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Archive for अप्रैल, 2012

सोना फिर सुर्खियों में है। पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ती कीमतों के कारण वह चर्चा में था। अब नए बजट में उस पर लगाए गए करों के कारण वह चर्चा में है। जब से बजट पेश हुआ, देश भर के सोना-चांदी के सराफा व्यापारी लगातार हड़ताल पर हैं। कई मुख्यमंत्रियों ने उनकी मांगों का समर्थन किया है। यहां तक कि केन्द्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल भी कानपुर में उनके समर्थन में आ गए और बोल गए कि जैसे रात में मच्छर खून चूसते हैं, वैसे सरकारी विभाग इन व्यापारियों का खून चूस रहे हैं। सबसे ताजा बयान बाबा रामदेव का आया है कि सोने पर टेक्स लगाना उचित नहीं है और इससे काला धन बाहर नही आएगा।

प्रणब दा ने अपने बजट में सोने से संबंधित तीन प्रावधान किए है। एक, सोने के आयात पर शुल्क 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 4 प्रतिशत किया है। दो, सोने के ब्रान्डेड आभूषणों पर 1 प्रतिशत केन्द्रीय उत्पाद शुल्क था, उसे गैर-ब्रान्डेड आभूषणों पर भी लागू किया है। हालांकि अब डेढ़ करोड़ के बजाय चार करोड़ रू. वार्षिक तक आभूषण बनाने वाले छोटे उत्पादकों को इससे छूट दे दी है। चांदी के आभूषणों को पूरी तरह उत्पाद शुल्क से मुक्त रखा गया है। तीन, दो लाख रू. से अधिक के आभूषण खरीदने पर पेन नंबर अनिवार्य होगा तथा स्त्रोत कर-कटौती (टीडीएस) होगी।

सराफा व्यापारी इन तीनों प्रस्तावों का विरोध कर रहे हैं। बाद के दोनों प्रस्तावों पर वित्तमंत्री ने पुनर्विचार के संकेत दिए हैं, किंतु आयात शुल्क में वृद्धि वापस लेने से इंकार कर दिया है।

दरअसल उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर में भारत में सोने की खपत और सोने के आयात दोनों में बेतहाशा वृद्धि हुई है और अब वह सरकार के गले की हड्डी बन गई है। कैलेण्डर वर्ष 2011 में भारत में 969 टन सोने का रिकाॅर्ड आयात हुआ और वह हथियारों की ही तरह दुनिया का सबसे बड़ा सोना आयातक देश बन चुका है। दुनिया की कुल सोने की खपत की 30 फीसदी से ज्यादा अकेले भारत में होती है। चूंकि भारत के अंदर मुश्किल से दो टन सोने का सालाना उत्पादन होता है, इसलिए भारत की सोने की यह विशाल भूख भारत के आयात बिल को बुरी तरह बढ़ा रही है। पेट्रोलियम पदार्थों के बाद सोना-चांदी भारत के आयात बिल की सबसे बड़ी मद बन गया है। कुल आयात बिल का करीब दस फीसद सोने-चांदी के आयात में जाने लगा है।

अनुमान है कि बीते वित्तीय वर्ष 2011-12 में देश में 58 अरब डालर का सोना आयात हुआ होगा। इसके पिछले वर्ष में यह 33 अरब डालर था। यानी केवल एक साल में इसमें 75 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2001-02 में सोना आयात 4.17 अरब डालर था। अर्थात ग्यारह सालों में उसमें करीब 14 गुनी बढ़ोतरी हुई है। गौरतलब है कि इस बीच में दुनिया में सोने की कीमतें भी काफी बढ़ी है, जिसका एक कारण शायद स्वयं भारत की बढ़ती मांग रही है। किंतु बढ़ती कीमतें भी भारत की सोने की भूख को कम करने में नाकाम रही है।

भारतवासियों की सोने की इस अनियंत्रित भूख ने भारत के विदेश व्यापार घाटे और भुगतान संतुलन के संकट को भी गंभीर बनाया है। भारत के विदेश व्यापार का घाटा वर्ष 2010-11 में 130.5 अरब डालर की विशाल राशि पर पहंुच गया था। विदेश व्यापार घाटे की यह विशाल खाई कुछ हद तक विदेशी मुद्रा की अन्य चालू प्राप्तियों (जैसे विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भेजा धन) से भरती है किंतु फिर भी घाटा रह जाता है जिसे भुगतान संतुलन का चालू खाते का घाटा कहा जाता है। यह भी तेजी से बढ़ रहा है जिसे पूरने के लिए सरकार को विदेशी कर्जों और विदेशी पूंजी को हर कीमत पर बुलाने पर जोर देना पड़ता है। भुगतान संतुलन का चालू खाते का घाटा वर्ष 2010-11 में 44.4 अरब डालर था, जो 2011-12 में बढ़कर 63.2 अरब डालर रहने का अनुमान है। यह भारत की कुल राष्ट्रीय आय के 3.6 फीसदी के बराबर पहंुच गया है, जो खतरे की घंटी है। गौरतलब है कि पिछली बार 1991 में जब भुगतान संतुलन का बड़ा संकट पैदा हुआ था जिसने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से बड़ा कर्ज लेने और वैश्वीकरण-उदारीकरण की नीतियों को अपनाने के लिए भारत सरकार को मजबूर किया था, तब चालू खाते का घाटा राष्ट्रीय आय का 3 फीसदी था। यह भी साफ है कि इस विशाल घाटे में सोना आयात का बड़ा योगदान है। यदि सोना आयात को बंद कर दिया जाए, तो विदेश व्यापार घाटा और भुगतान संतुलन के चालू खाते का घाटा दोनों काफी कम रह जाएंगे।

सोने का यह अनाप-शनाप आयात भारत देश और इसकी अर्थव्यवस्था के लिए एक ज्यादा बुनियादी रूप से भी नुकसानदेह है। इसका मतलब है कि भारतवासियों की मेहनत से पैदा धन का एक हिस्सा देश के बाहर जा रहा है। बदले में जो मिल रहा है वह बेकाम के धातु के टुकड़े है। सोने मंे निवेश एक तरह का मृत निवेश है। यदि यही धन देश के अंदर उत्पादक कामों में लगता तो देश में ज्यादा रोजगार पैदा होता, धन बढ़ता और आर्थिक प्रगति होती। अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो उसका गुणक प्रभाव होता। अमरीका जैसे देशों की तुलना में भारत के बारे में एक अच्छी बात यह है कि यहां बचत की दर काफी ऊंची है, 30 फीसदी के करीब। किंतु इस बचत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सोना खरीदी के रूप में देश से बाहर चला जा रहा है।

सवाल इस गरीब देश के सीमित संसाधनों के उपयोग का भी है। यह एक विडंबना है कि दुनिया के सबसे गरीब देशों में एक, सबसे ज्यादा कुपोषित और अशिक्षित लोगों का देश, दुनिया में सबसे ज्यादा सोने की खपत करे। उसकी प्राथमिकता लोगों का भोजन, आवास, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य न होकर सोने को खरीदने में प्रकट हो। यह एक घोर विकृति है। पूंजीवाद की विचित्र माया है। यह भी सोचने की बात है कि जो देश धर्म व अध्यात्म का गढ़ माना जाता है, जहां साधुओं, संतो और बाबाओं की कमी नही है, उसी में सोने के प्रति इतनी ललक व चाहत है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा सोनाप्रेमी देश बन जाता है।

भारत में सोने की बढ़ती मांग के पीछे कई कारण हैं। एक तो बढ़ती महंगाई है। महंगाई की ज्यादा दरों के कारण रूपए का मूल्य तेजी से गिरता है और बैंक में या अन्यत्र धन जमा करना अनाकर्षक हो जाता है। इसलिए लोग अपनी बचतें सोने के रूप में रखने लगते हैं, जिसकी कीमतें तेजी से बढ़ने से अच्छा फायदा होता है। सोने के गहनों के प्रति महिलाओं की पारंपरिक ललक का एक कारण उनकी असुरक्षा है। महिलाओं के पास जो गहने हंै, कई बार वही एकमात्र संपत्ति होती है जिस पर उनका अधिकार होता है।

किंतु पिछले कुछ वर्षांे में सोने की मांग में विस्फोट का सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत में धनाढ्य और नक्धनाढ्य वर्ग की अमीरी काफी बढ़ है, जिसने बड़े पैमाने पर अपनी वैध-अवैध कमाई को सोने के रूप में रखना शुरू किया है। नयी व्यवस्था में सट्टात्मक प्रवृत्तियों को जो बढ़ावा मिला है, उसने भी सोने और जमीन की मांग और उनके भावांे को बेहद बढ़ाया है। यानी देश के अमीर लोग अब अपनी कमाई के एक हिस्से से सोना और जमीन-मकान इसलिए नहीं खरीद रहे है कि उन्हें उसकी जरूरत है। बल्कि इसलिए कि इनकी कीमतें तेजी से बढ़ती है और वे घर बैठे बिना कुछ किए चंद सालों में अपनी संपत्ति को दुगना-तिगुना कर सकते है। वायदा बाजार ने भी सोने की कीमतों और सट्टात्मक मंाग को आसमान पर पहुंचाया है।

देश में भ्रष्टाचार और दो नंबरी समानांतर अर्थव्यस्था का जो बोलबाला बढ़ा है, उसका भी संबंध सोने की मांग से है। सोने के साथ सबसे बड़ी सुविधा यह है कि इस छिपाना, गुपचुप ले जाना या लेन-देन आसान है। करोड़ों रूपयों के नोट कहीं रखना आसान नहीं है, किंतु करोड़ांे रूपये का सोना आसानी से बैंक के एक लाॅकर में रखा जा सकता है। दो साल पहले सरकारी एल्युमीनियम कंपनी ‘नाल्को’ का मुख्य कार्यपालन अधिकारी पकड़ाया था तो उसके लाॅकरों से 15 किलो सोना बरामद हुआ था। पता चला था कि वह अपने दलाल के मार्फत घूस में सोने का बिस्कुट या सोने की ईंट ही लेता था। न सूटकेस का झंझट और न नोट गिनने की जहमत! इसलिए जब बाबा रामदेव कहते हैं कि सोने का काले धन से कोई रिश्ता नहीं है, तो वे या तो अपनी समझ की कमी दर्शा रहे हैं या फिर सराफा व्यापारियों का समर्थन जुटाने की सस्ती कोशिश कर रहे हैं।

देशहित में सोने की मांग और हवस को घटाने, हतोत्साहित करने और नियंत्रित करने की जरूरत है। सराफा व्यापारियों की मांगें उचित नहीं है। आखिर जब देश में ज्यादातर वस्तुओं के उत्पादन पर 12 फीसदी उत्पाद कर लग रहा है, तो उनकी इस मांग का क्या औचित्य है कि सोने के गहनों पर 1 फीसदी उत्पाद कर भी नहीं लगे ? बल्कि उत्पाद कर तो बढ़ना चाहिए, क्योंकि स्वर्ण आभूषण एक विलासिता की वस्तु है, प्राथमिकता वाली बुनियादी जरूरत की वस्तु नहीं। आयात शुल्क में वृद्धि भी नाकाफी है। यह और बढ़ना चाहिए। सोने के आयात पर पाबंदी पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।

सच कहें तो पिछले दो दशकों में खुद सरकार की उदारीकरण और मुक्त व्यापार की गलत नीतियों के कारण ही आज के हालात पैदा हुए है। देश आजाद होने के बाद सोने की भूख को नुकसानदेह मानकर इसके आयात पर पाबंदी लगाई गई थी और सोने के व्यापार पर भी काफी नियंत्रण लगाया गया था। किंतु 1993 में सोने के आयात पर पाबंदी हटा ली गई और फिर आयात शुल्क भी काफी कम कर दिया गया। जो लोग विदेश यात्रा पर जाते हंै, उन्हें भी लौटते वक्त मामूली शुल्क देकर अपने साथ सोना लाने की छूट दे दी गई। सोने के आयात के पीछे तर्क यह था कि इससे स्वर्ण आभूषण उद्योग और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। किंतु असलियत में निर्यात कम रहे, आयात कई गुना ज्यादा रहा। बैंको और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को सोना रखकर कर्जा देने की इजाजत दी गई। सोने का वायदा कारोबार भी शुरू किया गया। सोने के ब्रांडेड गहनांे पर नाममात्र का 1 फीसदी उत्पाद शुल्क भी पिछले साल के बजट में ही शुरू किया गया, नहीं तो यह पूरी तरह शुल्क मुक्त था। मामूली से आयात शुल्क में भी तैयार आभूषणों के निर्यात के नाम पर बड़ी-बड़ी छूट दी गई। उदाहरण के लिए, इस वर्ष के बजट दस्तावेजों से पता चलता है कि सोने और हीरे-जवाहरात के आयात-शुल्क में माफी से 2010-11 में 41,200 करोड़ रू. तथा 2011-12 में 58,190 करोड़ रू. के राजस्व का नुकसान केन्द्र सरकार को हुआ है।

कुल मिलाकर, उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के कारण देश में जो कई विकृतियों एवं समस्याएं पैदा हुई है, उनमें यह भी एक है। काफी पहले कवि ने हमें चेताया था कि सोने में धतूरे से भी सौ गुना ज्यादा नशा है -

कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।

या खावे सो बौराये, वा पावे सो बौराय।।

सोने का यह खतरनाक नशा इंसानांे, समाज, सरकार और देश सबको ले डूब रहा है। इस पर अविलंब रोक लगाने की जरूरत है।

(लेखक आर्थिक-राजनैतिक विषयों पर टिप्पणीकार एवं समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)

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1991 से भारत में जिस आर्थिक नीति को घोषित रूप से लागू किया गया है उसे द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों से लेकर 1990 आते-आते सोवियत यूनियन के ध्वस्त होने जैसी घटनाओं के संदर्भ में ही समझा जा सकता है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी शोषण के पुराने रूप पर एक हद का विराम लग गया। भारत समेत दुनिया के अनेक देश साम्राज्यवादी नियंत्रण से आजाद हो गये जिन पर पुराने तरह तक आर्थिक नियंत्रण असंभव हो गया। सोवियत यूनियन एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा और स्वयं यूरोप के बड़े भू-भाग पर इसका नियंत्रण काफी दिनों तक बना रहा। इसी पृष्ठभूमि में ब्रेटनवुड्स संस्थाएं – विश्व बैंक, अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन – 2 जुलाई 1944 में अस्तित्व में आयीं, जिनका मूल उद्देश्य युद्ध से ध्वस्त हो चुकी पश्चिमी यूरोप और जापान की अर्थव्यवस्थाओं को पटरी पर लाकर एक हद तक संसार पर इनके वर्चस्व को फिर से स्थापित करना था।
पश्चिमी वर्चस्व को कायम रखने का यह प्रयास चल ही रहा था कि रूस और चीन में भारी आर्थिक बदलाव आये जिसने पश्चिमी ढ़ंग के औद्योगिक विकास के लिए एक संजीवनी का काम किया। चीन में कई उथल-पुथल, जैसे ‘सांस्कृतिक क्रान्ति’, ‘बड़ा उछाल’ (ग्रेट लीप) आदि के बाद देंग द्वारा कम्युनिश्ट राजनीतिक सत्ता के तहत ही पूंजीवाद की ओर संक्रमण शुरू हुआ और रूस में, 1990 आते आते थोड़े ही समय में पूरी कम्युनिश्ट व्यवस्था धराशायी हो गयी।
सोवियत व्यवस्था के अंतर्विरोध
रूस के ऐसे अप्रत्याशित बदलाव के निहितार्थ को समझना जरूरी है। रूस ने अपने सामने वैसे ही औद्योगिक समाज के विकास का लक्ष्य रखा जैसा औद्योगिक क्रान्ति के बाद पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में विकसित हुआ था। दरअसल रूस ने तेजी से इस दिशा में अमेरिका से आगे निकलने का लक्ष्य अपने सामने रखा था। लेकिन आधुनिक उद्योगों के लिए पूंजी संचय की प्रक्रिया का समतामूलक समाज के लक्ष्य से इतना विरोध था कि इस व्यवस्था पर असह्य दबाव बना रहा। मजदूरों पर काम का बोझ बढ़ाने के लिए ‘पीस रेट’1 की असह्य (तथाकथित स्टैखनोवाइट) व्यवस्था लागू की जाने लगी। किसानों की जमीन को जबर्दस्ती सामूहिक फार्मों के लिए ले लिया गया और उन्हें एक नौकरशाही के तहत श्रमिक की तरह कठिन शर्तों पर काम करने को मजबूर किया गया। कृषि के अधिशेष (surplus) को उद्योगों के विकास के लिए लगाया जाने लगा। इससे उद्योगों के लिए तो पूंजी संचय तेज हुआ लेकिन चारों  ओर पार्टी और इससे जुड़ी नौकरशाही के खिलाफ इतना आक्रोश हुआ कि अंततः व्यवस्था धराशायी हो गयी। जो नतीजे हुए वे जग जाहिर है। इससे जो पूंजीवाद पैदा हुआ वह बहुत ही अस्वस्थ ढ़ंग का है। एक खास तरह की उद्यमिता और मितव्ययिता जो पूंजीपतियों के साथ पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में जुड़ी थीं उसका वहां अभाव था और सामूहिक संपत्ति की लूट और विशाल मात्रा में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन (जैसे प्राकृतिक गैस एवं दूसरे खनिजों) की खरीद फरोख्त से धनाढ्य बनने की होड़ लग गयी। इस क्रम में सोवियत काल की जो सामाजिक सुरक्षा आम लोगों को उपलब्ध थी वह छिन्न-भिन्न हो गयी। थोड़े से लोग अल्पकाल में ही धनाढ्य हो गये। फिर भी अपने प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर रूस एक बड़ी पूंजीवादी व्यवस्था के रूप में प्रभावी बना हुआ है। लेकिन आम लोगों का जीवन स्तर देश की विशाल संपदा के हिसाब से काफी नीचा है।
चीन के अंतर्विरोध
चीन में जो बदलाव आये हैं वे कुछ अचरज में डालने वाले लगते हैं। लेकिन गहराई से विचार करने पर साफ दिखाई देता है कि यह भी समतामूलक समाज के लक्ष्यों से आधुनिक ढंग के औद्योगीकरण के अंतरविरोध का ही नतीजा है। माओ ने शुरू में ऐसा सोचा था कि एक साम्यवादी समाज की स्थापना के लिए औद्योगिक विकास के अति उच्च स्तर पर पहुँचना जरूरी नहीं, जैसी कि मार्क्सवादियों की प्रारंभिक मान्यता थी। उसका ऐसा मानना था कि लोगों की चेतना और जीवन शैली में बदलाव से, ऊंचे औद्योगिक विकास के बिना भी, समतामूलक, साम्यवादी समाज बनाया जा सकता है। इसी सोच से सांस्कृतिक क्रांति के प्रयास हुए जिसमें लोगों की सोच को बदलने के लिए शहरी लोगों को ग्रामीण अंचलों में कृषि से जुड़े कामों को करने को बाध्य किया गया। सामूहिक जीवन के लिए सभी स्तर पर कम्युनों की स्थापना की जाने लगी। पर माओ के इस सपने के बिखरने के दो कारण थे। एक तो जिस कम्युन पद्धति को वह लागू करना चाहता था, वह स्वतः स्फूर्त रूप से नीचे से विकसित नहीं हो रही थी बल्कि ऊपर से एक केन्द्रीय सत्ता के द्वारा लागू की जा रही थी, जिसके पीछे वहां की सैन्य शक्ति थी। इस तरह यह एक सहयोगी व्यवस्था को केन्द्रीकृत पार्टी नौकरशाही के दबाव में विकसित करने का प्रयास था। इससे पैदा संस्थागत अवरोध के खिलाफ छात्रों और युवाजनों की शक्ति को उभारने का प्रयास किया गया, जिससे जगह-जगह संघर्ष होने लगे और सैन्य शक्ति से ही स्थिति को नियंत्रित किया गया। दूसरा, माओ नेे ‘बैकयार्ड स्टील मिल’ की बात जरूर की लेकिन यह छोटे और घरेलू उद्योगों के आदर्श को लागू करने के लिए नहीं हुआ। इसे तत्कालिक मजबूरी से ज्यादा नहीं माना गया। भारी सैन्यबल के विकास और इसके लिए जरूरी अत्याधुनिक उद्योगों के विकास का लक्ष्य कभी भी नहीं छोडा गया। अंततः अति विकसित उद्योगों की महत्वाकंाक्षा ने छोटे उद्योगों और स्वशासी कम्युनों की कल्पना को रौंद दिया और माओ के जाते-जाते अत्याधुनिक उद्योगों पर आश्रित सैन्यबल की महत्वाकांक्षा हावी हो गई। आधुनिक ढ़ंग की औद्योगिक व्यवस्था के विकास के लिए पूंजी संचय के वे सारे रास्ते अपनाना अपरिहार्य हो गया जिन्हें अन्यत्र अपनाया गया था। चीन में ‘‘मंडारिनों’’ (केन्द्रीकृत नौकरशाही) के तहत राज्य के उद्देश्यों के लिए आम लोगों की कई पीढि़यों की बलि देने की परंपरा दो हजार वर्षों से अधिक पुरानी है, जिसका गवाह चीन की दीवार है। इसलिए जब एक बार आधुनिक ढंग के औद्योगिक विकास का लक्ष्य अपनाया गया तो आम लोगों, विशेषकर ग्रामीण लोगों के हितों को नजरअंदाज किया जाने लगा। इसके लिए चीन के प्राकृतिक और मानव संसाधनों का अबाध शोषण शुरू हुआ और संसार भर के अत्याधुनिक पूंजीवादी प्रतिष्ठानों को आमंत्रित कर इस विकास में लगाया गया। विशेष सुविधाओं से युक्त ‘‘स्पेशल इकाॅनोमिक जोन’’ SEZ का जाल बिछ गया। पूंजीवाद के विकास से जुड़ा औपनिवेशक शोषण का यह आंतरिक और आत्यांतिक रूप बन गया है।
प्राथमिक पूंजी संचय प्राथमिक नहीं, निरंतर
मार्क्स ने औद्योगिक क्रान्ति के लिए आवश्यक ‘प्राथमिक पूंजी संचय’ 2 को किसानों के क्रूर विस्थापन और श्रमिकों के घोर शोषण से जोड़ा था। उसने यह मान लिया था कि इसके बाद स्थापित उद्योगों में मजदूरों के शोषण से प्राप्त अधिशेष के आधार पर पूंजी का विस्तार होता रहेगा। श्रमिकों और पंूजीपतियों का संघर्ष श्रम के अधिशेष के अनुपात को लेकर होगा जो पूंजीपतियों के मुनाफे का आधार है। लेकिन समग्रता में परिणाम सुखदायी होगा क्योंकि अंततः इससे एक नयी सभ्यता का विस्तार होता रहेगा। इनमें रूकावट श्रम से जुडे अधिशेष को हासिल करने और इससे जुड़े समय-समय पर आने वाले व्यापार के संकटों (ट्रेड साइकिल) से आएगी। रोजा लक्जमबर्ग जैसी मार्क्सवादी चिन्तकों ने भी इस व्यवस्था का मूल संकट अधिशेष जनित पण्यों के बाजार से ही जोड़ा था। स्वयं धरती के संसाधनों के सिकुड़न के संकट पर किसी का ध्यान नहीं गया था।
अब तस्वीर ज्यादा जटिल और भयावह है। औद्योगिक विकास शून्य में नहीं होता और सकल उत्पाद में श्रम निर्गुण या अदेह रूप में संचित नहीं होता बल्कि अन्न, जल और अनगिनत जैविक पदार्थो के परिवर्तन और परिवर्धन से उपयोग की वस्तुओं के अंसख्य रूपों में संचित होता है। यह प्रक्रिया पूरी धरती को संसाधन के रूप में जज्ब कर असंख्य उपयोग की वस्तुओं के रूप में बदलने की प्रक्रिया होती है।

प्राकृतिक व मानवीय संसाधनों का असीमित दोहन
इस क्रम में धरती के सारे तत्व जैविक प्रक्रिया से बाहर हो जीवन के लिए अनुपलब्ध बनते जाते हैं – जैसे ईंट, सीमेंट, लोहा या प्लास्टिक, जिन्हें मनुष्य से लेकर जीवाणु तक कोई भी जज्ब नहीं कर सकता। इस सारी प्रक्रिया केा धरती पर जीवन या स्वयं धरती की मौत के रूप में देखा जा सकता है। क्योंकि यह किसी भी जैविक प्रक्रिया के लिए अनुपयोगी बन जायेगी। ध्यान देने की बात है कि पूंजी संचय और इस पर आधारित औद्योगिक विकास की प्रक्रिया सिर्फ प्राथमिक स्तर पर हीं नहीं बल्कि सतत् चलने वाली होती है और इसमें प्राकृतिक और मानव संसाधनों का दोहन हर स्तर पर चलता रहता है। यह संभव इसलिए होता है क्योंकि समाज में एक ऐसा वर्ग भी बना रहता है जो इस से लाभान्वित होता है – सिर्फ पूंजीपति ही नहीं बल्कि विस्तृत नौकरशाही, व्यवस्थापक और विनिमय करने वाला वर्ग भी जिसका जीवन स्तर इस विकास के साथ ऊंचा होता रहता है। यह समूह विकास का वाहक और पेरोकार बना रहता है क्योंकि इससे इसकी समृद्धि और उपभोग के दायरे का विस्तार होता रहता है। दूसरे इसका अनुकरण करते है। इससे अपनी पारी आने का भ्रम बना रहता है।
वैसे समूह जिनके आवास और पारंपरिक रूप से जीवन के आधार वैसे प्रदेश हैं जहां वन हैं, खनिज पदार्थ हैं और ऐसी जल धाराएं जिन्हें बिजली पैदा करने के लिए बांधों से नियंत्रित किया जा रहा है – विस्थापित हो इस उत्पादन पद्धति के पायदान पर डाल दिये जाते हैं। किसानों की उपज को सस्ते दाम पर लेने का प्रयास होता है ताकि इन पर आधारित औद्योगिक उत्पादों की कीमतें कम कर ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके। विशाल पैमाने पर होने वाले विस्थापन से श्रम बाजार में काम तलाशने वालों की भीड़ बनी रहती है जिससे श्रमिकों को कम से कम मजदूरी देना होता है। इस तरह देश के मजदूर और किसान लगातार गरीबी रेखा पर बने रहते हैं। अगर उपभोग की वस्तुओं की कीमतें बढ़ती है तो ये भूखमरी और कंगाली झेलते हैं। जो बड़ी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं हैं वे लगातार इस प्रयास में लगी रहती हैं कि सस्ते श्रम और संसाधनों के क्षेत्र में पंूजी का प्रवेश निर्बाध बना रहे। जैसे पानी बहकर एक स्तर पर फैल जाता है वैसे ही निर्धनता भी अपना स्तर ढूंढ़ते हुए व्यापक बनती जाती है। श्रमिकों के पलायन से संपन्न क्षेत्रों पर जनसंख्या का दबाव बढ़ना और फिर इससे वहां के मजदूरों के जीवन पर विपरीत प्रभाव और बाहरी श्रमिकों के खिलाफ आक्रोश इसका परिणाम होता है।
महंगाई का मूल कारण
ऊपर के संदर्भ में आज की महंगाई पर भी विचार करने की जरूरत है। महंगाई को आम तौर से आपूर्ति और मंाग से जोड़ा जाता है। यह बाजार के दैनन्दिन के अनुभवों पर आधारित है। लेकिन अब हम एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके हैं कि आपूर्ति का संकट स्थायी और वैश्विक बन गया है। इसमें तत्कालिक रूप से कहीं मंदी और कीमतों में गिरावट भले ही दिखे, स्थायी रूप से महंगाई का दबाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बना रहेगा। इसका मूल कारण है हमारी सभ्यता और खासकर पूंजीवादी सभ्यता, जिसका मूल उद्देश्य अविरल मुनाफे के लिए ‘‘उपभोग’’ की वस्तुओं की विविधता और मात्रा का विस्तार करते जाना है। इनके पैमानों के उत्तरोत्तर विस्तार के साथ प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता पर उन्नीसवीं शताब्दी से ही दबाव बढ़ने लगा है, जबसे औद्योगिक क्रान्ति का असर दुनिया पर पड़ने लगा। इनसे अनेक आवश्यक खनिज जिनमें ऊर्जा के मूल स्त्रोत कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस एवं उत्पादन के ढांचे के लिए आधार तांबा, लोहा एवं अल्युमिनियम आदि के अयस्क इतनी तेजी से खतम होते जा रहे हैं कि इनकी उपलब्धता घटने लगी है और ये दिनों दिन महंगे होते जा रहे हैं। इससे पूरी अर्थव्यवस्था पर महंगाई का दबाव बनता है। बाहर की किन्हीं तात्कालिक स्थितियों या अचानक ऊर्जा के किसी स्त्रोत के सुलभ होने से कभी-कभी महंगाई से राहत भले ही मिल जाये, ऊपर वर्णित संसाधनों की आपूर्ति का मूल संकट सदा बना रहता है। इससे भी बढ़कर जीवन के लिए अपरिहार्य पेयजल, जो वनस्पति जगत से लेकर सभी जीव और मानव जीवन के लिए अपरिहार्य है, अपर्याप्त होता जा रहा है। इसके खत्म होने का कारण इसका बड़ी मात्रा में उपयोग ही नहीं बल्कि आधुनिक उद्योगों और औद्योगिक आबादियों के कचड़े एवं कृषि में विशाल मात्रा में इस्तेमाल किये जा रहे रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का जलश्रोतों और भूजल में घुलने से हो रहा प्रदूषण भी है। इनका प्रयोग अब जटिल रासायनिक प्रक्रिया से सफाई के बाद ही संभव होता है जिससे यह ये महंगे पण्य की श्रेणी में आ जाते हैं। इसका बोझ गरीब वर्गो के लिए असह्य हो जाता है जो न महंगे बोतलबन्द पानी खरीद सकते हैं न नगरों के भारी पानी के टैक्स का बोझ उठा सकते हैं। अन्न महंगा करने में ये सभी कारक शामिल हो जाते है।
मूल बीमारी औद्योगिक सभ्यता
संसार की बड़ी वित्तीय संस्थाएं इस कोशिश में रहती हैं कि पूंजी का प्रवाह बिना अवरोध के बना रहे और इससे औद्योगिक सभ्यता की मूल बीमारी धीरे-धीरे उन देशों और भू-भागों को भी ग्रसित करती है जो पहले इस औद्योगिक सभ्यता की चपेट में नहीं आये थे। जैसे-जैसे प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता घटती है दुनिया के तमाम लोगों पर अपने जल और जमीन को पूंजीवादी प्रतिष्ठानों के लिए खोलने का दबाव बढ़ता है। वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के प्रावधानों का मूल उद्देश्य इसी प्रक्रिया की औपचारक मान्यता का उद्घोष है। इसलिए इस समस्या का निदान एक ऐसी विकेन्द्रित व्यवस्था ही हो सकता है जिसमें लोग स्थानीय संसाधनों के आधार पर सरल जीवन पद्धति अपनायें। यह व्यवस्था समतामूलक ही हो सकती है।

टिप्पणियां
1. ‘पीस रेट’ (Piece Rate) का मतलब है कि एक निश्चित मात्रा में काम करने पर ही निर्धारित मजदूरी दी जाएगी। मजदूरी देने के दो तरीके हो सकते हैं – एक, दिन के हिसाब से मजदूरी दी जाए (डेली वेज रेट) और दो, काम की मात्रा के हिसाब से मजदूरी दी जाए (पीस रेट)। दूसरे तरीके में मजदूरों का शोषण बढ़ जाता है। जो हट्टे-कट्टे जवान होते है, वे पैसे के लालच में अपने स्वास्थ्य की परवाह न करके एक दिन में ज्यादा काम करते है। जो थोड़ा कमजोर होते है, वे निर्धारित मात्रा में काम नहीं कर पाने के कारण एक दिन की मजदूरी भी नहीं पाते हैं। भारत में मनरेगा की बहुचर्चित योजना में पीस रेट का उपयोग करने के कारण मजदूरों का काफी शोषण हो रहा है। कई बार मजदूरो को एक दिन की मजदूरी 50-60 रू. ही मिल पाती है।
2. कार्ल मार्क्स ने ‘प्राथमिक पूंजी संचय’ (Primitive Accumulation of Capital)पूंजीवाद के प्रारंभ की उस प्रक्रिया को कहा था, जिसमें 16 वीं से 18 वीं सदी तक बड़े पैमाने पर इंग्लैण्ड के खेतों से किसानों को विस्थापित करके उन्हें ऊनी वस्त्र उद्योग की ऊन की जरूरत के लिए भेड़ों को पालने के लिए चरागाहों में बदला गया। इससे औद्योगीकरण में दो तरह से मदद मिली। एक, उद्योगांे को सस्ता कच्चा माल मिला। दो, विस्थापित किसानों से बेरोजगार मजदूरों की सुरक्षित फौज तैयार हुई और उद्योगों को सस्ते मजदूर मिले। सच्चिदानंद सिन्हा कहना चाहते हैं कि यह प्रक्रिया मार्क्स के बताए मुताबिक पूंजीवाद की महज प्राथमिक या प्रारंभिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि लगातार चलने वाली पूंजीवाद की अनिवार्य प्रक्रिया है।
3. ‘पण्य’ मार्क्स द्वारा इस्तेमाल की गई अवधारणा Commodity का अनुवाद है। इसका मतलब वे वस्तुएं है जिनकी बाजार में खरीद-फरोख्त होती है। जैसे पानी यदि मुफ्त में उपलब्ध है तो वह पण्य नहीं है। किंतु वह बोतलों में बंद होकर बिकने लगा है तो पण्य बन गया है।

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वाराणसी कैंट विधान-सभा क्षेत्र से समाजवादी जनपरिषद (प्रत्याशी – अफलातून ) का चुनाव-खर्च व आय

चुनाव खर्च हेतु चन्दा

डॉ बी. के. यादव                     1000

जगनारायण सिंह                  1000

राजेन्द्र                                    2000

डॉ के के मिश्रा                          1000

प्रो . विपिन  त्रिपाठी                                 500

डॉ श्रीकृष्ण सिंह                                        500

अजीत सिंह                             5000

रमेश गिनोडिया                      11000

चचा                                         25 ,000

नचिकेता                                  10 ,000

अनूप सर्राफ                             28 ,800

दल                                           10 ,000

डॉ अशोक अग्रवाल                     5 ,000

जीतेंद्र गुप्ता                              11 ,000

अशोक सेकसरिया                     4000

डॉ राजीव                                   11 ,000

अनिल त्रिपाठी                            5000

महेश पांडे                                    5000

डॉ संघमित्रा                             11 ,000

विनोद सिंह (WNT)                    500

पवन कुमार                                1000

डॉ स्वाति                                      1400

दीपक पटेल                                     500

डॉ आई एस गंभीर                       2000

_______________________________

कुल आय                           1,72200

खर्च

नुक्कड़ सभाएं (आठ )          21 ,940

परचा -स्टीकर                         6019

वाहन – इंधन                         28 ,869 .20

बैनर-झंडा                             1436

पार्टी   कार्यकर्ताओं का दौरा      2468

कार्यकर्ताओं पर व्यय                13000

जमानत राशि                           10000

अन्य फुटकर खर्च                      1952

__________________________________

कुल खर्च                                       85 ,684

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हमारी मांग थी की चुनावी तंत्र हर उम्मीदवार को एक हिसाबनावीस मुहैया कराए । आयोग तो जब मानेगा तब मानेगा लेकिन दल के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ सोमनाथ त्रिपाठी ने स्वयं यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई ।

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