भारतीय भाषाओं को संपन्न और समृद्ध बनाने के लिए जिन संस्थाओं को गठित किया गया हो , वे अगर अपने उद्देश्य से ठीक विपरीत काम करने लगें तो कम से कम उसका प्रतिवाद करना प्रत्येक भारतीय भाषा प्रेमी का कर्तव्य है । एक समय की ऐसी प्रसिद्ध और प्रतिबद्ध दो संस्थाओं नागरी प्रचारिणी सभा , वाराणसी तथा बंगीय साहित्य परिषद , कोलकाता- की दुर्गति के लिए शायद हमारा मौन ही मुख्य रूप से जिम्मेवार है । इस पत्र के माध्यम से मैं भारतीय भाषा परिषद ,कोलकाता द्वारा अपने संस्थापक दिवस पर आयोजित अंग्रेजी व्याख्यान और अंग्रेजी में ही भेजे गए निमंत्रण पत्र के विरुद्ध अपना प्रतिवाद दर्ज कराना चाहता हूं ।
मेरे दिवंगत पिता सीताराम सेकसरिया और उनके अभिन्न मित्र दिवंगत भागीरथ कानोडिया ने १९७४ में अपनी पचहत्तर -अस्सी वर्ष की वृद्धावस्था में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व को रोकने और भारतीय भाषाओं के बीच आदान-प्रदान , सम्पर्क ,सहयोग और अनुवाद बढ़ाने के लिए भारतीय भाषा परिषद की स्थापना की थी । दोनों मित्रों की दृष्टि यह थी कि हिन्दी का ढोल पीटने के बजाए भारतीय भाषाओं को संपन्न और समृद्ध कर ही अंग्रेजी के सर्वभक्षी अभियान को रोका जा सकता है । परिषद के उद्देश्यों की सत्रह सूत्री सूची का प्रथम उद्देश्य ही – ‘ विभिन्न भारतीय भाषाओं… को निकट लाने और उनमें पारस्परिक सम्मान पैदा करने की दृष्टि से विचारों में समन्वय और आदान – प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय मंच की स्थापना करना’ था । यह कहने की जरूरत नहीं कि दोनों ही मित्र स्वतंत्रता सेनानी थे और अंग्रेजी साम्राज्यवाद के भुक्तभोगी ।
अब भारतीय भाषा परिषद इस उद्देश्य से ठीक विपरीत काम कर रही है । २००४ में एक अंग्रेजी इंटरनेशनल स्कूल खोलकर परिषद को एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनाने की सुनियोजित कोशिश की गई थी , जो हिंदी के प्रायः सभी प्रतिष्ठित लेखकों के प्रखर विरोध के कारण सफल नहीं हो पाई। सात वर्ष के अंतराल के बाद यह कोशिश फिर से शुरु की गई है । अपने कर्मचारियों को जीवन-निर्वाह लायक वेतन देने में अपने को अक्षम बताने वाली परिषद अंग्रेजी में मंहगे व्याख्यान आयोजित करने के साथ लाखों या करोड़ रुपये के किसी प्रोजेक्ट (परियोजना) के तहत भारतीय भाषा का कोई विश्वकोश या कोश अंग्रेजी में तैयार करने में लगी है । आज बहुत सारे व्यावसायिक प्रकाशन विशुद्ध मुनाफा कमाने के लिए भारतीय भाषाओं ही नहीं , भारतीय व्यंजनों और पाककला तक के विश्वकोश अंग्रेजी में प्रकाशित कर रहे हैं । भारतीय भाषा परिषद के उद्देश्यों में स्पष्ट रूप से कहा गया है ,’संस्था के पूर्ण रूप से उन्नायक होने के कारण उसकी कोइ भी प्रव्रुत्ति जिसमें मुद्रण और प्रकाशन भी सम्मिलित है,किसी भी प्रकार के आर्थिक लाभ या प्राप्ति के लिए संचालित नहीं की जाएगी ।’
हाल ही में भारतीय भाषा परिषद ने अपने मासिक वागर्थ के दो नवलेखन अंकों को मिलाकर बिना किसी संपादन और भूमिका के एक किताब बनाकर राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउन्डेशन उसकी चार सौ पचास प्रतियां बेची हैं । यह किताब बाजार में कहीं उपलब्ध नहीं , परिषद की पुस्तक की दुकान ‘पुस्तक केन्द्र’ तक में नहीं । जिन लोगों की रचनाएं संकलित हैं , उन्हें पुस्तक भेजना तो दूर , यह भी सूचित नहीं किया गया है कि उनकी रचनाओं का क्या हश्र हुआ है । सूचना के अधिकार के तहत राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउन्डेशन और सरकारी संस्थाओं द्वारा पुस्तकों की खरीद की प्रक्रियाओं – उनके चयन और चयनकर्ताओं के बारे में जानकारी प्राप्त करना और चुप्पाचोरी धांधली को रोकना बहुत जरूरी है । परिषद के मंत्रियों को परिषद के कार्यकलाप के बारे में मैं पत्र लिख चुका हूं , पर व्यर्थ । यही नहीं मुझे आगे पत्राचार न करने के लिए कहा गया है ।
मेरी अपनी कोई निजी पहचान नहीं है । जो है अपने दिवंगत पिता के पुत्र के रूप में ही है । इस पहचान के नाते मेरे लिए यह पत्र लिखना अत्यंत कष्टप्रद और मार्मिक है ।
- अशोक सेकसरिया
भारतीय भाषा परिषद की दुर्गति / ले. अशोक सेक्सरिया
मई 3, 2011 Aflatoon अफ़लातून द्वारा


हिंदी की संस्थाओं की दशा और दिशा सोचनीय है . भारतीय भाषा परिषद के अंग्रेज़ीकरण के बारे में अशोक जी का प्रतिवाद उचित है . यह अंग्रेज़ी का नहीं अंग्रेज़ीकरण का विरोध है.
वैसे यह प्रतिवाद दस-बीस साल पहले हुआ होता तो बेहतर होता .
अशोकजी का यह पत्र दो दिन पहले ‘जनसत्ता’ में पढा था। इसी को आधार बना कर ‘जनसत्ता’ ने अपने कल के अंक में महत्वपूर्ण और विचारेत्तेजक अग्रलेख छापा है।
समूचा प्रकरण गहरी निराशा और खीझ पैदा करता है। पता नहीं वे क्या कारण हैं जो हिन्दी के नाम पर हिन्दीवाले ही हिन्दी पर ऐसे अत्याचार करते हैं। ये यह भी भूल जाते हैं कि हिन्दी ही इन्हें पहचान, प्रतिष्ठा और आजीविका दे रही है।
सारे चोट्टे किस्म के लोग अंग्रेजी के तलवे चाटने में लगे हुए हैं।
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