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Archive for the ‘capitalism’ Category

1991 से भारत में जिस आर्थिक नीति को घोषित रूप से लागू किया गया है उसे द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों से लेकर 1990 आते-आते सोवियत यूनियन के ध्वस्त होने जैसी घटनाओं के संदर्भ में ही समझा जा सकता है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी शोषण के पुराने रूप पर एक हद का विराम लग गया। भारत समेत दुनिया के अनेक देश साम्राज्यवादी नियंत्रण से आजाद हो गये जिन पर पुराने तरह तक आर्थिक नियंत्रण असंभव हो गया। सोवियत यूनियन एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा और स्वयं यूरोप के बड़े भू-भाग पर इसका नियंत्रण काफी दिनों तक बना रहा। इसी पृष्ठभूमि में ब्रेटनवुड्स संस्थाएं – विश्व बैंक, अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन – 2 जुलाई 1944 में अस्तित्व में आयीं, जिनका मूल उद्देश्य युद्ध से ध्वस्त हो चुकी पश्चिमी यूरोप और जापान की अर्थव्यवस्थाओं को पटरी पर लाकर एक हद तक संसार पर इनके वर्चस्व को फिर से स्थापित करना था।
पश्चिमी वर्चस्व को कायम रखने का यह प्रयास चल ही रहा था कि रूस और चीन में भारी आर्थिक बदलाव आये जिसने पश्चिमी ढ़ंग के औद्योगिक विकास के लिए एक संजीवनी का काम किया। चीन में कई उथल-पुथल, जैसे ‘सांस्कृतिक क्रान्ति’, ‘बड़ा उछाल’ (ग्रेट लीप) आदि के बाद देंग द्वारा कम्युनिश्ट राजनीतिक सत्ता के तहत ही पूंजीवाद की ओर संक्रमण शुरू हुआ और रूस में, 1990 आते आते थोड़े ही समय में पूरी कम्युनिश्ट व्यवस्था धराशायी हो गयी।
सोवियत व्यवस्था के अंतर्विरोध
रूस के ऐसे अप्रत्याशित बदलाव के निहितार्थ को समझना जरूरी है। रूस ने अपने सामने वैसे ही औद्योगिक समाज के विकास का लक्ष्य रखा जैसा औद्योगिक क्रान्ति के बाद पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में विकसित हुआ था। दरअसल रूस ने तेजी से इस दिशा में अमेरिका से आगे निकलने का लक्ष्य अपने सामने रखा था। लेकिन आधुनिक उद्योगों के लिए पूंजी संचय की प्रक्रिया का समतामूलक समाज के लक्ष्य से इतना विरोध था कि इस व्यवस्था पर असह्य दबाव बना रहा। मजदूरों पर काम का बोझ बढ़ाने के लिए ‘पीस रेट’1 की असह्य (तथाकथित स्टैखनोवाइट) व्यवस्था लागू की जाने लगी। किसानों की जमीन को जबर्दस्ती सामूहिक फार्मों के लिए ले लिया गया और उन्हें एक नौकरशाही के तहत श्रमिक की तरह कठिन शर्तों पर काम करने को मजबूर किया गया। कृषि के अधिशेष (surplus) को उद्योगों के विकास के लिए लगाया जाने लगा। इससे उद्योगों के लिए तो पूंजी संचय तेज हुआ लेकिन चारों  ओर पार्टी और इससे जुड़ी नौकरशाही के खिलाफ इतना आक्रोश हुआ कि अंततः व्यवस्था धराशायी हो गयी। जो नतीजे हुए वे जग जाहिर है। इससे जो पूंजीवाद पैदा हुआ वह बहुत ही अस्वस्थ ढ़ंग का है। एक खास तरह की उद्यमिता और मितव्ययिता जो पूंजीपतियों के साथ पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में जुड़ी थीं उसका वहां अभाव था और सामूहिक संपत्ति की लूट और विशाल मात्रा में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन (जैसे प्राकृतिक गैस एवं दूसरे खनिजों) की खरीद फरोख्त से धनाढ्य बनने की होड़ लग गयी। इस क्रम में सोवियत काल की जो सामाजिक सुरक्षा आम लोगों को उपलब्ध थी वह छिन्न-भिन्न हो गयी। थोड़े से लोग अल्पकाल में ही धनाढ्य हो गये। फिर भी अपने प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर रूस एक बड़ी पूंजीवादी व्यवस्था के रूप में प्रभावी बना हुआ है। लेकिन आम लोगों का जीवन स्तर देश की विशाल संपदा के हिसाब से काफी नीचा है।
चीन के अंतर्विरोध
चीन में जो बदलाव आये हैं वे कुछ अचरज में डालने वाले लगते हैं। लेकिन गहराई से विचार करने पर साफ दिखाई देता है कि यह भी समतामूलक समाज के लक्ष्यों से आधुनिक ढंग के औद्योगीकरण के अंतरविरोध का ही नतीजा है। माओ ने शुरू में ऐसा सोचा था कि एक साम्यवादी समाज की स्थापना के लिए औद्योगिक विकास के अति उच्च स्तर पर पहुँचना जरूरी नहीं, जैसी कि मार्क्सवादियों की प्रारंभिक मान्यता थी। उसका ऐसा मानना था कि लोगों की चेतना और जीवन शैली में बदलाव से, ऊंचे औद्योगिक विकास के बिना भी, समतामूलक, साम्यवादी समाज बनाया जा सकता है। इसी सोच से सांस्कृतिक क्रांति के प्रयास हुए जिसमें लोगों की सोच को बदलने के लिए शहरी लोगों को ग्रामीण अंचलों में कृषि से जुड़े कामों को करने को बाध्य किया गया। सामूहिक जीवन के लिए सभी स्तर पर कम्युनों की स्थापना की जाने लगी। पर माओ के इस सपने के बिखरने के दो कारण थे। एक तो जिस कम्युन पद्धति को वह लागू करना चाहता था, वह स्वतः स्फूर्त रूप से नीचे से विकसित नहीं हो रही थी बल्कि ऊपर से एक केन्द्रीय सत्ता के द्वारा लागू की जा रही थी, जिसके पीछे वहां की सैन्य शक्ति थी। इस तरह यह एक सहयोगी व्यवस्था को केन्द्रीकृत पार्टी नौकरशाही के दबाव में विकसित करने का प्रयास था। इससे पैदा संस्थागत अवरोध के खिलाफ छात्रों और युवाजनों की शक्ति को उभारने का प्रयास किया गया, जिससे जगह-जगह संघर्ष होने लगे और सैन्य शक्ति से ही स्थिति को नियंत्रित किया गया। दूसरा, माओ नेे ‘बैकयार्ड स्टील मिल’ की बात जरूर की लेकिन यह छोटे और घरेलू उद्योगों के आदर्श को लागू करने के लिए नहीं हुआ। इसे तत्कालिक मजबूरी से ज्यादा नहीं माना गया। भारी सैन्यबल के विकास और इसके लिए जरूरी अत्याधुनिक उद्योगों के विकास का लक्ष्य कभी भी नहीं छोडा गया। अंततः अति विकसित उद्योगों की महत्वाकंाक्षा ने छोटे उद्योगों और स्वशासी कम्युनों की कल्पना को रौंद दिया और माओ के जाते-जाते अत्याधुनिक उद्योगों पर आश्रित सैन्यबल की महत्वाकांक्षा हावी हो गई। आधुनिक ढ़ंग की औद्योगिक व्यवस्था के विकास के लिए पूंजी संचय के वे सारे रास्ते अपनाना अपरिहार्य हो गया जिन्हें अन्यत्र अपनाया गया था। चीन में ‘‘मंडारिनों’’ (केन्द्रीकृत नौकरशाही) के तहत राज्य के उद्देश्यों के लिए आम लोगों की कई पीढि़यों की बलि देने की परंपरा दो हजार वर्षों से अधिक पुरानी है, जिसका गवाह चीन की दीवार है। इसलिए जब एक बार आधुनिक ढंग के औद्योगिक विकास का लक्ष्य अपनाया गया तो आम लोगों, विशेषकर ग्रामीण लोगों के हितों को नजरअंदाज किया जाने लगा। इसके लिए चीन के प्राकृतिक और मानव संसाधनों का अबाध शोषण शुरू हुआ और संसार भर के अत्याधुनिक पूंजीवादी प्रतिष्ठानों को आमंत्रित कर इस विकास में लगाया गया। विशेष सुविधाओं से युक्त ‘‘स्पेशल इकाॅनोमिक जोन’’ SEZ का जाल बिछ गया। पूंजीवाद के विकास से जुड़ा औपनिवेशक शोषण का यह आंतरिक और आत्यांतिक रूप बन गया है।
प्राथमिक पूंजी संचय प्राथमिक नहीं, निरंतर
मार्क्स ने औद्योगिक क्रान्ति के लिए आवश्यक ‘प्राथमिक पूंजी संचय’ 2 को किसानों के क्रूर विस्थापन और श्रमिकों के घोर शोषण से जोड़ा था। उसने यह मान लिया था कि इसके बाद स्थापित उद्योगों में मजदूरों के शोषण से प्राप्त अधिशेष के आधार पर पूंजी का विस्तार होता रहेगा। श्रमिकों और पंूजीपतियों का संघर्ष श्रम के अधिशेष के अनुपात को लेकर होगा जो पूंजीपतियों के मुनाफे का आधार है। लेकिन समग्रता में परिणाम सुखदायी होगा क्योंकि अंततः इससे एक नयी सभ्यता का विस्तार होता रहेगा। इनमें रूकावट श्रम से जुडे अधिशेष को हासिल करने और इससे जुड़े समय-समय पर आने वाले व्यापार के संकटों (ट्रेड साइकिल) से आएगी। रोजा लक्जमबर्ग जैसी मार्क्सवादी चिन्तकों ने भी इस व्यवस्था का मूल संकट अधिशेष जनित पण्यों के बाजार से ही जोड़ा था। स्वयं धरती के संसाधनों के सिकुड़न के संकट पर किसी का ध्यान नहीं गया था।
अब तस्वीर ज्यादा जटिल और भयावह है। औद्योगिक विकास शून्य में नहीं होता और सकल उत्पाद में श्रम निर्गुण या अदेह रूप में संचित नहीं होता बल्कि अन्न, जल और अनगिनत जैविक पदार्थो के परिवर्तन और परिवर्धन से उपयोग की वस्तुओं के अंसख्य रूपों में संचित होता है। यह प्रक्रिया पूरी धरती को संसाधन के रूप में जज्ब कर असंख्य उपयोग की वस्तुओं के रूप में बदलने की प्रक्रिया होती है।

प्राकृतिक व मानवीय संसाधनों का असीमित दोहन
इस क्रम में धरती के सारे तत्व जैविक प्रक्रिया से बाहर हो जीवन के लिए अनुपलब्ध बनते जाते हैं – जैसे ईंट, सीमेंट, लोहा या प्लास्टिक, जिन्हें मनुष्य से लेकर जीवाणु तक कोई भी जज्ब नहीं कर सकता। इस सारी प्रक्रिया केा धरती पर जीवन या स्वयं धरती की मौत के रूप में देखा जा सकता है। क्योंकि यह किसी भी जैविक प्रक्रिया के लिए अनुपयोगी बन जायेगी। ध्यान देने की बात है कि पूंजी संचय और इस पर आधारित औद्योगिक विकास की प्रक्रिया सिर्फ प्राथमिक स्तर पर हीं नहीं बल्कि सतत् चलने वाली होती है और इसमें प्राकृतिक और मानव संसाधनों का दोहन हर स्तर पर चलता रहता है। यह संभव इसलिए होता है क्योंकि समाज में एक ऐसा वर्ग भी बना रहता है जो इस से लाभान्वित होता है – सिर्फ पूंजीपति ही नहीं बल्कि विस्तृत नौकरशाही, व्यवस्थापक और विनिमय करने वाला वर्ग भी जिसका जीवन स्तर इस विकास के साथ ऊंचा होता रहता है। यह समूह विकास का वाहक और पेरोकार बना रहता है क्योंकि इससे इसकी समृद्धि और उपभोग के दायरे का विस्तार होता रहता है। दूसरे इसका अनुकरण करते है। इससे अपनी पारी आने का भ्रम बना रहता है।
वैसे समूह जिनके आवास और पारंपरिक रूप से जीवन के आधार वैसे प्रदेश हैं जहां वन हैं, खनिज पदार्थ हैं और ऐसी जल धाराएं जिन्हें बिजली पैदा करने के लिए बांधों से नियंत्रित किया जा रहा है – विस्थापित हो इस उत्पादन पद्धति के पायदान पर डाल दिये जाते हैं। किसानों की उपज को सस्ते दाम पर लेने का प्रयास होता है ताकि इन पर आधारित औद्योगिक उत्पादों की कीमतें कम कर ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके। विशाल पैमाने पर होने वाले विस्थापन से श्रम बाजार में काम तलाशने वालों की भीड़ बनी रहती है जिससे श्रमिकों को कम से कम मजदूरी देना होता है। इस तरह देश के मजदूर और किसान लगातार गरीबी रेखा पर बने रहते हैं। अगर उपभोग की वस्तुओं की कीमतें बढ़ती है तो ये भूखमरी और कंगाली झेलते हैं। जो बड़ी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं हैं वे लगातार इस प्रयास में लगी रहती हैं कि सस्ते श्रम और संसाधनों के क्षेत्र में पंूजी का प्रवेश निर्बाध बना रहे। जैसे पानी बहकर एक स्तर पर फैल जाता है वैसे ही निर्धनता भी अपना स्तर ढूंढ़ते हुए व्यापक बनती जाती है। श्रमिकों के पलायन से संपन्न क्षेत्रों पर जनसंख्या का दबाव बढ़ना और फिर इससे वहां के मजदूरों के जीवन पर विपरीत प्रभाव और बाहरी श्रमिकों के खिलाफ आक्रोश इसका परिणाम होता है।
महंगाई का मूल कारण
ऊपर के संदर्भ में आज की महंगाई पर भी विचार करने की जरूरत है। महंगाई को आम तौर से आपूर्ति और मंाग से जोड़ा जाता है। यह बाजार के दैनन्दिन के अनुभवों पर आधारित है। लेकिन अब हम एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके हैं कि आपूर्ति का संकट स्थायी और वैश्विक बन गया है। इसमें तत्कालिक रूप से कहीं मंदी और कीमतों में गिरावट भले ही दिखे, स्थायी रूप से महंगाई का दबाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बना रहेगा। इसका मूल कारण है हमारी सभ्यता और खासकर पूंजीवादी सभ्यता, जिसका मूल उद्देश्य अविरल मुनाफे के लिए ‘‘उपभोग’’ की वस्तुओं की विविधता और मात्रा का विस्तार करते जाना है। इनके पैमानों के उत्तरोत्तर विस्तार के साथ प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता पर उन्नीसवीं शताब्दी से ही दबाव बढ़ने लगा है, जबसे औद्योगिक क्रान्ति का असर दुनिया पर पड़ने लगा। इनसे अनेक आवश्यक खनिज जिनमें ऊर्जा के मूल स्त्रोत कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस एवं उत्पादन के ढांचे के लिए आधार तांबा, लोहा एवं अल्युमिनियम आदि के अयस्क इतनी तेजी से खतम होते जा रहे हैं कि इनकी उपलब्धता घटने लगी है और ये दिनों दिन महंगे होते जा रहे हैं। इससे पूरी अर्थव्यवस्था पर महंगाई का दबाव बनता है। बाहर की किन्हीं तात्कालिक स्थितियों या अचानक ऊर्जा के किसी स्त्रोत के सुलभ होने से कभी-कभी महंगाई से राहत भले ही मिल जाये, ऊपर वर्णित संसाधनों की आपूर्ति का मूल संकट सदा बना रहता है। इससे भी बढ़कर जीवन के लिए अपरिहार्य पेयजल, जो वनस्पति जगत से लेकर सभी जीव और मानव जीवन के लिए अपरिहार्य है, अपर्याप्त होता जा रहा है। इसके खत्म होने का कारण इसका बड़ी मात्रा में उपयोग ही नहीं बल्कि आधुनिक उद्योगों और औद्योगिक आबादियों के कचड़े एवं कृषि में विशाल मात्रा में इस्तेमाल किये जा रहे रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का जलश्रोतों और भूजल में घुलने से हो रहा प्रदूषण भी है। इनका प्रयोग अब जटिल रासायनिक प्रक्रिया से सफाई के बाद ही संभव होता है जिससे यह ये महंगे पण्य की श्रेणी में आ जाते हैं। इसका बोझ गरीब वर्गो के लिए असह्य हो जाता है जो न महंगे बोतलबन्द पानी खरीद सकते हैं न नगरों के भारी पानी के टैक्स का बोझ उठा सकते हैं। अन्न महंगा करने में ये सभी कारक शामिल हो जाते है।
मूल बीमारी औद्योगिक सभ्यता
संसार की बड़ी वित्तीय संस्थाएं इस कोशिश में रहती हैं कि पूंजी का प्रवाह बिना अवरोध के बना रहे और इससे औद्योगिक सभ्यता की मूल बीमारी धीरे-धीरे उन देशों और भू-भागों को भी ग्रसित करती है जो पहले इस औद्योगिक सभ्यता की चपेट में नहीं आये थे। जैसे-जैसे प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता घटती है दुनिया के तमाम लोगों पर अपने जल और जमीन को पूंजीवादी प्रतिष्ठानों के लिए खोलने का दबाव बढ़ता है। वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के प्रावधानों का मूल उद्देश्य इसी प्रक्रिया की औपचारक मान्यता का उद्घोष है। इसलिए इस समस्या का निदान एक ऐसी विकेन्द्रित व्यवस्था ही हो सकता है जिसमें लोग स्थानीय संसाधनों के आधार पर सरल जीवन पद्धति अपनायें। यह व्यवस्था समतामूलक ही हो सकती है।

टिप्पणियां
1. ‘पीस रेट’ (Piece Rate) का मतलब है कि एक निश्चित मात्रा में काम करने पर ही निर्धारित मजदूरी दी जाएगी। मजदूरी देने के दो तरीके हो सकते हैं – एक, दिन के हिसाब से मजदूरी दी जाए (डेली वेज रेट) और दो, काम की मात्रा के हिसाब से मजदूरी दी जाए (पीस रेट)। दूसरे तरीके में मजदूरों का शोषण बढ़ जाता है। जो हट्टे-कट्टे जवान होते है, वे पैसे के लालच में अपने स्वास्थ्य की परवाह न करके एक दिन में ज्यादा काम करते है। जो थोड़ा कमजोर होते है, वे निर्धारित मात्रा में काम नहीं कर पाने के कारण एक दिन की मजदूरी भी नहीं पाते हैं। भारत में मनरेगा की बहुचर्चित योजना में पीस रेट का उपयोग करने के कारण मजदूरों का काफी शोषण हो रहा है। कई बार मजदूरो को एक दिन की मजदूरी 50-60 रू. ही मिल पाती है।
2. कार्ल मार्क्स ने ‘प्राथमिक पूंजी संचय’ (Primitive Accumulation of Capital)पूंजीवाद के प्रारंभ की उस प्रक्रिया को कहा था, जिसमें 16 वीं से 18 वीं सदी तक बड़े पैमाने पर इंग्लैण्ड के खेतों से किसानों को विस्थापित करके उन्हें ऊनी वस्त्र उद्योग की ऊन की जरूरत के लिए भेड़ों को पालने के लिए चरागाहों में बदला गया। इससे औद्योगीकरण में दो तरह से मदद मिली। एक, उद्योगांे को सस्ता कच्चा माल मिला। दो, विस्थापित किसानों से बेरोजगार मजदूरों की सुरक्षित फौज तैयार हुई और उद्योगों को सस्ते मजदूर मिले। सच्चिदानंद सिन्हा कहना चाहते हैं कि यह प्रक्रिया मार्क्स के बताए मुताबिक पूंजीवाद की महज प्राथमिक या प्रारंभिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि लगातार चलने वाली पूंजीवाद की अनिवार्य प्रक्रिया है।
3. ‘पण्य’ मार्क्स द्वारा इस्तेमाल की गई अवधारणा Commodity का अनुवाद है। इसका मतलब वे वस्तुएं है जिनकी बाजार में खरीद-फरोख्त होती है। जैसे पानी यदि मुफ्त में उपलब्ध है तो वह पण्य नहीं है। किंतु वह बोतलों में बंद होकर बिकने लगा है तो पण्य बन गया है।

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पूंजीवाद एक बार फिर संकट में है। पिछले दिनों आई जबरदस्त मंदी ने इसकी चूलें हिला दी है और दुनिया अभी इससे पूरी तरह उबरी नहीं है। पूंजीवाद का संकट सिर्फ बैंकों, कंपनियों व शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। दुनिया में भूखे, कुपोषित, बेघर और बेरोजगार लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। आज दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोग भूखे रहते हैं, यानी हर छठा आदमी भरपेट नहीं खा पाता है। इंसान की सबसे बुनियादी जरुरत भोजन को भी पूरा नहीं कर पाना पूंजीवादी सभ्यता की सबसे बड़ी विफलता है। पर्यावरण का संकट भी गहराता जा रहा है, जिसे कोपनहेगन सम्मेलन की विफलता ने और उजागर कर दिया है।

इन संकटो ने पूंजीवादी सभ्यता के चमत्कारिक दावों पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इसके विकल्पों की तलाश तेज हो गई है। लेकिन इसके लिए जरुरी है कि पहले इसकी बुनियादी गड़बड़ियों को समझा जाए और उनका सम्यक रुप से विश्लेषण किया जा सके।

कार्ल मार्क्स पूंजीजीवाद के सबसे बड़े और सशक्त व्याख्याकार व टीकाकार रहे हैं। किन्तु डेढ़ सौ सालों बाद उनके विश्लेषण और सिद्धांतों में कई कमियां दिखाई देती है। पूंजीवाद के विकास ,विनाश और क्रांति के बारे में उनकी भविष्यवाणियां सही साबित नहीं हुई हैं। पूरी दुनिया पूंजीपतियों और मजदूरों में नहीं बंटी। कारखानों का संगठित मजदूर वर्ग क्रांति का अगुआ अब नहीं रहा। रुस, पूर्वी यूरोप, चीन, वियतनाम आदि में जो कम्युनिस्ट क्रांतियां हुई, वे धराशायी हो गई हैं, और ये देश वापस पूंजीवाद के आगोश में चले गए हैं। इधर लातीनी अमरीका में जो समाजवाद की बयार चली है, वह शास्त्रीय मार्क्सवादी धारा से काफी अलग है।

दुनिया में आंदोलन और संघर्ष तो बहुत हो रहे हैं। किन्तु मजदूर-मालिक संघर्ष अब खबरों में नहीं है। किसानों, आदिवासियों और असंगठित मजदूरों के आंदोलन, जल-जंगल-जमीन के आंदोलन, धार्मिक-सामुदायिक-राष्ट्रीय पहचान आधारित आंदोलन तो हैं , किन्तु वे मार्क्स के विचारों से काफी अलग हैं। तब हम इन्हें कैसे समझे ?

इस मामले में डॉ० राममनोहर लोहिया से हमें मदद मिल सकती है। उन्होंनें 1943 में ‘अर्थशास्त्र मार्क्स के आगे’ नामक निबंध लिखा। उन्होंने बताया कि पूंजीवादी शोषण का मुख्य आधार एक कारखाने या एक देश के अंदर मालिक द्वारा मजदूर का शोषण नहीं, बल्कि उपनिवेशों का शोषण है। उपनिवेशों के किसान, कारीगर व मजदूर ही असली सर्वहारा है। लेनिन का यह कथन गलत है कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अंतिम अवस्था है। बल्कि, यह पूंजीवाद की पहली और अनिवार्य अवस्था है। यदि पश्चिम यूरोप के देशों ने अमरीका, अफ्रीका, एशिया और आस्ट्रेलिया के विशाल भूभागों पर कब्जा करने और लूटने का काम न किया होता, तो वहां औद्योगिक क्रांति नहीं हो सकती थी।

उपनिवेशों के आजाद होने के बाद भी नव-औपनिवेशिक और नव-साम्राज्यवादी तरीकों से यह लूट व शोषण चालू है और इसीलिए पूंजीवाद फल-फूल रहा है। यह शोषण सिर्फ औपनिवेशिक श्रम का ही नहीं है। इसमें पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता हुआ दोहन, लूट और विनाश भी अनिवार्य रुप से छिपा है। इसीलिए आज दुनिया में सबसे ज्यादा झगड़े प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हो रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण के संकट भी पैदा हो रहे हैं।

औपनिवेशिक शोषण की जरुरत पूंजीवादी विकास के लिए इतनी जरुरी है, कि तीसरी दुनिया के जिन देशों ने इस तरह का विकास करने की कोशिश की, बाहरी उपनिवेश न होने पर उन्होंनें आंतरिक उपनिवेश विकसित किए। आंतरिक उपनिवेश सिर्फ क्षेत्रीय व भौगोलिक ही नहीं होते हैं। अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्से भी (जैसे गांव या खेती) आंतरिक उपनिवेश बन जाते हैं। भारतीय खेती के अभूतपूर्व संकट और किसानों की आत्महत्याओं के पीछे आंतरिक उपनिवेश की व्यवस्था ही है।

सोवियत संघ का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही था कि उसने उसी तरह का औद्योगीकरण और विकास करने की कोशिश की, जैसा पूंजीवादी यूरोप-अमरीका में हुआ था। किन्तु बाहरी और आंतरिक उपनिवेशों की वैसी सुविधा उसके पास नहीं थी।

इसलिए, पूंजीवाद का एक बुनियादी नियम हम इस तरह बयान कर सकते हैं :

पूंजीवादी विकास के लिए औपनिवेशिक, नव-औपनिवेशिक या आंतरिक – औपनिवेशिक

शोषण जरुरी है। यह शोषण दोनों का होता है – श्रम का भी और प्राकृतिक संसाधनों का भी।

दुनिया के स्तर पर इस नियम का अभी तक कोई महत्वपूर्ण अपवाद नहीं है।

लोहिया के पहले गांधी ने आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता के इस शोषणकारी-विनाशकारी चरित्र के बारे में चेतावनी दी थी। मार्क्स के अनुयायियों में रोजा लक्ज़मबर्ग ने इस विषय में मार्क्स की खामियों को उजागर किया था और उसे सुधारने की कोशिश की। लोहिया के बाद लातीनी अमरीका के आन्द्रे गुन्दर फ्रेंक और मिस्त्र के समीर अमीन नामक मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों ने लोहिया से मिलती-जुलती बातें कही है।

यदि ऊपर कही गई बातें सही हैं, तो इनसे कई निष्कर्ष निकलते हैं :

’ तीसरी दुनिया के गरीब देशों में यूरोप-अमरीका जैसा औद्योगीकरण एवं विकास संभव नहीं है, चाहे वह पूंजीवादी तरीके से किया जाए या साम्यवादी (राज्य पूंजीवादी) तरीके से किया जाए।

’ चूंकि अमरीका-यूरोप की समृद्धि व जीवन-शैली पूरी दुनिया के श्रम व प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर टिकी है, वह दुनिया के सारे लोगों के लिए हासिल करना संभव नहीं है। इसलिए समाजवादियों को उसका सपना छोड़ देना होगा। सबकी न्यूनतम बुनियादी जरुरतें तो पूरी हो सकती हैं, किन्तु विलासितापूर्ण जीवन सबका नहीं हो सकता है। दूसरे शब्दों में ‘स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व’ के साथ ‘सादगी’ और ‘स्वावलंबन’ भी समाजवादी समाज के निर्माण के महत्वपूर्ण एवं जरुरी सूत्र होंगे।

’ इस अर्थ में दुनिया का आर्थिक-राजनैतिक संकट और पर्यावरणीय संकट आपस में जुड़े हैं। एक वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था में ही दोनों संकटों से मुक्ति मिल सकेगी। दूसरे शब्दों में, समाजवाद निर्माण के किसी भी प्रयास में दोनों तरह के आंदोलनों – आर्थिक-सामाजिक बराबरी के आंदोलन एवं पर्यावरण के आंदोलन – को मिलकर ताकत लगाना होगा।

’ विकल्प सिर्फ पूंजीवाद (उत्पादन संबंधों के संकुचित अर्थ में) का नहीं हो सकता। निजी संपत्ति को खतम करना काफी नहीं है। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के साथ पूंजीवादी तकनालॉजी, जीवन-शैली और जीवन-मूल्यों का भी विकल्प खोजना होगा। दूसरे शब्दों में हमें ‘पूंजीवादी सभ्यता’ का विकल्प खोजना होगा। एक नयी सभ्यता का निर्माण करना होगा।

इक्कीसवीं सदी में समाजवाद की किसी भी संकल्पना, तलाश और कोशिश में ये महत्वपूर्ण सूत्र होंगे। इनके लिए हम लोहिया के आभारी हैं।

————–’’’…………………………

(साहित्य अकादमी द्वारा डॉ० राममनोहर लोहिया पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी (18-20फरवरी 2010) में पेश आलेख – हिन्दी सारांश)

- सुनील

ग्रा/पो केसला,

जि. होशंगाबाद, मध्य प्रदेश

461111

ईमेल – sjpsunil@gmail.com

कार्य :- समाजवादी विचारों का प्रचार-प्रसार। आदिवासियों, किसानों,

मछुआरों एवं विस्थापितों के संघर्ष एवं संगठन में पिछले 25 वर्ष से सक्रिय। अखबारों, पत्रिकाओं में लेखन। कई पुस्तिकाएं भी प्रकाशित।

पद :- राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, समाजवादी जन परिषद।

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पिछले भाग से आगे :

वैसे तो यह औद्योगिक व्यवस्था पूंजीवाद द्वारा पैदा की गयी है जिसमें निजी स्वामित्व की प्रधानता है , लेकिन धीरे धीरे उद्योगों का यह ढांचा , जो वृहद कॉर्पोरेशनों के रूप में विकसित हुआ है , पूंजीपतियों के व्यक्तिगत नियन्त्रण से मुक्त हो एक स्वतंत्र स्वरूप धारण करने लगा है और इसका मूल रुझान पूर्ववत श्रम और संसाधनों के शोषण से प्रतिष्ठानों के लिए ज्यादा मुनाफा कमाना होता है । विख्यात अमेरिकी अर्थशास्त्री गालब्रेथ ने विकसित हो रहे स्वायत्त पूंजी के व्यवस्थापकों के इस समूह को ’टेक्नोस्ट्रक्चर’ का नाम दिया था । निजी या सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों में इनकी व्यवस्था को चलाने के लिए व्यवस्थापकों और नौकरशाहों का ऐसा ही संवेदनहीन ढांचा तैयार हुआ है जिसका एक मात्र लक्ष्य अपना विस्तार करना और कॉर्पोरेशन के मुनाफे को बढ़ाना भर है । सार्वजनिक क्षेत्र के कॉर्पोरेशन एक अर्थ में जरूर भिन्न होते हैं।  इनके मुनाफे पर एक हद तक – जहाँ लोकतंत्र है, जन प्रतिनिधियों का नियन्त्रण होता है । लेकिन इनकी मूल प्रवृत्तियाँ निजी पूंजीवादी प्रतिष्ठानों से भिन्न नहीं होतीं । और इसी कारण यह भी पूंजीवादी व्यवस्था के फैलाव और संकोच के व्यापार चक्र से बिल्कुल मुक्त नहीं होते । चूँकि बुनियादी तौर से यह निजी प्रतिष्ठानों से भिन्न नहीं होते सरकारें जब चाहें तो विनिवेश द्वारा इनकी पूँजी को निजी क्षेत्र में स्थानान्तरित कर सकती है – जैसा हाल में मनमोहन सिंह सरकार ने एन.टी.पी.सी में किया है ।

अशोक सेक्सरिया - सच्चिदानन्द सिन्हा

अशोक सेक्सरिया - सच्चिदानन्द सिन्हा

समग्र रूप से यह पूंजीवादी कॉर्पोरेटी दुनिया आम आदमियों , विशेष कर आदिवासियों और किसानों के जीवन पर कहर बरसाती है | जिस औपनिवेशिक शोषण के बल पूंजीवाद का विकास हुआ है वह शोषण और भी भयावह होता जा रहा है क्योंकि इस व्यवस्था की संसाधनों की भूख असीम है । इसका सरल सूत्र है – अधिक मुनाफे के लिए अधिक उत्पादन चाहिए और अधिक उत्पादन के लिए अधिक संसाधान यानी अधिक जंगल की कटाई , अधिक खनिजों का खनन , अधिक अन्न और दूसरे कृषिजन्य कच्चे माल । इनके संयन्त्रों के लिए भूमि और सबसे ऊपर व्यापार के लिए परिवहन का तानाबाना चाहिए , ताकि सभी दूरदराज स्थानों को यह ऑक्टोपस (अष्टपाद) की तरह अपनी गिरफ़्त में ले सकें । पिछले दिनों ’स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन ’के नाम पर और सड़कों के चौड़ीकरण के नाम पर एक्सप्रेस वे एवं हाईवे के लिए देश भर में भूमि अधिग्रहण का सिलसिला चलाया जा रहा है । इन्हीं के खिलाफ़ प्रतिरोध से सिंगूर और नन्दीग्राम की त्रासदीपूर्ण घटनाएं हुई हैं । इसके पहले उड़ीसा , छत्तीसगढ़  और स्वयं झारखण्ड में देशी , विदेशी बड़ी कंपनियों द्वारा आदिवासियों और किसानों की जमीन पर सरकारी बल के सहारे अधिग्रहण के ऐसे प्रयास लगातार होते रहे हैं और जगह जगह इनके खिलाफ़ आन्दोलन होते रहे हैं जिन्हें दबाने की कोशिश भी होती रही है । जहाँ तहाँ माओवादी गतिविधियों में उभार में भी यह जन प्रतिरोध प्रतिबिंबित होता है । जब भारत के प्रधान मन्त्री मनमोहन सिंह “नक्सली हिंसा” को देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बताते हैं तो उनकी चिंता व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए संसाधनों की उपलब्धि की ही है । विश्व बैंक की आर्थिक नीति को देश में लागू करने में अग्रिम भूमिका निभाने वाले हमारे प्रधान मन्त्री का यह रुख स्वाभाविक है ।

लेकिन हमारे माओवादी मित्र भी लगभग वैसे ही दृष्टिकोण के शिकार हैं । अगर उन्होंने माओ के देश चीन पर ध्यान दिया होता तो वे माओवाद की जगह समाज परिवर्तन की किसी वैकल्पिक नीति की तलाश करते । माओ के चीन में आज क्या हो रहा है ?  माओ के नेतृत्व में चालीस वर्ष से अधिक तक चलने वाले आन्दोलन – जिसमें अनगिनत लोगों ने अपनी आहुति – का अन्तिम परिणाम क्या हुआ? आज चीन पूंजीवादी विकास और कॉर्पोरेटी व्यवस्था का सबसे सशक्त और निर्मम नमूना है । वहाँ की सालाना विकास दर भारत से भी कहीं ज्यादा है , जो कभी १२ प्रतिशत पार कर गयी थी । लेकिन इसका फायदा वहाँ के नवोदित पूंजीपति वर्ग और व्यवस्थापक वर्ग को मिल रहा है , जिनकी सुविधायें पश्चिमी दुनिया के संपन्नों की बराबरी कर रही हैं । लेकिन आम किसानों और मजदूरों की स्थिति दर्दनाक बनी हुई है । सरकार को उनकी सुरक्षा की चिंता इतनी कम है कि हजारों लोग कोयला खदानों की दुर्घतनाओं में मरते रहते हैं । माओवादी मित्रों को इस पर विचार करना चाहिए कि वे माओ की तर्ज पर खूनी क्रांति में स्वयं अपनी और हजारों दूसरे प्रतिबद्ध लोगों की शहादत से फिर चीन जैसा ही पूंजीवादी ढांचा तैयार करना चाहते हैं क्या ? वैसे ढाचे में तो आदिवासी और किसान वैसे ही विस्थापित होंगे और कुचले जायेंगे जैसे भारत और दुनिया के दूसरे देशों में पूंजीवादी विकास के क्रम में हो रहा है । देंग या कुछ दूसरे व्यक्तियों पर इस “भटकाव” की जवाबदेही डाल हम गंभीर सामाजिक विश्लेषण से बच नहीं सकते ।

सजप सम्मेलन धनबाद

सजप सम्मेलन धनबाद

समाजवादी जन परिषद बुनियादी तौर से ऐसे विकास को ( भले ही वह समाजवाद के नाम पर हो रहा हो ) नकारती रही है और आगे भी नकारती रहेगी । हमें एक ऐसे वैकल्पिक ढांचे की तलाश जारी रखनी होगी जिसमें मेहनतकशों की स्वायत्तता और व्यवस्था की मानवीयता बनी रहे । हमें स्पष्ट रूप से यह घोषित करना है कि किसानों और आदिवासियों के जीवन पर आघात करने वाली किसी विकास की व्यवस्था को हम स्वीकार नहीं करेंगे । हमें ऐसी छोटी राजकीय और आर्थिक इकाइयाँ विकसित करने की दिशा में पहल करना होगा जिसमें आदमी पूरे अर्थ में स्वतंत्र हो और अपनी व्यवस्था बनाने के लिए उसे पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त हो । खनिजों की खुदाई के लिए किसानों और आदिवासियों के विस्थापन का हम शुरु से विरोध करते रहे हैं। बाल्को के गंधमार्दन में बॉक्साईट खनन का अहिंसक विरोध समता संगठन ( जिसके प्रयासों से बाद में समाजवादी जनपरिषद का निर्माण हुआ ) ने कुछ दूसरे सहयोगी संगठनों के साथ किया था और उसमें एक हद की सफलता भी मिली थी। हमारा यह संकल्प होना चाहिए कि आगे भी हम सदा ऐसा अहिंसक प्रतिरोध जारी रखेंगे ।

ऐसे अहिंसक संघर्षों की श्रृंखला से ही भविष्य में वह वातावरण तैयार होगा जिसमें एक वैकल्पिक समाज व्यवस्था – जो केन्द्रीकृत राज्य व्यवस्था और विशाल पूंजीवादी और नौकरशाही शोषण से समाज को मुक्त कर सके – अस्तित्व में आये । समाजवादी जनपरिषद को अपने इस प्रयास में देश के तमाम शोषित लोगों , आदिवासियों , किसानों ,  मजदूरों एवं बुद्धिजीवियों को शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए । हमें लोगों को सचेत करना चाहिए कि प्राकृतिक संपदा के अन्धाधुंध दोहन की मुहिम को वर्तमान औद्योगिक विकास और उपभोक्तावादी संस्कृति से अलग कर नहीं देखें ।  जो लोग आज की विकास प्रक्रिया को तो कबूल करते हैं पर जल , जंगल , और जमीन के कॉर्पोरेटी अधिग्रहण का विरोध करते हैं , वे स्वयं अपने को और तमाम जनता को भ्रम में डालते हैं । दोनों का अनिवार्य संबंध है इस सत्य को हमें उजागर करते रहना है ।

हमारा पिछला राष्ट्रीय सम्मेलन सत्याग्रह आन्दोलन के शताब्दी वर्ष में हुआ था । आज का सम्मेलन “हिन्द स्वराज” के शताब्दी वर्ष में हो रहा है । आज की व्यवस्था के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष के क्रम में विकेन्द्रित ग्राम गणतंत्र की दिशा में समाज को ले जाने के प्रयास में “हिन्द स्वराज” की मूल कल्पना से प्रेरणा मिलेगी यह आशा है ।

- सच्चिदानन्द सिन्हा , धनबाद ,२८ अक्टूबर , २००९ .

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[ २८ , २९ , ३० अक्टूबर २००९ को धनबाद में समाजवादी जनपरिषद का द्विवार्षिक सम्मेलन सम्पन्न हुआ । सम्मेलन का उद्घाटन  दल से जुड़े चिन्तक सच्चिदानन्द सिन्हा ने किया । प्रस्तुत है उनका उद्घाटन भाषण ]

सच्चिदानन्द सिन्हा

सच्चिदानन्द सिन्हा

झारखण्ड , जहाँ हम सम्मेलन में बैठे हैं , एक अर्थ में मानव इतिहास की समेकित प्रतिछाया प्रस्तुत करता है । अपनी बात को मैं थोड़ा स्पष्ट करना चाहता हूँ । मानव समाज के अनुभवों के परिपेक्ष्य में पिछली दो शताब्दी का इतिहास यह बतलाता है कि सारी आदिम समाज से कारपोरेटीकरण की तरफ़ संक्रमण और इस क्रम में आम आदमी के दरिद्रीकरण की रही है । दरिद्रीकरण , आधुनिक अर्थ में धन के अभाव से ही नहीं , बल्कि आदमी की स्वायत्तता , आत्म सम्मान एवं सामाजिक दायित्व बोध के लोप के अर्थ में भी । मार्क्स समेत ज्यादातर चिंतकों के विचार इस प्रक्रिया से बाहर कोष्ठकों में बन्द विवरण भर हैं ।

आम आदमी के जीवन में यह संक्रमण तीन चरणों में आया है – पहला , जब आदमी कबीले के सम्मानित सदस्य के रूप में स्थित था , दूसरा , जब वह किसान बना और अपने उत्पादन के अधिशेष से व्यवस्था एवं इसके शीर्ष पर उपस्थित विभिन्न तरह के शोषक समूहों का पोषण करता रहा , और तीसरा जब वह आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था में सर्वहारा या श्रमिक बन अपने काम और आय दोनों के लिए पराश्रित बना । वर्तमान पूंजीवादी समाज में वह कौन सा काम करेगा और किन उपक्रमों में किन स्थितियों में करेगा , दूसरों द्वारा निर्धारित होता है । दरअसल इतिहास बतलाता है मनुष्य पूर्ण स्वायत्तता की स्थिति में सिर्फ प्रथम चरण में ही था जब वह सामूहिक शिकार या वनोपजों के संग्रह से जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था । उस काल में सभी लोग वास्तविक या कल्पित लहू के संबंध से सगे और सहयोगी थे । हाल के अनेक अध्ययनों से यह बात सिद्ध होती है कि उनके कठोर जीवन और आपसी खूनी संघर्षों की कहानी प्राय: विद्वानों द्वारा वर्तमान समाज में फैले द्वेष – राग का प्रचीन स्थितियों पर प्रक्षेपण का परिणाम है ।

झारखण्ड में हम एक विकृत रूप में विकास के इन तीनों खण्डों का सह – अस्तित्व पाते हैं । (१) यहाँ आज भी अनेक कबीलायी समूह हैं जो मूल्त: आखेट और वनोपजों के संग्रह से जीविका पाते हैं – हाँलाकि आधुनिक खदानों , उद्योगों और शहरीकरण ने उन्हें अति छोटे दायरों में सीमित कर दिया है । वे आज विलुप्त होने की कगार पर हैं । (२) वर्तमान भूमि व्यवस्था के तहत खेतीबारी करने वाले किसान और (३) खदानों , कारखानों , निर्माण कार्यों एवं परिवहन में कार्यरत मजदूर जो स्थायी या दिहाड़ी मजदूरी पर काम करते हैं ।

झारखण्ड की त्रासदी यह है कि यहाँ वनोपजों की भरमार है ( या थी )और खनिजों का विपुल भंडार है – शायद भारत के तमाम खनिजों के तीस से चालीस प्रतिशत तक । इसलिए जब से भारत में आधुनिक औद्योगीकरण ने अपना पांव पसारना शुरु किया तब से कोयला , लौह – अयस्क , और दूसरे खनिजों के लिए यहाँ के उर्वर वनों से हरे भरे प्रदेश की खदानों के लिए खुदाई शुरु हुई । और यह हरा भरा प्रदेश उबड़ खाबड़ खड्डों और खंडहरों का बियाबान बनने लगा ।  पारंपरिक जीवन के आधार से विस्थापित यहाँ के स्वस्थ और सुन्दर पुरुष और स्त्रियों को बिचौलियों के माध्यम से दूर दराज स्थानों पर उत्तर बंग से लेकर असम तक के चाय बगानों में काम करने के लिए ले जाया गया । वहाँ वे अपनी पूरी सांस्कृतिक विरासत से कट गये , और आज जहाँ हैं और जिस जमीन को उन्होंने अपने खून पसीने से सींचा और बनाया है ,उस पर भी उनके सत्व की स्वीकृति नहीं है । पारंपरिक जीवन के आधार के नष्ट होने से आजीविका के साधन से हीन यहाँ के लोगों को आज भी बड़ी संख्या में ठेकेदारों द्वारा कठोर अस्थायी निर्माण कार्यों के लिए बाहर ले जाया रहा है ।

दूसरी तरफ़ झाखण्ड के खदानों और कारखानों में काम करने के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों से बड़ी तादाद में श्रमिक यहाँ आये । वे भी अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पैदा की गयी दरिद्रता और विस्थापन की एक कहानी के साथ आये थे । अंग्रेजी शासन ने वहाँ भी दरिद्रता और अकाल की एक व्यवस्था पैदा की थी । अत्यधिक शोषण और शासकीय लापरवाही से कृषि व्यवस्था नष्ट हो गयी थी और अकालों का एक सिलसिला शुरु हुआ । दूसरी ओर औद्योगिक क्रांति के बाद के बर्तानी उद्योगों की प्रतिस्पर्धा और शासकीय पक्षपात के कारण वहां के पारंपरिक घरेलू उद्योग नष्ट हो गये और इनमें लगे शिल्पी बेरोजगार हो गये । इसी पृष्टभूमि में वहाँ से बड़ी संख्या में लोगों को बंधुआ मजदूरों के रूप में मॉरिशस , सुरीनाम , गायना, फिजी आदि में ले जाया गया । जो बाकी बचे उनमें बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में कोलकाता , जैसे महानगरों या फिर झारखण्ड की खदानों में काम करने आये । कुछ ऐसे ही कारणों से छत्तीसगढ़ और बिलासपुर से भी बड़ी संख्या में लोग झारखंड की खदानों में काम करने आये । इससे इस इलाके में विभिन्न स्थानों से आये मजदूरों में भी एक दूसरे के प्रति तनाव पैदा होता रहा है । कोयला या दूसरे अयस्कों की ढुलाई के खर्च से बचने के लिए कुछ बड़े औद्योगिक संयन्त्र टाटा , बोकारो , हटिया , सिंदरी  आदि में लगे । पर इनमें दक्षता और बड़ी आय वाले स्थानों पर प्राय: वैसे लोगों को लगाया गया जो विकसित औद्योगिक क्षेत्रों से आते थे और दक्षता वाले कामों में प्रशिक्षित थे । नये तरह के उद्योगों में रोजगार देने की क्षमता घटती जा रही है और इससे रोजगार के लिए प्रतिस्पर्धा और श्रमिकों के विभिन्न समूहों में आपसी तनाव बढ़ता गया है । लोग इस बात को नजरअंदाज करते रहे हैं कि समस्या के मूल में आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था ही है जो लगातार उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या ऑटोमेशन और कम्प्यूटरीकरण के जरिये घटाती चलती है । चूँकि उद्योग धन्धे मूलत: वहीं विकसित होते हैं जहाँ संरचनात्मक सुविधाओं का विकास हुआ होता है । उद्योग प्राय: वहीं फैलते हैं जहाँ  इनका आधार एक बार निर्मित हो चुका होता है । देश के हर हिस्से से लोग ऐसे औद्योगिक नगरों की ओर रुख करते हैं और काम नहीं मिलने पर उनकी झुग्गियों और झोपड़ पट्टी को आबाद करते हैं । इन स्थानों पर लोगों में प्राय: मूल , भाषा आदि के सवाल पर तनाव पैदा होता है ।  यूरोप के देशों में इस तरह का विरोध बाहर से काम की तलाश में आने वाले अप्रवासियों के खिलाफ़ होता है । झारखंड में भी यदा कदा इस तरह का तनाव विभिन्न मूल के लोगों के बीच देखा जा सकता है । इसके मूल में वर्तमान पूंजीवादी उद्योगों का चरित्र है जिस में स्थायी और अस्थायी बेरोजगारी निहित है । इससे सीमित रोजगार के लिए मजदूरों में छीना झपटी होती रहती है ।

( जारी )

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   ( जून , २००४ )। भारत में चुनाव आता है तो धनतंत्र की स्थिति देखकर मन में एक प्रकार की मायूसी आती है । क्या इस चक्रव्यूह का भेदन किया जा सकता है ? कभी भेद लेंगे तो सही सलामत लौट भी पायेंगे ? मूलभूत परिवर्तन के विचारों की उड़ान कुछ क्षण के लिए थम जाती है ।

    दूसरी भावना यह भी आती है कि पाकिस्तान में हमारी जैसी प्रजातांत्रिक व्यवस्था होती तो वहीं के लोगों को अच्छा लगता । प्रजातंत्र के न रहने से बेहतर है एक लूला – लँगड़ा प्रजातंत्र । प्रजातंत्र में विश्वास न रखनेवालों के लिए भी वहाँ जगह होगी ।

    इस भावना को हम ज्यादा नहीं खींच सकते हैं । कोई पूछ सकता है कि अगर क्यूबा में साम्यवादी व्यवस्था के स्थान पर भारत जैसी पूँजीवादी-प्रजातांत्रिक व्यवस्था आ जाएगी , तो क्या वह स्वागत योग्य है ? हमारा उत्तर सकारात्मक नहीं होगा । हम कहेंगे कि क्यूबा के लोग अपने आर्थिक समाज में विषमताओं को बढ़ाए बगैर प्रजातंत्र का नया ढाँचा सृजित करें।

    इस नए ढाँचे को तलाशने के लिए बीसवीं सदी के मध्य में काफ़ी गहमा – गहमी थी । न सिर्फ़ राजनीति में , बल्कि विश्वविद्यालयों के विद्वानों में भी अच्छी खासी चर्चा हो जाती थी । चालीस के दशक में ब्रिटेन का प्रो. हेराल्ड जे. लास्की राजनीतिशास्त्र का मूर्धन्य विद्वान था । व्यक्ति स्वातंत्र्य और आर्थिक समानता के बीच के द्वन्द्व  को लास्की ने ’ अपने समय का सबसे बड़ा विरोधाभास’ के रूप में देखा । इस विरोधाभास का विवेचन करने के लिए उसने एक ग्रंथ लिखा । लास्की खुद ब्रिटेन के श्रमिक दल का सक्रिय सदस्य था , तब श्रमिक दल का वैचारिक आधार समाजवाद था ।

    भारत के समाजवादी दल (सोशलिस्ट पार्टी) ने भी भारत के लिए एक समतामूलक प्रजातांत्रिक संविधान लिखने की कोशिश की थी । उन्हीं दिनों भारत की संविधान सभा की बहस में डॉ. अम्बेडकर ने ’ आर्थिक लोकतंत्र ’ की अवधारणा के बारे में एक महत्वपूर्ण वक्तव्य रखा था ।

    बाद के समय में यूरोप तथा भारत में धनतंत्र की मजबूती इतनी बढ़ी है कि उपरोक्त बहस को न राजनीति में , न विश्वविद्यालयों में कोई महत्व दिया जा रहा है । मानो इस विषय की प्रासंगिकता खत्म कर दी गई । यूरोप में लास्की के समकक्ष जो विद्वान हैं और समाज विज्ञान की महान हस्तियाँ माने जाते हैं , वे सब ’ विचारधारा की समाप्ति ’ के पक्षधर लगते हैं । उनके विचारों में इतनी उड़ान नहीं है कि अमरीकी आधिपत्यवाली विश्वव्यवस्था का कोई विकल्प तलाश करें । भारत के विद्वानों ने तो जैसे कसम खा ली है कि मूलभूत और व्यापक सिद्धान्तों को ईजाद करना उनका काम नहीं महाशक्तियों का है । जिसके पास आधुनिकतम हथियार होंगे और सबसे अधिक धन होगा , ज्ञान का वितरण वही करेगा । हमारे चिन्तन का एक औपनिवेशिक दायरा होगा ।

    यानी , प्रजातंत्र की संरचना और स्वरूप में बुनियादी बदलाव का सपना इस समय के राजनीतिक समूहों और समाज वैज्ञानिकों में नहीं है । भारतीय विद्वान ज्यादा से ज्यादा चुनाव सुधार की बात कर लेते हैं , या कभी – कभी राष्ट्रपति प्रणाली बनाम प्रधानमंत्री प्रणाली की बचकानी बहस करते हैं । संवैधानिक उपाय से धनतंत्र को नियंत्रित किए बगैर , राजनीतिक प्रणाली में परिवर्तन लाये बगैर चुनाव सुधार का भी कोई परिणाम नहीं निकलने वाला है । अन्यथा अपनी सामर्थ्य की भीतर चुनाव आयोग ने चुनाव सुधार की कई कोशिशें की हैं । भारत के संविधान में धनतंत्र को मर्यादित करने का जो भी हल्का प्रावधान था , ग्लोबीकरण और उदारीकरण के दर्शन को अपनाकर उसको अप्रभावी कर दिया गया है । इससे भारतीय प्रजातंत्र और राजनीति पर गहरा नकारात्मक असर हुआ है ।

( जारी )

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  1. प्रेस का यह कर्तव्य होगा कि चुनाव तथा प्रत्याशियों के बारे में निष्पक्ष रिपोर्ट दे । समाचारपत्रों से अस्वस्थ्य चुनाव अभियानों में शामिल होने की आशा नहीं की जाती । चुनावों के दौरान किसी प्रत्याशी , दल या घटना के बारे में अतिशियोक्तिपूर्ण रिपोर्ट न दी जाए । वस्तुत: पूरे मुकाबले के दो या तीन प्रत्याशी ही मीडिया का सारा ध्यान आकर्षित करते हैं । वास्तविक अभियान की रिपोर्टिंग देते समय समाचारपत्र  को किसी प्रत्याशी द्वारा उठाये गये किसी महत्वपूर्ण मुद्दे को छोड़ना नहीं चाहिए और न ही उसके विरोधी पर कोई प्रहार करना चाहिए ।
  2. निर्वाचन नियमावली के अन्तर्गत सांप्रदायिक अथवा जातीय आधार पर चुनाव अभियान की अनुमति नहीं है । अत: प्रेस को ऐसी रिपोर्टों से दूर रहना चाहिए जिनसे धर्म, जाति , मत , सम्प्रदाय अथवा भाषा के आधार पर लोगों के बीच शत्रुता अथवा घृणा की भावनाएं पैदा हो सकती हों ।
  3. प्रेस को किसी प्रत्याशी के चरित्र या आचरण के बारे में या उसके नामांकन के संबंध में अथवा किसी प्रत्याशी का नाम अथवा उसका नामांकन  वापस लिये जाने के बारे में ऐसे झूटे या आलोचनात्मक वक्तव्य छापने से बचना चाहिए जिससे चुनाव में उस प्रत्याशी की संभावनाएं दुष्प्रभावित होती हों । प्रेस किसी भी प्रत्याशी/दल के विरुद्ध अपुष्ट आरोप प्रकाशित नहीं करेगा ।
  4. प्रेस किसी प्रत्याशी/दल की छवि प्रस्तुत करने के लिए किसी प्रकार का प्रलोभन – वित्तीय या अन्य स्वीकार नहीं करेगा । वह किसी भी प्रत्याशी/दल द्वारा उन्हें पेश किया गया आतिथ्य या अन्य सुविधायें स्वीकार नहीं करेगा ।
  5. प्रेस किसी प्रत्याशी/दल – विशेष के प्रचार में शामिल होने की आशा नहीं की जाती । यदि वह करता है तो वह अन्य प्रत्याशी/दल को उत्तर का अधिकार देगा ।
  6. प्रेस किसी दल/ सत्तासीन सरकार की उपलब्धियों के बारे में सरकारी खर्चे पर कोई विज्ञापन स्वीकार / प्रकाशित नहीं करेगा ।
  7. प्रेस निर्वाचन आयोग/निर्वाचन अधिकारियों अथवा मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा समय समय पर जारी सभी निर्देशों/अनुदेशों का पालन करेगा ।
  8. जब भी समाचारपत्र मतदान पूर्व सर्वेक्षण प्रकाशित करते हैं तो उन्हें सर्वेक्षण करवाने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं का उल्लेख सावधानीपूर्वक करना चाहिए एव्म प्रकाशित होने वाली उपलब्धियों के नमूने का माप एवं उसकी प्रकृति , पद्धति में गलतियों के संभावित प्रतिशत का भी ध्यान रखना चाहिए । [ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मतदान पूर्व सर्वेक्षणों पर रोक लगा दी गयी है ।-सं. ]
  9. अगर चुनाव अलग चरणों में हो तो किसी भी समाचारपत्र को मतदान पूर्व सर्वेक्षण चाहे वे सही भी क्यों न हो प्रकाशित नहीं करना चाहिए ।

भारत की प्रेस परिषद द्वारा चुनावों के सन्दर्भ में उपर्युक्त दिशा निर्देश जारी किए गए हैं । अपने मुख्य ब्लॉग की एक प्रविष्टी को पुष्ट करने के लिए इन निर्देशों को यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है । उक्त प्रविष्टि के तथ्यों के प्रति भारत के चुनाव आयोग तथा सम्बन्धित अखबारों के सम्पादकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए पत्र लिख दिए गए हैं । सम्पादकों द्वारा  उचित कार्रवाई न किए जाने पर प्रेस परिषद को लिखा जायेगा ।  मीडिया के इस गैर जिम्मेदाराना आचरण के विरुद्ध , लोकतंत्र के हक में पाठकों की आम राय प्रकट हुई है । इसकी हमें उम्मीद थी तथा इससे हमें नैतिक बल मिला है ।

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दीवाल  -  लेखन  नहीं , परचे नहीं , नुक्कड़ सभायें पहले से कहीं कम , इसके बावजूद  चुनाव खर्च की ऊपरी सीमा में लगातार वृद्धि !  माना जा रहा है कि यह सब कदम गलत – राजनीति पर नकेल कसने के लिए लिए गए हैं !

पिछले ही रविवार को ही हिन्दुस्तान की सम्पादक मृणाल पाण्डे ने अपने नियमित स्तम्भ में बताया कि दुनिया के बड़े अखबार मन्दी का मुकाबला करने के लिए कैसे खुद को दीवालिया घोषित करने से ले कर छँटनी की कार्रवाई कर रहे हैं तथा -

” मीडिया की छवि बिगाड़ने वाली घटिया पत्रकारिता के खिलाफ ईमानदार और पेशे का आदर करने वाले पत्रकारों का भी आंदोलित और संगठित होना आवश्यक बन गया है । “

विश्वव्यापी मन्दी के दौर में हो रहे दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र के इस आम चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश में “चुनावी रिपोर्टिंग” के नाम पर प्रमुख हिन्दी दैनिक पत्रकारिता में गलीजपन की नई हदें स्थापित कर रहे हैं । न सिर्फ़ इस गलीजपन की पत्रकारिता से जनता के जानने के हक पर कुठाराघात हो रहा है अपितु इन अखबारों को पढ़ कर राय बनाने में जनता के विवेक पर हमला हो रहा है । इस प्रकार स्वस्थ और निष्पक्ष चुनावों में बाधक के रूप में यह प्रमुख हिन्दी दैनिक  अपनी भूमिका तय कर चुके हैं । यह गौरतलब है इन प्रमुख दैनिकों द्वारा अनैतिक, अवैध व्यावसायिक लेन- देन को खुले आम बढ़ावा दिया जा रहा है । क्या अखबार मन्दी का मुकाबला करने के लिए इन अनैतिक तरीकों से धनार्जन कर रहे हैं ?

गनीमत है कि यह पतनशील नीति अखबारों के शीर्ष प्रबन्धन द्वारा क्रियान्वित की जा रही है और उन दैनिकों में काम करने वाले पत्रकार  इस पाप से सर्वथा मुक्त हैं । आपातकाल के पूर्व तानाशाही की पदचाप के तौर पर सरकार द्वारा अखबारों के विज्ञापन रोकना और अखबारी कागज के कोटा को रोकना आदि गिने जाते थे । आपातकाल के दौरान बिना सेंसरशिप की खबरों के स्रोत भूमिगत साइक्लोस्टाइल बुलेटिन और बीबीसी की विश्व सेवा हो गये थे ।  “हिम्मत” (सम्पादक राजमोहन गांधी , कल्पना शर्मा ) , “भूमिपुत्र” (गुजराती पाक्षिक ,सम्पादक – कान्ति शाह ) जैसी छोटी पत्रिकाओं ने प्रेस की आज़ादी के लिए मुद्रणालयों की तालाबन्दी सही और उच्च न्यायालयों में भी लड़े । भूमिपुत्र के प्रेस पर तालाबन्दी होने के बाद रामनाथ गोयन्का ने अपने गुजराती दैनिक के मुद्रणालय में उसे छापने दिया ।  तानाशाही का मुकाबला करने वाली इन छोटी पत्रिकाओं से जुड़े युवा पत्रकार आज देश की पत्रकारिता में अलग पहचान रखते है – कल्पना शर्मा , नीरजा चौधरी , संजय हजारिका ।

दूसरी ओर मौजूदा चुनावों में पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख अखबार हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण ने चुनावी विज्ञापनों को बतौर  “खबर”   छापने के लिए मुख्यधारा के दलों के हर  उम्मीदवारों से बिना रसीद अवैध रूप से दस से २० लाख रुपये लिये हैं। धन देने के बाद न सिर्फ़ विज्ञापननुमा एक – एक पृष्ट चित्र- संग्रह छापे जा रहे हैं तथा समाचार भी धन प्रभावित तरीके से बनाये जा रहे हैं ।

आम चुनावों के पहले हुए विधान परिषद के लिए हुए स्नातक सीट के निर्वाचन में प्रत्याशी रह चुके समाजवादी डॉ. सुबेदार सिंह बताते हैं कि अखबारों को आर्थिक लाभ पहुंचाने की चाह पूरी न कर पाने के कारण मतदान के एक सप्ताह पहले ही अखबारों से उनका लोप हो गया था । अम्बेडकरवादी चिन्तक डॉ. प्रमोद कुमार कहते हैं अखबारों द्वारा अपनाई गई यह चुनाव नीति लोकतंत्र के भविष्य के लिए खतरनाक है ।

समाजवादी जनपरिषद की उत्तर प्रदेश इकाई अखबारों द्वारा अपनाये जा रहे इस लोकतंत्र विरोधी आचरण के सन्दर्भ में चुनाव आयोग तथा प्रेस परिषद से हस्तक्षेप करने की अपील करती है ।  दल ने यह निश्चय किया है कि इस खतरनाक रुझान के सन्दर्भ में लोक राजनैतिक मंच के न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर तथा वरिष्ट पत्रकार कुलदीप नैयर का ध्यान भी खींचा जायेगा।

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इस सैद्धान्तिक अन्तर्विरोध का हल खोजने की कोशिश में हम एक नये सत्य पर पहुचते हैं । दरअसल पूंजीवाद का तीन – चार सौ सालों का पूरा इतिहास देखें, तो वह लगातार प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्जा करने और उससे लोगों को बेदखल करने का इतिहास है । एशिया व अफ्रीका के देशों को उपनिवेश बनाने के पीछे वहाँ के श्रम के साथ साथ वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों की लूट का आकर्षण प्रमुख रहा है । दोनों अमरीकी महाद्वीपों और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के मूल निवासियों को नष्ट करके वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की लालसा ही यूरोपीय गोरे लोगों को वहाँ खींच लाई । जिसे मार्क्स ने ‘पूंजी का आदिम संचय’ कहा है वह दरअसल पूंजीवाद की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है । इसके बगैर भी पूंजीवाद चल नहीं सकता । मजदूरों के शोषण की तरह प्राकृतिक संसाधनों की लूट भी पूंजी के संचय का अनिवार्य हिस्सा है ।
पूंजीवादी औद्योगीकरण एवं विकास के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तरीके से कितने बड़े पैमाने पर जंगल नष्ट किया गया , कितने बड़े पैमाने पर जमीन की जरूरत है , कितने बड़े पैमाने पर पानी की जरूरत है , कितने बड़े पैमाने पर खनिज निकालना होगा , कितने बड़े पैमाने पर उर्जा चाहिए – ये बातें अब धीरे धीरे साफ़ हो रही हैं और उनका अहसास बढ़ रहा है । यदि यह पूंजीवाद की अनिवार्यता है तो पूंजीवाद के विश्लेषण में इन्हें शामिल करना होगा । जो मूल्य का श्रम सिद्धान्त मार्क्स ने अपनाया वह इसमें बाधक होता है । श्रम के शोशण को समझने और उत्पादन की प्रक्रिया में श्रम के महत्व को बताने के लिए तो यह सिद्धान्त ठीक है , किन्तु प्राकृतिक संसाधनों का इसमें कोई स्थान नहीं है । ऐसा शायद इसलिए भी है कि प्राकृतिक संसाधनों को प्रकृति का मुफ्त उपहार मान लिया जाता है । लेकिन सच्चाई यह है कि प्रकृति को बड़े पैमाने पर लूटे बगैर तथा उस पर निर्भर समुदायों को उजाड़े-मिटाये बगैर पूंजीवादी व्यवस्था के मूल्य का सृजन हो ही नहीं सकता । ‘अतिरिक्त मूल्य’ का एक स्रोत श्रम के शोषण में है, तो एक प्रकृति की लूट में भी । जिसे पूंजीवादी मुनाफा कहा जाता है उसमें प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्जे , एकाधिकार और लूट से उत्पन्न ‘लगान’ का भी बड़ा हिस्सा छिपा है ।
प्राकृतिक संसाधनों की यह लूट को नवौपनिवेशिक शोषण या आन्तरिक उपनिवेश की लूट से स्वतंत्र नहीं है , बल्कि उसीका हिसा है । शोषण व लूट के इस आयाम को पूंजीवाद के विश्लेषण के अंदर शामिल करना जरूरी हो गया है। मार्क्स और लोहिया के समय यह उभर कर नहीं आया था । इसलिए अब पूंजीवाद के समझने के अर्थशास्त्र को मार्क्स और लोहिया से आगे ले जाना होगा । गांधीजी जो शायद ज्यादा दूरदर्शी व युगदृश्टा थे इसमें हमारे मददगार हो सकते हैं ।
पूंजीवाद एक बार फिर गहरे संकट में है । वित्तीय संकट , विश्वव्यापी मन्दी और बेरोजगारी आदि इसका एक आयाम है । यह भी गरीब दुनिया के मेहनतकश लोगों के फल को हड़पने के लिए शेयर बाजार , सट्टा , बीमा , कर्ज का व्यापार जैसी चालों का नतीजा है जिसमें कृत्रिम समृद्धि का एक गुब्बारा फुलाया गया था । वह गुब्बारा फूट चुका है । लेकिन इस संकट का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम पर्यावरण का संकट , भोजन का संकत और प्राकृतिक संसाधनों का संघर्ष है । दुनिया के अनेक संघर्ष जल, जंगल , जमीन , तेल और खनिजों को ले कर हो रहे हैं । इन संकटों से पूंजीवादी विकास की सीमाओं का पता चलता है । इन सीमाओं को समझकर , पूंजीवाद की प्रक्रियाओं का सम्यक विश्लेषण करके , उस पर निर्णायक प्रहार करने का यह सही मौका है । यदि हम ऐसा कर सकें तो जिसे ‘इतिहास का अंत’ बताया जा रहा है , वह एक नये इतिहास को गढ़ने की शुरुआत हो सकता है ।
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सुनील ,समाजवादी जनपरिषद ,ग्रा?पो. केसला,वाया इटारसी,जि होशंगाबाद,(म.प्र.) ४६११११
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इस लेख का प्रथम भाग , दूसरा भाग

सुनील की अन्य लेखमाला : औद्योगीकरण का अन्धविश्वास : ले. सुनील

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पिछले भाग से आगे : जाहिर है लोहिया का यह निष्कर्ष गलत साबित हुआ । पूंजीवाद ज्यादा दीर्घायु और ज्यादा स्थायी साबित हुआ तथा कई संकटों को पार कर गया । मार्क्स की ही तरह लोहिया की भविष्यवाणी भी गलत साबित हुई । दरअसल , इस निबन्ध को वे पचीस तीस साल बाद लिखते तो आसानी से देख लेते कि उपनिवेशों के आजाद होने के साथ औपनिवेशिक शोषण तथा साम्राज्यवाद खतम नहीं हुआ , बल्कि उसने नव-औपनिवेशिक रूप धारण कर लिया । अंतरराष्ट्रीय व्यापार , अंतरराष्ट्रीय कर्ज , विदेशी निवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विस्तार के जरिए यह शोषण चलता ही नहीं रहा बल्कि बढ़ता गया । सुदूर क्षेत्रों तक घुसपैठ व कमाई के जरिए पूंजीवाद को मिले । नतीजतन पूंजीवाद फलता फूलता गया । भूमंडलीकरण का नया दौर इसी नव औपनिवेशिक शोषण को और ज्यादा बढ़ाने के लिए लाया गया है ।
औपनिवेशिक प्रक्रिया का एक और रूप सामने आया है । वह है आंतरिक उपनिवेशों का निर्माण । सच्चिदानन्द सिन्हा जैसे समाजवादी विचारकों ने हमारा ध्यान इस ओर आकर्षित किया है । दुनिया के गरीब देशों में जो सीमित औद्योगीकरण हुआ है , वह इसी प्रक्रिया के साथ हुआ है । जब बाहरी उपनिवेश बनाना संभव नहीं होता , तो पूंजीवादी विकास देश के अंदर ही उपनिवेश बनाता है । जैसे भारत के पिछड़े एवं आदिवासी इलाके एक तरह के आंतरिक उपनिवेश हैं । पूर्व सोवियत संघ के एशियाई हिस्से भी आंतरिक उपनिवेश ही थे । आंतरिक उपनिवेश सिर्फ भौगोलिक रूप में होना जरूरी नहीं है । अर्थव्यवस्था एवं समाज के विभिन्न हिस्से भी आंतरिक उपनिवेश की भूमिका अदा कर सकते हैं । जैसे गांवों और खेती को पूंजीवादी व्यवस्था में एक प्रकार का आंतरिक उपनिवेश बना कर रखा गया है , जिन्हें वंचित ,शोषित और कंगाल रख कर हे उद्योगों और शहरो का विकास होता है । भारत जैसे देशों का विशाल असंगठित क्षेत्र भी एक प्रकार का आंतरिक उपनिवेश है जिसके बारे में सेनगुप्ता आयोग ने हाल ही में बताया कि वह २० रुपये रोज से कम पर गुजारा करता है । लेकिन यह भी नोट करना चाहिए कि पूंजीवादी विकास की औपनिवेशिक शोषण की जरूरत इतनी ज्यादा है कि सिर्फ आंतरिक उपनिवेशों से एक सीमा तक , अधकचरा औद्योगीकरण ही हो सकता है । भारत इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है , जहाँ औद्योगीकरण की एक सदी के बावजूद देश का बहुत बड़ा हिस्सा बहिष्कृत और हाशिए पर है तथा देश की श्रम शक्ति का ८ फीसदी भी संगठित क्षेत्र में नहीं लग पाया है ।
इस प्रकार नव औपनिवेशिक शोषण एवं आतंरिक उपनिवेश की इन प्रक्रियाओं से पूंजीवाद ने न केवल अपने को जिन्दा रखा है , बलिक बढ़ाया व फैलाया है । लेकिन इससे लोहिया की मूल स्थापना खारिज नहीं होती हैं , बल्कि और पुष्ट होती हैं । वह यह कि पूंजीवाद के लिए देश के अंदर कारखानों खदानों के मजदूरों का शोषण पर्याप्त नहीं है । इसके लिए शोषण के बाहरी स्रोत जरूरी हैं । उपनिवेश हों , नव उपनिवेश हों या आंतरिक उपनिवेश हों उनके शोषण पर ही पूंजीवाद टिका है । साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद पूंजीवाद के अनन्य सखा सहोदर हैं । इसीसे यह निष्कर्ष भी निकलता है आधुनिक औद्योगिक पूंजीवादी विकास कभी भी सब के लिए खुशहाली नहीं ला सकता है । बड़े हिस्से की कीमत पर कुछ लोगों का ही विकास हो सकता है । यदि दुनिया के सारे इलाकों और सारे लोगों को विकास चाहिए तो पूंजीवाद का विकल्प खोजना होगा ।
पूंजीवाद का एक और आयाम है ,जो तेजी से उभर कर आ रहा है । धरती का गरम होना , बढ़ता प्रदूषण , नष्ट होती प्रजातियां , पर्यावरण का बढ़ता संकट, प्राकृतिक संसाधनों के बढ़ते संघर्ष आदि इस बात की ओर इंगित कर रहे हैं कि पूंजीवादी विकास में प्रकृति भी एक महत्वपूर्ण कारक है । जैसे श्रम का अप्रत्यक्ष (औपनिवेशिक) शोषण पूंजीवाद में अनिवार्य रूप से निहित है , वैसे ही प्रकृति के लगातार बढ़ते दोहन और शोषण के बिना पूंजीवादी विकास नहीं हो सकता । जैसे जैसे पूंजीवाद का विकास और विस्तार हो रहा है प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और एक तरह का अघोषित युद्ध बढ़ता जा रहा है । जिन पारंपरिक समाजों और समुदायों की जिन्दगियां प्रकृति के साथ ज्यादा जुड़ी हैं जैसे आदिवासी , पशुपालक , मछुआरे , किसान आदि उनके ऊपर भी हमला बढ़ता जा रहा है । पूंजीवाद के महल का निर्माण उनकी बलि देकर किया जा रहा है ।
पिछले दिनों भारत में नन्दीग्राम , सिंगूर , कलिंगनगर आदि के संघर्षों ने औद्योगीकरण की प्रकृति व जरूरत पर एक बहस खड़ी की , तो कई लोगों को इंग्लैंड में पूंजीवाद की शुरुआती घटनाओं की याद आईं जिसे कार्ल मार्क्स ने ‘पूंजी का आदिम संचय’ नाम दिया था । दोनों में काफ़ी समानतायें दिखाई दे रही थीं । इंग्लैंड में तब बड़े पैमाने पर किसानों को अपनी जमीन पर से बेदखल किया गया था , ताकि ऊनी वस्त्र उद्योग हेतु भेड़पालन हेतु चारागाह बनाये जा सकें और बेदखल किसानों से बेरोजगारों की सस्ती श्रम – फौज , नये उभर रहे कारखानों को मिल सके । कई लोगों ने कहा कि भारत में वही हो रहा है। लेकिन मार्क्स के मुताबिक तो वह पूंजीवाद की प्रारंभिक अवस्था थी । क्या यह माना जाए कि भारत में पूंजीवाद अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है । यह कब परिपक्व होगा ?
[ जारी ]

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[ लेखक समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा अर्थशास्त्री हैं | डा. राममनोहर लोहिया की प्रसिद्ध पुस्तक Marx , Gandhi and Socialism का एक अध्याय है-Economics after Marx |प्रस्तुत आलेख उसके आगे का कथन है | ]

मानव इतिहास के हर दौर में दुनिया को बदलने और बेहतर बनाने की कोशिशें हुई हैं। ऐसी हर कोशिश के पीछे दुनिया की मौजूदा व्यवस्था और विकास की एक समझ रहती है। मार्क्स और गांधी आधुनिक युग के दो प्रमुख विचारक रहे हैं जिनकी सोच व समझ परिवर्तनकर्मियों के लिए प्रेरणा और शक्ति का स्रोत रही है । डॉ. राममनोहर लोहिया जिनकी जन्म शताब्दी इस वर्ष मनायी जाने वाली है , को मार्क्स और गांधी के बीच एक वैचारिक पुल बनाने वाला माना ज सकता है ।

कार्ल मार्क्स ने हमे बताया कि किस प्रकार पूंजीवाद का पूरा ढाँचा मजदूरों के शोषण पर टिका है । मजदूर की मेहनत से जो पैदा होता है , उसका एक हिस्सा ही उसको मजदूरी के रूप में दिया जाता है । शेष हिस्सा ‘अतिरिक्त मूल्य’ होता है , जो पूँजीपति के मुनाफे का आधार होता है । यही मुनाफा पूँजीवादी विकास का आधार होता है । मार्क्स ने कल्पना की थी कि औद्योगीकरण के साथ बड़े बड़े कारखानों में बहुत सारे मजदूर एक साथ काम करेंगे । वर्ग चेतना के विकास के साथ वे संगठित होंगे , ज्यादा मजदूरी पाने के लिए आन्दोलन करेंगे । लेकिन मुनाफा और मजदूरी एक साथ नहीं बढ़ सकते । यही वर्ग संघर्ष बढ़ते बढ़ते क्रांति का रूप ले लेगा और तब समाजवाद आएगा । मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी कि पश्चिम यूरोप जहाँ पूँजीवादी औद्योगीकरण सबसे पहले व ज्यादा हुआ है , वहीं क्रांति सबसे पहले होगी ।

किन्तु मार्क्स की भविष्यवाणी सही साबित नहीं हुई । क्रांति हुई भी तो रूस में , जो अपेक्षाकृत पिछड़ा , सामंती और कम औद्योगीकृत देश था । इसके बाद चीन में क्रांति हुई , वहाँ तो औद्योगीकरण नहीं के बराबर हुआ था । चीन की क्रांति तो पूरी की पूरी किसानों की क्रांति थी , जबकि मार्क्स की कल्पना थी कि सर्वहारा मजदूर वर्ग क्रांति का अगुआ होगा । पश्चिमी यूरोप में पूँजीवादी औद्योगीकरण के दो सौ वर्ष बाद भी क्रांति नहीं हुई । पूँजीवाद भी इस दौर में नष्ट होने के बजाए , संकटों को पार करते हुए , फलता फूलता गया ।

मार्क्सवाद की इस उलझन को सुलझाने का एक सूत्र तब मिला जब १९४३ में डॉ. राममनोहर लोहिया का निबन्ध ‘अर्थशास्त्र मार्क्स के आगे’ प्रकाशित हुआ । इसे दुनिया के गरीब पिछड़े मुल्कों के नजरिए से मार्क्सवाद की मीमांसा भी कहा जा सकता है । लोहिया ने बताया की पूंजीवाद का मूल आधार पूंजीवादी देशों में पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों का शोषण नहीं बल्कि उपनिवेशों के किसानों ,कारीगरों और मजदूरों का शोषण है । यही ‘अतिरिक्त मूल्य’ का मुख्य स्रोत है । इसीके कारण पूंजीवादी देशों में मुनाफा मजदूरी का द्वन्द्व टलता गया , क्योंकि दुनिया के विशाल औपनिवेशिक देशों की लूट का एक हिस्सा पूंजीवादी देशों के मजदूरों को भी मिल गया । यह संभव हुआ कि मजदूरी और मुनाफा दोनों साथ साथ बढ़ें। इसीलिए पश्चिमी यूरोप में क्रांति नहीं हुई । इसी के साथ लोहिया ने लेनिन की इस बात को भी काटा कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अन्तिम अवस्था है । लोहिया ने कहा कि पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का प्रारंभ और विकास एक साथ हुआ । बिना साम्राज्यवाद के पूंजीवाद का विकास हो ही नहीं सकता । मार्क्स की ही एक शिष्या रोजा लक्समबर्ग की तरह लोहिया ने बताया कि पूंजीवाद के विकास के लिए एक बाहरी उपनिवेश जरूरी है , जहाँ के बाजारों में माल बेचा जा सके और जहाँ से सस्ता कच्चा माल और सस्ता श्रम मिल सके । इसी विश्लेषण के आधार पर लोहिया ने कहा कि असली सर्वहारा तो तीसरी दुनिया के किसान मजदूर हैं । वे ही पूंजीवाद की कब्र खोदेंगे ।

जब लोहिया ने यह निबंध लिख तब दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था और उसके पहले जबरदस्त मंदी का दौर आ चुका था । पूंजीवाद के संकटों को समझने के लिए भी लोहिया ने एक नई दृष्टि दी । कीन्स और मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों के मुताबिक पूंजीवादी देशों की उत्पादन क्षमता और मांग या क्रय शक्ति के अंतर से ये संकट आते हैं । लोहिया के मुताबिक सिर्फ इतना कहना अर्ध सत्य है । इन संकटों का असली स्रोत साम्राज्यवादी प्रक्रिया में है । लोहिया के शब्दों में , ‘ उत्पादन के पुराने तरीके से किसी साम्राज्यवादी क्षेत्र की शोषण – सीमा के समाप्त होने पर आर्थिक संकट उत्पन्न होता है , जो किसी नये क्षेत्र की खोज के उपरान्त समाप्त होता है , जहाँ नये आविष्कारों का उपयोग किया जा सके ।’

इसी विश्लेषण के आधार पर लोहिया ने उस निबंध में कहा कि चूंकि पूरी दुनिया को उपनिवेश बनाया जा चुका है , अब कोई नया भूभाग उपनिवेश बनाने के लिए बचा नहीं है, पूंजीवाद स्थाई संकट की अवस्था में पहुंच गया है । इसकी वृद्धि का मार्ग बन्द हो चुका है , इसकी सीमा आ चुकी है । या तो यह टूट जायेगा या धन के निम्न स्तर पर स्थायित्व प्राप्त कर लेगा । पूंजीवाद के सिरमौर के रूप में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के उदय और पश्चिमी यूरोप की जगह लेने को लोहिया नो्ट करते हैं लेकिन उसके नेतृत्व में पूंजीवाद के संकट का हल हो सकेगा ,इसमें वे गहरी शंका जाहिर करते हैं ।

[ जारी ]

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