गेहूँ की फसल कट चुकी है । बनारस से बेलथरा रोड की संक्षिप्त रेल यात्रा में वे खेत भी अलग से दिखते हैं जहाँ हार्वेस्टर से कटाई के कारण भूसे में कटौती हुई है । उत्तर प्रदेश शासन ने तीन संस्थाओं के जरिए गेहूँ खरीदने की बात की है तथा खुद सरकार के आँकड़े बताते हैं कि उत्पादन का सिर्फ़ पाँचवाँ हिस्सा अब सरकार द्वारा खरीदा जा रहा है । ७ फीसदी अथवा उससे से अधिक ’सिकुड़न’ वाले गेहूँ को खरीदने से इनकार किया जा रहा है । समाजवादी जनपरिषद के महामन्त्री विक्रमा मौर्य याद करते हैं ,’ सरकार इस दावे के साथ हमें गेहूँ का बीज बेचती है कि यह सौ फीसदी जमेगा। इस दावे को सही मान कर हम बीज खरीद लेते हैं लेकिन सौ फीसदी बीज नहीं जमता !’ किसान के बचे रहने के नाम पर घोषित समर्थन-मूल्य (यह आजीविका मूल्य नहीं है) पर खरीदते वक्त मानो सरकार चिंगुरने (सिकुड़ने) लगती है। दरअसल समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली हेतु इस गेहूँ की खरीद का कोई संतुलन बचा नहीं रह गया है। यह बिलकुल खुली बात है कि बिना किसी सर्वेक्षण ऊपर से निर्देश दिया जाता है कि कितने परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे मानना है तथा कितने प्रतिशत को हर साल उसके ऊपर मान कर उस तादाद में कटौती करते जाना है । किसान अपने परिवार की सब जरूरत को पुरा करने के अलावा मेरे जैसे निकम्मे लोगों के लिए भी पैदा करता है। अन्न स्वालम्बन का लाक्ष्य बरसों पहले हासिल कर लेने के बावजूद सार्वजनिक वितरण प्रणाली में श्रेणियां बना दी गई हैं । सार्वजनिक वितरण प्रणाली का नाश करने की दिशा में यह जरूरी कदम माना गया होगा। पूरी आबादी को सस्ते दर पर खिलाने और पैदा करने वाले से ’समर्थन मूल्य’ पर खरीदने की नीयत होती तो सरकार द्वारा घोषित मूल्य अधिकांश उत्पादन की खरीद की जाती।
बनारस से हमारी राज्य समिति में गये रामजनम का कहना है बिजली -पानी जैसे संसाधनों के वितरण में गैर बराबरी को भी मुद्दा बनाना चाहिए। लखनऊ में २०-२२ घण्टे,बनारस में १८-२० घण्टे और देहातों में ४ घण्टे बिजली रहती है।
मर्यादपुर की चट्टी पर दो गाड़ियां हमे पार कर निकल गईं । उन दोनों पर ’फलां परिणय ढिकना’ के पोस्टर लगे थे। साथी सोमनाथ त्रिपाठी ने आश्चर्य के साथ पूछा ,’ लगन शुरु हो गया,क्या?’
हम जिस जीप में बीच की कतार में बैठे थे उसके सामने ( ड्राइवर की लाइन में) बैठे एक स्थानीय पंडिज्जी ने अपनी तरफ़ से हमारा ज्ञान वर्धन किया -” ’अम्बेडकर – लगन’ शुरु हो चुका है। अम्बेडकर-लगन के कई लाभ हैं । तम्बू-डेरा , रसोइए आदि सहजता से और सस्ते रेट पर मिल जाते हैं। अम्बेडकर-लगन ’खर-मास’ के दुष्प्रभावों से भी मुक्त है । मुझे पसन्द आया अम्बेडकर-लगन का विचार। फसल काट कर खाली हो जाना इस नये प्रकार की लगन में होता है। देवताओं के शयन-काल में विवाह को अशुभ नहीं माना गया।

देवताओं के शयन-काल में विवाह को अशुभ नहीं माना गया।
अच्छी प्रस्तुति!
अम्बेडकर-लगन Great concept. There is a need for many more such concepts to check the process of Sanskritization that is killing the poor masses. Let us see how the new census emerges if people opt for sanskritization or de-sanskritization.
घोषित समर्थन-मूल्य is a slap inthe face of hard working farmers. Farming is and was never a profitable occupation. People are still farming because they do not have other options to quit farming.
बिजली -पानी जैसे संसाधनों के वितरण में गैर बराबरी को भी मुद्दा बनाना चाहिए। लखनऊ में २०-२२ घण्टे,बनारस में १८-२० घण्टे और देहातों में ४ घण्टे बिजली रहती है। Fully agree with what Ramjanam said. The urban privilege topped with arrogance to negate it, is attrocious. From the begining rurals have been the lesser children of free India. This should change now.
Thanks for a wonderful post,
Peace,
Desi Girl