अपने राष्ट्रीय आन्दोलनों से एक तरह का दोतरफा रिश्ता रहा — दोनों ने इन राष्ट्रीय आन्दोलनों को सींचा लेकिन साथ ही उसे राष्ट्रीय मुक्ति से वृहत्तर चरित्र देने में लगे रहें…गांधीजी का कांग्रेस से रिश्ता क्रमशः ज़्यादा असहज होता गया और माओ को भी अपने पुराने लोगों के खिलाफ ही सांस्कृतिक क्रान्ति करनी पडी ( ये अलग बात है कि इस सांस्कृतिक क्रान्ति में वह व्यापक जनता से सीधे संपर्क में होने के बजाय पार्टी के ही गुटों पर आश्रित रहें और कोई मुकम्मल एजेंडा भी नहीं था ), मतलब, गांधी और माओ के विरोधाभासों के बीच भी मुझे लगता है यह तो ज़रूर सीखना चाहिए कि 21वीं सदी में बदलाव की पहल देश की दूसरी आज़ादी, तीसरी आजादी जैसे किसी अमूर्त लहर से नहीं बल्कि उपभोक्तावाद, प्रकृति के विनाश और वैकल्पिक जीवन मूल्यों के मुकम्मल सरोकारों पर आधारित होना चाहिए.
“….किन्तु आजाद भारत के शासकों के विश्वासघात के कारण गांधी के विचारों का ‘स्वराज’ नहीं आ सका..” जैसी स्थापनाएं मुझे उलझाऊ लगती हैं. क्योंकि माओवादी, स्तालिनवादी, हिंदूवादी, इस्लामवादी सभी यही कहेंगे, और कहते ही हैं, कि उनके सपनों का स्वर्ग इसलिए ही नहीं बना कि इसने-उसने विश्वासघात किया. मुझे लगता है, गांधीवाद के मूल्यवान योगदानों के सम्मान के साथ ही इसकी सीमाओं पर और इसे नए सन्दर्भों के अनुरूप ढालने की जरूरतों पर भी खुल के बात होनी चाहिए….धार्मिक मुहावरों के इस्तेमाल के खतरे….ग्राम स्वराज्य के सुंदर नारे के बावजूद सामंती ढाँचे – भूमि सम्बन्ध, जाति, जेंडर इत्यादि पर सीमित सुधारवादी नज़रिया…..साथ ही पूंजीवाद की व्यवस्थागत समझ की बजाय ahistorical और सभ्यता विमर्श टाइप व्याख्या के अपने खतरे हैं…
माओवादियों को और असल में सारी वामपंथी पार्टियों को ही उस सैद्धांतिक पड़ताल से रिश्ता बनाना होगा जो पिछले दशक से व्यापकतर परिवर्तनकामी राजनीति और खुद मार्क्सवाद के अन्दर भी जारी हैं.
लेखक को एक संतुलित लेख के लिए धन्यवाद, और इसीलिए भी कि बिना निष्पक्ष हुये, समस्या को समझा नहीं जा सकता और समाधान की दिशा भी भटक जाती है. निश्चय ही ये एक राजनैतिक समस्या है, और इसका कारगर हल राजनैतिक हल ही होगा, बातचीत के साथ होगा, और एक बार फिर से समाज के बड़े हिस्से को झकझोरेगा भी. चाहते न चाहते हुये भी हम सभी इसकी लपेट में किसी न किसी तरह आयेंगे ही. प्रगति का जो खानों खदानों का मॉडल है, आदिवासियों के विस्थापन का सवाल है, और गृहयुद्ध जैसी स्थिति का भी. सिर्फ बस्तर में ही नहीं देश के कई राज्यों में, कश्मीर में, पूर्वोत्तर में. ये हल सरकार नहीं परोसेगी, माओवादी तो वृहतर समाज से कटे हुये है ही. ये समाधान जनता के और लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाले लोगो की पहल से ही निकलेगा. अच्छा हो कि अधिक से अधिक लोग इस विषय पर सोचे, और सक्रीय पहल करे. आठ-साल पहले बुश की इस्तेमाल की गयी भाषा और नीती की हवा दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश में निकल चुकी है, कि ” चुनने के लिए सिर्फ दो रास्ते है, एक युद्ध का और दूसरा, आतंक का” . जनतंत्र में इन दो रास्तों के अलावा और बहुत से रास्ते होते है. नहीं होते तो बनाए जाने की संभावना हमेशा रहती है, और ज़रुरत भी. और जनता बहुत ज़ल्द इन दो रास्ता दिखाने वालों को भी रास्ते पर ले आती है.
Sahi
काफी चिंतन है इस आलेख में. माओवाद और कुछ नहीं बस गरीबों की जान की कीमत पर सत्ता-सुख लूटने का सरल रास्ता अपनाने का प्रयास भर है. इन अपराधी हत्यारों को क़ानून का रास्ता दिखाना और जन-सामान्य की सुरक्षा करना प्रशासन और सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए.
[उत्सुकतावश पूछ रहा हूँ, क्या लेखक वही डॉ. सुनील हैं जो कभी जॉर्ज फर्नान्डीज़ के साथी थे?]
सौभाग्य से यह सुनील जॉर्ज के साथी कभी नहीं रहे। वे दूसरे व्यक्ति हैं, उनका नाम डॉ. सुनीलम उर्फ़ सुनील मिश्र है ।
सुनील के अति आवश्यक लेख-द्वय को पढ्वाने का शुक्रिया।
सुनील से जिस गहरे चिन्तन की हम साथी अपेक्षा करते हैं, वह लेख मे मिली;समयिक तो है ही।
उन्हे बधाई पहुँचा दें ।
स्वाति
अफलातून जी, स्पष्टीकरण के लिए धन्यवाद.
कुमार सुंदरम जी और स्वप्नदर्शी की टिप्पणियों से वे अनसुलझे प्रश्न फिर से रेखांकित होते हैं, जिनके उत्तर सचमुच खोजे जाने चाहिए. आपने २०वीं सदी के दो बड़े क्रांतिकारियों में गांधी और माओ का नाम लिया है, ऐसा किस तर्क से, यह स्पष्ट करने की थोड़ी आवश्यकता महसूस होती है. लेनिन भी २० वीं सदी में थे और उनके नेतृत्व में १९१७ की सोवियत क्रांति अपने प्रभाव और निकट ऐतिहासिक परिणतियों में १९४७ की ब्रिटिश साम्राज्य से भारत की आज़ादी और १९४९ में चीनी क्रांति से अधिक महत्वपूर्ण थी. बल्कि कह सकते हैं कि महात्मा गांधी और माओ, दोनों ने विचारों और रणनीतियों पर सोवियत क्रांति का प्रभाव स्वीकार भी किया है। (उससे अपने मतभेदों को स्पष्ट करते हुए भी) इसी तरह २० वीं सदी में ही हो ची मिन्ह और नेल्सन मंडेला भी थे। अगर ध्यान दें तो इन सभी क्रांतिकारियों के वैचारिक-राजनीतिक निर्माण की परिस्थितियां भिन्न-भिन्न थीं। अगर लेनिन के सामने रूस की ज़ारशाही का पतनशील सामंती राजतंत्र था, माओ के सामने जापानी साम्राज्यवाद और तीन चीनी सामंती शक्तियां थीं, उसी तरह हो ची मिन्ह के सामने संसार की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति अमेरिका और मंडेला के सामने औपनिवेशिक गुलामी के साथ-साथ सारी मानव सभ्यता की चेतना में गहराई से जड़ें जमा चुका ‘नस्लवादी रंगभेद’ था। कहने का आशय मात्र यही है कि सभी समाजिक क्रांतियों और उनके प्रतीक-नायकों के ऐतिहासिक परिसंदर्भ और सामजिक परिस्थितियां अलग थीं। जाहिर है, आज नयी विश्वपूंजी (ग्लोबल कार्पोरेट कैपिटल), इसकी टेक्नालाजी की ताकत और इसके बने रहने की ज़रूरत के संदर्भ भिन्न हैं। हम और आप आज जिस समय में हैं, वह शायद यह सुविधा हमें देता है कि अतीत की सामाजिक-राजनीतिक क्रांतियों की असफल या त्रासद परिणतियों को भी देख सकते हैं। हम सब जानते हैं कि १९४७ में सत्ता-हस्तांतरण के दौरान गांधी किस स्थिति में थे और उन्होंने क्यों कांग्रेस को भंग करने की बात की थी। वे कांग्रेस को जन-आंदोलन के रूप में बनाये रखना चाहते थे। लेनिन भी इसीलिए बोल्शेविकों को राज्य-सत्ता में शामिल होने की बजाय जनता का पहरेदार बनाये रख्ने के पक्ष मे थे और अपनी सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी को फौज़ी ‘बैरकवाद’ (Militarism/ Bunker-ism) से मुक्त करना चाहते थे। हिंसा के पक्ष में दोनों नहीं थे। मंडेला के बारे में तो सभी जानते हैं कि उनके विचारों पर सबसे अधिक प्रभाव गांधी जी का ही था। यानी ‘हिंसा’ के विरोधी वे भी थे। हां, माओ के बारे में मेरे मन में दुविधाएं हैं। मैंने शायद उतना उन्हें पढ़ा नहीं है। लेकिन उनकी ‘क्रांतिकारी छलांग’ और ‘सांस्कृतिक क्रांति’ की परिणतियां डरावनी थीं। कोई भी लेखक, कलाकार या साधारण नागरिक अपनी स्वतंत्रता का इस तरह दमन कभी नहीं चाहेगा। रूस में भी स्तालिनकाल के परवर्ती दिनों में यही हुआ था। यह भी शायद सच है कि जैसा व्यक्तिपूजक अधिनायकवाद (Personality cult) स्तालिन और माओ का विकसित हुआ, उसके सबसे बड़े खतरे हमारे भारतीय समाज में भी हैं। यहां तो क्रिकेट के खिलाड़ी, ठग प्रवचनकारी, फिल्मी एक्टर तक ‘भगवान’ और ‘महान’ बना दिये जाते हैं तो सफल क्रांति के नायकों के पुजारियों से पैदा होने वाली निरंकुश व्यक्ति-शाही की आशंका उन लेखकों-नागरिकों को डरा सकती है, जो अपना स्वतंत्र विवेक और विचार रखते हैं और जिसके बने रहने की गारंटी १९४८ का संयुक्त राष्ट्र का घोषणापत्र भी देता है। सुनील जी, अगर आपको याद हो तो विश्व विख्यात क्रांतिकारी कवि पाब्लो नेरुदा ने, जब वे चीन गये और वहां रह कर उन्होंने सब कुछ देखा और अंत में माओ के साथ लंबा संवाद किया तो अपने निष्कर्ष मेम उन्होंने कहा कि ‘माओ मार्क्सवादी नहीं हैं।’ मुझे लगता है, ऐसा उन्होंने इसलिए कहा होगा कि माओ की आधुनिकता युरोप या पश्चिम की आधुनिकता से उसी तरह मेल नहीं खाती थी जैसे गांधी की आधुनिकता। (इस संदर्भ में गांधी-टैगोर विवाद के पन्ने पलटना (मेरी समझ से) उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना अंबेडकर-गांधी संवाद-पत्राचार को देखना। सुनील जी, यह भी एक संयोग ही है कि अगर इस साल राष्ट्रपिता गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ की सौवीं जयंती मनाई जा रही है, तो अगले साल उन विश्व-कवि, राष्ट्रकवि टैगोर के जन्म की डेढ़ सौवीं जयंती भी मनायी जायेगी, जिनके ‘आधुनिकता’ के बारे में विचार बहुत भिन्न थे। (यह मानें कि ‘आधुनिकता’ की अवधारणा में ही राजनीतिक लोकतंत्र, इसकी आर्थिक प्रणाली और सामाजिक ‘विकास’ के विचार अंतर्निहित हैं।) अरुंधती राय के उस यात्रा-संस्मरण (मैं उसे यही कहना चाहूंगा, क्योंकि वह इतना मानवीय और रचनात्मक है कि उसे ‘स्पीच आफ़ येनान फ़ोरम’ की तरह किसी एकार्थी राजनीतिक दस्तावेज़ में रिड्यूस करना उसके समूचे पाठ का वही ‘राजनीतिक अंतर्पाठ’ होगा, जिससे हर रचनाकार डरता है।
२०११ में जब टैगोर और गांधी विमर्श के पन्ने पलटे जाएंगे, तो बहुत से लोग यह मार्मिक सच भूल जायेंगे कि अपने से भिन्न विचारों वाले गांधी को ‘महात्मा’ कहने वाला कोई और नहीं, टैगोर ही थे।
आपके आलेख हमेशा विचारों को प्रोत्तेजित करते हैं, बहस और संवाद के नये इलाके खोजते हैं और सबसे बड़ी बात उनमें निष्पक्ष सी लगती वह लोकतांत्रिक सदाशयता और सहिष्णुता होती है, जिसके न होने का अर्थ लोकतांत्रिकता की गैरहाज़िरी का संकेत करता है।
हां, १९६७-६८ में जान मिर्डल ने भी चीन के ‘विकास’ और ‘आधुनिकता’ के बारे में एक रोचक किताब लिखी थी ‘A Report from the Village Society of China’ …आपने देखी होगी. ये जान मिर्डल उन्हीं ‘Challenge to Asian Poverty’ वाले विख्यात गुन्नार मिर्डल के बेटे थे.
आपको बधाई.
उदय प्रकाशजी एवं अन्य मित्रों की टिप्पणियाँ पढ़ीं। धन्यवाद । इस विषय पर पूरे देश में गंभीर चिन्तन एवं बहस चलनी चाहिए ।
(१) राजसत्ता की दिलचस्पी इस लोकतंत्र को बचाने या सुधारने में नहीं होगी । वह तो कॉर्पोरेट साम्राज्यवाद की एजेंट बन चुकी है । लोकतंत्र को ज्यादा सार्थक बनाने के लिए आम लोगों को आगे आना पड़ेगा । मेरे दिमाग में इस लोकतंत्र के ढांचे में परिवर्तन के कुछ सुझाव हैं । उन पर बाद में लिखूँगा ।
(२) मैंने गांधी और माओ को ’तीसरी ’ दुनिया के दो बड़े क्रान्तिकारी बताया है । लेनिन योरोपियन रशिया के थे । गांधी और माओ मौलिक विचारक थे । उन्होंने नए प्रयोग किए । वे गैर-योरोपियन दुनिया के लिए ज्यादा प्रासंगिक हैं । उनके विचार और काम आज भी व्यापक स्तर पर प्रेरणा के स्रोत हैं । किन्तु कहने का मतलब यह नहीं है कि दूसरे क्रांतिकारियों से नहीं सीखना है ।
सुनील
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