Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘brahminism’ Category

“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।

Read Full Post »

सामाजिक न्याय के प्रखर प्रवक्ता , औरंगाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ट वकील , समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सक्रिय सदस्य साथी प्रवीण वाघ हमारे बीच नहीं रहे । युवक क्रांति दल (युक्रांद) से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले समाजवादी जनपरिषद के संस्थापकों में प्रमुख थे। मराठवाडा विश्वविद्यालय का नाम बाबासाहब अम्बेडकर के नाम पर करने के आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की थी।  आपके पिता चन्द्रमोहन वाघ औरंगाबाद में रिपब्लिकन पार्टी में सक्रिय थे तथा डॉ. अम्बेडकर के निकट सहयोगी थे तथा अम्बेडकर साहब द्वारा शुरु पत्रिका का प्रकाशन करते थे।

प्रवीण वाघ

सामाजिक न्याय के प्रबल प्रवक्ता प्रवीण वाघ

असंगठित मजदूरों के सवाल को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाते थे । वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों के बहुजन समाज पर पड़ने दुष्प्रभाव को वे बखूबी प्रस्तुत करते थे।  कुटुम्बीजन इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति पायें ।

साथी तेरे सपनों को हम मंजिल तक पहुंचायेंगे।

Read Full Post »

गेहूँ की फसल कट चुकी है । बनारस से बेलथरा रोड की संक्षिप्त रेल यात्रा में वे खेत भी अलग से दिखते हैं जहाँ हार्वेस्टर से कटाई के कारण भूसे में कटौती हुई है । उत्तर प्रदेश शासन ने तीन संस्थाओं के जरिए गेहूँ खरीदने की बात की है तथा खुद सरकार के आँकड़े बताते हैं कि उत्पादन का सिर्फ़ पाँचवाँ हिस्सा अब सरकार द्वारा खरीदा जा रहा है । ७ फीसदी अथवा उससे से अधिक ’सिकुड़न’ वाले गेहूँ को खरीदने से इनकार किया जा रहा है । समाजवादी जनपरिषद के महामन्त्री विक्रमा मौर्य याद करते हैं ,’ सरकार इस दावे के साथ हमें गेहूँ का बीज बेचती है कि यह सौ फीसदी जमेगा। इस दावे को सही मान कर हम बीज खरीद लेते हैं लेकिन सौ फीसदी बीज नहीं जमता !’ किसान के बचे रहने के नाम पर घोषित समर्थन-मूल्य (यह आजीविका मूल्य नहीं है) पर खरीदते वक्त मानो सरकार चिंगुरने (सिकुड़ने) लगती है। दरअसल समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीद और  सार्वजनिक वितरण प्रणाली हेतु इस गेहूँ की खरीद का कोई संतुलन बचा नहीं रह गया है। यह बिलकुल खुली बात है कि बिना किसी सर्वेक्षण ऊपर से निर्देश दिया जाता है कि कितने परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे मानना है तथा कितने प्रतिशत को हर साल उसके ऊपर मान कर उस तादाद में कटौती करते जाना है । किसान अपने परिवार की सब जरूरत को पुरा करने के अलावा मेरे जैसे निकम्मे लोगों के लिए भी पैदा करता है। अन्न स्वालम्बन का लाक्ष्य बरसों पहले हासिल कर लेने के बावजूद सार्वजनिक वितरण प्रणाली में श्रेणियां बना दी गई हैं । सार्वजनिक वितरण प्रणाली का नाश करने की दिशा में यह जरूरी कदम माना गया होगा। पूरी आबादी को सस्ते दर पर खिलाने और पैदा करने वाले से ’समर्थन मूल्य’ पर खरीदने की नीयत होती तो सरकार द्वारा घोषित मूल्य अधिकांश उत्पादन की खरीद की जाती।

बनारस से हमारी राज्य समिति में गये रामजनम का कहना है बिजली -पानी जैसे संसाधनों के वितरण में गैर बराबरी को भी मुद्दा बनाना चाहिए। लखनऊ में २०-२२ घण्टे,बनारस में १८-२० घण्टे और देहातों में ४ घण्टे बिजली रहती है।

मर्यादपुर की चट्टी पर दो गाड़ियां हमे पार कर निकल गईं । उन दोनों पर ’फलां परिणय ढिकना’ के पोस्टर लगे थे। साथी सोमनाथ त्रिपाठी ने आश्चर्य के साथ पूछा ,’ लगन शुरु हो गया,क्या?’

हम जिस जीप में बीच की कतार में बैठे थे उसके सामने ( ड्राइवर की लाइन में) बैठे एक स्थानीय पंडिज्जी ने अपनी तरफ़ से हमारा ज्ञान वर्धन किया -”  ’अम्बेडकर – लगन’ शुरु हो चुका है। अम्बेडकर-लगन के कई लाभ हैं । तम्बू-डेरा , रसोइए आदि सहजता से और सस्ते रेट पर मिल जाते हैं। अम्बेडकर-लगन ’खर-मास’ के दुष्प्रभावों से भी मुक्त है । मुझे पसन्द आया अम्बेडकर-लगन का विचार। फसल काट कर खाली हो जाना इस नये प्रकार की लगन में होता है। देवताओं के शयन-काल में विवाह को अशुभ नहीं माना गया।

Read Full Post »

इस चिट्ठे पर मेरी पिछली पोस्ट पर जो टिप्पणियां आई हैं उनके अलावा फ़ेसबुक के जरिए भी कुछ मित्रों ने उस पर चर्चा की है ।  इस बहस में मेरे लेख की आलोचना में जो प्रमुख बाते कही गयी हैं उन्हें सब से पहले यहाँ एक साथ रख रहा हूँ :

* इस आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान क्यों न हो ?

* ये बड़े लोगों की चाल है छोटे लोगों को सत्ता से दूर रखने की.आखिर इनमें से कितनी महिलाएं खुद के बूते यहाँ पहुची हैं…कोई पति देव की वजह से तो कोई अपने फ़िल्मी दुकान से उठकर आया है…और कोई किसी राजघराने की पताका लहरा रही है…….* ये औरतें (सवर्ण) भी तो वैसे ही ही अपना मुकाम पा सकती हैं जैसा की आप कल्पना कर रहे हैं

* जो आज महिला आरक्षण का समर्थन कर रहीं हैं ज्यादातर वही महिलाएं हैं जिन्होंने दलित आरक्षण का विरोध किया था। इसी से समझा जा सकता है कि ये आरक्षण में आरक्षण का विरोध क्यों कर रही हैं।

* ये महिलायें अब क्यों नहीं कह रही कि आरक्षण के ज़रिए स्त्री-पुरुषों को आपस में लड़ाया जा रहा है , समाज को बाँटा जा रहा है ।

* गुस्सा आता है जब कोई किसी चीज को खुद के लिये तो मांगता है परन्तु दूसरों को देने पर तमाम तमाम तर्क पेश करता है ।
* आभा राठोर किस की वकालत करेंगी राठोर की या रुचिका की ?मालकिनें क्या दरियादिल हो कर अपनी कामवालियों को दुख सुनायेंगी ? मैनपुरी की ठकुराइनें क्या फूलन की मौत या बलात्कार पर आँसू बहायेंगी ? महिलाओं को एक वर्ग कहकर हम किसे ठग रहे हैं ?
इन आरोपों , आक्षेपों और आशंकाओं की बाबत बात करने के पहले आरक्षण से जुड़ी कुछ बुनियादी बातों पर गौर करें:
समाज में व्याप्त जाति और लिंग जैसे गैर बराबरी के आधारों पर व्याप्त एकाधिकार को विशेष अवसर (समान अवसर से गैर बराबरी बरकरार रहती है) की मदद से तोड़ने का एक साधन आरक्षण है।
जातिविहीन – लिंगभेदविहीन समाज की दिशा में यह एक साधन होता है । यह साध्य नहीं साधन है।  इस साधन का उद्देश्य इन शोषित वर्गों को महत्वपूर्ण ओहदों पर नुमाइन्दगी देना है , उनकी गरीबी दूर करना या बेरोजगारी दूर करना नहीं (भले ही दूरगामी परिणाम के तौर पर इसका  प्रतिफल यह हो)।
व्यक्ति या समूह जीवन के किसीआयाम में शोषक और किसी अन्य में शोषक हो सकता है। आम तौर पर खुद के या अपने समूह के समूह को शोषण को हम देख पाते हैं किन्तु जिस आयाम में हम शोषक की भूमिका में होते हैं वह नहीं देखना चाहते । मसलन उत्तर प्रदेश और बिहार में सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य अंग्रेजी – हटाओ , अलाभकारी जोत पर टैक्स न देने , जाति- तोड़ो और जातिगत आरक्षण के हक में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे किन्तु नर – नारी समता के कार्यक्रम तथा उसके लिए संगठन बनाने में फिसड्डी रहते थे । बहुत बाद में समता संगठन जैसे राजनैतिक समूहों ने  अपने सक्रिय सदस्यों की आचार संहिता में पुरुष साथियों द्वारा १. घरेलू श्रम-साध्य काम में हिस्सा बँटाना,२.पत्नी को न पीटना जैसी शर्तें जोड़ीं ।
इसी प्रकार मंडल संस्तुतियों के खिलाफ़ फूटे आक्रोश में सवर्ण महिलाओं का एक बड़ा तबका आरक्षण विरोधी भावना से प्रभावित था । ये महिलायें जतिगत पिछड़ेपन का शिकार नहीं थीं।
बिहार के पीरो के पूर्व विधायक तथा लोहिया के अत्यन निकट सहयोगी रामइकबाल बरसी के शब्दों में ’  हमारे समाज में हर जाति की औरत कहारिन है’ । राम इकबालजी इसी लिए किसी भी घर में भोजन के बाद खुद थाली धोते हैं । काशी विश्वविद्यालय परिसर में नरेन्द्रनाथ तिवारी नामक एक चिकित्सक ने अपनी पत्नी वीणा तिवारी की जलाकर हत्या कर दी थी । हरिशंकर तिवारी जैसे जाति के बाहुबली मठाधीशों ने सिर्फ़ हत्यारे पुरुष की जाति देखकर गवाहों को धमकाने , पसन्दीदा जज की अदालत में मामले को डालने में अहम भूमिका अदा की। सामाजिक चेतना के सामूहिक प्रयास से ही दोषी को सजा मिल पायी ।
जगजीवन राम केन्द्र की हर सरकार में मन्त्री रहे और लम्बे समय तक देश के सबसे बड़े दलित नेता थे । इसके बावजूद उनके हाथों सम्पूर्णानन्द की प्रतिमा का अनावरण करने के बाद काशी के कट्टर पंडितों ने उसे गंगा जल से धोया था। जाति और लिंग के भेद मात्र आर्थिक उन्नति से समाप्त नहीं हो जाते हैं । उन्हें समाप्त करने के लिए विशेष प्रयास करने होते हैं ।
कोई पति देव की वजह से तो कोई अपने फ़िल्मी दुकान से उठकर आया है…और कोई किसी राजघराने की पताका लहरा रही है……. बिना आरक्षण के किन आधारों से महिलायें सत्ता में भागीदारी कर पाती थी यह निश्चित गौरतलब बात है ।
सच , गृहणियों और कामवालियों के बीच भी बहनापा होता है । मुम्बई में हुए एक शोध पर गौर करें।
समाज के तमाम शोषित तबकों को एक वर्ग के रूप में संगठित करना आसान नहीं होता। उनमें आपसी द्वन्द्व पैदा करना ,बढ़ावा देना सरल होता है । नक्सलवादी छोटे किसान को भूमिहीन खेत मजदूर का वर्ग शत्रु बता कर लड़ा देता है । इन्हें लड़ा देना आसान है । पूरी खेती घाटे का धन्धा है,यह समझा कर िन दोनों तबकों को एकजुट कर व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना उतना सरल नहीं है, किन्तु वही जरूरी है ।
डॉ. लोहिया सामाजिक नीति पर सच्चे आन्दोलन की बाबत जो कल्पना रख गये उसके दो बिन्दुओं पर गौर करें :
” समाज के दबे हुए समुदायों में सभी औरतों को , द्विज औरतों समेत जो कि उचित ही है , शामिल कर लेने पर पूरी आबादी में इनका (पिछड़ों का) अनुपात ९० प्रतिशत हो जाता है। दबी हुई मानवता का इतना बड़ा समुद्र , हिन्दुस्तान के हर १० में ९ मर्द और औरतें , चुप्पी में ऊँघ रही हैं या , बहुत हुआ तो , जीवन्त प्रतीत होने वाली चिहुँक सुनाई पड़ जाती है । उनके दुबले पतले अंगों पर आर्थिक और राजनीतिक उन्नति से अपने आप कुछ चरबी चढ़ सकती है। “
…… ” इस बात पर बार बार ज़ोर डालना चाहिए कि नीची जातियों के सैंकड़ों लोग , जिन पर अन्यथा ध्यान नहीं जा पाता , उन पर पूर्व नियोजित नीति के द्वारा देना चाहिए , बन्सिबत उन दो वृहत्काया वालों के जो किसी न किसी तरह ध्यान आकर्षित कर ही लेते हैं । “
इन ”दो वृहत्कायों ’ के बारे में जून १९५८ में दिए अपने भाषण में (जाति प्रथा,राममनोहर लोहिया समता विद्यालय न्यास , पृष्ट ७६ ) में डॉ. लोहिया ने बताया है । आज लोहिया की नर्सरी से निकले तीन नेताओं तथा बसपा ने राज्य सभा में जो भूमिका अदा की उसे समझने में शायद इस अनुच्छेद से मदद मिलेगी :
” सारे देश के पैमाने पर अहीर , जिन्हें ग्वाला , गोप भी कहा जाता है , और चमार , जिन्हें महार भी कहा जाता है , सबसे ज्यादा संख्या की छोटी जातियाँ हैं । अहीर तो हैं शूद्र , और चमार हैं हरिजन । हिन्दुस्तान की जाति प्रथा के ये वृहत्काय हैं , जैसे द्विजों में ब्राह्मण और क्षत्रिय ।अहीर, चमार , ब्राह्मण और क्षत्रिय , हर एक २ से ३ करोड़हैं । सब मिलाकर ये हिन्दुस्तान की आबादी का ये के करीब १० से १२ करोड़ हैं । फिर भी इनकी सीमा से हिन्दुस्तान की कुल आबादी के तीन चौथाई से कुछ कम बाहर ही रह जाते हैं । कोई भी आन्दोलन जो उनकी हैसियत और हालत को बदलता नहीं , उसे थोथा ही मानना चाहिए । इन चार वृहत्कायों की हैसियत और हालत के परिवर्तन में उन्हें ही बहुत दिलचस्पी हो सकती है पर पूरे समाज के लिए उनका कोई खास महत्व नहीं है । “
फूलन पर किए गए अत्याचार और उसके द्वारा की गई हत्याएं सभ्य समाज के अनुरूप नहीं थी। अपने क्षेत्र से काफ़ी दूर भदोही आकर जब फूलन ने संसदीय चुनाव में हिस्सा लिया तब उनके प्रतिद्वन्द्वी वीरेन्द्र पहलवान ने मैंनपुरी की विधवाओं को चुनाव में घुमाया था । चुनाव परिणाम फूलन के हक में था। हालांकि पिछड़ी महिला के लिए आरक्षण की उन्हें जरूरत नहीं पड़ी थी।

* गुस्सा आता है जब कोई किसी चीज को खुद के लिये तो मांगता है परन्तु दूसरों को देने पर तमाम तमाम तर्क पेश करता है । - हर अन्याय के खिलाफ़ गुस्सा आना जरूरी है ।

Read Full Post »

राष्ट्र की हिटलरी कल्पना फासीवाद के नाम से कुख्यात है । हिटलर ने ‘नस्ल’ की कथित शुद्धता और यहूदी विद्वेष की विक्षिप्तता को फैलाकर जर्मनी को भीषण बर्बरता और रक्तपात में डुबो दिया और विश्व भर की लांछना का पात्र बना दिया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का धर्म आधारित राष्ट्र भी उसी प्रकार का एक बर्बर उद्देश्य है । हिटलर से तुलना करके या हिटलर का उदाहरण देकर हम संघ-परिवार पर कोई काल्पनिक आरोप नहीं लगा रहे हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गौरव-पुरुष गुरु गोलवलकर ने खुद १९३९ में लिखी अपनी पुस्तक ‘ वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड ‘ ( हम या हमारी राष्ट्रीयता परिभाषित ) ( अब उनके चेले अधिकृत रूप से कहने लगे हैं कि यह उनकी लिखी किताब नहीं है , उनका अनुवाद है ) में कहा था -

नस्ल और इसकी संस्कृति की पवित्रता को बनाए रखने के लिए जर्मनी ने यहूदियों से अपने देश को रिक्त कर दुनिया को स्तम्भित कर दिया । नस्ल का गर्व यहाँ अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पाता है। जर्मनी ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि संस्कृतियों और नस्लों के फर्क जो बुनियाद तक जाते हैं , एक संपूर्ण इकाई में जज़्ब नहीं किए जा सकते । हम भारतीयों के लिए यह एक अच्छा सबक है जिससे लाभ उठाना चाहिए । “

    यह सचमुच बड़े शर्म की बात है कि जिस विद्वेष और क्रूरता के लिए हिटलर का जर्मनी पूरी दुनिया में लांछित हुआ , गोलवलकर ने ने उसी की प्रशंसा की और भारत के लिए उसी हिटलरी रास्ते की सिफारिश की । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुरु गोलवलकर के बताए हुए फासीवाद के रास्ते पर चल रहा है । वह जिस हिन्दू राष्ट्र की बात करता है , वह सिर्फ मुस्लिम विद्वेष तक सीमित नहीं है । स्त्रियों और शूद्र कही जाने वाली जातियों , जिन्हें सबसे अधिक धर्माचार्यों द्वारा अनुमोदित क्रूर प्रथाओं और परम्परागत ऊँच-नीच का शिकार होना पड़ा है , की दुर्दशा कम होने के बजाए , धर्म आधारित राष्ट्र में काफ़ी बढ़ जाएगी । सती प्रथा और बाल-विवाह पर रोक सम्बन्धी कानून हटाने और वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने की मांग धर्म-संसद के प्रस्तावों में होने लगी थीं । स्त्रियों को सम्पत्ति में हक देने वाले हिन्दू कोड बिल का भी गोलवलकर ने विरोध किया था ।

   इसलिए यदि आप कूप मंडूकता , धर्मान्धता , स्त्री उत्पीड़न और दलितों तथा पिछड़ों की सामाजिक दुर्दशा को देश की नियति नहीं बनाना चाहते तो हिन्दू राष्ट्र के नारे से सतर्क रहे। हम किस प्रकार पूजा पाठ करें , त्योहार किस ढंग से मनाएं , धार्मिक प्रतीकों का क्या अर्थ ग्रहण करें और दूसरे धर्म के अनुयायियों के साथ क्या व्यवहार करें , इन बातों को संघ परिवार और महंत मठाधीश नियंत्रित करनी की कोशिश करते हैं । इनके चलते हमारे धार्मिक आचरण की स्वाधीनता सुरक्षित नहीं है । ऐसे तत्वों को धार्मिक मान्यता और राजनैतिक समर्थन देना बन्द करें नहीं तो ये हमें एक अन्धी सुरंग में पहुंचा देंगे ।

    दुनिया के कई धर्म आधारित राष्ट्रों में जनता का उत्पीड़न और रुदन हमसे छिपा नहीं है। धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के बारे में हम जानते हैं कि इस्लामियत के नाम पर कैसे कठमुल्लों , सामन्तों , फौजी अफसरों , भ्रष्ट नेताओं और असामाजिक तत्वों का वह चारागाह बन गया है । क्या हम भारत में भी उसी दुष्चक्र को स्थापित करना चाहता हैं ? धर्म आधारित राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी अवधारणा है । किसी धर्म आधारित राष्ट्र में लोकतंत्र कभी पनप नहीं सकता । संविधान , न्यायपालिका , और प्रेस का हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर अपमान कट्टरपंथियों के लोकतंत्र विरोधी रुख की ही बानगी है । गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

[ दोनों चित्रों का स्रोत :  विकीपीडिया ]

Read Full Post »

गांधी बनाम अम्बेडकर की बहस में गांधी जी की धारा के दो प्रमुख उत्तराधिकारियों – डॉ. लोहिया और जयप्रकाश नारायण के आन्दोलनों में सामाजिक परिवर्तन के कार्यक्रमों को नजरअन्दाज करने पर बहस अपूर्ण रहेगी । संपूर्ण क्रांति के आन्दोलन के बीच लोकनायक जयप्रकाश की उपस्थिति में तोड़ी गयी जनेऊ का ढेर लग जाता था तथा हजारों नवयुवकों ने जातिसूचक चिह्न त्याग दिये थे । समाजिक विभाजन कम से कम हो इसलिए डॉ. लोहिया ने ‘साठ संकड़ा’ के सिद्धान्त में औरत , आदिवासी , दलित और पिछड़ों को एक ही राजनैतिक परिभाषा में संगठित करने के प्रयास किए । उनकी पार्टी में हर स्तर साठ सैंकड़ा का सिद्धान्त लागू होने के कारण दलितों और पिचड़ों का नेतृत्व भी पैदा हुआ ।

    यह निश्चित तौर पर स्पष्त रहना चाहिए कि इस बहस में गांधी जी की पैरवी में मुखर हो रहे धार्मिक सहिष्णुता विरोधी दल तथा नव-साम्राज्यवाद का बंदनवार सजा कर स्वागत करने वाले दल के कंधे से कंधा मिलाना जयप्रकाश , विनोबा तथा लोहिया के अनुगामियों के लिए संभव नहीं है । इसे प्रकार अम्बेडकरवादी स्मूहों को भी नयी आर्थिक नीति के सन्दर्भ में एक स्पष्ट सोच प्रकट करनी होगी ।

    गांधी बनाम अम्बेडकर की बहस में हिस्सा लेने वालों के लिए गांधी जी की यह सलाह सर्वथा उचित है – ” हम बड़ों के बल का अनुसरण करें , उनकी कमजोरी का कभी नहीं । बड़ों की लाल आँखों में अमृत देखें , उनके लाड़ से दूर भागें , मोहमयी दया के वश होकर वे बहुत कुछ करने की इजाजत दें , बहुत कुछ करने को कहें , तब लोहे जैसे सख्त बनकर उससे इनकार करें । मैं एक बार यदि कहूँ कि हरगिज झूठ न बोलना , मगर मुश्किल में पड़कर झूठ के सामने आँखें बन्द कर लूँ , तब मेरी आँखों की पलकों को पकड़कर जोर से खोल देने में तुम्हारी भक्त होगी , मेरे इस दोष को दरगुजर करने में द्रोह होगा । ” ( पत्र – मगनभाई देसाई को, महादेवभाई की डायरी , खण्ड तीन, पृ. ११२  ) *

 

Read Full Post »

Kishan Pattanayak    ‘हरिजन’ शब्द शाश्वत रहे , यह गांधी जी नहीं चाहते थे । ‘अछूत’ शब्द के प्रति उनका विरोध था , इसीलिए वे यहाँ तक मानते थे कि ‘ स्वराज्य में दफ़ा १२४ राजद्रोह के लिए नहीं होगी , परन्तु हरिजनों को अछूत कहने वाले के विरुद्ध होगी।’ ( महादेवभाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. १९४ )

    हरिजन शब्द के प्रति अपने लगाव के बावजूद दलितों की इस शब्द के प्रति आपत्ति को वे तरजीह देते थे । मद्रास के शंकर नामक एक कार्यकर्ता ने वहाँ के दलितों के लिए हरिजन शब्द के बारे में आपत्ति की बाबत गांधी जी को लिखा कि वे हरिजन कैसे कहलाए ? हम तो हरजन हैं हरिजन नहीं । शंकर ने लिखा था ,इन लोगों को यदि हिन्दू कहें , तो इन्हें अच्छा लगेगा । आप इजाजत दीजिए ।’ उसे गांधी जी ने लिखा ,’ हरिजन नाम पर आपत्ति होने पर के लिए मुझ अफ़सोस होता है । तुम्हारे मित्रों को जो नाम पसन्द हो , वह इस्तेमाल कर सकते हो । मगर उन्हें यह समझाना कि मेरे मन में विष्णु य शिव का जरा भी ख्याल न था । मेरे लिए तो इसका अर्थ ‘भगवान का आदमी’ ही होता है । विष्णु , शिव या ब्रह्मा में मैं कोई भेद नहीं मानता । सभी ईश्वर के नाम हैं ।मगर इस मामले में उनके निर्णय पर अमल करना चाहिए ।’ ( वही , पृ. १३७ ) 

    २९ अक्टूबर , १९३२ को एक बंगाली सज्जन का पत्र गांधी जी को मिला, ‘आप ‘हरिजन’ नाम देकर अछूतों का दूसरा नाम कायम करना चाहते हैं । इन्हें नाम देने की बात ही क्यों न छोड़ दी जाए ? उसके जवाब में गांधी जी ने लिखा- ‘हरिजन’ शब्द अछूत भाइयों को ध्यान में रखकर हमेशा के लिए इस्तेमाल करना हो , तो आपका ऐतराज ठीक हैओ ।मगर अभी तो उन्हें अलग करके दिखलाए बिना काम नहीं चल सकता ।साथ ही मुझे यह लगता है कि ‘अछूत’ या उससे मिलते-जुलते देशी भाषाओं में काम में लिए जाने वाले दूसरे शब्द उनके लिए इस्तेमाल करना अब उचित नहीं है।’ ( वही, पृ. १५५ )

    गांधी जी ने सवर्णों के लिए भी एक नाम दिया था । अहमदाबाद में सवर्णों की एक सभा में उनके भाषण में यह नाम आया है । ‘ मेरे लिए अछूत , यदि हम अपने से (सवर्णों से ) तुअलना करें , तो हर्जन है – भगवान का आदमी और हम दुर्जन हैं ।अछूतों ने सारे श्रम करके , शोणित सुखाकर तथा अपने हाथ गंदे करके हमें आराम और सफाई से रहने की सुविधा दी है । —– यदि हम चाहें तो अब से भी खुद हरिजन बन सकते हैं , लेकिन इसके लिए हमें उनके प्रति किये गये पापों का प्रायश्चित करना पड़ेगा ।’ (महात्मा गांधी ,अहमदाबाद के सवर्णों को , यंग इण्डिया ,६ अगस्त ,१९३१,पृ. २०३ )

    समतावादी नेता किशन पटनायक का ‘हरिजन बनाम दलित’ , नाम की इस बहस के सन्दर्भ में ठोश सुझाव है कि ‘हरिजन’ शब्द अछूतों के लिए था । जिस हद तक अछूत नहीं रह गये हैं  उस हद तक हरिजन शब्द भी हटाना चाहिए और अगर प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से सवर्ण जातियाँ अस्पृश्यता को चलाए रखना चाहती हैं तो गांधी के द्वारा प्रयुक्त दूसरे शब्द का इतेमाल व्यापक होना चाहिए और सभी उच्च जातियों को दुर्जन जातियाँ कह कर पुकारना चाहिए ।—-’दलित’ शब्द की विशेषता यह है कि स्वत: स्फूर्त ढंग से शिक्षित , सचेत हरिजन समूह इस शब्द के साथ जुड़ रहे हैं ।’ ( हरिजन बनाम दलित,सं राजकिशोर ) यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि इस वर्ग के बड़ी संख्या में साधारण ग्रामीण आज भी अपनी जाति का नाम न बता कर खुद को हरिजन कहते हैं । क्या इसका यह कारण है कि ग्रामीण समाज में अस्पृश्यता समाप्त नहीं हुई है और इस कारण गांधी जी द्वारा दिया गया नाम सवर्णों से बताने में एक तरह की सुरक्षा का भाव छिपा होता है ?

 

[ जारी ]

भाग १

भाग २

भाग ३

 भाग ४

 भाग ५

   

Read Full Post »

      गांधी जी और कांग्रेस ने दूसरी गोलमेज वार्ता के बाद पहली बार डॉ. अम्बेडकर को दलितों के प्रतिनिधियों के रूप में मान्यता दी । इसी लिए पूना करार में डॉ. अम्बेडकर को एक पक्ष बनाया गया । ये दोनों विभूतियाँ दलित समस्या के प्रति एक दूसरे के दृष्टिकोण से अच्छी तरह वाकिफ़ थीं । यरवदा जेल में कार्यकर्ताओं से बातचीत में गांधी जी ने स्पष्ट शब्दों में इन मतभेदों को प्रकट किया है । ‘ प्रधानमन्त्री के खिलाफ यह लड़ाई ( पृथक निर्वाचन के विरुद्ध उपवास ) न की होती , तो हिन्दू धर्म का खात्मा हो जाता । अलबत्ता , अभी तक हम लोगों की आपसी लड़ाई तो खड़ी ही है । आज अम्बेदकर चार करोड़ लोगों के लिए नहीं बोलते । मगर जब इन चार करोड़ में शक्ति आयेगी , तब वे सोच विचार नहीं करेंगे । इन चार लोगों का मन भगवान पल भर में बदल सकता है और वे मुसलमान भी बन सकते हैं । लेकिन ऐसा न हो तो वे चुन – चुन कर हिन्दुओं को मारेंगे । यह चीज मुझे अच्छी नहीं लगेगी , पर मैं इतना जरूर कहूँगा कि सवर्ण हिन्दू इसी लायक थे । ‘ गांधीजी की मान्यता थी कि सामाजिक और आध्यात्मिक स्तर पर उनके द्वारा लिए जा रहे कार्यक्रम का विकल्प दलितों को राजनैतिक सत्ता दिलाकर वैधानिक परिवर्तन कराना नहीं हो सकता । मंदिर प्रवेश और सहभोज के कार्यक्रमों में डॉ. अम्बेडकर की दिलचस्पी कम थी , लेकिन गांधी जी इन कार्यक्रमों को करोड़ों आस्तिक दलितों की दृष्टि से और हिन्दू समाज की एकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते थे । डॉ. अम्बेडकर की नीति तथा उनके स्वतंत्र नेतृत्व का गांधी जी पर दबाव था । इसी प्रकार गांधी जी के नेतृत्व का डॉ. अम्बेडकर पर दबाव था । गांधी जी ने पूना करार के बाद एक बार कहा था , ‘ मैं हरिजनों का कम छोड़ दूँ ,तो अम्बेडकर ही मुझ पर टूट पड़ें ? और जो करोड़ों बेजुबान हरिजन हैं , उनका क्या हो ? ” पूना करार के लिए डॉ. अम्बेडकर और गांधी जी की वार्ताओं के जो दौर चले थे उसका डॉ. अम्बेदकर ने अपनी पुस्तक में विवरण बिलकुल नहीं दिया है , लेकिन महादेवभाई की डायरी ने उस दौर के इतिहास को दस्तावेज का रूप दिया है । इन वार्ताओं के दरमियान डॉ. अम्बेडकर ने गांधी जी से कहा था , ‘ मगर आप के साथ मेरा एक ही झगड़ा है , आप केवल हमारे लिए नहीं , वरन कथित राष्ट्रीय हित के लिए काम करते हैं । आप सिर्फ़ हमारे लिए काम करें , तो आप हमारे लाड़ले वीर ( हीरो )  बन जाँए । ‘ ( महदेवभाई की डायरी , खण्ड दो , पृष्ठ ६० ) पूना करार पर सहमति के तुरन्त पश्चात डॉ. अम्बेडकर गांधी जी से जेल में मिलने आये , तब जो संवाद हुए वे इस प्रकार हैं-

    ठक्कर बापा – ‘अम्बेडकर का परिवर्तन हो गया ‘

    बापू बोले – ‘ यह तो आप कहते हैं । अम्बेडकर कहाँ कहते हैं ? “

    अम्बेडकर – ‘ हाँ, महात्मा हो गया । आपने मेरी बहुत मदद की । आपके आदमियों ने मुझे समझने का जितना प्रयत्न किया , उसके बनिस्पत आपने मुझे समझने का अधिक प्रयत्न किया । मुझे लगता है कि इन लोगों की अपेक्षा आपमें और मुझमें अधिक साम्य है । ‘

    सब खिलखिलाकर हँस पड़े । बापू ने कहा , ‘ हाँ ‘ । इन्हीं दिनों बापू ने भी कहा था कि , ‘ मैं भी एक तरह का अम्बेदकर ही तो हूँ ? कट्टरता के अर्थ में । ‘ ( वही , पृ. ७१ )

    पूना करार के बाद के दिनों में इन दोनों विभूतियों के निकट आने की कफ़ी संभावना थी । गांधी जी की प्रेरणा से बने अस्पृश्यता निवारण मंडल की केन्द्रीय समिति में अम्बेडकर ने रहना मंजूर किया था । इस संस्था के उद्देश्य निर्धारित करने के संदर्भ में डॉ. अम्बेडकर द्वारा समाज व्यवस्था की बाबत अपनी पैनी समझदारी प्रकट करने वाले सुझाव दिए । बाद में जब उक्त मंडल के व्यवस्थापन में दलितों की भागीदारी की बात आयी तब गांधी जी ने कहा कि प्रायश्चित करने वाले सवर्ण ही इस मंडल में कर्ज चुकाने की भावना से रहेंगे । कर्जदार को समझना चाहिए , कि उसे अपना ऋण कैसे चुकाना है । डॉ. अम्बेडकर के मन पर इन रवैए का प्रतिकूल असर पड़ा ।

[ जारी ]

भाग १

भाग २

भाग ३

भाग ४

 

Read Full Post »

जहाँ तक मनुस्मृति , गीता आदि ग्रन्थों के दलित विरोध को पुष्ट करने का प्रश्न है , गांधी जी का दृष्टिकोण स्पष्ट है ।उन्हें यह विश्वास था कि वे हिन्दू धर्म का एक सुधरा स्वरूप भारतीय समाज से ग्रहण करवा लेंगे । उनके दृष्टिकोण को प्रकट करने वाला निम्नलिखित पत्र अलीगढ़ विश्वविद्यालय के संस्कृत के प्रोफेसर हबीबुर रहमान को लिखा गया है । इस पत्र में उन्होंने लिखा , ” हिन्दू धर्म की खसूसियत यह है कि उसमें काफी विचार स्वातंत्र्य है । और उसमें हर एक धर्म के प्रति उदार भाव होने के कारण उसमें जो कुछ अच्छी बातें रहतीं हैं , उनको हिन्दूधर्मी मान सकता है । इतना ही नहीं , परन्तु मानने का उसका कर्तव्य है ।ऐसा होने के कारण धर्म ग्रन्थों के अर्थ का दिन-प्रतिदिन विकास होता रहा है । हिन्दू धर्म के नाम से प्रचलित ग्रन्थों में जो कुछ लिखा गया है , वह सबके सब धर्मवचन हैं , ऐसा नहीं है । वेदपाठ सुननेवाले शूद्र के कान में गरम सीसा डालने की बात अगर ऐतिहासिक मानी जाए , तो मैं उस धर्म को मानने के लिए हरगिज तैयार नहीं हूँ और ऐसे असंख्य हिन्दू हैं ,जो उसे धर्म वचन नहीं मानते हैं । हिन्दू धर्म के लिए एक कसौटी रखी गयी है , जिसको एक बालक भी समझ सकता है । जो बुद्धिग्राह्य वस्तु नहीं है और बुद्धि से विपरीत है , वह कभी धर्म नहीं हो सकती है । और जो सत्य और अहिंसा के विपरीत है , वह भी धर्म नहीं हो सकती ।” ( महादेवभाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. १७३ – १७४ )

    यरवदा जेल में मथुरादास नामक कार्यकर्ता को समझाते हुए गांधी जी ने कहा , “ गुलामों से बदतर – इन लोगों को जानवर बनाया और इनका हमने यह धर्म बना दिया कि ये लोग अपने कर्मों का कुफल भोगते हैं । यह तो धर्म का राक्षसी स्वरूप है । हिन्दू धर्म का अगर यह अर्थ हो तो मैं भी गीता ,  मनुस्मृति सबको जला डालूँ । ( महादेवभाई की डायरी , खण्ड तीन , पृ. २६९  )

    अस्पृश्यता को पाप का फल माननेवाले लोग कर्म मार्ग का सबसे बद़्आ अनर्थ करते हैं , ऐसा गांधी जी मानते थे । २५ जुलाई १९३४ को लखनऊ में एक आम सभा में गांधी जी ने कहा , ” धर्म के नाम पर दुनिया भर में अस्पृश्यता नहीं देखी है । अमरीका और दक्षिण अफ़्रीका में गोरे काले के बीच इस प्रकार का तिरस्कार और घृणा है लेकिन उसे वे धर्म कार्य नहीं कहते । हिन्दुओं ने ठेका ले रखा है । चाहे जैसा शौचाचार का पालन करने वाले छह करोड़ लोगों के साथ अस्पृश्यता और घृणा का बर्ताव किया जाता है , जैसे डॉ. अम्बेडकर ।सवर्ण अकिंचन का जो स्थान समाज में है वह अम्बेदकर का नहीं है । सवर्णों के बुद्धिमान के साथ अम्बेडकर बैठ सकते हैं । वे बुद्धि से इतने तीव्र हैं कि किसी से कम नहीं । हरिजन सेवा के लिए उनमें त्याग और बहादुरी भी है । इतना आपको सुनाना चाहता हूँ कि हमारे बीच इस सेवाकार्य में मतभेद होने पर भी उनकी बुद्धि , त्याग व बहादुरी के बारे में मुझे कोई शंका नहीं है । उनके विषय में कहना कि उनका पापी योनि में जन्म है ? चाहे जितना प्रायश्चित करें वे अस्पृश्य रहेंगे , पाप धुलेंगे नहीं ? इससे बड़ा कोई पाप नहीं है , कर्ममार्ग का इससे बड़ा अनर्थ मेरी नजर में कोई नहीं है । ” महादेवभाई की डायरी (गुजराती),खण्ड-२०, पृ ६३-६४ ) ।

    डॉ . अम्बेडकर और महात्मा गांधी के बीच दलितों के नेतृत्व को लेकर संघर्ष था । फरवरी १९३७ में हुए प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन परिणामों के फलस्वरूप डॉ. अम्बेडकर ने ” कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के साथ क्या किया ” नामक पुस्तक दलित और विदेशी पाठकों के लिए लिखी । इन चुनावों में अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित १५१ सीटों में से कांग्रेस ने ७३ सीटें जीतीं ।इन ७३ सीटों में से अनुसूचित जाति के बहुमत से जीती गयीं ३८ सीटें थीं । डॉ. अम्बे्डकर ने चुनाव के कुछ माह पूर्व ही इन्डिपेण्डेण्ट लेबर पार्टी का गठन किया था । इस पार्टी ने सिर्फ महाराष्ट्र में चुनाव लड़ा जहाँ १५ सुरक्षित सीटों में से १३ पर उसकी जीत हुई  तथा २ सामान्य सीटें भी इसने हासिल कीं थीं । सिवा एक गाली के इस पुस्तक के निष्कर्षों को ही सुश्री मायावती दोहरा रही हैं ।” जाति तोड़ो : समाज जोड़ो ” का “आन्दोलन ” चला रहे श्री कांशीराम जाति तोड़ने के डॉ. अम्बेदकर द्वारा सुझाये गये चार कार्यक्रमों के सन्दर्भ में क्या कर पाए हैं ? यह उन्हें बताना चाहिए । डॉ. अम्बेडकर के अनुसार जाति-प्रथा के नाश के लिए १. अन्तर्जातीय विवाह – सवर्ण-अवर्ण ,२. धर्म की चिकित्सा ( विषमता बढ़ाने वाले तत्वों की आलोचना) ,धर्मान्तरण तथा ४. दलितों की सामाजिक-आर्थिक उन्नति – ये चार कार्यक्रम बताये गए थे ।

[ जारी ]

भाग १

भाग २

भाग ३

Read Full Post »

    लोकनायक जयप्रकाश और महात्मा गांधी के जीवन और विचार यात्राओं के विकासक्रम को नजरअन्दाज करके विसंगतिपूर्ण उद्धरण प्रस्तुत किए जाँए तो बहुत आसानी से जे.पी को मार्क्सवादी और गांधीजी को जाति – प्रथा का पक्षधर होने के भ्रामक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं । गांधी जी को इस प्रकार की विसंगतियों की परवाह नहीं थी । उनकी हर मौलिक ( किसी अन्य व्यक्ति द्वारा सम्पादित अथवा संकलित नहीं ) पुस्तक में ” पाठकों से ” निवेदन में यह स्पष्ट कहा जाता है कि ” सत्य की खोज ” में मैंने कई विचारों का त्याग किया है और नयी चीजें सीखीं हैं । सुधी पाठक , यदि उन्हें मेरी दिमागी दुरुस्ती पर भरोसा हो तो एक ही विषय पर बाद की तिथि में कही गयी बाद की बात को ही ग्रहण करेंगे । जे.पी. मेरी विचार यात्रा  में इसी प्रकार की सावधानी बरतने का पाठकों से आग्रह करते हैं । वर्णाश्रम का जन्मना – कर्मणा सिद्धान्त , जाति – प्रथा तथा रोटी – बेटी व्यवहार के सन्दर्भ में गांधी जी के विचार – आचार के विकासक्रम को उपर्युक्त सावधानी के साथ ही समझा जाना चाहिए । वर्तमान समय में बुद्धिवादियों का एक समूह सती – प्रथा और वर्णव्यवस्था का पक्षधर है । कुछ राजनैतिक हल्कों में इस समूह को ‘हिन्दू नक्सलाइट’ नाम दिया गया है ( धरमपाल ,बनवारी आदि) ।  “गांधी बनाम अम्बेडकर” की बहस के बहाने इन लोगों ने वर्णव्यवस्था के पक्ष में तथा जाति प्रथा को मजबूत करने के हेतु से गांधी जी के कुछ अद्धरण प्रस्तुत किये हैं । ऐसा करना उनकी बौद्धिक बेईमानी का परिचायक है ।

    गांधी जी वर्णव्यवस्था का आधार जन्मना और कर्मणा दोनों मानते थे । पुश्तैनी गुणों के संरक्षण की अपनी परिकल्पना के कारण उन्होंने अपने वर्न में विवाह को कफी समय तक इष्ट माना । हालांकि रोटी-बेटी के प्रतिबन्ध हिन्दू धर्म के अविभाज्य अंग नहीं हैं ऐसा उनका मानना था । अस्पृश्यता के मसले पर कांग्रेस ने हिन्दू महासभा को सहयोगी बनाया था । डॉ. अम्बेडकर ने इसकी आलोचना की है । परन्तु महामनाअ मालवीय द्वारा साम्प्रदायिकता का विरोध तथा काशी विश्वविद्यालय में दलित छात्र-छात्राओं के पठन-पाठन तथा छात्रावासीय जीवन में आनेवाली जातीय-विभेद तहा छूआछूत की कठिनाइयों को दूर करने उनके द्वारा स्वयं पहल करने के उदाहरण से इस ‘सहयोग’ का सकारात्मक पहलू प्रकट होता है। काशी विश्वविद्यालय के दो चर्चित पूर्व विद्यार्थी श्री रामधन ( अब स्वर्गस्थ)  और स्व. जगजीवनराम के छात्र जीवन के अनुभव इसके प्रमाण हैं । परस्पर सम्मान के बावजूद महामना और गांधी जी के बीच रोटी – बेटी के प्रतिबन्ध के सन्दर्भ में मतभेद था । कलकत्ता की एक महिला कार्यकर्ता ने गांधी जी से इस मतभेद की बात पूछी थी । उसे गांधी जी ने उत्तर दिया – ” रोटी – बेटी का प्रतिबन्ध हिन्दू-धर्म का अविभाज्य अंग नहीं है । यह रूढ़ि हो गई है । हरिजनों और दूसरी जातियों के बीच हरगिज भेद नहीं रचा जा सकता है ( महादेव भाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. ११७ ) । सोनार जाति के एक सज्जन ने अन्तर्जातीय विवाह करने के सन्दर्भ में गांधी जी से व्यक्तिगत सलाह मांगी थी । गांधी जी ने उन्हें लिखा,”जात-पाँत की पाबन्दियों का धर्म के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । यह सही है कि वह हिन्दू धर्म में बहुत समय से चली आ रही रूढ़ि बन गयी है । मगर रूढ़ियां तो समय – समय पर बदलती ही रहती हैं ।” ( महादेव भाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. १५५ ) । एक आर्यसमाजी श्री धर्मदेव ने वर्णाश्रम के सन्दर्भ में यरवदा जेल में १७ -१-१९३३ को गांधीजी से लम्बी बातचीत हुई थी । वर्णाश्रम पर बोलते हुए गांधी जी ने कहा ” मेरी तो आजकल साधना चल रही है ।इस मामले में मैं आत्मविश्वास से नहीं बोल सकता क्योंकि मेरी साधना थोड़ी है । ” ( महादेवभाइ की डायरी खण्ड – ३ ,पृ. ६१ ) उसी दिन लेडी टेकरसी ने गांधी जी से मिश्र विवाह की बात छेड़ी औए कहा ” ये सनातनी इस मिश्र विवाह से बहुत डर गए हैं। ” गांधी जी ने कहा – ” अब यह भी मैं समझा दूँ । आज अस्पृश्यता के सिलसिले में मैं इसका प्रचार नहीं करता । पर इसमें कोई शक नहीं कि यह चीज मुझे पसन्द है । इसी चीज के बारे में निरन्तर विचार चलते रहते हैं और मेरे विचार अधिकाधिक स्पष्ट होते जा रहे हैं । मेरे सामने सवाल किया जाए तब जवाब देते-देते भी मेरे विचारों में स्पष्टता बढ़ती रहती है । ” ( महादेवभाई की डायरी , भाग – ३ , पृ. ६६-६७ ) । सुरेश बनर्जी नामक एक कार्यकर्ता ने लिखा कि बंगाल में जात-पांत टूटे यही अस्पृश्यता निवारण कहलाएगा । उन्हें गांधीजी ने लिखा – ” मैं आप से इस बारे में पूरी तरह सहमत हूँ कि जातियों को नष्ट होना ही पड़ेगा । लेकिन यह मेरी जिन्दगी में होगा या नहीं , यह मैं नहीं जानता। इन दोनों मुद्दों को  एक दूसरे से मिलाकर हमें दोनों को बिगाड़ना नहीं चाहिए । अस्पृश्यता आत्मा का हनन करने वाला पाप है । जात-पांत सामाजिक बुराई है । आप अपनी हमेशा की लगन के साथ जात-पांत से भिड़ जाइए । इसमें आपको मेरा अच्छा सहयोग मिलेगा ।” ( महादेवभाई की डायरी ,खण्ड दो , पृ. १०४ ) । इसी दौर में वर्ण व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप के बारे में गांधी जी ने १४ – २ – १९३३ को कहा – ” हम, सब शूद्र हो गए हैं इस अर्थ में मैं अम्बेडकर से सहमत हूँ ।”( महादेवभाई की डायरी खण्ड तीन , पृ, – १४३ ) । डॉ. अम्बेडकर ने मई १९३६ के एक लेख में गांधी जी के इस विषय पर दृष्टिकोण के सन्दर्भ में लिखा था , ” हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए कि उन्होंने जिस तरह जाति पर विश्वास करना छोड़ दिया है , उसी तरह वे वर्ण में विश्वास करना छोड़ देंगे । ” ( राष्ट्रीय सहारा , २४-४-९४ द्वारा उद्धृत डॉ. अम्बेडकर का मई १९३६ का लेख )

    १९४५ से गांधी जी ने घोषित कर दिया था कि वे सिर्फ उन विवाहों में शामिल होंगे जिनमें एक पक्ष हरिजन हो । इस लेखक के माता-पिता का विवाह अन्तर्जातीय और अन्तरप्रान्तीय था – गांधी जी ने उन्हें आशीर्वाद के पत्र में लिखा कि अन्तरप्रान्तीय विवाह होने के कारण तुम्हें न्यूनतम उत्तीर्ण होने के अंक दूंगा लेकिन प्रथम श्रेणी के अंक तो सवर्ण-अवर्ण विवाह को ही मिलेंगे । सवर्ण दलित विवाहों के सन्दर्भ में ७ – ७ – १९४६ के ‘हरिजन ‘ में गांधीजी ने लिखा ” ऐसे विवाहों की अन्तिम कसौटी यह है कि वे दोनों पक्षों में सेवाभाव विकसित करें । ऐसे विवाह से जुड़ी रूढ़िजन्य कठिनाइयाँ हर अन्तर्जातीय विवाह द्वारा किसी हद तक दूर होती जाएंगी । अन्तत: एक ही जाति रह जाएगी जिसे हम भंगी के सुन्दर नाम से जानते हैं – भंगी यानी सुधारक अथवा गन्दगी को दूर करनेवाला । हम सब प्रार्थना करें कि ऐसा मंगल-प्रभात शीघ्र होगा ।” ( कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गांधी , खण्ड – ८४ , पृ. ३८८-३८९ ) । जातियों के उन्मूलन के बाद वर्गों का  विभाजन आड़ा ( हॉरिज़ॉन्टल) होगा ,खड़ा (वर्टिकल) नहीं – गांधीजी ने ऐसी कल्पना की है ।

[ जारी ]

भाग १

भाग २

 

Read Full Post »

Older Posts »

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 2,815 other followers

%d bloggers like this: