[ नीला हार्डीकर अवकाश प्राप्त शिक्षिका हैं और मध्य प्रदेश के मुरेना में महिलाओं और दलितों के साथ काम करती हैं । नर्मदा बचाओ आन्दोलन और मध्य प्रदेश में चलने वाले आदिवासियों , स्त्रियों , विस्थापितों के जन आन्दोलनों के साथ वे सक्रीयता से जुड़ी हैं । उनके तथा प्रतिष्ठित पत्रिका ’गांधी - मार्ग ’ के प्रति आभार के साथ यह लेख प्रकाशित करते हुए मुझे खुशी हो रही है । मेरे चिट्ठों के पाठक नीला हार्डीकर से पूर्व परिचित हैं - इन दो पोस्टों के माध्यम से ।]
अब बीटी बैंगन कभी भी बाजार में आ सकता है ।
क्या है यह बीटी बैंगन ? दिखने में तो यह साधारण बैंगन जैसा ही होगा । फर्क इसकी बुनियादी बनावट में है । इस बैंगन की , उसके पौधे की , हर कोशिका में एक खास तरह का जहर पैदा करने वाला जीन होगा, जिसे बीटी यानि बेसिलस थिरुंजेनेसिस नामक एक बैक्टीरिया से निकालकर बैंगन की कोशिका में प्रवेश करा दिया गया है । इस जीन को , तत्व को पूरे पौधे में प्रवेश करा देने की सारी प्रक्रिया बहुत ही पेचीदी और बेहद महंगी है । इसे प्रौद्योगिकी को जेनेटिक इंजीनियरिंग का नाम दिया गया है ।
हमारे देश में बैंगन का ऐसा क्या अकाल पड़ा है जो इतनी महंगी तकनीकी से बने बीजों के लिए यहां ऐसे विचित्र प्रयोग चलते रहे ? पहले इसका इतिहास देख लें । मध्य प्रदेश के जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय के खेतों में बीटी बैंगन की प्रयोगात्मक फसलें ली गई थीं । इस बात की जांच की गई कि इसे खाने से कितने कीड़े मरते हैं । जांच से पता चला कि बैंगन में प्राय: लग सकने वाले ७० प्रतिशत तक कीट इस बैंगन में मरते हैं । इसे ही सकारात्मक नतीजा माना गया । अब बस इतना ही पता करना शेष था कि इस बीटी बैंगन को खाने से मनुष्य पर क्या असर पड़ेगा ? प्राणियों पर भी इसके प्रभाव का अधकचरा अध्ययन हुआ है । ऐसे तथ्य सामने आए हैं कि बीटी बैंगन खाने वाले चूहों के फेफड़ों में सूजन , अमाशय में रक्तस्राव , संतानों की मृत्युदर में वृद्धि जैसे बुरे प्रभाव दिखे हैं ।
इसलिए यह बात समझ से परे है कि जब चूहों पर भी बीटी बैंगन के प्रभाव का पूरा अध्ययन नहीं हुआ है तो उसे खेत और बाजार में उतारने की स्वीकृति देने की जल्दी क्या थी । वह भी तब जब इस विषय को देख रही समिति के भीतर ही मतभेद थे । सर्वोच्च न्यायलय द्वारा इस समिति में रखे गये स्वतंत्र विशेषज्ञ माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. पुष्प भार्गव का कहना है कि स्वीकृति से पूर्व आवश्यक माने गये जैव सुरक्षा परीक्षणों में से अधिकांश को तो छोड़े ही दिया गया है । शायद अमेरिका की तरह हमारी सरकार की भी नीति है कि नियमन पर ज्यादा जोर न दिया जाए । वरना विज्ञान और तकनीक का विकास रुक जाएगा । यह मंत्र बीज कंपनी मोनसेंतों ने दो दशक पूर्व तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश सीनियर को दिया था और उन्होंने उसे मान भी लिया था। तभी से उनकी नियामक संस्था एप्फ़.डी.ए. अपने भीतर के वैज्ञानिकों की सलाह के विपरीत अमेरिका में इस विवाद भरी तकनीक से बने मक्का ,सोया आदि बीजों को स्वीकृति देती जा रही है और इन बीजों को खेत में बोया जा चुका है । अब अमेरिका के लोग इसकी कीमत चुकाने जा रहे हैं । अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ एनवायर्नमेंटल मेडिसिन (एइएम) का कहना है कि जीएम खाद्य स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा है। विषाक्तता , एलर्जी और प्रतिरक्षण , प्रजनन,स्वास्थ्य, चय-अपचय , पचाने की क्रियाओं पर तथा शरीर और आनुवंशिक मामलों में इन बीजों से उगी फसलें , उनसे बनी खाने-पीने की चीजें भयानक ही होंगी ।
हमारे देश में इस विचित्र तकनीक से बने कपास के बीज बोए जा चुके हैं । ऐसे खेतों में काम करने वालों में एलर्जी होना आम बात है । यदि पशु ऐसे खेतों में चरते हैं तो उनके मरने की आशंका बढ़ती है। भैंसे बीटी बिनौले की चरी खाकर बीमार पड़ी हैं । उनकी चमड़ी खराब हो जाती है व दूध कम हो जाता है। भैंस बीटी बिनौले की खली नहीं खाना चाहती । यूरोप और अमेरिका से खबरें हैं कि मुर्गियों, चूहे , सुअर , बकरीगाय व कई अन्य पशु जीएम मक्का और अन्य जीएम पदार्थ खाना ही नहीं चाहते । पर हम इन्सानों की दुर्गत तो देखिए जरा ।
हमें बताया जा रहा है कि यदि विकास चाहिए तो किसान को बीटी बैंगन के बीज खरीदने के लिए तैयार होना होगा । और इसी तरह हम ग्राहकों को भी , उपभोक्ताओं को भी बीटी बैंगन खरीदकर पकाने, खाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए ! उनका कहना है कि इससे कोई नुकसान होने की , एलर्जी होने की बातभी तक सिद्ध नहीं हुई है । होगी तो हम हैं न । नियंत्रण कर लेंगे । अरे भाई, आखिर दवा उद्योग का भी तो विकास होना चाहिए । इन पौधों से जमीन , खेत , जल जहरीला होता है , तितली , केंचुए कम होते हैं तो उन समस्याओं से निबटने के लिए कृषि विज्ञान का और विकास होगा , बायोटेक्नालॉजी में सीधा विदेशी निवेश और बढ़ेगा । हम इसी तरह तो होते जाएंगे !
[ अगली प्रविष्टी में समाप्य ]

बेगुन तो फिर भी ठीक है यह औगुन बन गया है।
क्या बात है, दिनेशरायजी !
हमारे समझ के परे है की इतना विरोध होने के बावजूद सरकार क्योंकर इसका समर्थन कर रही है. एक ही उपाय है. इसका बहिष्कार, जन चेतना द्वारा. कोई समाज सेवी संस्था सामने आये और लगातार अखबारों में पूरे पृष्ट का विज्ञापन दे. हाँ यह भी विज्ञापन ही होगा.
Subramanianji,
I guess you are refering to volunteer organizations, sorry they have no funds. Whereas, those capable NGOs can’t print protest advertisements coz’ they are hand in glove as they are reaping funds under FCRA from WB, IMF and other big fishes.
It is time we started growing our own veggies in bags coz’ bycott without veggies is not possible.
http://containergardening.wordpress.com/
@Aflatoonji,
Kindly post this post on indiblogger.in, this message needs to reach to more young people.
Thanks for wonderful post.
Peace,
Desi Girl