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Archive for the ‘communalism’ Category

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए।

आजादी की लड़ाई का एक साफ मकसद था , गुलामी के जुए को उतार फेकना। जब उद्देश्य ऊंचा और साफ-साफ होता है तब समाज का हर तबका उस  राजनीति से जुड़ जाता है । मौजूदा विधान सभा चुनाव एक ऐसे दौर में हो रहा है जब देश के हर नागरिक के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ तीव्र भावना है । लेकिन राजनीति की मुख्यधारा के अधिकांश’ दलों के पांव भ्रष्टाचार के कीचड से सने हैं। इसी वजह से आम जनता का इन चुनावों में उत्साह कम दिख रहा है। देश में बड़े बड़े घोटालों की आई बाढ़ की जड़ से १९९२ से चलाई गई आर्थिक नीतियों का सीधा सम्बन्ध है। इन नीतियों को केन्द्र और राज्य में रही हर दल की सरकार ने अपना लिया है। इसीलिए ये तमाम पारटियां इस चुनाव में इन मसलों से मुंह चुरा रही हैं । 

शिक्षित नौजवानों को छोटी-सी नौकरी भी बिना रिश्वत नहीं मिल रही। नई आर्थिक नीतियों से रोजगार के अवसर संकुचित हुए हैं। आबादी के मुट्ठी-भर लोगों के लिए रोजगार,स्वास्थ्य,शिक्षा की सुविधाओं को बढ़ावा देने का सीधा मतलब है कि आम लोगों को इन सुविधाओं से दूर किया जाना। जब आम जनता की जरूरतों को पूरा करना उद्देश्य होगा तब ही रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और वे रोजगार सुरक्षित रहेंगे। एक प्रभावशाली जन लोकपाल कानून की धज्जियां उड़ाने में सभी बड़े दलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी ।  भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिए जन लोकपाल के अलावा भी अन्य पहल भी करनी होंगी।

बुनकरी-जरदोजी तथा अन्य रोजगार , स्वास्थ्य , शिक्षा – इन सभी क्षेत्रों में जनता की दुशवारियां बढ़ गई हैं। आम बुनकर और दस्तकार को ध्यान में रखकर कपड़ा नीति और दस्तकार नीति अब तक नहीं बनी है । सभी बड़ी पार्टियां इसके लिए जिम्मेदार हैं । बुनकरों की सहकारी समिति के नाम पर फर्जीवाड़े के मामले भी सामने आए हैं । जरदोजी और दस्तकारी से जुड़े लोगों को बुनकरों के समान सुविधायें मिलनी चाहिए। बुनकर और दस्तकार इस देश के लिए बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं लेकिन उनकी तरक्की की हमेशा अनदेखी की जाती है।
खेती और दस्तकारी के बाद हमारे देश में सबसे बड़ा रोजगार खुदरा-व्यापार है जिस पर हमले की रणनीति बन चुकी है। केन्द्र सरकार की पार्टी के राजकुंवर की समझदारी के अनुसार दानवाकार विदेशी कम्पनियों को देश का खुदरा-व्यापार सौंप कर वे किसानों का भला करने जा रहे हैं । देश के सबसे बड़े घराने के द्वारा जिन सूबों में सब्जी का खुदरा-व्यवसाय हो रहा है क्या वहां के किसानों ने खुदकुशी से मुक्ति पा ली है ?
प्रदेश की सरकार द्वारा भ्रष्टाचार को नया संस्थागत रूप दे दिया गया है। किसानों की जमीनें लेकर जो बिल्डर नये नगर और एक्सप्रेस-वे बनाने की जुगत में है, उनके खर्च पर प्रदेश सरकार पुलिस थाने ( चुनार ) का निर्माण करवाया है। कई पुलिस चौकियां अपराधियों के पैसों से बनवाई गई हैं। समाजवादी जनपरिषद नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए बना है। जिन इलाकों में दल ने संघर्ष किया है और मजबूत जमीन बना ली है सिर्फ वहीं चुनाव में शिरकत करता है।  मजबूत राजनैतिक विकल्प बनाने का काम व्यापक जन-आन्दोलन द्वारा ही संभव है । इसलिए भ्रष्ट राजनीति के दाएरे से बाहर चलने वाले आन्दोलनों और संगठनों के मोर्चे का वह हिस्सा है। राष्ट्रीय-स्तर पर लोक राजनीति मंच’ तथा जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय ऐसी बड़ी पहल हैं तथा स्थानीय स्तर पर साझा संस्कृति मंच , जो सामाजिक सरोकारों का साझा मंच है ।
वाराणसी के हमारे प्रत्याशी की राजनैतिक यात्रा इसी शहर में भ्रष्टाचार विरोधी जयप्रकाश आन्दोलन के किशोर कार्यकर्ता के रूप में  शुरु हुई| छात्र-राजनीति को जाति-पैसे-गुंडागर्दी से मुक्त कराने की दिशा में समता युवजन सभा से वे जुड़े और एक नयी राजनीति की सफलता के शुरुआती प्रतीक बने। लोकतांत्रिक अधिकार और विकेन्द्रीकरण , सामाजिक न्याय ,पर्यावरण तथा आर्थिक नीति के दुष्परिणामों के विरुद्ध संगठनकर्ता बने तथा इन्हीं संघर्षों के लिए समाज-विरोधी ताकतों के लाठी-डंडे खाये और थोपे गए फर्जी मुकदमों में कई बार जेल गये। फिरकावाराना ताकतों का मुकाबला करने के लिए नगर में गठित ‘सद्भाव अभियान’ से वे सक्रियता से जुड़े । साम्प्रदायिक दंगों के दौरान थोपे गये फर्जी मुकदमों को हटाने के पक्ष में तथा हिंसा में शरीक लोगों पर लगे मुकदमों को सरकार द्वारा हटाने के विरुद्ध अफलातून ने कामयाब कोशिश की। पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ हमारे समूह ने रचनात्मक संघर्ष का सहारा लिया है तथा मानवाधिकार आयोग द्वारा सार्थक हस्तक्षेप के लिए पहल की है ।
वाराणसी के स्त्री सरोकारों के साझा मंच – समन्वय के माध्यम से शहर में ही नहीं समूचे राज्य में हुए नारी-उत्पीड़न के विरुद्ध कारगर आवाज उठाई गई है ।
रोज-ब-रोज की नागरिक समस्याओं का समाधान नगर निगम और उसके सभासदों के स्तर पर होना चाहिए । विधायक-नीधि का दुरुपयोग ज्यादा होगा यदि कोई ठेकेदार ही विधायक बन जाए।
इसलिए वाराणसी कैन्ट क्षेत्र में भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलों का विकल्प खोजने की आप कोशिश करेंगे तो आपकी निराशा दूर हो सकती है । बड़े दलों से जनता की निराशा के कारण फिर अस्पष्ट बहुमत का दौर शुरु होगा ऐसा प्रतीत हो रहा है।इसलिए समाजवादी जनपरिषद के उम्मीदवार विधान सभा में विपक्ष में रहने और जन आकांक्षाओं की आवाज को बुलन्द करने का संकल्प लेते हैं। हमें जनता के विवेक पर भरोसा है। यह सिर्फ अफवाह ही हो सकती है कि सुबह होगी ही नहीं । सुबह होगी क्योंकि मत, बल,समर्थन आपके हाथ में है। भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलो से छुटकारा पाने की आपकी कोशिश सफल होगी यह हमे यकीन है। विधान सभा में आपकी आवाज बुलन्द हो इसलिए हम आप से अपील करते हैं कि अपना अमूल्य वोट देकर वाराणसी कैन्ट से समाजवादी जनपरिषद के साफ-सुथरे और जुझारु उम्मीदवार अफ़लातून को भारी मतों से विजयी बनाएं ।निवेदक,
समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश
लोक राजनैतिक मंच                                     साझा संस्कृति मंच

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अपनी आवाज अपना गला ( दुनिया मेरे आगे )

Monday, 26 December 2011 06:10

अफलातून जनसत्ता 26 दिसंबर, 2011: हरे राम, हरे कृष्ण’ संप्रदाय द्वारा रूसी में अनूदित गीता पर रूस में आक्षेप लगाए गए हैं और उस पर प्रतिबंध लगाने की बात की गई है। विदेश मंत्री ने संसद और देश को आश्वस्त किया है कि वे रूस सरकार से इस मामले पर बात करेंगे। मामला पर-राष्ट्र का है। क्या भारत में ही इस पुस्तक को लेकर परस्पर विपरीत समझदारी नहीं है? यह मतभेद और संघर्ष सहिष्णु बनाम कट्टरपंथी का है। लोहिया ने इसे ‘हिंदू बनाम हिंदू’ कहा। उन्होंने गांधी-हत्या (हत्यारों की शब्दावली में ‘गांधी-वध’) को भी हिंदू बनाम हिंदू संघर्ष के रूप में देखा। देश के विभाजन के बाद एक बार गांधीजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में निमंत्रित किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई थी। सरसंघचालक गोलवलकर ने गांधीजी का स्वागत करते हुए उन्हें ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ बताया। उत्तर में गांधीजी बोले- ‘मुझे हिंदू होने का गर्व अवश्य है, लेकिन मेरा हिंदू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी हैं। हिंदू धर्म की विशिष्टता, जैसा मैंने उसे समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। अगर हिंदू यह मानते हों कि भारत में अ-हिंदुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हें घटिया दर्जे से संतोष करना होगा तो इसका परिणाम यह होगा कि हिंदू धर्म श्रीहीन हो जाएगा। मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही है कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा।’
गोलवलकर से गांधीजी के वार्तालाप के बीच में गांधी-मंडली के एक सदस्य बोल उठे- ‘संघ के लोगों ने निराश्रित शिविर में बढ़िया काम किया है। उन्होंने अनुशासन, साहस और परिश्रमशीलता का परिचय दिया है।’ गांधीजी ने उत्तर दिया- ‘लेकिन यह न भूलिए कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासिस्टों ने भी यही किया था।’ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।

(पूर्णाहुति, चतुर्थ खंड, पृष्ठ- 17) इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उसमें गांधीजी से पूछा गया- ‘क्या हिंदू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता? अगर नहीं देता तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है, उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है?’ गांधीजी ने कहा- ‘पहले प्रश्न का उत्तर ‘हां’ और ‘नहीं’ दोनों है। मारने का प्रश्न खड़ा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है? दूसरे शब्दों में- हमें ऐसा अधिकार मिल सकता है, जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जाएं। एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने या फांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है? रही बात दूसरे प्रश्न की, तो यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है, तो भी कानून द्वारा उचित रूप में स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भली-भांति कर सकती है। अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद, दोनों एक साथ बन जाएं तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जाएंगे। उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए। कानून को अपने हाथों में लेकर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए।’ (संपूर्ण गांधी वांग्मय, खंड: 89)
आध्यात्मिक सत्य को समझाने के लिए कई बार भौतिक दृष्टांत की आवश्यकता पड़ती है। यह भाइयों के बीच लड़े गए युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि हमारे स्वभाव में मौजूद ‘भले’ और ‘बुरे’ के बीच की लड़ाई का वर्णन है। मैं दुर्योधन और उसके दल को मनुष्य के भीतर की बुरी अंत:प्रेरणा और अर्जुन और उसके दल को उच्च अंत:प्रेरणा मानता हूं। हमारी अपनी काया ही युद्ध-भूमि है। इन दोनों खेमों के बीच आंतरिक लड़ाई चल रही है और ऋषि-कवि उसका वर्णन कर रहे हैं। अंतर्यामी कृष्ण, एक निर्मल हृदय में फुसफुसा रहे हैं। गांधीजी तब भले ही एक व्यक्ति हों, आज तो उनकी बातें कालपुरुष के उद्गार-सी लगती हैं और हमारे विवेक को कोंचती हैं। उस आवाज को तब न सुन कर हमने उसका ही गला घोंट दिया था। अब आज? आज तो आवाज भी अपनी है और गला भी अपना!

गांधी जी और संघ

जनसत्ता 29 दिसंबर, 2011: अपनी आवाज अपना गला’ (दुनिया मेरे आगे, 26 दिसंबर) में अफलातून जी ने कुछ तथ्यों को सही संदर्भों के साथ प्रस्तुत नहीं किया है। इसमें संघ-द्वेष से आपूरित पूर्वग्रह की झलक मिलती है। देश विभाजन के बाद गांधीजी किसी संघ शिविर में नहीं गए थे। दिल्ली में भंगी बस्ती की शाखा में उन्हें 16 सितंबर, 1947 को आमंत्रित किया गया था। आमंत्रित करने वाले व्यक्ति सरसंघचालक गोलवलकर नहीं, बल्कि दिल्ली के तत्कालीन प्रांत प्रचारक वसंत राव ओक थे। गांधीजी सदैव खुद को गौरवशाली सनातनी हिंदू कहते थे। वसंत राव ओक ने शाखा पर गांधीजी का परिचय ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ कह कर करवाया। गांधीजी ने इस परिचय पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
गोलवलकर से गांधीजी की बातचीत का वर्णन अफलातून जी ने ‘पूर्णाहुति’ का संदर्भ देकर किया है। इस मुलाकात का गांधी संपूर्ण वांग्मय में दो बार जिक्र है। पहला, 21 सितंबर, 1947 को प्रार्थना-प्रवचन में- ‘अंत में गांधीजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु (गोलवलकर) से अपनी और डॉ दिनशा मेहता की बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि मैंने सुना था कि इस संस्था के हाथ भी खून से सने हुए हैं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिलाया कि यह बात झूठ है। उनकी संस्था किसी की दुश्मन नहीं है। उसका उद्देश्य मुसलमानों की हत्या करना नहींं है। वह तो सिर्फ अपनी सामर्थ्य भर हिंदुस्तान की रक्षा करना चाहती है। उसका उद्देश्य शांति बनाए रखना है। उन्होंने (गुरुजी ने) मुझसे कहा कि मैं उनके विचारों को प्रकाशित कर दूं।’
इसका जिक्र गांधीजी ने भंगी बस्ती की शाखा पर अपने भाषण में किया- ‘कुछ दिन पहले ही आपके गुरुजी से मेरी मुलाकात हुई थी। मैंने उन्हें बताया था कि कलकत्ता और दिल्ली में संघ के बारे में क्या-क्या शिकायतें मेरे पास आई थीं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिया कि हालांकि संघ के प्रत्येक सदस्य के उचित आचरण की जिम्मेदारी नहीं ले सकते, फिर भी संघ की नीति हिंदुओं और हिंदू धर्म की सेवा करना मात्र है और वह भी किसी दूसरे को नुकसान पहुंचा कर नहीं। संघ आक्रमण में विश्वास

नहीं रखता। अहिंसा में उसका विश्वास नहीं है। वह आत्मरक्षा का कौशल सिखाता है। प्रतिशोध लेना उसने कभी नहीं सिखाया।’
इस मुलाकात का जैसा वर्णन अफलातून जी ने किया है और अंत में लिखा है कि ‘उन्होंने (गांधीजी ने) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।’ ये विचार प्यारेलाल जी के हो सकते हैं, गांधीजी के नहीं। गांधीजी ने अपने भाषण में जो संघ के विषय में कहा, वह इस प्रकार है- ‘संघ एक सुसंगठित और अनुशासित संस्था है। उसकी शक्ति भारत के हित में या उसके खिलाफ प्रयोग की जा सकती है। संघ के खिलाफ जो आरोप लगाए जाते हैं, उनमें कोई सच्चाई है या नहीं, यह संघ का काम है कि वह अपने सुसंगत कामों से इन आरोपों को झूठा साबित कर दे।’
अफलातून जी ने लिखा है- ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई।’ इसका भी वर्णन संपूर्ण वांग्मय में है। किसी संघ अधिकारी ने गीता के संदर्भ में वहां कुछ भी नहीं कहा था। एक स्वयंसेवक ने गांधीजी द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के संदर्भ में गीता का हवाला देते हुए यह पूछा था- ‘गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण कौरवों का नाश करने के लिए जो उपदेश देते हैं, उसकी आप किस तरह व्याख्या करेंगे?’ गांधीजी ने स्वयंसेवक की समझदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया, संजीदगी से जवाब दिया- ‘… पापी को सजा देने के अधिकार की जो बात गीता में कही गई है, उसका प्रयोग तो केवल सही तरीके से गठित सरकार ही कर सकती है।’ बाद में गांधीजी ने आग्रह किया कि कानून को अपने हाथ में लेकर सरकारी प्रयत्नों में बाधा न डालें।
लेख के अंत में गीता के अर्थ का जो आध्यात्मिक आयाम अफलातून जी ने प्रस्तुत किया है, उस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। अनावश्यक रूप से संघ को बदनाम करने और घृणा फैलाने के प्रयासों को जब इन आयामों में मिश्रित किया जाता है, तब हम समाज की सेवा नहीं, बल्कि उसका नुकसान कर रहे होते हैं।
’महेश चंद्र शर्मा, (पूर्व सांसद), द्वारका, नई दिल्ली

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

खुले मन की जरूरत

जनसत्ता 30 दिसंबर, 2011: जिस तरह महेश चंद्र शर्मा जी ने ‘संघ’ के बचाव में गांधीजी के निकट के साथी, सचिव और जीवनीकार प्यारेलाल जी पर लांछन लगाया है, वह ‘संघ’ के गोयबल्सवादी तौर-तरीके से मेल खाता है। संपूर्ण गांधी वांग्मय में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के दौरान छेड़छाड़ की गई थी, उस पर यूपीए-एक सरकार ने वरिष्ठ सर्वोदयकर्मी नारायण देसाई की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की थी। जांच समिति ने शोधकर्मियों द्वारा लगाए गए छेड़छाड़ के सभी आरोप सही पाए थे और उक्त संस्करण की पुस्तकों और सीडी की बिक्री पर तत्काल रोक लगाने और असंशोधित मूल रूप की ही बिक्री करने की संस्तुति की थी। बहरहाल, जितनी तफसील में इस विषय पर लिखा जा सकता है, उसका मोह न कर मैं इतिहास-क्रम में उलटा जाते हुए सिर्फ ठोस प्रसंगों को रखूंगा।
गांधी को ‘संघ’ के प्रात:-स्मरणीयों में शरीक करने की चर्चा हम महेश जी, प्रबाल जी, अशोक भगत जी, रामबहादुर जी जैसे स्वयंसेवकों से जेपी आंदोलन के दौर (1974-75) से सुनते आ रहे थे। सितंबर और अक्टूबर 2003 में प्रकाशित संघ के काशी प्रांत की शाखा पुस्तिका मेरे हाथ लग गई। स्मरणीय दिवसों में गांधी जयंती के विवरण में ‘देश विभाजन न रोक पाने और उसके परिणामस्वरूप लाखों हिंदुओं की पंजाब और बंगाल में नृशंस हत्या और करोड़ों की संख्या में अपने पूर्वजों की भूमि से पलायन, साथ ही पाकिस्तान को मुआवजे के रूप में करोड़ों रुपए दिलाने के कारण हिंदू समाज में इनकी प्रतिष्ठा गिरी।’ संघ के साहित्य-बिक्री पटलों पर ‘गांधी-वध क्यों’ नामक पुस्तक में ‘वध’ के ये कारण ही बताए गए हैं।
संघ की शाखा में गांधीजी के जाने की तारीख के उल्लेख में अपनी चूक मैं स्वीकार करता हूं। प्यारेलाल जी द्वारा लिखी जीवनी ‘महात्मा गांधी दी लास्ट फेस’ पर महेश जी ने पूर्वाग्रह का आरोप लगाया है। इसलिए दिल्ली डायरी, प्रार्थना प्रवचन और गांधी द्वारा संपादित पत्रों से ही उद्धरण पेश हैं।
गीता की बाबत दिया गया उद्धरण संपूर्ण गांधी वांग्मय (खंड 89) में मौजूद है।
‘अगस्त क्रांति-दिवस’ (9 अगस्त, 1942) को प्रकाशित ‘हरिजन’

(पृष्ठ 261) में गांधीजी ने लिखा- ‘शिकायती पत्र उर्दू में है। उसका सार यह है कि आसफ अली साहब ने अपने पत्र में जिस संस्था का जिक्र किया है (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) उसके 3,000 सदस्य रोजाना लाठी के साथ कवायद करते हैं, कवायद के बाद नारा लगाते हैं- हिंदुस्तान हिंदुओं का है और किसी का नहीं। इसके बाद संक्षिप्त भाषण होते हैं, जिनमें वक्ता कहते हैं- ‘पहले अंग्रेजों को निकाल बाहर करो, उसके बाद हम मुसलमानों को अपने अधीन कर लेंगे। अगर वे हमारी नहीं सुनेंगे तो हम उन्हें मार डालेंगे।’ बात जिस ढंग से कही गई है, उसे वैसी ही समझ कर यह कहा जा सकता है कि यह नारा गलत है और भाषण की मुख्य विषय-वस्तु तो और भी बुरी है।
नारा गलत और बेमानी है, क्योंकि हिंदुस्तान उन सब लोगों का है जो यहां पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे मुल्क का आसरा नहीं ताक सकते। इसलिए वह जितना हिंदुओं का है उतना ही पारसियों, यहूदियों, हिंदुस्तानी ईसाइयों, मुसलमानों और दूसरे गैर-हिंदुओं का भी है। आजाद हिंदुस्तान में राज हिंदुओं का नहीं, बल्कि हिंदुस्तानियों का होगा, और वह किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के निर्वाचित समूची जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा।
धर्म एक निजी विषय है, जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गई है, उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने अस्वाभाविक विभाग हो गए हैं। जब देश से विदेशी हुकूमत उठ जाएगी तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद हंसेंगे। अगर अंग्रेजों की जगह देश में हिंदुओं की या दूसरे किसी संप्रदाय की हुकूमत ही कायम होने वाली हो तो अंग्रेजों को निकाल बाहर करने की पुकार में कोई बल नहीं रह जाता। वह स्वराज्य नहीं होगा।’
महेश जी खुले दिमाग से तथ्यों को आत्मसात करें और ‘प्रात: स्मरणीय’ के पक्ष से परेशान न हों।
’अफलातून, काहिवि, वाराणसी

अप्रासंगिक विषय

चौपाल’ (30 दिसंबर) में अफलातून का जवाब पढ़ा।  उन्होंने अप्रासंगिक विषयों को अपने पत्र में उठाया है, जैसे गांधी संपूर्ण वांग्मय से राजग सरकार ने छेड़छाड़ की और संघ ने महात्मा गांधी का नाम कैसे ‘प्रात: स्मरण’ में जोड़ा। इन मुद्दों का न तो मेरे पत्र में उल्लेख था, न ही अफलातून के मूल लेख में। इस संदर्भ में केवल इतना  कहना है कि मैं संपूर्ण वांग्मय के जिन खंडों को उद्धृत कर रहा हूं, वे राजग सरकार के समय छपे हुए नहीं, बल्कि मई 1983 में नवजीवन ट्रस्ट, अमदाबाद द्वारा प्रकाशित हैं। जो उद्धरण मैंने दिए हैं वे किसी छेड़छाड़ के नहीं, उसी अधिकृत संपूर्ण वांग्मय के हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शिविरों में भारत के महान पुरुषों के नामों का स्मरण ‘प्रात: स्मरण’ में करता है। अफलातून इससे क्यों नाराज हैं! मैंने प्यारेलाल जी पर कोई लांछन अपने पत्र में नहीं लगाया, कृपया पत्र को पुन: ध्यान से पढ़ें। मैंने अफलातून को ‘पूर्वाग्रह-ग्रस्त’ अवश्य कहा है। यदि अफलातून को संघ विषयक कोई ‘पूर्वाग्रह’ नहीं है, तो निश्चय ही यह खुशी की बात है।
अफलातून ने पुन: गांधीजी को सही प्रकार से उद्धृत नहीं किया। जिस तथाकथित नारे और भाषण की शिकायत दिल्ली प्रांत कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने गांधीजी से की थी, उसके संदर्भ में गांधीजी ने जो कुछ ‘हरिजन’ में लिखा उसके वे अंश जो अफलातून ने उद्धृत नहीं किए उन्हें उद्धृत करने से पूरी वास्तविकता ही बदल जाती है।
गांधीजी ने कहा है ‘‘मैं तो यही उम्मीद कर सकता हूं यह नारा अनधिकृत है, और जिस वक्ता के बारे में यह कहा गया है कि उसने ऊपर के विचार व्यक्त किए हैं, वह कोई जिम्मेदार आदमी नहीं है।’’ एक अनधिकृत, गैर-जिम्मेदार नारे और वक्तव्य को लेकर अफलातून क्या सिद्ध करना चाहते हैं, जिसके लेखक के बारे में किसी को कुछ पता नहीं। ऐसे वाहियात नारों और वक्तव्यों के आधार पर आप संघ का आकलन करना चाहते हैं और चाहते हैं कि कोई आपको पूर्वाग्रही भी न कहे! संघ को थोड़ा भी जानने वाला व्यक्ति जानता है कि शाखाओं में कभी नारेबाजी नहीं होती।
उस वाहियात भाषण का भी गांधीजी जवाब देते हैं, यह उनकी संजीदगी है।
अफलातून से केवल इतना निवेदन है कि उन्हें संघ से जो शिकायत हो, वे स्वयं अपने तर्कों से उसे प्रस्तुत करें, किसी महापुरुष की आड़ लेकर उन्हें प्रहार करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। पता नहीं काशी प्रांत की कौन-सी शाखा पुस्तिका उनके हाथ लग गई। देश विभाजन को न रोक पाने के कारण महात्मा जी बहुत दुखी थे, वे 15 अगस्त 1947 के उत्सव में भी शामिल नहीं हुए और द्वि-राष्ट्रवादी पृथकतावादियों के आक्रमण से परेशान हिंदुओं ने गांधीजी के सामने अपनी पीड़ाओं और आक्रोश को व्यक्त किया था। इसका उल्लेख करने में अफलातून को उस पुस्तिका से क्या शिकायत है?
’महेश चंद्र शर्मा, नई दिल्ली

हिन्दू द्विराष्ट्रवादी

महात्मा गांधी का संपूर्ण वांग्मय हिंदी और अंग्रेजी (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी) में प्रकाशन विभाग, भारत सरकार ने छापा है, नवजीवन ट्रस्ट ने नहीं। उसका स्वत्वाधिकार जरूर 1983 से 2008 तक नवजीवन ट्रस्ट के पास रहा। ‘गांधीजीनो अक्षरदेह’ (गुजराती वांग्मय) जरूर नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किया गया है। जिस उद्धरण का हवाला महेश जी ने दिया है, उसे मैंने ‘हरिजन’ (गांधीजी का अंग्रेजी मुखपत्र) के पृष्ठ 261 से लिया है। द्वि-राष्ट्रवादी केवल मुसलिम लीग के लोग नहीं थे, हिंदुओं के लिए हिंदू राष्ट्र को मानने वाले भी द्वि-राष्ट्रवादी हैं।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुसलिम लीग से पहले सावरकर ने धर्म के आधार पर देश के बंटवारे

की बात शुरू कर दी थी। हिंदू-राष्ट्रवादी गांधी के समक्ष अपनी शिकायत कभी प्रार्थना सभा में बम फेंक कर कर रहे थे। अंतत: उन्हीं गांधी जी को गोली मार दी। महेश जी के शब्दों में यह उनकी पीड़ा और आक्रोश मात्र था, जिन्हें शाखा-पुस्तिका में असली हिंदू माना गया है। महेश जी ने शाखा-पुस्तिका के उद्धरण का खंडन नहीं किया है, भले ही उन्हें यह पता न हो कि मेरे हाथ कौन-सी पुस्तिका लग गई। शाखा में नारे नहीं उद्घोष होते हैं, पथ-संचलन भी मौन नहीं हुआ करते।
गांधी-हत्या को ‘गांधी-वध’ कहने वालों की किताबें भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय 11, अशोक मार्ग पर भी बिक रही थीं-


http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2011/09/post-195.html

’अफलातून, वाराणसी

 

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श्री लालकृष्ण आडवाणी जी के नाम खुला पत्र

आदरणीय आडवाणी जी,

सादर नमस्कार,

भ्र्रष्टाचार के विरोध मे आपकी जनचेतना यात्रा मध्यप्रदेश से गुजर रही है। इसे सफल बनाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी रात दिन एक कर रही है। खराब सड़कें दुरूस्त की जा रही हैं। स्वागत के लिए बंधनद्वार सजाए जा रहे हैं। सुरक्षा की माकूल व्यवस्था की जा रही है। यात्रा में पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। यह करोडों रूपये कहां से आ रहा है, यह जिज्ञासा हर नागरिक के मन में है।

संघ मुख्यालय पर दण्डवत, प्रणाम और हाजिरी देकर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी छोड़ने का भरोसा देने के बाद इस यात्रा की मंजूरी मिल पाई। पार्टी में जारी अन्र्तकलह को दरकिनार करते हुए अन्ततः यात्रा प्रारंभ हो गई। यह प्रसन्नता का विषय है।

भाजपा शासित राज्यों में भी नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है।

मध्यप्रदेश में ऐसा कोई विभाग नहीं है, जहां बिना पैसे दिए काम होता हो। पटवारी से लेकर अधिकारियो, कर्मचारियों के पास करोड़ों की संपत्ति जब्त होने की खबरों से जाहिर होता है कि यहां नौकरशाही को जनता को लूटने और भ्रष्टाचार की खुली लूट मिली हुई है। मुख्यमंत्री से लेकर कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप पार्टी की अंदरूनी उठापटक में बाहर आते रहते हैं।

मध्यप्रदेश में किसी भी बड़े छोटे पद पर बैठा आपकी पार्टी का व्यक्ति पैसा खाने और कमाने में लगा हुआ है। नेताओं व मंत्रियों के संरक्षण में जंगल माफिया, रेत माफिया, भूमाफिया, शिक्षा माफिया, सहकारी माफिया सक्रिय होकर करोड़ों के वारे-न्यारे कर रहे है। राशन की दुकान हथियाने व राशन की कालाबाजारी करने में आपकी पार्टी पीछे नहीं हैं।

मध्यप्रदेश के किसानों की बड़ी दुर्दशा हो रही है। सरकार के तमाम दावों के बावजूद उन्हें घटिया बीज, नकली खाद, महंगे डीजल और बिजली कटौती की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। खेती में बढ़ती लागत और खुले बाजार की नीति के कारण किसानी घाटे में जा रही है। प्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं का दौर जारी है। आपके सहयोगी सगठन भारतीय किसान संघ खुद किसानों के मुद्दे पर आंदोलन चला रहा है।

मध्यप्रदेश में कुपोषित बच्चों की लगातार मौतों की खबर विकास के सारे दावों की पोल खोल देती है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं अब पैसा कमाने का सबसे बड़ा जरिया बन गई हैं। मध्यप्रदेश के किसानों-मजदूरों को राहत और रियायत देने पर सरकार पैसे का रोना रोती रही है। जबकि देशी-विदेशी उद्योगपतियों को उनकी शर्त पर उ़घोग लगाने के लिए तमाम छूट दी जा रही है।

उत्तराखंड में अभी हाल ही में हुआ नेतृत्व परिवर्तन भ्रष्टाचार का ही परिणाम था। कर्नाटक में रेडडी बंधुओं एवं येदुरप्पा के कारनामों पर पूरी भाजपा उनके बचाव में खड़ी हो गई थी। लोकायुक्त की रिपोर्ट से भाजपा को कर्नाटक में नेतृत्व बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा थां।

भ्रष्टाचार के बारे में भाजपा का इतिहास अच्छा नहीं रहा। भ्रष्टाचार पर दोहरे मापदण्ड अपनाना पार्टी की नीति रही है। कांग्रेस शासन के केन्द्रीय मंत्री सुखराम के मुद्दे पर संसद की कार्यवाही ठप्प करने वाली पार्टी सुखराम के कांग्रेस से निकलने के बाद ही अपना दोस्त बनाने में देर नहीं करती। जब दिल्ली में भाजपा की सरकार थी तब केन्द्रीय मंत्री, वरिष्ठ भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव टी.वी. कैमरे के सामने सरेआम घूस लेते दिखाए गए और तो और भाजपा के राष्टीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते टी.वी. के माध्यम से पूरे देश ने देखा।

नोट के बदले वोट का मामला हो, पैसे लेकर संसद में सवाल उठाने का मामला हो, कबूतरबाजी का आरोप हो या हवाला का, सभी में आपकी पार्टी के सांसदों ने नाम कमाया है।

नोट के बदले वोट के मामले में तो कुछ सांसद व भाजपा नेता जेल की सलाखों के पीछे हैं।

केन्द्र में लगभग 6 वर्ष तक षासन कर आप महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व निभा चुके हैं, इस अवधि मे आपने विदेशों में जमा काले धन का भारत वापिस लाने के लिए क्या प्रयास किये? भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई प्रभावी कानून बनाया क्या? हम इन सवालों के उत्तर जनचेतना यात्रा के माध्यम से जानना चाहते हैं।

आपकी यात्राओं में बड़ी रूचि है। इसके पूर्व राम जन्मभूमि मंदिर के मुद्दे को लेकर आपके नेतृत्व में निकाली गई रथयात्रा का स्मरण आना स्वाभाविक है। सौगंध राम की खाते है-मंदिर वहीं बनायेंगे के उद्घोष के साथ रथयात्रा ने भारत भ्रमण किया था। यात्रा देश में जहां-जहां गई, वहां-वहां नफरत, उन्माद ओर साम्प्रदायिकता फैली। दंगे हुए। यात्रा के उन्माद में भीड़ ने अन्ततः बाबरी मस्जिद ढहा दी। इस यात्रा के बाद भाजपा का राजनैतिक ग्राफ तेजी से बढ़ा। अटल जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। आप उपप्रधानमंत्री, गृहमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। परंतु आपने अपने शासनकाल में राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद सुलझाने व राममंदिर बनवाने के लिए कोई कानून नहीं बनाया, और न ही कोई पहल की। हद तो जब हो गई जब शासन में पहुंचकर आपने मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम को अपने एजेंडा से ही बाहर कर दिया। इस संबंध मं आपकी पार्टी का ही एक नारा समर्पित हैः- जो नहीं राम का, वो नहीं किसी के काम का।

मान्यवर, भाजपा की स्थापना 1980 से लेकर आज तक पार्टी के किसी सम्मेलन, समारोह, मीटिंग में लोकनायक जयप्रकाश नारायण न कोई चित्र रखा गया, न उनका नाम लिया गया। न उनकी पुण्यतिथि मनाई गई और न उनकी जयंती मनाई गई। आपके शासनकाल में जे पी का जन्म जताब्दी वर्ष 1902-2002 था। जिस पर आप लोगों ने कोई ध्यान नहीं दिया। आज उन्हीं जे पी का नाम लेकर उनकी जन्मस्थली से यात्रा निकालना एक तरह का राजनैतिक अवसरवाद नही तो क्या है?

केन्द्र सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध में आपकी पार्टी ने आज तक प्रभावी और कारगर आंदोलन नहीं किया। संसद में आपका विरोध रस्म-अदायगी जैसा लगता था। क्योंकि आपकी राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार के कारण आपके अंदर नैतिक शक्ति नहीं बची थी। हमें लगता है कि गांधीवादी अण्णा हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए राष्टव्यापी आंदोलन से पैदा हुई ऊर्जा को समेटकर वोटो में बदलने के लिए, दिल्ली की गद्दी पर कब्जा जमाने व प्रधानमंत्री बनने के राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित होकर यह यात्रा निकाली जा रही है। इसका भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने से कोई लेना-देना नहीं है। जिसमें आप सफल हो सकते हैं पर देश नहीं।

हम आपका ध्यान वर्ष 1991 में लागू की गई उदारीकरण, वैष्वीकरण की उन नीतियों की ओर दिलाना चाहते हैं जिनके चलते घोटालों की बाढ़ आ गई है। अफसोस यही है कि कांग्रेस-भाजपा दोनों प्रमुख पार्टियां इन नीतियों पर पुनर्विचार किए बगैर जोर-शोर से आगे बढ़ा रही हैं। देशी-विदेशी पूंजीपतियों, कंपनियों को लुभाने और उनका समर्थन पाने की दोनों पार्टियों में होड़ लगी है। विदेशी निवेशी के लिए लालायित नेता, मुख्यमंत्री विदेश जाकर उन्हें हर प्रकार की सुविधा देने का वादा कर रहे हैं।

स्थानीय लोगों को बेदखल कर प्राकृतिक संसाधनों जल,जंगल, जमीन, खदान, खेत-खलिहानों का सौदा किया जा रहा है। विश्व बैंक, अन्तरा्ष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियाई विकास बैंक जैसे साम्राज्यवादी अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं हमारे देश और प्रदेश के विकास की प्राथमिकताएं तय कर रही हैं। नीतियों में निहित भ्रष्टाचार कानूनसम्मत भले ही हो, पर यह ज्यादा खतरनाक है।

मौजूदा व्यवस्था गैर बराबरी, शोषण, लूट और मुनाफे पर टिकी हुई है।, जो हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। इसे बदले बगैर भ्रष्टाचार से मुक्ति पाना असंभव है। इसका एक आयाम भोगवादी संस्कृति है। जिसने हमारा पूरा जीवन दर्शन बदल दिया है। विडंबना यह है कि हमारे मौजूदा राजनैतिक दलों के एजेंडा में यह सब नहीं है।

आदरणीय, जन चेतना यात्रा के बजाय आप इस उम्र में तीर्थयात्रा करते तो ज्यादा पुण्य मिलता। मन निर्मल होता और चित्त को शांति मिलती।

आपके स्वस्थ और दीर्घजीवन की कामना के साथ

गोपाल राठी

समाजवादी जन परिषद

मध्यप्रदेश

फोन संपर्कः 9425408801

पिपरिया, दिनांक-14 अक्टूबर, 2011

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सामाजिक न्याय के प्रखर प्रवक्ता , औरंगाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ट वकील , समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सक्रिय सदस्य साथी प्रवीण वाघ हमारे बीच नहीं रहे । युवक क्रांति दल (युक्रांद) से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले समाजवादी जनपरिषद के संस्थापकों में प्रमुख थे। मराठवाडा विश्वविद्यालय का नाम बाबासाहब अम्बेडकर के नाम पर करने के आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की थी।  आपके पिता चन्द्रमोहन वाघ औरंगाबाद में रिपब्लिकन पार्टी में सक्रिय थे तथा डॉ. अम्बेडकर के निकट सहयोगी थे तथा अम्बेडकर साहब द्वारा शुरु पत्रिका का प्रकाशन करते थे।

प्रवीण वाघ

सामाजिक न्याय के प्रबल प्रवक्ता प्रवीण वाघ

असंगठित मजदूरों के सवाल को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाते थे । वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों के बहुजन समाज पर पड़ने दुष्प्रभाव को वे बखूबी प्रस्तुत करते थे।  कुटुम्बीजन इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति पायें ।

साथी तेरे सपनों को हम मंजिल तक पहुंचायेंगे।

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उच्चतम न्यायालय ने २००२ के गुजरात में हुए नरसंहार के लिए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जिम्मेदार हैं कि नहीं इस बात की जांच अहमदाबाद के मेजिस्ट्रेट की अदालत को सुपुर्द कर दी है. उच्चतम न्यायालय ने यह भी निर्देश दिए कि इस जांच में उसके द्वारा नियुक्त स्पेशियल इन्वेस्टिगेशन टीम एवं एमिकस क्यूरी (वरिष्ट अधिवक्ता) की रपट को ध्यान में रखा जाए. साथ ही नरसंहार में जिन लोगों ने अपने परिजनों को खोया है उनके द्वारा अतिरिक्त गवाही एवं सबूतों को भी सुना और देखा जाए.
भारतीय जनता पार्टी ने उच्चतम न्यायालय के इस निर्देश को मोदी को निर्दोष घोषित किए जाना बतलाया है, जो कि अर्ध सत्य ही नहीं बल्कि सरासर झूठ है. उच्चतम न्यायालय ने मोदी के खिलाफ़ लगाए गए आरोपों का कोई खंडन नहीं किया है. बल्कि, २००२ में हुए दंगों में उनकी भूमिका की मेजिस्ट्रेट की अदालत में जांच करने के आदेश ही दिए हैं. अब यह मामला निचली अदालत में चलेगा, और शायद यह एक लंबी प्रक्रिया होगी. गौर तलब है कि उच्चतम न्यायालय में किसी भी फ़ौजदारी केस की सुनवाई नहीं होती, वहां सिर्फ़ निचली अदालतों के फ़ैसलों पर सुनवाई होती है और उन पर अंतिम फ़ैसला सुनाया जाता है.
लेकिन इस तथ्य को छुपा कर, भाजपा नेता इस भ्रामक प्रचार में जुट गए हैं कि उच्च अदालत ने मोदी को तमाम आरोपों से बरी कर दिया है और यह कि विपक्ष तथा नागरिक अधिकार संगठन पिछले ११ सालों से मोदी को बदनाम करने की कोशिश में लगे हैं. स्वयं मोदी ने उच्चतम न्यायालय के निर्देश को ’विवादों का अंत’ बतलाया है और अपने खिलाफ़ लगे आरोपों को गुजरात की ६ करोड़ जनता को बदनाम करने की साजिश कहा है. मोदी ने २००२ के नरसंहार को ’एक क्रिया की प्रतिक्रिया’ कहा था, जब कि तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने गोआ के भाजपा अधिवेशन में मोदी सरकार की आलोचना यह कह कर की थी कि मोदी अपना राजधर्म भूल गए हैं.
जो मोदी करण थापर के टीवी चैट शो के बीच से तब भाग खडे हो गए जब उन्हें २००२ के नरसंहार के कारण धूमिल हुई उनकी छवि को सुधार ने लिए सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगने को कहा गया था, अब उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद १७ सितम्बर से तीन दिन का उपवास कर रहे हैं इस घोषित उद्देश्य के साथ की गुजरात में सद्भाव का वातावरण बने. अपने दस वर्ष के कार्यकाल में पहली बार मोदी ने जनता के नाम एक खुला पत्र भी लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत ने अब तक उठाए सभी विवादों का अंत कर दिया है और इसलिए वे अब समाज में सद्भावना अभियान चलाना चाहते हैं.
उनकी मुसलमान विरोधी छवि के कारण बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने मोदी को विधान सभा चुनाव प्रचार से दूर रखा था. राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के कई घटक दल मोदी के अतिवादी सांप्रदायिक तेवर के कारण उनसे कतराते रहे हैं. दूसरी ओर, भाजपा कई युवा नेता मोदी को भावी प्रधान मंत्री के रूप में प्रचारित कर रहे हैं. अब जब २००२ के नरसंहार में उनकी भूमिका का मामला निचली अदालत में चलाए जाने में एक लंबा समय लगने की संभावना है तब मोदी अपने आप को एक सेक्यूलर राष्ट्रीय नेता के रूप में साबित करना चाह रहे हैं. जब तक उन पर लगाए आरोप साबित या खारिज नहीं होते, साबरमती नदी में बहुत पानी बह चुका होगा और राष्ट्रीय राजनीति भी किसी अनिश्चित मोड़ पर पहुंच चुकी होगी.
भाजपा के वरिष्ट नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने भी मोदी की राष्ट्रीय राजनीति में संभावित भूमिका के बारे में अटकलों को यह कह कर बढावा दिया कि देश को मोदी जैसे बहु प्रतिभावान एवं प्रभावी नेता की आवश्यकता है. लेकिन गुजरात में मोदी की मौजूदा हालत नाजुक प्रतीत हो रही है. एक ओर जहां उनकी २००२ के नरसंहार में भूमिका को लेकर वरिष्ट पुलिस अधिकारी जैसे संजीव भट्ट, राहुल शर्मा और रजनीश राय ने हलफ़नामा देकर सवालिया निशान खड़े कर रखे हैं, जिसको निचली अदालत अनदेखा नहीं कर सकती, वहीं दूसरी ओर राज्यपाल श्रीमती कमला बेनीवाल द्वारा गुजरात उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश आर ए मेहता की लोकपाल के पद पर की गई नियुक्ति को राज्य सरकार द्वार चुनौती देने से मोदी पेंचीदी परिस्थिति में फ़ंस गए हैं.
लोकपाल के लिए पूर्व न्यायाधीश मेहता के नाम का सुझाव गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं दिया था. तदुपरांत, वर्तमान कानून में लोकपाल की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल को ही है, न कि राज्य के मुख्यमंत्री को. लोकपाल का पद पिछले सात साल से खाली पड़ा था जिसे मोदी सरकार ने अपनी आपत्ति जता कर भरने नहीं दिया था. इस पर उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के दाखिल करने पर, राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी करने के प्रयास किए जिसमें लोकपाल की नियुक्ति का अधिकार मुख्यमंत्री को दिए जाने का प्रावधान था. इस अध्यादेश पर राज्यपाल ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और तत्काल न्यायाधीश मेहता की नियुक्ति की घोषणा कर दी.
राज्यपाल द्वारा मेहता की नियुक्ति की घोषणा के दूसरे ही दिन मोदी सरकार ने लोकपाल कार्यालय पर ताला लगा दिया और उनकी नियुक्ति को उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी. उच्च न्यायालय ने इस मामले में राज्यपाल को प्रतिवादी बनाने से इनकार कर दिया और मोदी सरकार को एक नोटिस भेजी कि वह इस बात की सफ़ाई दे कि कैसे मोदी द्वारा प्रधान मंत्री को लिखा गया पत्र अखबारों तक पहुंच गया जिसमें मोदी ने न्यायाधीश मेहता के खिलाफ़ सरकार के प्रति द्वेषपूर्ण भावना रखने का आरोप लगाया गया था.
इस से पूर्व राज्य कोंग्रेस के एक प्रतिनिधि दल ने राष्ट्रपति को मिल कर मोदी सरकार के खिलाफ़ एक प्रतिवेदन दिया गया था जिसमें गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप थे. कोंग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने कई औद्योगिक घरानों को करोडों रुपए की जमीन माटी के मोल बेच दी है जिसमे सरकार को एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान पहुंचा है.
इन आरोपों की जांच लोकपाल न कर सके इस उद्देश्य से मोदी सरकार ने एक जांच आयोग की घोषणा कर दी. जब कोई जांच आयोग किसी मामले में जांच कर रहा हो उस परिस्थि्ति में लोकपाल उस पर कोई कार्रवाही नहीं कर सकता ऐसा लोकपाल कानून में प्रावधान है.
— (साभार : पीपुल्स डेली, सितम्बर १५,२०११ )
नचिकेता देसाई
१०/११७, अखबार नगर
अहमदाबाद – ३८० ०१३

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30 सितंबर, 2010 को अयोध्या विवाद के विषय में लखनऊ उच्च न्यायालय के फैसले के बाद देश ने राहत की सांस ली है। तीनों पक्षों को एक तिहाई – एक तिहाई भूमि बांटने के इस फैसले के कारण कोई भी पक्ष पूरी हार – जीत का दावा नहीं कर पाया। कोई खून-खराबा या उपद्रव इसलिए भी नहीं हुआ, क्योंकि देश की आम जनता इस विवाद से तंग आ चुकी है और इसको लेकर अब कोई बखेड़े, दंगों या मार-काट के पक्ष में नहीं है।
किन्तु इस फैसले से कोई पक्ष संतुष्ट नहीं है और यह तय है कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाएगा और इसमें कई साल और लग सकते हैं। इस विवाद का फैसला चाहे सर्वोच्च न्यायालय से हो चाहे आपसी समझौते से, किन्तु अब यह तय हो जाना चाहिए कि इसका व इस तरह के विवादों का फैसला सड़कों पर खून – खच्चर व मारकाट से नहीं होगा। ऐसा कोई नया विवाद नहीं उठाया जाएगा। धार्मिक कट्टरता और उन्माद फैलाने वाली फिरकापरस्त ताकतों को देश को बंधक बनाने, पीछे ले जाने और अपना उल्लू सीधा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
इस फैसले को लेकर कुछ चिन्ताजनक बातें हैं । एक तो यह कि इसमें जमीन एवं सम्पत्ति के मुकदमे को हल करने के लिए आस्था और धार्मिक विश्वास को आधार बनाया गया है, जो एक खतरनाक शुरुआत है। ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ की जिस रपट का इसमें सहारा लिया गया है, वह भी काफी विवादास्पद रही है।
दूसरी बात यह है कि 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद को तोड़ने की जो गुण्डागर्दी की गई, इसके दोषियों को अभी तक सजा नहीं मिली है। यह घटना करीब-करीब वैसी ही थी, जैसी अफगानिस्तान में तालिबान शासकों द्वारा बुद्ध की मूर्ति को तोड़ने की। यह भारत के संविधान के खिलाफ थी और भारत की विविधता वाली संस्कृति पर तथा इसकी धर्मनिरपेक्षता पर गहरी चोट थी। अडवाणी, सिंघल जैसे लोग इस फैसले के आने के बाद अपने इस अपराधिक कृत्य को फिर से उचित ठहरा रहे हैं। इस घटना के बाद देश में कई जगह दंगे हुए थे, किन्तु उनके दोषियों को भी अभी तक सजा नहीं मिली है। मुम्बई दंगों के बारे में श्रीकृष्ण आयोग की रपट पर भी कार्रवाई नहीं हुई है। इसी तरह से 1949 में मस्जिद परिसर में रातोंरात राम की मूर्ति रखने वालों को भी सजा नहीं मिली है। ऐसा ही चलता रहा तो भारत के अंदर इंसाफ पाने में अल्पसंख्यकों का भरोसा खतम होता जाएगा। इन घटनाओं से बहुसंख्यक कट्टरता और अल्पसंख्यक कट्टरता दोनों को बल मिल सकता है, जो भारत राष्ट्र के भविष्य के लिए खतरनाक है।
ऐसी हालत मे, समाजवादी जन परिषद देश के सभी लोगों और इस विवाद के सभी पक्षों से अपील करती है कि -
1. इस मौके की तरह आगे भी भविष्य में इस विवाद को न्यायालय से या आपसी समझौते से सुलझाने के रास्ते को ही मान्य किया जाए। यदि कोई आपसी समझौता नहीं होता है तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सभी मंजूर करें।
2. किसी भी हालत में इस विवाद या ऐसे अन्य विवादों को लेकर हिंसा, मारकाट, बलप्रयोग, नफरत व उन्माद फैलाने का काम न किया जाए। धार्मिक विवादों को लेकर राजनीति बंद की जाए। जो ऐसा करने की कोशिश करते हैं, उन्हें जनता मजबूती से ठुकराए।
3. मंदिर, मस्जिद या अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर कोई नया विवाद न खड़ा किया जाए। वर्ष 1993 में भारतीय संसद यह कानून बना चुकी है कि (अयोध्या विवाद को छोड़कर) भारत में धर्मस्थलों की जो स्थिति 15, अगस्त, 1947 को थी, उसे बरकरार रखा जाएगा। इस कानून का सभी सम्मान व पालन करें।
4. 6 दिसंबर, 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस, उसके बाद के दंगो तथा ऐसी अन्य हिंसा के दोषियों को शीघ्र सजा दी जाए।

लिंगराज सुनील सोमनाथ त्रिपाठी अजित झा
अध्यक्ष उपाध्यक्ष महामन्त्री मन्त्री

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हमने एक त्रिशिर राक्षस का वध किया है
कि अपनी देव-त्रयी को बींध दिया है
हमें नहीं मालूम

हमें नहीं मालूम
कि हम खुश हैं कि उदास
सुन्न पड़ गया है हमारा हृदय हठात्

दिशाओं से चलता हमारा दशानन संवाद
एक काली चुप्पी में बदल गया है
दसो दिशाओं में एक साथ दौड़ जाना चाहते हम
दिशाहीन ठिठके खड़े हैं
अपने छोट बच्चे के सामने

कौतुक से चमकती आँखों वाला हमारा छोटा बच्चा
जिसे हम छोड़ आये थे
कंधे पर बोरे का बुभुक्षित झोला लटकाये
बचपन-वंचित उन बच्चों से तनिक दूर
जो किसी के बच्चे नहीं हैं
दिनभर बीनते कुछ-न-कुछ कूड़े-कचरे के ढेरों में
ताकते सूनी-सूखी आँखों से तमाशा
जब हम चिल्लाते गुजरे थे बलिदानी-अभिमानी टोलियों में
रामलला हम आयेंगे
रामलला हम आयेंगे
मंदिर वहीं बनायेंगे….
बगैर विचारे कि क्या रामायण के अक्षर-घर से
मानस-मंदिर से
भव्य होगा कोई बासा
दिव्य होगा कोई आलय?
हम राम-भक्त थे किसी के लिए राम-विभक्त ?

आज हमारी झुकी-झुकी आँखों के सामने है
फटी-फटी आँखों वाला हमारा छोटा बच्चा
जितनी भी हमारे भीतर वहशत उससे कई गुना है जिसके भीतर दहशत
बेजुबां दहशत जिसकी खामोश चीख से भरी जा रही है पूरी दुनिया
शोर-शराबे से भरी दुनिया एक पल को स्तब्ध

अखबारों की सुर्खियाँ आज काले मोटे हर्फ भर नहीं हैं
सचमुच लिखी हैं लहू से
जिनके नीचे वे बस पंकिल पंक्तियां नहीं
खौफ़ और गम से फटती शिरायें हैं वतन की

और हम सोच नहीं पा रहे हैं कि ऐसा कैसे हुआ
कि हम जो अपनी करुणा के कपास से
ढँक देना चाहते थे सभ्यता के चौराहे पर भटकती
काली अनंगी हड़ीली देहें
इथियोपिया और सोमालिया की
विवस्त्र-त्रस्त कर बैठे अपने ही हाथों मातृभूमि को
लज्जित और लहूलुहान

एक बड़ के बहुत पुराने पितामह पेड़ को काट देने वाली
कुल्हाड़ियाँ हैं हमारी बाहें
धूप-शीत-सधे जिसके प्रचीन छतनार शीश को अब
कभी नहीं देख सकेंगी आँखें
अब हम जानते हैं हमारी उँगलियाँ मूँगफलियों की तरह
आसानी से तोड़ सकती हैं आदमियों को
और बादाम की तरह बगैर खास दिक्कत के
मकान-दर-मकान
लेकिन हमारी हथेलियाँ अब कब
सहला सकेंगी हमारे बच्चे के काँपते कपोल
सपने की नदी में उसके डूबने को
नींद के नभ में उड़ने में बदलती हुई ?

बेघर हो गया है जो हमारे अन्त:करण के गर्भगृह में
रमने वाला देवता
उसे कितने बरस का बनवास दिया है हमने
वह कब लौटेगा अपनी अयोध्या में ?

- ज्ञानेन्द्रपति
(दिसंबर ’९२ )

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हिन्दुस्तानी में कहावत है – खोदा पहाड़ निकली चुहिया – लम्बे तथा कठिन रियाज के बाद जब नतीजा अपेक्षतया बहुत कम निकलता है – उन हालात में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है ।
न्यायमूर्ती एम.एस. लिबर्हान ने १७ साल परिश्रम किया जिस दरमियान शुरुआती तीन माह की नियुक्ति के उनके कार्यकाल को ४० बार बढ़ाया गया , उन्होंने १०२९ पृष्टों की एक रिपोर्ट तैयार की जो उन तमाम हकीकतों और हालात का तफ़सील से ब्यौरा देती है जिनके के कारण १९९२ में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया । उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले नहीं है बल्कि स्पष्ट तथा बुलन्द हैं  : यह विध्वंस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था – ” यह एक संयुक्त उद्यम था “- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , विश्व हिन्दू परिषद ,शिव सेना तथा भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा यह षड़यन्त्र रचा गया था , इनमें से अन्त में उल्लिखित संगठन को रिपोर्ट ने सही ही आर.एस.एस का मोहरा बताया है ।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन निर्भीक तथ्यान्वेषणों के बावजूद जो सिफारिशें दी गई हुई हैं वे फुस्स अथवा कायराना हैं तथा उनका इन निष्कपट निष्कर्षों से कोई मेल नहीं बैठता । देश को साम्प्रदायिक महाविपदा के मुहाने पर ढकलने के लिए ६८ व्यक्तियों को दोषी पाए जाने के बावजूद  श्री लिब्रहान अब तक विध्वंस-मामले में आरोपित होने से बच रहे लोगों के खिलाफ़ आरोप दाखिल करने की संस्तुति नहीं करते हैं न ही वे आपराधिक कार्रवाई को तेजी से निपटाने की बात करते हैं ।
षड़यंत्र की बाबत  ’ संयुक्त उद्यम ’का जुमला बार – बार दोहराने की वजह से यह चौंकाने वाली बात लगती है । १९९९ में तत्कालीन युगोस्लाविया की बाबत टैडिक फैसले के बाद से सीधी भागीदारी न होने के बावजूद जिन लोगों ने जानबूझकर इन कृत्यों को बढ़ावा दिया हो तथा जो लोग इन कृत्यों में लिप्त संगठनों के शीर्ष पर होते हैं उन पर दायित्व डालने की अन्तर्राष्ट्रीय फौजदारी कानून में सामूहिक अपराधों के ऐसे मामलों की बाबत बाद के वर्षों में एक धारणा  विकसित हुई है ।
यदि श्री लिब्रहान ने अपनी सिफारिशों में इस विचार को लागू किया होता तथा इस बात पर जोर दिया होता कि राजनेता , पुलिस अफ़सर, और नौकरशाह जिस व्यापक दण्डाभाव का लाभ लेते आए हैं उस का अन्त हो तो यह मुल्क उनका एहसान मानता । परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है । धर्म तथा राजनीति को अलग रखने तथा अन्य कुछ अन्य ढीले ढाले सुझाव देने के उपरान्त , यह रिपोर्ट विध्वंस मामले में तात्कालिक न्याय सुनिश्चित करने अथवा देश को इस त्रासदी की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए संस्तुति देने से खुद को बचा ले गई है ।
शायद  श्री लिब्रहान अथवा उनके कमीशन की यह इतनी कमी नहीं है जितना हमारी पुलिस तथा न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था द्वारा उन्हीं नतीजों पर पहुंच कर फिर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करने की अक्षमता का दोष है ।
दसवें अध्याय में न्यायमूर्ति लिब्रहान सदोषता की बाबत एक निश्चयात्मक वक्तव्य देते हैं : ” किसी औचित्यपूर्ण सन्देह से परे यह स्थापित है कि यह ’संयुक्त-सामान्य-उद्यम’ विध्वंस की पूर्व नियोजित कार्रवाई थी जिसकी तात्कालिक रहनुमाई विनय कटियार , परमहंस रामचन्द्र दास , अशोक सिंघल , चम्पत राय , श्रीषचन्द दीक्षित , बी. पी. सिंघल तथा आचार्य गिरिराज कर रहे थे । यह सब मौके पर मौजूद नेता थे जिन्हें आर.एस.एस.एस द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित करना था । लालकृष्ण अडवाणी मुरली मनोहर जोशी तथा अन्य उनके स्थानापन्न दायित्व के कारण दोषमुक्त नहीं हैं वे भी आर.एस.एस. द्वारा निर्देशित भूमिका को स्वेच्छा से कबूले हुए सह-षड़यन्त्रकारी हैं । अयोध्या अभियान को उनका निश्चित समर्थन तथा दीर्घकाल तक चले  अभियान के निर्णायक चरण में उनकी सशरीर मौजूदगी से यह अकाट्य रूप से स्थापित हो चुका है ।
मेरा यह निष्कर्ष है कि आर.एस.एस. , भाजपा , विहिप , शिव सेना तथा उनके वे पदाधिकारी जिनका इस रिपोर्ट में नाम दिया गया है  ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मन्त्री कल्याण सिंह के साथ आपराधिक गठजोड़ स्थापित कर विवादित जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए एक ’संयुक्त-समान-उद्यम’(Joint Common Enterprise) स्थापित कर लिया था । उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल करने का काम किया तथा लोकतंत्र को नष्ट करने की सोची समझी कार्रवाई में लिप्त रहे । “
मस्जिद गिराया जाना , “धार्मिक , राजनैतिक , तथा भीड़-तंत्र के सर्वमन्दिरों को एक साथ समेटने वाले संगठित व सुनियोजित षड़यन्त्र का चरम बिन्दु था ” । न्यायमूर्ति लिबर्हान यह सही ही नोट किया कि, ” कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उन्हें सुरक्षित रखा जा सके एवं आगे के राजनैतिक इस्तेमाल के लिए उनकी सेक्युलर विश्वसनीयता को बचाये रखा जा सके । “इस प्रकार श्री अडवाणी और श्री जोशी इस दूसरे दर्जे के भाग रहे हों परन्तु वे भी राजनैतिक तथा कानूनी दायित्व से नहीं बच सकते , बावजूद इसके कि वे संघ परिवार द्वारा प्रदत्त ’मुमकिन इन्कार’ की ढाल से लैस हों ।
आज ,सत्रह साल बीत जाने के बाद , इस संयुक्त उद्यम में लिप्त कई अपराधी मर चुके हैं । परन्तु कई इस बिना पर फले फूले हैं कि वे कानून के ऊपर हैं । इस मुल्क के द्वारा न्यायमूर्ति लिबर्हान की इन सिफ़ारिशों के माध्यम से ’इस चूहे को निकालने के लिए ’ चाहे जितनी भी झूठी निन्दा हो , इस रपट में वह खजाना है जिसकी मदद से कोई ख्यातिनाम जाँच एजेन्सी ठोस षड़यन्त्र का मामला बना सकती है । ऐसे कई किरदार जिनकी स्मृति इस आयोग के समक्ष धूमिल हो गयी थी , नार्को विश्लेषण समेत पुलिस की पारंगत पूछताछ , के समक्ष ज्यादा देर न टिक पायें । उत्तर प्रदेश सरकार यदि गंभीर हो तो पूरक आरोप पत्र दाखिल कर सकती है तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के मामले को त्वरित-ट्रैक न्यायालय में ले जा सकती है ताकि आखिरकार न्याय हो सके ।

( मूल अंग्रेजी लेख )

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‘ जब कटत रहे कामदेव , तब कहाँ रहे रामदेव ?
अब वोट माँगे रामदेव तब पेड़ में ‘उनका’ बाँध देव’

१९७७ के आम चुनाव में रायबरेली या अमेठी के किसी विधान सभा क्षेत्र से कांग्रेसी विधायक रहे ‘रामदेव’ (बाबा नहीं ) के खिलाफ़ जनता ने यह नारा बनाया और लगाया था । सब को पता है कि अमेठी से संजय गाँधी को रवीन्द्र प्रताप सिंह ने और रायबरेली से इन्दिरा गांधी को लोकबन्धु राजनारायण ने शिकस्त दी थी ।
अविभाजित उत्तर प्रदेश – सिफ़र , अविभाजित बिहार – सिफ़र , मध्य प्रदेश – एक ( समर्थित निर्दल – माधवराव सिंधिया) यह था मौलिक अधिकारों को १९ महीने निलम्बित रखने , प्रेस सेंसरशिप लगाने , जबरिया नसबन्दी अभियान चलाने वाली , आजादी के बाद से तब तक दिल्ली की कुर्सी पर काबिज रही कांग्रेस का १९७७ का चुनाव परिणाम ।
कल जब पीलीभीत से भारतीय जनता पार्टी के युवा उम्मीदवार वरुण ने बिना पार्टी के झण्डों के ( अलबत्ता विहिप के झण्डे रखने का ‘निर्देश’ था ) , वरिष्ट भाजपा नेता कालराज मिश्र की देखरेख में गिरफ़्तारी दी तब नारा लगा- ‘वरुण नहीं यह आंधी है,दूसरा संजय गांधी’ है’ । जबरिया नसबन्दी अभियान के पीछे की तानाशाही संविधानेतर सत्ता (मनमोहन सिंह या राजनाथ सिंह की तरह राज्य सभा सदस्य भी न था ) का नमूना था – संजय गांधी । उस अवधि को इन्दिराजी के प्रति नरम हुए विनोबा ने यदि ‘अनुशासन पर्व’ कहा तो सर्वोदयी मनीषी दादा धर्माधिकारी ने ‘दु:शासन पर्व’ कहा था । संजय गांधी जिसके बारे में किस्सा मशहूर हुआ था-’गन्ना क्यों बोते हो,गुड़ बोओ’, मंच पर जिनकी चप्पलें नारायण दत्त तिवारी जैसा वरिष्ट नेता उठाता था और जिसे विलायत में पोलिटेकनिक की पढ़ाई के दौरान पुर्जों की चोरी में पकड़े जाने के कारण निकाल दिया गया था ।
उस दु:शासन पर्व के खिलाफ़ संघ के कार्यकर्ता भी सत्याग्रह कर जेल जाते थे जब तक जेल से बालासाहब देवरस ने ‘इन्दिराजी के बीस सूत्री कार्यक्रम’ (बेटे की पांच अलग) के समर्थन में चिट्ठी नहीं लिखी । क्या उसी समय से संजय गांधी को ‘अपने जी’ मान लिया गया था ? राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ‘रंग में भंग’ की पंक्ति -‘योग्य से ही योग्य का सम्बन्ध होना योग्य था’ अब चरितार्थ हो रही है ।
उस परिवार से ‘गांधी’ जुड़ने का कारण जो व्यक्ति रहा , उसकी चर्चा न राहुल के लोग करते हैं और न ही संजय वाले । एक ‘फरहर’ सांसद के रूप में इस व्यक्ति के प्रति सम्मान का भाव उठता है । फिरोज गांधी सत्ताधारी दल के लोक सभा सदस्य होने के बावजूद ‘प्रेस की आजादी’ जैसे सवालों पर संसद को गरम रखते थे ।
वरुण की योग्य माता मानेका ने जरूर कांग्रेस की सिख विरोधी साम्प्रदायिकता की गंभीर चर्चा शुरु की थी लेकिन वह भी इसलिए थम गयी कि ‘संघ’ ने भी उस चुनाव में ‘हिन्दू-हित’ की पार्टी कांग्रेस को माना था और भाजपा लोक सभा के आम चुनाव में देश भर में सिर्फ़ दो सीटें जीत पाई थी । वरुण बाबा की उमर के लिहाज से भवानीप्रसाद मिश्र की यह ‘बाल-कविता’ शायद उन दिनों के बारे में उसे और राहुल को कुछ समझ दे :

चार कौए उर्फ़ चार हौए ,भवानी प्रसाद मिश्र

बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले ,
उन्होंने यह तय किया कि सारे उडने वाले
उनके ढंग से उडे,रुकें , खायें और गायें
वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं

कभी कभी जादू हो जाता दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बडे सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड और बाज हो गये.

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में
हाथ बांध कर खडे हो गये सब विनती में
हुक्म हुआ , चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ – पिऊ को छोडें कौए – कौए गायें

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना – पीना मौज उडाना छुट्भैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बडे – बडे मनसूबे आए उनके जी में

उडने  तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उडने वाले सिर्फ़ रह गए बैठे ठाले
आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं , चार कौओं का दिन है

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोडे में किस तरह सुनाना ?
- भवानीप्रसाद मिश्र .

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  हिन्दुस्तान लौटने के बाद खिलाफ़त आन्दोलन में साथ दे कर गांधीजी ने राष्ट्रीय स्तर पर कौमी एकता स्थापित करने का प्रथम प्रयास किया था । खुद को आदर्शोन्मुख व्यवहारवादी गिनवाने वाले गांधीजी ने राष्ट्रीय स्तर पर यथासंभव व्यावहारिक बनने का प्रयास किया था । ऐसा करने में उन्होंने स्तुति व निन्दा , लोकप्रियता व अप्रियता दोनों ग्रहण किए थे । इस आन्दोलन के कारण ही कुछ लोग उनके जीवनभर के दोस्त बने तथा अन्य कुछ लोगों ने उन्हें दुश्मन माना था।

    खिलाफ़त आन्दोलन गांधी ने शुरु नहीं किया था । इस आन्दोलन का प्रमुख कारण अन्तर्राष्ट्रीय था । प्रथम महायुद्ध शुरु हुआ तब हिन्द के मुसलमानों को न छेड़ने और युद्ध-प्रयासों में उनकी मदद की अपेक्षा से ब्रिटिश सरकार ने अपनी मुसलिम प्रजा को सम्बोधित एक गंभीर घोषणा की थी , जिसमें कहा गया था कि : युद्ध तो उसकी इच्छा न होने के बावजूद ऑटॉमन सरकार(तुर्की) ने उस पर लादा है। घोषणा में आगे कहा गया था कि अरबिस्तान तथा मेसोपोटामिया के मुस्लिम धार्मिक स्थलों और जेद्दाह के बंदरगाह पर हरगिज़ आक्रमण नहीं किया जाएगा । हज करने वाले यात्रियों को कोई दिक्कत आने न दी जाएगी । ब्रिटिश प्रधान मन्त्री लॉयड जॉर्ज ने कहा था कि साथी देश तुर्की को एशिया माइनर की उसकी भूमि से उसे वंचित नहीं करेगे । अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी इस घोषणा को समर्थन दिया था । इससे हिन्दुस्तान के मुसलमानों को भरोसा था कि तुर्की की आज़ादी बची रहेगी । युद्ध के बाद की संधि में विजेता राष्ट्रों ने तुर्की के इलाकों की बन्दर बाँट की तथा सुल्तान के अधिकारों को सीमित करते हुए साथी देशों द्वारा नामित हाई कमिशनरों के मार्गदर्शन के तहत रखा गया ।

    खुले वचन भंग की इस संधि से हिन्द के मुसलमानों को जबरदस्त निराशा हुई ,जो स्वाभाविक थी । इसके अलावा खिलाफ़त आन्दोलन शुरु करने के पीछे हिन्द के मुसलिम नेतृत्व के मन में एक और महत्वपूर्ण कारण था – वे चाहते थे कि हिन्द के मुसलमानों में राष्ट्रीय अस्मिता का भाव जागृत हो । हिन्द के तमाम मुसलिम किसी एक अखंडित विचार या संस्कार के नहीं थे । उनमें कई मतभेद तथा खास कर नेताओं की स्पर्धा के कारण पैदा किए गए भेद थे । उनकी ज्यादातर संस्थायें धार्मिक थी । पश्चिमी शिक्षा प्राप्त तथा उलेमाओं से मदरसों में तालीम प्राप्त लोगों में खूब फरक था । ज्यादातर धार्मिक संस्था सरकार के प्रति नरम थी लेकिन देवबन्द के दारुल उलूम सरकार विरोधी रुझान वाली थी।  पढे लिखों में अलीगढ़ मुसलिम युनिवर्सिटी के पढ़े तरुण , उनके प्राध्यापक और प्रशासक पश्चिमी रुझान वाले थे। पश्चिमी तालीमयाफ़्ता ज्यादातर शहरों में थे और सरकारी नौकरियों में भी। मुसलमानों का विशाल समुदाय तो किसान , कारीगर तथा छोटे व्यापारी थे ।

   भारतीय मुसलमानों के सबसे महान समाज सुधारक सर सैय्यद ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्थापना की । अलीगढ विश्वविद्यालय ही नहीं ‘ अलीगढ़ तहरीक ‘ मानी जाती थी । खिलाफ़त आन्दोलन शुरु होने के पूर्व तीन साप्ताहिकों ने हिन्द के मुसलमानों पर जबरदस्त असर  डालअना शुरु किया था । मोहम्मद अली कलकत्ते से कॉमरेड ,कलकत्ते से ही मौलाना अबुल कलाम आज़ाद अलहिलाल  तथा लाहौर से जफ़र अली खां जमींदार निकालते थे ।

    खिलाफ़त आन्दोलन के प्रमुख नेता अली बन्धु , डॉ. अंसारी ,मौलाना हसरत मोहानी  और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद प्रमुख थे । गांधी की तरह ये सभी धार्मिक रुझान वाले थे , नेहरू और जिन्ना की तरह अधार्मिक सेक्युलर नहीं थे । मुस्लिम लीग उस समय मात्र अमीर और पढ़े लिखों की संस्था थी।हांलाकि खिलाफ़त आन्दोलन के समर्थन में उन्होंने भी प्रस्ताव पास किया था लेकिन उसकी शाखायें और समितियां इसमें सक्रिय नहीं थीं। खिलाफ़त की शुरुआत में माना गया था कि तीन मार्ग मुसलमानों के लिए खुले हैं (१) खून खराबा (२) पूरी कौम की हिजरत (३) असहयोग । पहले दो विकल्प न ग्रहण करने के पीछे गांधी का प्रमुख योगदान था । इस दौर में अली बन्धुओं की माता आबेद बानु बेगम ने स्त्री जागृति का महत्वपूर्ण काम किया ।वे खुद पर्दा नशीं थी लेकिन खिलाफ़त की मीटिंगों में पहुंच कर पर्दा निकाल देतीं और कहती,’तुम सब मेरे बेटों की तरह हो तुम्हारे सामने कैसा परदा?’ बाद में अली बन्धुओं की गिरफ़्तारी के बाद शौकत अली की पत्नी भी सक्रिय हुईं । ६ अप्रैल १९१९ के दिन रॉलेट कानून के खिलाफ़ जब देशव्यापी हड़ताल हुई तब मुम्बई की दो मस्जिदों में श्रीमती सरोजिनी नायडू को बुलाया गया ।

   खिलाफ़त के माध्यम से गांधी गरीब मुसलमानों तक पहुंचे और उन्हें सक्रिय बनाया ।

  

   कॉग्रेस और खिलाफ़त कमिटी की संयुक्त बैठक में एक तरफ़ श्रीमती एनी बेसेण्ट तथा महामना मालवीय तथा दूसरी तरफ़ शौकत अली थे । उन लोगों ने कहा कि अभी विचार करने के लिए वक्त दीजिए , इन लोगों ने कहा कि कब तक इन्तेज़ार किया जाएगा । हसरत मोहानी ने यह कह कर धमाका कर दिया कि अफ़गानिस्तान के अमीर यदि ब्रिटिश सरकार पर हमला करते हैम तो मैं उनका साथ दूंगा । गांधी ने मुसलिम नेताओं से अहिंसक असहयोग की शपथ ली थी और कहा था कि इसका उल्लंघन हुआ तो मैं अलग हट जाऊंगा । इस आधार पर उन्होंने खिलाफ़त आन्दोलन के मुसलमानों का समर्थन किया । यह सच्चाई कहीं दबाई नहीं गई है ,उस दौर की बाबत लिखी तमाम इतिहास की किताबों में मिलती हैं । (मिनोल्ट गेईल की The Khilafat Movement , पृष्ट ९९,उक्त पुस्तक में गृह विभाग के दस्तावेज से लिया गया,राष्ट्रीय अभिलेखागार,नई दिल्ली से) । खिलाफ़त के मुसलिम नेताओं पर आरोप तब भी लगते थे जिनकी बाबत गांधी ने कहा था , ‘ वे द्वेष मुक्त हैं यह मैं नहीं कहता ,परन्तु उनके द्वेषभाव के साथ मेरा प्रेम भाव मिलाने पर द्वेष भाव का वेग मैं कम कर दे रहा हूं यह मुझे यकीन है।’ ( गांधी शिक्षण -भाग १०,पृ ८)

     ” मैं मुसलमान पहले हूं फिर हिन्दुस्तानी हूँ(मोहम्मद अली) इसका मैं बचाव करता हूँ।क्योंकि मैं भी तो यह कहने वाला हूँ कि पहले हिन्दू हूं इसीलिए सच्चा हिन्दुस्तानी हूं ।”(महादेव भाईनी डायरी ,भाग ६,पृ- ४३६-४३७)

    [ इस विषय पर यदि पाठक रुचि लेंगे तो नारायण देसाई की ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी पुरस्कार प्राप्त किताब 'मारूं जीवन एज मारी वाणी' के सम्बन्धित अध्याय का पूरा अनुवाद कर पेश किया जाएगा। खिलाफ़त आन्दोलन के नेताओं के बारे में विस्तार से चर्चा की जा सकती है ]

[ बिना दोहराये पोस्ट कर रहा हूं ]

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