भारत वर्ष में आर्थिक नियोजन के पिछले पचास वर्षों पर गौर करते हुए लक्ष्मी चन्द जैन बताते हैं कि हमारी प्रमुख समस्या नौकरशाही पर निर्भरता है । गांधी यह भली भांति समझते थे कि जनता की भागीदारी के बिना कोई काम नहीं किया जाना चाहिए तथा जनता की भागीदारी के बिना कोई काम सफल भी नहीं हो सकता – हम यह बुनियादी बात भूल गये ।
देश के विकास के लिए होने वाले प्रयासों से गत पचास वर्षों से योजनाकार , विश्लेषक तथा बाद में शिक्षक तथा निर्माता के रूप में जुड़े लक्ष्मी चन्द जैन यह शिद्दत से महसूस करते हैं कि गांधी आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितना वे अपने जीवन-काल में थे । लक्ष्मी चन्द जी के मन में गांधी की प्रासंगिकता की बाबत यह निष्ठा किसी ’गुरु-भक्ति’ के कारण न थी।अदिकतर गांधीजनों की भांति वे गांधी के प्रत्यक्ष सम्पर्क में नहीं रहे ।
उन्होंने गांधी को बहुत ज्यादा पढ़ा था । बंगलुरु स्थित उनका निजी पुस्तकालय विशाल है , जिसमें अम्बेडकर और नेहरू का समग्र -संग्रह भी मौजूद है। सूर्योदय से घण्टों पूर्व वे इन संग्रहों के पठन में समय देते ।
कॉलेज के दिनों में वे एक गांधी-अनुभव से गुजरे थे। बरसों के अध्ययन के बावजूद उस तजुर्बे की छाप अमिट है । जैन साहब ने भारत छोड़ो आन्दोलन में हिस्सा लिया था और और विभाजन के पहले से ही हजारों की तादाद में चले आ रहे शरणार्थियों के दिल्ली स्थित एक शिविर (किंग्सवे कैम्प) के वे प्रभारी थे । आदतन खुराफ़ातियों का एक गिरोह उनसे नाराज था क्योंकि उनमें से एक को हटा कर लक्ष्मी चन्द जी प्रभारी बनाये गये थे। एक रात उनके बैरक पर पत्थर फेंके गये । उनके साथियों ने सलाह दी कि इसकी पुलिस को इत्तला की जाए ।
राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े एक पत्रकार के बेटे लक्ष्मी चन्द तब तक गांधीवादी नहीं बने थे लेकिन गांधी माहौल में छा चुके थे । लक्ष्मी चन्द याद करते हैं , ’ मुझ पर मानो गांधी सवार हो जाते । मैं शरणार्थियों पर पुलिस वालों को पिलवा दूंगा तो गांधीजी क्या सोचेंगे? ’
जैन जी ने पुलिस बुलाने से इन्कार कर दिया और सोचा कि इस परिस्थिति में गांधी क्या करते ? वे लोगों के बीच गये , उनसे बातचीत करके समाधान निकालने की कोशिश की । उन्होंने शरणार्थियों से यह भी कहा कि यदि वे उनसे असुन्तुष्ट हैं तो वे यह काम छोड़ने के लिए भी तैयार हैं ।
शाम तक स्वयंसेवकों की एक प्रबन्ध समिती गठित हो गई । उस समिती ने खुराफ़ातियों को कैम्प से विदा करने का फैसला भी लिया । ’मैंने समिती के नेताओं से कहा कि यह लोग गुमराह हैं हैं लेकिन हैं अपने ही बीच के । उन्हें निष्कासित न किया जाए।’
खुराफ़ातियों ने जब यह सब सुना तो इसका उन पर असर हुआ । वे लक्ष्मी चन्द जी से मिलने आए और इस बात का अहसान जताया कि उन्होंने निष्कासन रोकाऔर सुधार का मौका दिया । युवा लक्ष्मी चन्द को समझ में आया कि गांधी कारगर हैं ।
घटना के बाद पचास साल गुजर चुके हैं , लक्ष्मी चन्द जी पर उम्र का असर हो चुका लेकिन गांधी के प्रति उनकी निष्ठा अक्षुण्ण है । विडंबना यह है कि आजादी के बाद के इन सालों में लक्ष्मी चन्द जी ने गांधी विचारों को गर्त में जाते भी देखा है ।
उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त से आये ५०,००० पठान शरणार्थियों के पुनर्वास के एक असाधारण कार्यक्रम से स्वयंसेवक-संगठनकर्ता के रूप में वे जुड़े । फ़रीदाबाद में सहकारिता के आधार पर एक कस्बा बसाया गया । किरासन तेल के कनस्तरों के बैलट बक्स बना कर मतदान द्वारा नियोजन और प्रबन्धन समितियों का चुनाव हुआ । खुद प्रधानमन्त्री नेहरू इस परियोजना पर नजर रखे हुए थे। काफ़ी समय तक सहभागी विकास का यह सार्थक नमूना बना रहा । लक्ष्मी चन्द जी इन्डियन कॉपरेटिव यूनियन से जुड़ गये। इस परियोजना के तहत मजदूरों की सहकारी समिति ही औद्योगिक प्रतिष्ठान की मालिक बनी । इस आदर्श कस्बे में गैर-औपनिवेशिक उसूलों के आधार पर तालीम की व्यवस्था हुई तथा जन स्वास्थ्य का ढांचा खड़ा किया गया ।
नौकरशाही द्वारा परियोजना पर काबिज होने के बाद पूरी परियोजना निकम्मी हो गई । इस पतन को एक व्यक्ति रोक सकते थे , स्वयं प्रधानमन्त्री नेहरू । उन्होंने ऐसा नहीं किया । लक्ष्मी चन्द जैन ऐसा होने के पीछे एक सिद्धान्त देखते हैं । विभाजन के वक्त हुए नरसंहार से नेहरू मर्माहत थे उनकी बुद्धि ढह-सी गई थी । इस शक्स को गांधी ने चुनते वक्त सोचा था कि देश को एक बनाये रखने के लिए यह उपयुक्त होगा । परन्तु वे औपनिवेशिक नौकरशाही के ढांचे पर अतिनिर्भर हो गये । संविधान के औपचारिक रूप से लागू होने के पहले ही नौकरशाही तन्त्र पर हावी हो गई । अपने समुदाय के कटु अनुभवों के कारण अम्बेडकर ने यह माना कि गांव ’अज्ञानता के गढ़ ’ हैं । संविधान निर्माताओं ने ग्राम-स्वायत्तता के विचार को गंभीरता से ग्रहण नहीं किया । भारत के गणराज्य बनने के पहले ही पंचायतीराज का विचार खारिज कर दिया गया ।
बाद में जवाहरलाल नेहरू और इन्दिरा गांधी ने व्यवस्थित तरीके से जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों को राजनैतिक दल से अलग-थलग कर दिया । इस प्रकार राजनैतिक कार्यकर्ता जो आजादी के पहले सामाजिक परिवर्तन में एक अहम भूमिका अदा करता था , इस भूमिका से परे हो गया । नया सामाजिक – आर्थिक ढांचा खड़ा करने की जिम्मेदारी सिर्फ बीडीओ जैसे अदना सरकारी नौकर की हो गई । राजनीति ’गद्दी , संरक्षण , कीमत और पक्षपात’ का खेल बन कर रह गई ।
इन अन्तर्विरोधों के बावजूद लक्ष्मी चन्द जैन ने अपने तजुर्बे का लाभ विभिन्न सरकारों को हैण्डलूम,सहकारिता ,योजना आयोग , राजदूत आदि बन कर दिया। उनका कहना था कि,’अपनी नियति हम खुद हासिल करेंगे’- इस मूल भाव के कारण आजादी के बाद अन्तर्विरोध गौण हो गये थे। पटेल-नेहरू,कांग्रेस-अम्बेडकर इनके बीच स्पष्ट अन्तर्विरोध थे फिर भी वे एक साथ काम कर सके । यह मूल-भाव हम भुला चुके हैं । आदर्श एक गाली बन गई है ,राजनैतिक दलों में सैद्धान्तिक आधार पर काम का एजेण्डा नहीं रहा । ’पूरा सत्ताधारी वर्ग अपने घोषणापत्रों से विरत रहने में कोई संकोच नहीं करता और आम जनता में भी इस बात पर कोई घृणा नहीं पैदा होती । ’
जनता की इस उदासी और विरक्ति की कीमत अपार है । ’ यदि हमारा राजनैतिक तबका किसी को प्रेरणा और साहस नहीं दे पा रहा है तो हमारी सभ्यता कैसे बचेगी ?’ ’ इस प्रकार हम कुछ बेशकीमती खो रहे हैं , मानवता के सर्वाधिक हक में कुछ हम खो देंगे । ’
इन परिस्थितियों में आम जनता क्या करे ? गांधी का मार्ग क्या होगा ? लक्ष्मी चन्द जी के पास कोई बना बनाया नुस्खा नहीं है । परन्तु वे जरूर कहते हैं कि जनता कम-से-कम यह भाव तो लाये कि आदर्शवाद गुमा देना हमें मंजूर नहीं है – बिना उसूलों की रजनीति हमें कत्तई कबूल नहीं है । ’
राजनीति और राजनेताओं के बदलने के इंतजार में बैठे नहीं रहना होगा । ’ यदि आपके घर में आग लगी है तो आप गोष्ठी नहीं करेंगे,पहले एक बाल्टी पानी डालेंगे । ’ हम अपने यकीन के अनुसार चलें ,शुरुआत इसीसे करनी होगी ।
जैन बताते हैं कि दूसरों को रौंद कर यह सभ्यता नहीं बनी है । मतभेद दूर करने में इतिहास के इस्तेमाल में हमें सावधानी बरतनी होगी । ’मसलन छुआछूत को लेकर गांधी और अम्बेडकर के बीच के मतभेद को लें । ” हमें देखना होगा कि उस बहस से हमारी आज की समस्या कैसे हल होती है ?’
इन चुनौतियों का हल सावधानीपूर्वक किए गए विश्लेषण से होगा। विश्लेषण जो जमीनी हकीकत और तजुर्बों से पैदा होगा ।
’बुनियादी बातें गांधी का नाम लिए बिना समझी जा सकती हैं । गांधी को बहुत आसानी से गलत समझ लिया जाता है , और मजाक का विषय बना लिया जाता है । जो उन्हें समझने का दावा करते हैं वे भी अपनी महिमा बखानने के लिए उनका नाम रटते हैं ।’
लक्ष्मी चन्दजी जी की सलाह है , ’गांधी को मरा रहने दो , यही सब से अच्छा होगा ।’
( श्री अशोक गोपाल द्वारा लिए गए साक्षात्कार पर आधारित,स्रोत-संस्थाकुल,प्रस्तुतकर्ता एवं अनुवाद- अफ़लातून )
यह भी देखें : http://samatavadi.wordpress.com/2010/11/16/lc_jain_textile_policy/


[...] This post was mentioned on Twitter by afloo, afloo. afloo said: लक्ष्मी चन्द जैन : एक साक्षात्कार: http://wp.me/p1BM2-ha [...]
अफलू भाई,
मनोकामनाऍं कैसे पूरी होती हैं, इसके लिए आपको मेरे मन थाह लेनी पड़ेगी। लक्ष्मीचन्दजी का यह साक्षात्कार एक साँस में पढ़ गया। सचमुच में एक साँस में। नहीं जानता कि ऐसा क्यों हुआ लेकिन पढ़ते- पढ़ते मन विगलित हो गया और मुझे रोना आ गया। जी भर कर रोया हूँ। उसके बाद पोस्ट एक बार फिर पढ़ी और लगा कि मेरी कुछ उलझनें लक्ष्मीचन्दजी काफी पहले ही सुलझा गए। गाँधी को समझने का एक रास्ता लक्ष्मीचन्दजी से होकर भी गुजरता है यह जानने में इस साक्षात्कार ने बड़ी मदद की।
मैं आपका ऋणी हूँ कि आपने यह पोस्ट उपलब्ध कराई। अपने आसपास की स्थितियों से हताश होने वाले मुझ जैसे लोगों को ऐसी पोस्टें कितनी ताकत देती हैं, यह मैं अनुभव ही कर सकता हूँ, बता नहीं सकता।
बहरहाल, पुन: धन्यवाद। आभार।
Thanks for introducing Mr. Laxmi Chandra Jain to us.
with sincere condolence
”जनता की इस उदासी और विरक्ति की कीमत अपार है । ’ यदि हमारा राजनैतिक तबका किसी को प्रेरणा और साहस नहीं दे पा रहा है तो हमारी सभ्यता कैसे बचेगी ?’ ’ इस प्रकार हम कुछ बेशकीमती खो रहे हैं , मानवता के सर्वाधिक हक में कुछ हम खो देंगे । ’’
लगता है कि जैसे हम ‘सब कुछ’ खो चुके हैं और अपनी आवाज़ खुद सुनने के अतिरिक्त कुछ और हमारे पास नहीं है।
उन पर कुछ और भी दिया जाय।
श्रद्धांजलि!!
’बुनियादी बातें गांधी का नाम लिए बिना समझी जा सकती हैं । गांधी को बहुत आसानी से गलत समझ लिया जाता है , और मजाक का विषय बना लिया जाता है । जो उन्हें समझने का दावा करते हैं वे भी अपनी महिमा बखानने के लिए उनका नाम रटते हैं । great revealing truth
जहाँ बहुत से लोग अपनी आने वाली पीढ़ियों के उद्धार हेतु देश व समाज को दोनों हाथों से लूटने में लगे हों वहाँ इस तरह का लेख पढ़ना बहुत सुखद लगा।
लक्ष्मी चन्द जैन को श्रद्धांजली।
घुघूती बासूती