सोना फिर सुर्खियों में है। पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ती कीमतों के कारण वह चर्चा में था। अब नए बजट में उस पर लगाए गए करों के कारण वह चर्चा में है। जब से बजट पेश हुआ, देश भर के सोना-चांदी के सराफा व्यापारी लगातार हड़ताल पर हैं। कई मुख्यमंत्रियों ने उनकी मांगों का समर्थन किया है। यहां तक कि केन्द्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल भी कानपुर में उनके समर्थन में आ गए और बोल गए कि जैसे रात में मच्छर खून चूसते हैं, वैसे सरकारी विभाग इन व्यापारियों का खून चूस रहे हैं। सबसे ताजा बयान बाबा रामदेव का आया है कि सोने पर टेक्स लगाना उचित नहीं है और इससे काला धन बाहर नही आएगा।
प्रणब दा ने अपने बजट में सोने से संबंधित तीन प्रावधान किए है। एक, सोने के आयात पर शुल्क 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 4 प्रतिशत किया है। दो, सोने के ब्रान्डेड आभूषणों पर 1 प्रतिशत केन्द्रीय उत्पाद शुल्क था, उसे गैर-ब्रान्डेड आभूषणों पर भी लागू किया है। हालांकि अब डेढ़ करोड़ के बजाय चार करोड़ रू. वार्षिक तक आभूषण बनाने वाले छोटे उत्पादकों को इससे छूट दे दी है। चांदी के आभूषणों को पूरी तरह उत्पाद शुल्क से मुक्त रखा गया है। तीन, दो लाख रू. से अधिक के आभूषण खरीदने पर पेन नंबर अनिवार्य होगा तथा स्त्रोत कर-कटौती (टीडीएस) होगी।
सराफा व्यापारी इन तीनों प्रस्तावों का विरोध कर रहे हैं। बाद के दोनों प्रस्तावों पर वित्तमंत्री ने पुनर्विचार के संकेत दिए हैं, किंतु आयात शुल्क में वृद्धि वापस लेने से इंकार कर दिया है।
दरअसल उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर में भारत में सोने की खपत और सोने के आयात दोनों में बेतहाशा वृद्धि हुई है और अब वह सरकार के गले की हड्डी बन गई है। कैलेण्डर वर्ष 2011 में भारत में 969 टन सोने का रिकाॅर्ड आयात हुआ और वह हथियारों की ही तरह दुनिया का सबसे बड़ा सोना आयातक देश बन चुका है। दुनिया की कुल सोने की खपत की 30 फीसदी से ज्यादा अकेले भारत में होती है। चूंकि भारत के अंदर मुश्किल से दो टन सोने का सालाना उत्पादन होता है, इसलिए भारत की सोने की यह विशाल भूख भारत के आयात बिल को बुरी तरह बढ़ा रही है। पेट्रोलियम पदार्थों के बाद सोना-चांदी भारत के आयात बिल की सबसे बड़ी मद बन गया है। कुल आयात बिल का करीब दस फीसद सोने-चांदी के आयात में जाने लगा है।
अनुमान है कि बीते वित्तीय वर्ष 2011-12 में देश में 58 अरब डालर का सोना आयात हुआ होगा। इसके पिछले वर्ष में यह 33 अरब डालर था। यानी केवल एक साल में इसमें 75 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2001-02 में सोना आयात 4.17 अरब डालर था। अर्थात ग्यारह सालों में उसमें करीब 14 गुनी बढ़ोतरी हुई है। गौरतलब है कि इस बीच में दुनिया में सोने की कीमतें भी काफी बढ़ी है, जिसका एक कारण शायद स्वयं भारत की बढ़ती मांग रही है। किंतु बढ़ती कीमतें भी भारत की सोने की भूख को कम करने में नाकाम रही है।
भारतवासियों की सोने की इस अनियंत्रित भूख ने भारत के विदेश व्यापार घाटे और भुगतान संतुलन के संकट को भी गंभीर बनाया है। भारत के विदेश व्यापार का घाटा वर्ष 2010-11 में 130.5 अरब डालर की विशाल राशि पर पहंुच गया था। विदेश व्यापार घाटे की यह विशाल खाई कुछ हद तक विदेशी मुद्रा की अन्य चालू प्राप्तियों (जैसे विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भेजा धन) से भरती है किंतु फिर भी घाटा रह जाता है जिसे भुगतान संतुलन का चालू खाते का घाटा कहा जाता है। यह भी तेजी से बढ़ रहा है जिसे पूरने के लिए सरकार को विदेशी कर्जों और विदेशी पूंजी को हर कीमत पर बुलाने पर जोर देना पड़ता है। भुगतान संतुलन का चालू खाते का घाटा वर्ष 2010-11 में 44.4 अरब डालर था, जो 2011-12 में बढ़कर 63.2 अरब डालर रहने का अनुमान है। यह भारत की कुल राष्ट्रीय आय के 3.6 फीसदी के बराबर पहंुच गया है, जो खतरे की घंटी है। गौरतलब है कि पिछली बार 1991 में जब भुगतान संतुलन का बड़ा संकट पैदा हुआ था जिसने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से बड़ा कर्ज लेने और वैश्वीकरण-उदारीकरण की नीतियों को अपनाने के लिए भारत सरकार को मजबूर किया था, तब चालू खाते का घाटा राष्ट्रीय आय का 3 फीसदी था। यह भी साफ है कि इस विशाल घाटे में सोना आयात का बड़ा योगदान है। यदि सोना आयात को बंद कर दिया जाए, तो विदेश व्यापार घाटा और भुगतान संतुलन के चालू खाते का घाटा दोनों काफी कम रह जाएंगे।
सोने का यह अनाप-शनाप आयात भारत देश और इसकी अर्थव्यवस्था के लिए एक ज्यादा बुनियादी रूप से भी नुकसानदेह है। इसका मतलब है कि भारतवासियों की मेहनत से पैदा धन का एक हिस्सा देश के बाहर जा रहा है। बदले में जो मिल रहा है वह बेकाम के धातु के टुकड़े है। सोने मंे निवेश एक तरह का मृत निवेश है। यदि यही धन देश के अंदर उत्पादक कामों में लगता तो देश में ज्यादा रोजगार पैदा होता, धन बढ़ता और आर्थिक प्रगति होती। अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो उसका गुणक प्रभाव होता। अमरीका जैसे देशों की तुलना में भारत के बारे में एक अच्छी बात यह है कि यहां बचत की दर काफी ऊंची है, 30 फीसदी के करीब। किंतु इस बचत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सोना खरीदी के रूप में देश से बाहर चला जा रहा है।
सवाल इस गरीब देश के सीमित संसाधनों के उपयोग का भी है। यह एक विडंबना है कि दुनिया के सबसे गरीब देशों में एक, सबसे ज्यादा कुपोषित और अशिक्षित लोगों का देश, दुनिया में सबसे ज्यादा सोने की खपत करे। उसकी प्राथमिकता लोगों का भोजन, आवास, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य न होकर सोने को खरीदने में प्रकट हो। यह एक घोर विकृति है। पूंजीवाद की विचित्र माया है। यह भी सोचने की बात है कि जो देश धर्म व अध्यात्म का गढ़ माना जाता है, जहां साधुओं, संतो और बाबाओं की कमी नही है, उसी में सोने के प्रति इतनी ललक व चाहत है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा सोनाप्रेमी देश बन जाता है।
भारत में सोने की बढ़ती मांग के पीछे कई कारण हैं। एक तो बढ़ती महंगाई है। महंगाई की ज्यादा दरों के कारण रूपए का मूल्य तेजी से गिरता है और बैंक में या अन्यत्र धन जमा करना अनाकर्षक हो जाता है। इसलिए लोग अपनी बचतें सोने के रूप में रखने लगते हैं, जिसकी कीमतें तेजी से बढ़ने से अच्छा फायदा होता है। सोने के गहनों के प्रति महिलाओं की पारंपरिक ललक का एक कारण उनकी असुरक्षा है। महिलाओं के पास जो गहने हंै, कई बार वही एकमात्र संपत्ति होती है जिस पर उनका अधिकार होता है।
किंतु पिछले कुछ वर्षांे में सोने की मांग में विस्फोट का सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत में धनाढ्य और नक्धनाढ्य वर्ग की अमीरी काफी बढ़ है, जिसने बड़े पैमाने पर अपनी वैध-अवैध कमाई को सोने के रूप में रखना शुरू किया है। नयी व्यवस्था में सट्टात्मक प्रवृत्तियों को जो बढ़ावा मिला है, उसने भी सोने और जमीन की मांग और उनके भावांे को बेहद बढ़ाया है। यानी देश के अमीर लोग अब अपनी कमाई के एक हिस्से से सोना और जमीन-मकान इसलिए नहीं खरीद रहे है कि उन्हें उसकी जरूरत है। बल्कि इसलिए कि इनकी कीमतें तेजी से बढ़ती है और वे घर बैठे बिना कुछ किए चंद सालों में अपनी संपत्ति को दुगना-तिगुना कर सकते है। वायदा बाजार ने भी सोने की कीमतों और सट्टात्मक मंाग को आसमान पर पहुंचाया है।
देश में भ्रष्टाचार और दो नंबरी समानांतर अर्थव्यस्था का जो बोलबाला बढ़ा है, उसका भी संबंध सोने की मांग से है। सोने के साथ सबसे बड़ी सुविधा यह है कि इस छिपाना, गुपचुप ले जाना या लेन-देन आसान है। करोड़ों रूपयों के नोट कहीं रखना आसान नहीं है, किंतु करोड़ांे रूपये का सोना आसानी से बैंक के एक लाॅकर में रखा जा सकता है। दो साल पहले सरकारी एल्युमीनियम कंपनी ‘नाल्को’ का मुख्य कार्यपालन अधिकारी पकड़ाया था तो उसके लाॅकरों से 15 किलो सोना बरामद हुआ था। पता चला था कि वह अपने दलाल के मार्फत घूस में सोने का बिस्कुट या सोने की ईंट ही लेता था। न सूटकेस का झंझट और न नोट गिनने की जहमत! इसलिए जब बाबा रामदेव कहते हैं कि सोने का काले धन से कोई रिश्ता नहीं है, तो वे या तो अपनी समझ की कमी दर्शा रहे हैं या फिर सराफा व्यापारियों का समर्थन जुटाने की सस्ती कोशिश कर रहे हैं।
देशहित में सोने की मांग और हवस को घटाने, हतोत्साहित करने और नियंत्रित करने की जरूरत है। सराफा व्यापारियों की मांगें उचित नहीं है। आखिर जब देश में ज्यादातर वस्तुओं के उत्पादन पर 12 फीसदी उत्पाद कर लग रहा है, तो उनकी इस मांग का क्या औचित्य है कि सोने के गहनों पर 1 फीसदी उत्पाद कर भी नहीं लगे ? बल्कि उत्पाद कर तो बढ़ना चाहिए, क्योंकि स्वर्ण आभूषण एक विलासिता की वस्तु है, प्राथमिकता वाली बुनियादी जरूरत की वस्तु नहीं। आयात शुल्क में वृद्धि भी नाकाफी है। यह और बढ़ना चाहिए। सोने के आयात पर पाबंदी पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
सच कहें तो पिछले दो दशकों में खुद सरकार की उदारीकरण और मुक्त व्यापार की गलत नीतियों के कारण ही आज के हालात पैदा हुए है। देश आजाद होने के बाद सोने की भूख को नुकसानदेह मानकर इसके आयात पर पाबंदी लगाई गई थी और सोने के व्यापार पर भी काफी नियंत्रण लगाया गया था। किंतु 1993 में सोने के आयात पर पाबंदी हटा ली गई और फिर आयात शुल्क भी काफी कम कर दिया गया। जो लोग विदेश यात्रा पर जाते हंै, उन्हें भी लौटते वक्त मामूली शुल्क देकर अपने साथ सोना लाने की छूट दे दी गई। सोने के आयात के पीछे तर्क यह था कि इससे स्वर्ण आभूषण उद्योग और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। किंतु असलियत में निर्यात कम रहे, आयात कई गुना ज्यादा रहा। बैंको और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को सोना रखकर कर्जा देने की इजाजत दी गई। सोने का वायदा कारोबार भी शुरू किया गया। सोने के ब्रांडेड गहनांे पर नाममात्र का 1 फीसदी उत्पाद शुल्क भी पिछले साल के बजट में ही शुरू किया गया, नहीं तो यह पूरी तरह शुल्क मुक्त था। मामूली से आयात शुल्क में भी तैयार आभूषणों के निर्यात के नाम पर बड़ी-बड़ी छूट दी गई। उदाहरण के लिए, इस वर्ष के बजट दस्तावेजों से पता चलता है कि सोने और हीरे-जवाहरात के आयात-शुल्क में माफी से 2010-11 में 41,200 करोड़ रू. तथा 2011-12 में 58,190 करोड़ रू. के राजस्व का नुकसान केन्द्र सरकार को हुआ है।
कुल मिलाकर, उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के कारण देश में जो कई विकृतियों एवं समस्याएं पैदा हुई है, उनमें यह भी एक है। काफी पहले कवि ने हमें चेताया था कि सोने में धतूरे से भी सौ गुना ज्यादा नशा है -
कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
या खावे सो बौराये, वा पावे सो बौराय।।
सोने का यह खतरनाक नशा इंसानांे, समाज, सरकार और देश सबको ले डूब रहा है। इस पर अविलंब रोक लगाने की जरूरत है।
(लेखक आर्थिक-राजनैतिक विषयों पर टिप्पणीकार एवं समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)
