हम यह मान कर चले थे की आम जनता खुद से राजनीति को काफी दूर महसूस करने लगी है । राजनीति का मकसद जब स्पष्ट होता है तब समाज का हर तबका उससे जुड़ जाता है । राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में समाज का हर तबका राजनीति से जुड़ गया था क्योंकि उसका मकसद स्पष्ट था – देश को गुलामी के जुए से मुक्त कराना । हमने सोचा था कि चुनाव लड़कर आम आदमी को राजनीति से जोड़ने की कोशिश करेंगे । समाजवादी जनपरिषद की राजनीति का मकसद है नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना । लगभग सवा तीन लाख मतदाताओं के विधान सभा क्षेत्र में समाजवादी जनपरिषद के प्रत्याशी के रूप में मुझे मात्र ६३२ वोट मिले । जाति , सम्प्रदाय , पैसे के आधार पर राजनीति की मुख्यधारा के दलों से जुड़ना अधिकतर लोगों ने पसंद किया । लोगबाग प्रचलित राजनीति से मजबूती से जुड़े हैं । मुख्यधारा के दल राजनीति का जो भी उद्देश्य लेकर चल रहे हैं जनता को उससे परहेज नहीं है । लोगों में हमारी राजनीति के प्रति यकीन पैदा करने के लिए जो न्यूनतम ताकत आवश्यक है वह हम नहीं जुटा पाए हैं ।
हमें मिले वोट अललटप्पू ढंग से नहीं पड़े थे । जिन इलाकों में दल का काम था अथवा साथियों का निजी संपर्क था वहीं से यह वोट आए । गिने – गिनाए । हमारे संभावित मतदाताओं पर नोंच-खसोट भी हुई , जिसे रोकने के लिए हमने प्रयास नहीं किए थे । जिस छोटे से क्षेत्र में हमारे दल ने काम किया था और पहचान भी थी उसके बाहर कम समय देने पर कुछ वोट बढ़ जाते।
एक मित्र ने सही कहा कि लड़ नहीं पाए लेकिन ललकारा तो खूब ! इस बार सर्वाधिक नुक्कड़ सभाएं हमने ही कीं । बड़े दलों के बड़े नेताओं की रैलियाँ हुईं लेकिन नुक्कड़ सभाएं बिलकुल नहीं हुईं । १३ दिनों के लिए रखे गए एक वाहन के खर्च के बाद सबसे बड़ा खर्च नुक्कड़ सभाओं पर ही हुआ । हमारे परचे भी पसंद किए गए ।
पुरे चुनाव में यह हमेशा लगा कि तीसरी शक्ति के फलने-फूलने की गुंजाइश है । वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों व् साम्प्रदायिकता के विरुद्ध और सामाजिक न्याय के हक़ में खड़ी होने वाली तीसरी शक्ति । इस ताकत को खडा करने में राजनैतिक रूप से सचेत युवा और महिला संगठन बहुत कारगर साबित होंगे । वर्ग संगठनों की मजबूती होने पर लोग उस शक्ति को आपका आधार मान लेते हैं । ऐसा आधार जाति-सम्प्रदाय के आधार से बेहतर है ।
करीब एक लाख रुपये चुनाव में खर्च हुए । चन्दा इससे कुछ अधिक हुआ । चंदे का बड़ा हिस्सा बनारस के बाहर रहने वाले मित्रों से आया । १९७७ में मेरे साथ स्कूल पास करके जो मित्र निकले थे उनका सहयोग अधिक था ।
चुनाव-तंत्र की कमियाँ उजागर हुईं ।यह कमी थी – जायज चुनावी खर्च का फालतू छिद्रान्वेषण और नाजायज खर्च रोक पानी में पूरी विफलता । दलों द्वारा चुनाव खर्च की कोई सीमा निर्धारित नहीं है। कांग्रेस ने उम्मीदवारों को खर्च की अधिकतम सीमा (१६ लाख रूपए) से दुगने ज्यादा रकम प्रत्येक प्रत्याशी को दी थी । राजनैतिक समझ के अभाव में चुनाव तंत्र सुधार के नाम पर ऐसे कई कदम उठाता है जो छोटे दलों के विरुद्ध तथा भ्रष्ट राजनीति के पक्ष में होते हैं । लोकतंत्र का यह आवश्यक पर्व धारा १४४ के तहत नियंत्रित था।चार से अधिक लोगों के इकट्ठे होकर कुछ भी सार्वजनिक तौर पर करने के लिए पुलिस और प्रशासन से अनुमति लीजिए । गैर – मान्यताप्राप्त दलों के लिए मात्र १५ दिन प्रचार के लिए मिलते हैं । इन छोटे दलों को चुनाव चिह्न भी इस पखवाड़े के शुरुआत में ही मिलता है । इस अवधि में तीन बार चुनाव- खर्च बताने रिटर्निंग अफसर के दफ्तर जाना पड़ता है । खर्च – प्रेक्षक का आग्रह था की जिला प्रशासन द्वारा निर्धारित दरों पर ही खर्च दिखाया जाए , भले ही वास्तव में वह उससे कम या ज्यादा हो । इस प्रकार चुनाव – तंत्र झूट बोलने का आग्रह करता है।
मीडिया की भूमिका पक्षपातपूर्ण , मुनाफाखोर और अलोकतांत्रिक थी । पिछले चुनाव में ‘पेड़ न्यूज’ की काफी चर्चा हो गई थी। हमने भी चुनाव आयोग और प्रेस परिषद् में शिकायत दर्ज कराई थी। इस बार इसकी निगरानी के लिए जिला-स्तर पर एक समिति बना दी गई थी । मनमानी खबरें पैसे लेकर छापने में कुछ कमी जरूर आई । इसकी भरपाई बड़े अखबारों ने हर प्रत्याशी से पचीस हजार रुपये लेकर और छोटे अखबारों ने पंद्रह हजार रूपए लेकर की । जिन प्रत्याशियों ने इतना पैसा नहीं दिया उनकी खबरों का ‘ब्लैक आउट ‘ हुआ । स्थानीय अखबारों के इस रवैये का असर राष्ट्रीय अखबारों पर नहीं था । हिन्दू ,स्टार न्यूज, एनडीटीवी ,आज तक पर हमारी उम्मीदवारी ‘खबर’ मानी गई - http://www.thehindu.com/news/states/other-states/article2889442.ece , http://www.youtube.com/watch?v=YfVMi_sWvyI ,
चुनाव के लिए जन संपर्क के दौरान महसूस हुआ कि लोग प्रत्याशियों की बात बहुत ही ध्यान से सुनते हैं । नई राजनैतिक संस्कृति की बात से प्रभावित होकर जिन मुष्टिमेय लोगों ने वोट दिया उनमें से एक ने बताया कि १९७७ के बाद वे पहली बार वोट देने गए । मुझे याद आया कि मेरे सर्वोदयी पिता पहले चुनाव से ही मतदान की उम्र पार कर चुके थे लेकिन पहली बार वोट देने १९७७ में ही गए थे – कुछ दूर तक कंधे पर हल लिए किसान का जनता पार्टी झंडा उठा कर भी ।

अच्छा लगा, आपका तजुर्बा जानकर। नई राजनीतिक संस्कृति को जनसाधारण में फैलाने के लिए इस तरह के असंख्य प्रयासों की जरूरत है। हमारी शुभकामनाएँ सदैव आपके साथ हैं।
अब सोचिए कि एक लाख खर्च कर के 632 मत मिले तो
JYOTSANA SRIVASTAVA Bharatiya Janata Party 57918
ANIL SRIVASTWA Indian National Congress 45066
ASHFAQ AHMAD ALIAS DABLU Samajwadi Party 37922
CHANDRA KUMAR MISHRA ALIAS GUDDU MAHARAJ Bahujan Samaj Party 22162
MOHD. SALEEM Quami Ekta Dal 5366
VIKASH Apna Dal 1800
SHIV KUMAR Pragatisheel Manav Samaj Party 1599
SHAMBHU NATH BATUL All India Trinamool Congress 1107
RAMAKANT TRIPATHI Independent 900
ROHIT YADAV Rashtriya lokmanch 877
ANIL KUMAR PANDEY Rashtriya Samanta Dal 659
SATYA PRAKASH SRIVASTAVA Independent 645
AFLATOON Samajwadi Jan Parishad 632
SADABRIJ Shoshit Samaj Dal 593
VINOD KUMAR Jan Kranti Party(Rashtrawadi) 529
LALJEE CHAKRAWAL Lokpriya Samaj Party 504
SEEMA Bahujan Shakti 466
RANJIT UPADHYAY Sarwajan Mahasabha 392
PARVEZ QUADIR KHAN Independent 382
ADITYA KUMAR Independent 269
RAM CHANDAR YADAV Dalit Samaj Party 251
ARDHENDU SHEKHAR TIWARI Lok Jan Shakti Party 249
RAVI SINGH Jharkhand Mukti Morcha 215
MOHAMMAD JAVED Independent 186
Last Updated at 9:30 AM On 7/3/2012
… … 57 हजार मत वाले ने कितना खर्च किया होगा ? हमें तो यह हाल देखकर निराशा होती है।
जनता पर भरोसा करने का मन ठीक से नहीं होता!
आपने वही किया जो लोकतन्त्र की मॉंग थी। अपनी उम्म्ीदवारी को और परिणाम को वोटों से बिलकुल मत जोडिए। उम्मीदावारी सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात रही। शुरुआत ऐसी ही होती है और यकीन मानिए, यह शुरुआत रंग लाएगी।
विट्ठल भाई पटेल की दो पंक्तियॉं आने याद दिला दीं-
देख न पाऍं सुबह, यह और बात है।
आवाज हमारी अँधेरे के खिलाफ है।।
जनता के मन मेँ आत्मघाती प्रवर्ति घर कर गई है।किसी कम खर्च करने वाले प्रत्याशियोँ को एक ही नज़र मेँ रिजेक्ट कर देते हैँ।अब युवा ही कुछ कर सकते हैँ लेकिन वर्तमाण शिक्षा प्रणाली है ना इससे देशभक्त युवा निकलेँगे मुझे नहीँ लगता।
जिस तरह क्रिश्चियन धर्म वालोँ ने धर्म प्रचार के लिए विद्यालय की सहायता ली और RSS वालोँ ने भी वही किया दोनो सफल हैँ।तो क्योँ ना हम समाजवादी लोग भी इसी प्रकार का कुछ करेँ
Aflatoon ji, aapne chunav ladne ka saahas dikhaya yeh badi baat thee. Hum aaraamkursi wale chintak har mahine sarkaar banate aur girate hain. Per maidan mein utarne ka saahas juta nahin paate. Darasal, hamari Rajya Sabha bhee aise hi logon se bhari jaati hai. Phir kulmilakar dekhen toh U.P. ka voter pichhle donon chunavon mein bada samajhdaar bankar ubhra hai…jis ki bhee taraf gaya hai poori tarah dhal gaya hai. Chunki aap chaar logon ki party ke neta the toh aap vastav mein Mayawati ji aur Mulayam ji se takra rahe the…aise mein 632 voton ke aane ka koi malaal nahin hona chahiye…! Phir humlogon ke roop mein desh ke sabse samajhdaar log aapke saath hain hi….!!!! ajay.
Good things always start unheard and unknown….you will stamp your thoughts, philosophy and ideas someday.