अधिक नहीं पचीस – तीस साल पहले तक सूती कपड़े सस्ते और सिंथेटिक कपड़े मंहगे हुआ करते थे । उस समय अमेरिका से कोई अनिवासी सस्ते सिंथेटिक और मंहगी सूती जीन्स लाता था तो अटपटा-सा लगता था ।
जनता पार्टी की सरकार में १० से २५ रुपए में हथकरघे पर बनी ’ जनता साड़ी ’ , ’जनता-धोती’ और चादर अभी हम भूले नहीं हैं ।
आपातकाल के दौरान आचार्य कृपलानी तत्कालीन रेल मन्त्री कमलापति त्रिपाठी की रेलवे में चादर-पर्दे खादी का लेने के लिए सार्वजनिक तौर पर क्लास लेते हुए याद आते हैं ।
बचपन में टाटा – बिड़ला – डालमिया – सिंघानिया- बजाज के नाम सुने थे । हमारी तरुणाई में इस फेहरिश्त में एक नाम जुड़ा और जुड़ा ही नहीं सब से ऊपर भी पहुंच गया । इसके पीछे थी राजीव गांधी की अंगूठा-काट कपड़ा नीति । जी , ढाका की मलमल बनाने वाले कारीगरों के अंगूठे कटवाने वाली अंग्रेजों की नीति के समान । लाखों बुनकरों के रोजगार छीन कर उन्हें भुखमरी और खुदकुशी की ओर ढकलने वाली। खेती के बाद सबसे बड़ा रोज्रगार हैन्डलूम हुआ करता था ।
मौजूदा सरकार द्वारा फैशन-डिजाइनरों और अत्याधुनिक शो-रूमों पर बेतहाशा खर्च कर बुनकरों और कत्तिनों को भुला देने वाली खादी-नीति तो अभी जारी है ।
सरकारी-क्षेत्र और निजी क्षेत्र दोनों के विकल्प के रूप में सहकारी क्षेत्र को मानने वालों को अनदेखा किया जाता है ।
इन तमाम मसलों पर जब भी कुछ गंभीरता से सोच -समझ कर कदम उठाने की बात होगी गांधीवादी नेता लक्ष्मी चन्द जैन याद किए जाएंगे । विगत १४ नवम्बर को उनकी मृत्यु हो गई। वे ८५ वर्ष के थे ।
तीन वर्ष पहले जन आन्दोलनों के राष्ट्रीय समन्वय के सम्मेलन में उनसे अंतिम मुलाकात हुई थी । स्वाति और मैंने बनारस के बुनकरों के बीच आने के लिए उन्हें न्यौता दिया । वे तैयार थे।सिर्फ़ इतना कहा था कि बनारस की ठण्ड जब चरम पर हो तब न बुलाना ।
भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं के योगदान को अनदेखा किए जाने के प्रति ध्यान आकृष्ट करने वाली प्रमुख गांधीवादी अर्थशास्त्री , महिला नेत्री एवं लक्ष्मी चन्द की पत्नी श्रीमती देवकी जैन तथा उनके दो पुत्रों के प्रति हमारी शोक संवेदना ।
देखें : Gandhi works always , पत्रकार श्री अशोक गोपाल द्वारा लिया गया लक्ष्मी चन्द जैन का साक्षात्कार ।


नहीं अफलू भाई, जी नहीं भरा। लक्ष्मीचन्दजी के बारे में कोई भी जानकारी नहीं मिलती इस पोस्ट से और न ही उनके व्यक्तित्व की कोई पहचान मिलती है। साक्षात्कार पूरा अंग्रेजी में है जिसे पढ पाना और समझ पाना मेरे लिए तो मुमकिन नहीं हो पाया।
फिर कभी सही।
[...] यह भी देखें : http://samatavadi.wordpress.com/2010/11/16/lc_jain_textile_policy/ [...]
मुझे लगता है खादी सरकार से नहीं हम – आपके विचार और कार्य से चलेगा। सरकार तो अंगूठा काटने का काम कर सकती है।