Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘corruption’ Category

Reblogged from समाजवादी जनपरिषद:

अखबार की वह खबर हैरान करने वाली थी। मैंने सोचा कि शायद छपाई की कोई गलती है या दशमलव बिन्दु इधर-उधर हो गया है। लेकिन दूसरे अखबार में भी देखा। वह सच थी। यह खबर चालू वित्त वर्ष की प्रथम छ:माही में अग्रिम आयकर जमा करने वाले शीर्षस्थ लोगों के बारे में थी। इनमें दूसरे नंबर पर आंध्रप्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री के बेटे जगनमोहन रेड्डी का नाम था। सबसे ज्यादा आयकर जमा करने वाले सौ लोगों की सूची में वह एकमात्र नेता है, बाकी लोग फिल्मी सितारे, क्रिकेट खिलाड़ी और उद्योगपति-व्यवसायी है। लेकिन ज्यादा हैरत-भरी बात जगनमोहन रेड्डी द्वारा अदा किए गए कर की राशि में वृ्द्धि है। पिछले वर्ष उसने मात्र 2.9 लाख रु.

Read more… 22 more words

उ.प्र. विधान सभा चुनाव २०१२ के मौके पर ,फिर प्रकाशित .

Read Full Post »

Gmail अफ़लातून अफ़लू <aflatoon@gmail.com>

चुनाव – खर्च लिपिक


Aflatoon अफ़लातून <aflatoon@gmail.com> 5 February 2012 06:15
To: rksrivastava@eci.gov.in
Bcc: ceo_uttarpradesh@eci.gov.in, vinodzutshi@eci.gov.in, Aj <ajvaranasi@rediffmail.com>, Bharat_HT <bharatkumar_2000u@yahoo.com>, “bvishal@vns.amarujala.com” <bvishal@vns.amarujala.com>, Dainik Jagaran <varanasi@vns.jagran.com>, Gandiv <gandivvns@gmail.com>, Hindustan <htvaranasi@rediffmail.com>, Pioneer_English <rksinghpio@yahoo.co.in>, Rashtriya Sahara <rsvns1@gmail.com>, Sanmarg <sanmargvns1@satyam.net.in>, TOI <binays01@gmail.com>
श्री एस. वाय कुरेशी,
मुख्य चुनाव आयुक्त,
भारत का निर्वाचन आयोग,
नई दिल्ली.
विषय : चुनाव खर्च – ब्योरा ।
माननीय महाशय,
पंजीकृत गैर-मान्यताप्राप्त दलों को दो सप्ताह का प्रचार समय मिलता है। इस अवधि में तीन बार वित्तीय प्रेक्षकों के समक्ष जाना तथा तकनीकी ढंग से चुनाव खर्च और चन्दे का ब्योरा रखना बहुत जटिल और अव्यावहारिक प्रक्रिया होती है। खर्च-प्रेक्षक वास्तविक खर्च की बजाए स्थानीय-प्रशासन द्वारा अनुमानित खर्च को लिखने का आग्रह रखते हैं जो असत्य को बढ़ावा देना है । खर्च का अपना अनुमान लगाने के लिए तो वे स्वतंत्र हैं।
भारतीय वित्त सेवा से जुड़े इन प्रेक्षकों को लोकतंत्र और चुनाव के बारे में बुनियादी समझदारी नहीं है। ‘प्रेस विज्ञप्ति’ फोटोस्टैट करने और भेजने के खर्च का उल्लेख करने पर यह कहते हैं ,” आपको विज्ञप्ति जारी करने की क्या आवश्यकता है ?कहीं यह ’पेड न्यूज’ तो नहीं? ” सिर्फ विज्ञापन देने वाले प्रत्याशियों की खबरे छापने की नीति अपनाने वाले अखबारों के अलोकतांत्रिक आचरण को आपके प्रेक्षक नहीं समझ पाते हैं और इसलिए पकड़ भी नहीं सकते ।
बहरहाल , हमारी चुनाव आयोग से
चुनाव-सुधार की दिशा में मांग है कि आयोग इन पन्द्रह दिनों के लिए हर प्रत्याशी का खर्च रखने के लिए आयोग के खर्च पर प्रशिक्षित हिसाबनवीस रखने की व्यवस्था करे। यह छोटा-सा सुधार चुनाव में शुचिता रखने की दिशा में अत्यन्त महत्वपूर्ण साबित होगा ।
सधन्यवाद,
विनीत,
अफलातून, प्रत्याशी- समाजवादी जन परिषद , 390 वाराणसी कैन्ट वि,स. क्षेत्र


Aflatoon   अफ़लातून ,
समाजवादी जनपरिषद ,
५ , रीडर आवास ,जोधपुर कॉलॉनी,
काशी विश्वविद्यालय , वाराणसी – २२१००५


http://samatavadi.wordpress.com
Phone फोन :  +918004085923



Read Full Post »

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए।

आजादी की लड़ाई का एक साफ मकसद था , गुलामी के जुए को उतार फेकना। जब उद्देश्य ऊंचा और साफ-साफ होता है तब समाज का हर तबका उस  राजनीति से जुड़ जाता है । मौजूदा विधान सभा चुनाव एक ऐसे दौर में हो रहा है जब देश के हर नागरिक के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ तीव्र भावना है । लेकिन राजनीति की मुख्यधारा के अधिकांश’ दलों के पांव भ्रष्टाचार के कीचड से सने हैं। इसी वजह से आम जनता का इन चुनावों में उत्साह कम दिख रहा है। देश में बड़े बड़े घोटालों की आई बाढ़ की जड़ से १९९२ से चलाई गई आर्थिक नीतियों का सीधा सम्बन्ध है। इन नीतियों को केन्द्र और राज्य में रही हर दल की सरकार ने अपना लिया है। इसीलिए ये तमाम पारटियां इस चुनाव में इन मसलों से मुंह चुरा रही हैं । 

शिक्षित नौजवानों को छोटी-सी नौकरी भी बिना रिश्वत नहीं मिल रही। नई आर्थिक नीतियों से रोजगार के अवसर संकुचित हुए हैं। आबादी के मुट्ठी-भर लोगों के लिए रोजगार,स्वास्थ्य,शिक्षा की सुविधाओं को बढ़ावा देने का सीधा मतलब है कि आम लोगों को इन सुविधाओं से दूर किया जाना। जब आम जनता की जरूरतों को पूरा करना उद्देश्य होगा तब ही रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और वे रोजगार सुरक्षित रहेंगे। एक प्रभावशाली जन लोकपाल कानून की धज्जियां उड़ाने में सभी बड़े दलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी ।  भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिए जन लोकपाल के अलावा भी अन्य पहल भी करनी होंगी।

बुनकरी-जरदोजी तथा अन्य रोजगार , स्वास्थ्य , शिक्षा – इन सभी क्षेत्रों में जनता की दुशवारियां बढ़ गई हैं। आम बुनकर और दस्तकार को ध्यान में रखकर कपड़ा नीति और दस्तकार नीति अब तक नहीं बनी है । सभी बड़ी पार्टियां इसके लिए जिम्मेदार हैं । बुनकरों की सहकारी समिति के नाम पर फर्जीवाड़े के मामले भी सामने आए हैं । जरदोजी और दस्तकारी से जुड़े लोगों को बुनकरों के समान सुविधायें मिलनी चाहिए। बुनकर और दस्तकार इस देश के लिए बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं लेकिन उनकी तरक्की की हमेशा अनदेखी की जाती है।
खेती और दस्तकारी के बाद हमारे देश में सबसे बड़ा रोजगार खुदरा-व्यापार है जिस पर हमले की रणनीति बन चुकी है। केन्द्र सरकार की पार्टी के राजकुंवर की समझदारी के अनुसार दानवाकार विदेशी कम्पनियों को देश का खुदरा-व्यापार सौंप कर वे किसानों का भला करने जा रहे हैं । देश के सबसे बड़े घराने के द्वारा जिन सूबों में सब्जी का खुदरा-व्यवसाय हो रहा है क्या वहां के किसानों ने खुदकुशी से मुक्ति पा ली है ?
प्रदेश की सरकार द्वारा भ्रष्टाचार को नया संस्थागत रूप दे दिया गया है। किसानों की जमीनें लेकर जो बिल्डर नये नगर और एक्सप्रेस-वे बनाने की जुगत में है, उनके खर्च पर प्रदेश सरकार पुलिस थाने ( चुनार ) का निर्माण करवाया है। कई पुलिस चौकियां अपराधियों के पैसों से बनवाई गई हैं। समाजवादी जनपरिषद नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए बना है। जिन इलाकों में दल ने संघर्ष किया है और मजबूत जमीन बना ली है सिर्फ वहीं चुनाव में शिरकत करता है।  मजबूत राजनैतिक विकल्प बनाने का काम व्यापक जन-आन्दोलन द्वारा ही संभव है । इसलिए भ्रष्ट राजनीति के दाएरे से बाहर चलने वाले आन्दोलनों और संगठनों के मोर्चे का वह हिस्सा है। राष्ट्रीय-स्तर पर लोक राजनीति मंच’ तथा जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय ऐसी बड़ी पहल हैं तथा स्थानीय स्तर पर साझा संस्कृति मंच , जो सामाजिक सरोकारों का साझा मंच है ।
वाराणसी के हमारे प्रत्याशी की राजनैतिक यात्रा इसी शहर में भ्रष्टाचार विरोधी जयप्रकाश आन्दोलन के किशोर कार्यकर्ता के रूप में  शुरु हुई| छात्र-राजनीति को जाति-पैसे-गुंडागर्दी से मुक्त कराने की दिशा में समता युवजन सभा से वे जुड़े और एक नयी राजनीति की सफलता के शुरुआती प्रतीक बने। लोकतांत्रिक अधिकार और विकेन्द्रीकरण , सामाजिक न्याय ,पर्यावरण तथा आर्थिक नीति के दुष्परिणामों के विरुद्ध संगठनकर्ता बने तथा इन्हीं संघर्षों के लिए समाज-विरोधी ताकतों के लाठी-डंडे खाये और थोपे गए फर्जी मुकदमों में कई बार जेल गये। फिरकावाराना ताकतों का मुकाबला करने के लिए नगर में गठित ‘सद्भाव अभियान’ से वे सक्रियता से जुड़े । साम्प्रदायिक दंगों के दौरान थोपे गये फर्जी मुकदमों को हटाने के पक्ष में तथा हिंसा में शरीक लोगों पर लगे मुकदमों को सरकार द्वारा हटाने के विरुद्ध अफलातून ने कामयाब कोशिश की। पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ हमारे समूह ने रचनात्मक संघर्ष का सहारा लिया है तथा मानवाधिकार आयोग द्वारा सार्थक हस्तक्षेप के लिए पहल की है ।
वाराणसी के स्त्री सरोकारों के साझा मंच – समन्वय के माध्यम से शहर में ही नहीं समूचे राज्य में हुए नारी-उत्पीड़न के विरुद्ध कारगर आवाज उठाई गई है ।
रोज-ब-रोज की नागरिक समस्याओं का समाधान नगर निगम और उसके सभासदों के स्तर पर होना चाहिए । विधायक-नीधि का दुरुपयोग ज्यादा होगा यदि कोई ठेकेदार ही विधायक बन जाए।
इसलिए वाराणसी कैन्ट क्षेत्र में भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलों का विकल्प खोजने की आप कोशिश करेंगे तो आपकी निराशा दूर हो सकती है । बड़े दलों से जनता की निराशा के कारण फिर अस्पष्ट बहुमत का दौर शुरु होगा ऐसा प्रतीत हो रहा है।इसलिए समाजवादी जनपरिषद के उम्मीदवार विधान सभा में विपक्ष में रहने और जन आकांक्षाओं की आवाज को बुलन्द करने का संकल्प लेते हैं। हमें जनता के विवेक पर भरोसा है। यह सिर्फ अफवाह ही हो सकती है कि सुबह होगी ही नहीं । सुबह होगी क्योंकि मत, बल,समर्थन आपके हाथ में है। भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलो से छुटकारा पाने की आपकी कोशिश सफल होगी यह हमे यकीन है। विधान सभा में आपकी आवाज बुलन्द हो इसलिए हम आप से अपील करते हैं कि अपना अमूल्य वोट देकर वाराणसी कैन्ट से समाजवादी जनपरिषद के साफ-सुथरे और जुझारु उम्मीदवार अफ़लातून को भारी मतों से विजयी बनाएं ।निवेदक,
समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश
लोक राजनैतिक मंच                                     साझा संस्कृति मंच

Read Full Post »

चुनावों के करीब जाति-संगठनों के सम्मेलनों में जो प्रस्ताव पारित किए जाते हैं उनमें – ‘हमारी जाति के लोगों को सभी दल अधिक-से-अधिक टिकट दें ‘ टाइप प्रस्ताव प्रमुख होता है । इन संगठनों का एक मुख्य दावा रहता है कि वे अराजनैतिक हैं । सभी दलों से बिरादरी के लोगों के लिए टिकट मांगना अराजनीति है । चुनावों में यह जाति-संगठन अलग-अलग दलों द्वारा उनकी जाति के कितने और किन्हें उम्मीदवार बनाया गया है इसका ऐलान भी करते हैं । विभिन्न दलों के कार्यकर्ता इन संगठनों में एक साथ शामिल रहते हैं ।
एक लक्ष्यीय ‘अराजनैतिक’ संगठनों की इन जाति-संगठनों से कितनी समानता है ! ‘राजनीति धोखा है , धक्का मारो मौका है ‘ का नारा भी लगायेंगे और यह भी कहेंगे , ‘ जो दल हमारी मांग मान लेगा उसे राजनैतिक फायदा मिलेगा ‘ । स्वयंसेवी संस्थाओं के कर्ता-धर्ता तमाम भ्रष्ट दलों के भ्रष्ट नेताओं से नाता रखते हैं । सत्ता के गलियारों में अब इनकी ‘ सलाहकार परिषद ‘ की कोठरियां भी बन गई हैं । इसी प्रकार शिक्षा पर केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड में भी स्वयंसेवी-अराजनैतिकों की नुमाइन्दगी होती है ।
जमीनी-स्तर पर काम करने वाली इन संस्थाओं का समाज-अर्थनीति की खूफियागिरी में किस प्रकार की भूमिका हो सकती है इसके कु्छ उदाहरण देखिए :
भारत में जब इलेक्ट्रानिक्स के क्षेत्र में तेज प्रगति हो रही थी तब एक विदेशी फन्डिंग एजेन्सी ने एक स्वयंसेवी संस्था को ‘इलेक्ट्रानिक्स उद्योग में महिलाओं की स्थिति ‘ पर एक प्रोजेक्ट दिया । महिलाओं के नाम पर मिले प्रोजेक्ट के बहाने फन्डिंग एजेन्सी को उद्योग से जुडे अन्य जमीनी तथ्य हासिल करने थे ।
७वें दशक की शुरुआत में गुजरात में पिछडे वर्गों को ’बक्शी-पंच’ (बक्शी आयोग) के आधार पर आरक्षण दिया गया। गुजरात के पटेलों के नेतृत्व में इसका विरोध हुआ। मेरे भाई अहमदाबाद में पत्रकार थे और अतिरिक्त आमदनी के लिए एक इंग्लैण्ड के पैसे से चलने वाली संस्था में अनुवाद का अंशकालिक काम कर रहे थे। यह संस्था उनसे गुजरात के छोटे कस्बों के अखबारों में छप रही आरक्षण विरोधी खबरों का अनुवाद करा के अपने दानदाताओं को भेज रहे थी । जो तथ्य और सूचनायें और रपट जमीनी-स्तर से मिलनी हैं उन्हें इन संस्थाओं की मदद से आसानी से हासिल किया जाता है ।
जिन बातों पर आम दिनों में ज्यादा ध्यान नहीं जाता है उन पर इस खास दौर में जाएगा , उम्मीद है ।

Read Full Post »

” अन्ना हजारे के नेतृत्व में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश में एक आशा का संचार किया है । सरकार और व्यवस्था परस्त राजनैतिक दलों को जन शक्ति के सामने झुकना पड़ा है । गत ४ दशकों से टाले जा रहे एक प्रभावी लोकपाल/लोकायुक्त संस्था के गठन संबंधी कानून को जन शक्ति के दबाव में संसद में पारित करने का फैसला करना पड़ा है । जन शक्ति की आवाज के संसद में प्रतिध्वनित होने की भारतीय लोकतंत्र के लिहाज से यह एक ऐतिहासिक घटना है । “

समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पारित राजनैतिक प्रस्ताव में उपर्युक्त विचार व्यक्त करते हुए अन्ना हजारे द्वारा अनशन तोड़ने के बाद अपने वक्तव्यों उठाए गए व्यवस्था परिवर्तन संबंधी सवालों , जैसे मानव और प्रकृति के शोषण पर आधारित व्यवस्था , किसानों और मजदूरों का शोषण , विकेन्द्रीकरण , चुनाव – सुधार , ग्राम-सभा का अधिकार , शिक्षा का घोर व्यावसाईकरण आदि को लेकर आन्दोलन जारी रखने के संकल्प को दोहराया है ।

  आगामी १० से १२ अक्टूबर को बिहार के सासाराम में दल का राष्त्रीय सम्मेलन आयोजित होगा ।बैठक में सम्मेलन में पेश होने वाले राजनैतिक , सामाजिक और आर्थिक प्रस्तावों पर व्यापक चर्चा हुई और उन्हें पूर्णांग रूप दिया गया । आगामी दिनों में समाजवादी जन परिषद की पहल पर ’व्यवस्था बदलो – देश बदलो’ के आह्वान के साथ ’परिवर्तन यात्रा निकाली जाएगी’।

गत २७ से २९ अगस्त को रांची में संपन्न समाजवादी जन परिषद की  कार्यकारिणी की बैठक में सर्वश्री लिंगराज (अध्यक्ष ) , सोमनाथ त्रिपाठी (महमन्त्री ) , सुनील (उपाध्यक्ष) , अजीत झा,जोशी जेकब,चंचल मुखर्जी (तीनों सचिव),रमांकांत वर्मा ,चन्द्रभूषण चौधरी, शिवपूजन सिंह,सत्येन्द्र बर्मन,शिवजी,रामकेवल चौहान ,संतू भाई  व  अफ़लातून प्रमुख थे ।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी , रांची

राष्ट्रीय कार्यकारिणी

राष्ट्रीय समिति

 

Read Full Post »

अन्ना एवं साथियों के नाम एक पत्र
आदरणीय अन्ना हजारे, प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, अरविंद केजरीवाल एवं साथी,
16, अगस्त, 2011 से एक प्रभावी एवं स्वतंत्र लोकपाल के कानून के लिए आप फिर से अनशन सत्याग्रह शुरु करने जा रहे है। भ्रष्टाचार, अनाचार, कुशासन और नैतिक पतन में आकंठ डूबे इस देश में आपने एक ठोस मुद्दे को लेकर मजबूती से जो मोर्चा खोला है, उसके लिए हम आपको बधाई देते है। आपके माध्यम से देश में एक नई चेतना और उम्मीद का संचार हुआ है।
यह सही है कि महज लोकपाल की एक संस्था बन जाने से देश में भ्रष्टाचार खतम नहीं हो जाएगा। किंतु भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में यह एक शुरुआत हो सकती है। निष्पक्ष, प्रभावी, स्वतंत्र व स्वायत्त लोकपाल और लोकायुक्त की संस्थाएं केन्द्र और प्रांतीय स्तरों पर कायम होने से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने में मदद जरुर मिलेगी। ठीक उसी तरह जैसे आज उच्च न्यायालयों, सर्वोच्च न्यायालय एवं महालेखा नियंत्रक-परीक्षक जैसी संस्थाओं से कुछ मदद मिल जाती है या सूचना के अधिकार का कानून बनने से भी कुछ मदद मिली है।
किंतु यह भी सही है कि केन्द्र सरकार, सत्ता दल और विपक्षी दलों में एक सही व प्रभावी लोकपाल संस्था को बनाने की कोई इच्छा एवं क्षमता नहीं बची है। आप जैसा लोकपाल कानून बनाना चाहते है, वैसा कानून देश की मौजूदा सरकार या मौजूदा संसद बनाएगी, इसकी उम्मीद नहीं के बराबर है। इसका कारण साफ है। आज की संसद एक पतनशील, सिद्धांतहीन, भ्रष्ट और यथास्थितिवादी राजनीति की उपज है। इससे अपने स्वार्थों पर कुठारघात करने वाले कदमों की उम्मीद नहीं की जा सकती।
दूसरी ओर, यह भी सही है कि हमारी आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून बनाने का काम संसद एवं प्रांतीय विधानसभाओं का है। इसलिए आप संसद से , सांसदों से और राजनैतिक दलों से कोई विशेष कानून बनाने की अपील तो कर सकते है (जो आपने उनसे मिलकर की भी है), किंतु इस बारे में कोई आदेश नहीं दे सकते, फैसला नहीं ले सकते या जिद नहीं कर सकते। इसलिए यदि आप 16 अगस्त से जन लोकपाल विधेयक की अपनी मांग को लेकर आमरण अनशन करते है, तो यह एक अनुचित हठ की श्रेणी में आ जाएगा। यह अलोकतांत्रिक भी है, क्योंकि इस विधेयक के बारे में देश के अन्य लोगों की राय अलग-अलग भी हो सकती है।
आपने पिछली बार अप्रैल में जब अनशन किया था, तब बात अलग थी। तब आपकी मांग लोकपाल विधेयक का मसविदा बनाने के लिए समिति के गठन की थी। आपको मिले जनसमर्थन के कारण सरकार को मांग स्वीकार करनी पड़ी। अब इस समिति की प्रक्रिया से जो भी नतीजा निकला है, उसमें केन्द्र सरकार ने बदमाशी की है और अड़ियल रवैया अपनाया है, फिर भी उसका उपाय यह नहीं है कि आप अपने मसविदे को मनवाने के लिए दुबारा आमरण अनशन पर बैठ जाए।
यदि इस तरह देश में अलग-अलग व्यक्ति और समूह कुछ खास तरह का कानून बनवाने के लिए आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे तो क्या हालत पैदा हौंगे, इसकी कल्पना आप कर सकते है। यह भी गौरतलब है कि आधुनिक काल में सत्याग्रह के जनक माने जाने वाले महात्मा गांधी ने कभी भी किसी मांग को लेकर उपवास नहीं किए। उनके उपवास आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और देश की आत्मा को जगाने के लिए होते थे।
इसलिए समाजवादी जन परिषद (जो कि समाजवादी विचार और देश में एक वैकल्पिक क्रांतिकारी राजनीति के लिए समर्पित एक राजनैतिक दल है) की और से हम आपसे अपील करते है कि कृपया 16 अगस्त से आमरण अनशन न करें। इसके बजाय सांसदो व नेताओं की अतंरात्मा को जगाने के लिए, उन पर नैतिक दबाव बनाने के लिए और देश को झकझोरने के लिए आप तीन दिन का सांकेतिक अनशन करें।
यदि इस के बाद भी इन सांसदों को सद्बुद्धि नहीं आती है, तो आप इस लड़ाई को देश की जनता के बीच ले जाएं। इसके लिए एक जनमत-संग्रह की मांग को लेकर आप पूरे देश में घूमे। आप यदि पदयात्रा करते है तो आपको जबरदस्त जनसमर्थन मिलेगा। अभी तक आपको जो समर्थन मिला है, वह ज्यादातर पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग का है। अब इस मुहिम को दिल्ली से बाहर देश के कोने-कोने में गरीब व निम्न मध्यम वर्ग के करोडों लोगों के बीच ले जाने की जरुरत है।
यदि आप ऐसा करेंगे, तो आप पाएंगे कि इस देश में भ्रष्टाचार की समस्या के कई रुप, आयाम व चेहरे है। देश के साधारण नागरिक रोज जिस भ्रष्टाचार व कुशासन से जूझते है, उसका गहरा रिश्ता उस जन-विरोधी केन्द्रीकृत प्रशासनिक ढ़ाचे व दर्रे से है जो हमें अंग्रेजी राज से विरासत में मिला है और जिसे आजादी मिलने के बाद बुनियादी रुप से बदलने का काम नहीं हुआ। भारत का लोकतांत्रिक ढ़ांचा भी काफी केन्द्रीकृत है, जिसकी सीमाओं का
अहसास आपको भी इस लड़ाई के दरम्यान हुआ होगा। इसके निर्वाचित प्रतिनिधियों के आचरण-कर्म तथा आम जनता की समस्याओं-आकांक्षाओं के बीच गहरी खाई बन गई है।
इसलिए भारत के संविधान के अच्छे प्रावधानों को संजोते हुए भी लोकतांत्रिक ढ़ांचे में सुधार का मुद्दा आपके एजेण्डे में जोड़ना लाजमी होगा। मोटे तौर पर ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की नकल पर बने इस ढ़ांचे की जगह, गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ और लोहिया के ‘चौखम्भा राज’ की कल्पना से मदद लेते हुए, क्रांतिकारी ढ़ंग से सत्ता का विकेन्द्रीकरण करना होगा। अहम मसलों पर जनमत-संग्रह की व्यवस्था भी होनी चाहिए, जो दुनिया के कई देशों में मौजूद है।
इसी के साथ, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को परिणिति की ओर ले जाने के लिए आज की भ्रष्ट, स्वार्थी व सिद्धांतहीन राजनीति का भी विकल्प तैयार करना जरुरी है। राजनीति से ही देश चलता है। यदि राजनीति ऐसी ही रही तो देश कभी भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो सकता। इसलिए स्वयं को अराजनैतिक कहने के बजाय आपको यह चुनौती स्वीकार करनी पड़ेगी। कपिल सिब्बल ने चुनाव लड़ने की जो चुनौती आपको दी है, उसका दीर्घकाल में यही जवाब है कि आप देश की जनता को जगाते हुए, नए ढ़ांचों के निर्माण की मुहिम चलाते हुए, एक देशभक्त, जनमुखी और परिवर्तनकामी राजनीति खड़ी करें।
भ्रष्टाचार व महाघोटालों की जो बाढ़ पिछले कुछ सालों से देश में आई है, उसका सीधा रिश्ता उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण-बाजारीकरण-कंपनीकरण की नीतियों से भी है। स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, खनिज आदि का बाजार बनने से जो भ्रष्टाचार, लूट तथा कदाचार फैला है, उस पर भी आपका ध्यान होगा। घोर गैरबराबरी, विलासिता व उपभोक्ता संस्कृति के रहते भी देश में सदाचार कायम होना मुश्किल है। यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को आपको व्यवस्था-परिवर्तन की लड़ाई बनाना होगा। ऐसी हालत में यह लड़ाई शोषण, अन्याय, अत्याचार, विस्थापन, गरीबी, मंहगाई, कंपनी राज तथा साम्राज्यवाद के खिलाफ देश की मेहनतकश जनता की लड़ाई से जुड़ जाएगी। तभी एक क्रांतिकारी जनशक्ति भी तैयार हो सकेगी।
यदि आप ऐसा करते है तो आपको समाजवादी जन परिषद का ही नहीं, देश के अनेक जन संगठनों तथा करोड़ों लोगों का पूरा सहयोग व समर्थन मिलेगा।
क्रांतिकारी शुभकामनाओं के साथ,
लिंगराज     सुनील     सोमनाथ त्रिपाठी     अजीत झा     विश्वनाथ बागी        संजीव साने
अध्यक्ष     उपाध्यक्ष     महामंत्री                सचिव           संगठन मंत्री              उपाध्यक्ष

( लिप्यांतर श्री प्रवीण त्रिवेदी के सहयोग से साभार )

Read Full Post »

पिछले भाग से आगे :

भारत जैसे देश में जनतंत्र को चलाने के लिए हजारों ( शायद लाखों ) राजनैतिक कार्यकर्ता चाहिए । संसद , विधान सभा , जिला परिषद , ग्राम पंचायत आदि को मिला कर हजारों राजनैतिक पद हैं । प्रत्येक पद के लिए अगर दो या तीन उम्मीदवार होंगे , तब भी बहुत बड़ी संख्या हो जायेगी । इनमें से बहुत सारे कार्यकर्ता होंगे , जिन्हें पूर्णकालिक तौर पर सार्वजनिक काम में रहना होगा तो उनके परिवारों का खर्च कहाँ से आएगा ? भ्रष्टाचार की बात करनेवालों को इस प्रश्न का भी गंभीरतापूर्वक उत्तर ढूँढना पड़ेगा ।

    पिछले ५० साल की राजनीति पर हम संवेदनशील हो कर गौर करें , तो इस बात से हम चमत्कृत हो सकते हैं कि हजारों आदर्शवादी नौजवान देश के भविष्य को संदर बनाने के लिए परिवर्तनवादी राजनीति में कूद पड़े थे । आज अगर उनके जीवन इतिहासों का विश्लेषण करेंगे , तो मालूम होगा कि उनमें से अधिकांश बाद के दिनों में , जब उनको परिवार का भी दायित्व वहन करना पड़ा , या तो राजनीति से हट गये या अपने आदर्शों के साथ समझौता करने लगे ।  निजी तथा सार्वजनिक जीवन की जरूरतों को पूरी करने के लिए शुरु में छोटे-छोटे ठेकेदारों से , भ्रष्ट प्रशासकों से या काले व्यापारियों से चंदा लेना पड़ा । बाद में जब लगातार खर्च बढ़ता गया और प्रतिष्ठा भी बढ़ती गई , तब बड़े व्यापारियों और पूँजीपतियों के साथ साँठगाँठ करनी पड़ी । अगर वे आज भी राजनीति में हैं , तो अब तक इतना समझौता कर चुके हैं कि भ्रष्टाचार या शोषण के विरुद्ध खड़े होने का नैतिक साहस नहीं है । पिछले ५० साल आदर्शवादी कार्यकर्ताओं के सार्वजनिक जीवन में पतन और निजी जीवन में हताशा का इतिहास है ।

    अगर शुरु से ही समाज का कोई प्रावधान होता कि राजनीति में प्रवेश करनेवाले नौजवानों का प्रशिक्षण-प्रतिपालन हो सके , उनके लिए एक न्यूनतम आय की व्यवस्था हो सके , तो शायद वे टूटते नहीं , हटते नहीं , भ्रष्ट नहीं होते । कम से कम ५० फीसदी कार्यकर्ता और नेता स्वाधीन मिजाज के होकर रहते । अगर किसी जनतंत्र में १० फीसदी राजनेता बेईमान होंगे तो देश का कुछ बिगड़ेगा नहीं । अगर ५० फीसदी बेईमान हो जायें, तब भी देश चल सकता है । अब तो इस पर भी संदेह होता है कि सर्वोच्च नेताओं के ५ फीसदी भे देशभक्त और इमानदार हैं या नहीं ।

From Andolan_Tumkur_Hampi

    समाज के अभिभावकों का , देशभक्त कार्यकर्ताओं का संरक्षण समाज के द्वारा ही होना चाहिए । सारे राजनेताओं को हम पूँजीपतियों पर आश्रित होने के लिए छोड़ नहीं सकते । समाज खुद उनके प्रशिक्षण और प्रतिपालन का दायित्व ले । इस दायित्व को निभाने के लिए यदि बनी बनाई संस्थाएँ नहीं हैं , तो सांविधानिक तौर पर राज्य के अनुदान से संस्थायें खड़ी की जाएं । जिस प्रकार न्यायपालिका राज्य के अनुदान पर आधारित है , लेकिन स्वतंत्र है , उसी तरह राजनेताओं का प्रशिक्षण और प्रतिपालन करनेवाली संस्थायें भी स्वतंत्र होंगी। केवल चरित्र , निष्ठा और त्याग के आधार पर राजनैतिक संरक्षण मिलना चाहिए । जो आजीवन सामाजिक दायित्व वहन करने के लिए संकल्प करेगा . जो कभी धन संचय नहीं करेगा , जो संतान पैदा नहीं करेगा , उसीको सामाजिक संरक्षण मिलेगा । जो धन संचय करता है , तो संतान पैदा करता है , उसको भी राजनीति करने , चुनाव लड़ने का अधिकार होगा , लेकिन उसे सामाजिक संरक्षण नहें मिलेगा । जिसे सामाजिक संरक्षण मिलेगा उसके विचारों पर अनुदान देनेवालों का कोई नियंत्रण नहीं रहेगा । सिर्फ आचरण पर निगरानी होगी । निगरानी की पद्धति पूर्वनिर्धारित रहेगी।

  यह कोई विचित्र या अभूतपूर्व प्रस्ताव नहीं है । कोई भी राज्य व्यवस्था हो , सार्वजनिक जीवन में चरित्र की जरूरत होगी । किसी भी समाज में समर्पित कार्यकर्ताओं का एक समूह चाहिए । आधुनिक युग के पहले संगठित धर्म ने कई देशों में सार्वजनिक जीवन का मार्गदर्शन किया । धार्मिक संस्थाओं ने भिक्षुओं, ब्राह्मणों ,बिशपों को प्रशिक्षण और संरक्षण दिया , ताकि वे सार्वजनिक जीवन का मानदंड बनाये रखें । ग्रीस में और चीन में प्लेटो और कन्फ्यूशियस ने राजनैतिक कार्य के लिए प्रशिक्षित और समर्पित समूहों के निर्माण पर जोर दिया । सिर्फ आधुनिक काल में सार्वजनिक जीवन के मानदंडों को ऊँचा रखने की कोई संस्थागत प्रक्रिया नहीं तय की गयी है । इसलिए सारी दुनिया का सार्वजनिक जीवन अस्त-व्यस्त है । सार्वजनिक जीवन का दायरा बढ़ गया है , लेकिन मूल्यों और आदर्शों को बनाये रखने की संस्थायें नहीं हैं ।

    संविधान के तहत या राजकोष से राजनीति का खर्च वहन करना भी कोई नयी बात नहीं है । विपक्षी सांसदों और विधायकों का खर्च राजकोष से ही आता है । यह एक पुरानी मांग है कि चुनाव का खर्च भी क्यों नहीं ? राजनीति का खर्च भी क्यों नहीं ? कुछ प्रकार के राजनेताओं का जीवन बचाने के लिए केन्द्रीय बजट का प्रतिमाह ५१ करोड़ रुपये खर्च होता है । करोड़पति सांसदों को भी पेंशन भत्ता आदि मिलता है । इनमें से कई अनावश्यक खर्चों को काट कर देशभक्त राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक सामाजिक कोष का निर्माण शुरु हो सकता है ।

    अगर विवेकशील लोग राजनीति में दखल नहीं देंगे तो भारत की राजनीति कुछ ही अरसे  के अंदर अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के हाथों में चली जायेगी । जो लोग इसके बारे में चिंतित हो रहे हैं ,उन्हें एक मूल्य आधारित राजनैतिक खेमा खड़ा करना होगा ।इस खेमे के लिए एक बड़े पैमाने का कोष निर्माण करना होगा ।  आज की संसद या विधान सभा इसके लिए अनुदान नहीं देगी । सामाजिक और स्वैच्छिक ढंग से ही इस काम को शुरु करना होगा ।

    अन्ना हजारे इस काम को शुरु करेंगे , तो अच्छा असर होगा । यह राजनैतिक काम नहीं है , जनतांत्रिक राजनीति को बचा कर रखने के लिए यह एक सामाजिक काम है । धर्मविहीन राज्य में चरित्र का मानदंड बना कर रखने का यह एक संस्थागत उपाय है । अंततोगत्वा इसे ( ऐसी संस्थाओं को ) समाज का स्थायी अंग बना देना होगा या सांविधानिक बनाना होगा ।

    धर्म-नियंत्रित समाजों के पतन के बाद नैतिक मूल्यों पर आधारित एक मानव समाज के पुनर्निर्माण के बारे में कोई व्यापक बहस नहीं हो पायी है , यह बहस अनेक बिंदुओं से शुरु करनी होगी । यह भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है ।

(स्रोत : दूसरा शनिवार , सितंबर १९९७ )

Read Full Post »

[ करीब चौदह वर्ष पहले किशन पटनायक ने अपने मित्र राजकिशोर द्वारा सम्पादित  पत्रिका ’दूसरा शनिवार’ (सितम्बर १९९७) में यह लेख लिखा था । यह पुराना लेख भविष्य की बाबत है इसलिए और ध्यान खींचता है ।  कई बातें इस दौर के लिए भी प्रासंगिक और नई हैं । लेख इन्टरनेट के लिहाज से लम्बा है। उम्मीद है पाठक धीरज न खोयेंगे । - अफ़लातून ]

सिर्फ भारत में नहीं , पूरे विश्व में जनतंत्र का भविष्य धूमिल है । १९५० के आसपास अधिकांश औपनिवेशिक मुल्क आजाद होने लगे । उनमें से कुछ ही देशों ने जनतंत्र को शासन प्रणाली के रूप में अपनाया । अभी भी दुनिया के ज्यादातर देशों में जनतंत्र स्थापित नहीं हो सका है । बढ़ते मध्य वर्ग की आकांक्षाओं के दबाव से कहीं – कहीं जनतंत्र की आंशिक बहाली हो जाती है । लेकिन कुल मिलाकर विकासशील देशों में जनतंत्र का अनुभव उत्साहवर्धक नहीं है । नागरिक आजादी की अपनी गरिमा होती है , लेकिन कोई भी विकासशील देश यह दावा नहीं कर सकता कि जनतंत्र के बल पर उसका राष्ट्र मजबूत या समृद्ध हुआ है या जनसाधारण की हालत सुधरी है ।

अगर भारत में जनतंत्र का खात्मा जल्द नहीं होने जा रहा है , तो इसका मुख्य कारण यह है कि पिछड़े और दलित समूहों की अकांक्षाएँ इसके साथ जुड़ गई हैं ।  अत: जनतंत्र का ढाँचा तो बना रहेगा , लेकिन जनतंत्र के अन्दर से फासीवादी तत्वों का जोर-शोर से उभार होगा । जयललिता , बाल ठाकरे और लालू प्रसाद पूर्वाभास हैं । अरुण गवली , अमर सिंह जैसे लोग दस्तक दे रहे हैं । अगर वीरप्पन कर्नाटक विधान सभा के लिए निर्वाचित हो जाता है तो इक्कीसवीं सदी के लिए  आश्चर्य की बात नहीं होगी । यानी जनतंत्र जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा नहीं कर पा रहा है । अगर राजनीति की गति बदली नहीं , तो अगले दो दशकों में भारत के कई इलाकों में क्षेत्रीय तानाशाही या अराजकता जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होंगी ।

इसका मतलब यह नहीं कि जनतंत्र का कोई विकल्प है । अगर १९४७ या १९५० में हम एक जनतांत्रिक शासन प्रणाली नहीं अपनाते , तो देश की हालत इससे भी बुरी होती । गलती यह हुई कि हम अपने जनतंत्र को सही रूप और चरित्र नहीं दे पाये ।  भारत के इतिहास , भूगोल, समाज और अर्थनीति को समझते हुए भारत में जनतंत्र का जो मौलिक स्वरूप होना चाहिए था , उसका निरूपण आज तक नहीं हो पाया है । हमारे नेतृत्व का दिवालियापन और बौद्धिक वर्ग की वैचारिक गुलामी इसके लिए दायी हैं । १९४७ में उनके सामने सफ़ल जनतंत्र के दो नमूने थे और शासन व्यवस्था की एक औपनिवेशिक प्रणाली भारत में चल रही थी ।  इन तीनों को मिलाकर हमारे बौद्धिक वर्ग ने एक औपनिवेशिक जनतंत्र को विकसित किया है , जो जनतंत्र जरूर है  , लेकिन अंदर से खोखला है । शुरु के दिनों में अन्य विकासशील देशों के लिए भारत की मार्गदर्शक भूमिका थी ।  जब भारत ही जनतंत्र का कोई मौलिक स्वरूप विकसित नहीं कर पाया , तो अन्य देशों के सामने कोई विकल्प नहीं रह गया ।

पिछले पचास साल में भारत तथा अन्य विकासशील देशों में जनतंत्र की क्या असफलताएँ उजागर हुई हैं  , उनका अध्ययन करना और प्रतिकार ढूँढना – यह काम भारत के विश्वविद्यालयों ने बिलकुल नहीं किया है । शायद इसलिए कि पश्चिम के समाजशास्त्र ने इसमें कोई अगुआई नहीं की । पश्चिम से सारे आधुनिक ज्ञान का उद्गम और प्रसारण होता है लेकिन वहाँ के शास्त्र ने भी १९५० के बाद की दुनिया में जनतंत्र की असफलताओं का कोई गहरा या व्यापक अध्ययन नहीं किया है , जिससे समाधान की रोशनी मिले । पश्चिम की बौद्धिक क्षमता संभवत: समाप्त हो चुकी है ; फिर भी उसका वर्चस्व जारी है ।

१९५० के आसपास जिन देशों को आजादी मिली , उन समाजों में आर्थिक सम्पन्नता नहीं थी और शिक्षा की बहुत कमी थी । इसलिए इन देशों के जनतांत्रिक अधिकारों में यह बात शामिल करनी चाहिए थी कि प्रत्येक नागरिक के लिए आर्थिक सुरक्षा की गारंटी होगी और माध्यमिक स्तर तक सबको समान प्रकार की शिक्षा उपलब्ध होगी । अगर ये दो बुनियादी बातें भारतीय जनतंत्र की नींव में होतीं  , तो भारत की विकास की योजनाओं की दिशा भी अलग हो जाती । जाति प्रथा , लिंग भेद , सांप्रदायिकता और क्षेत्रीय विषमता जैसी समस्याओं के प्रतिकार के लिए एक अनुकूल वातावरण पैदा हो जाता । लोग जनतंत्र का एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकते थे ।

हुआ है उलटा । सारे समाज विरोधी तत्व जनतंत्र का उपयोग अपने को शक्तिशाली बनाने के लिए कर रहे हैं । राजनीति पर उन्हींका अधिकार है । जनतंत्र एक व्यापक राजनीति के द्वारा संचालित होता है । इस राजनीति का चरित्र इतना भयावह होता गया है कि अच्छे लोगों के लिए राजनीति वर्जनीय मानी जा रही है । इसका तार्किक परिणाम है कि राजनीति पर अधिकारियों का अधिकार हो जायेगा । अगर विवेकशील लोगों का प्रवेश राजनीति में नहीं होगा तो भ्रष्ट लोगों का राजत्व अवश्य होगा । इस द्वन्द्व का समाधान कैसे होगा ? अच्छे लोग राजनीति में कैसे आयेंगे और वहाँ अच्छे बन कर रहेंगे , इसका कोई शास्त्र या विवेचन होना चाहिए । समाज अगर जनतंत्र चाहता है , तो समाज के ही कुछ तरीके होने चाहिए , जिससे अच्छे लोग राजनीति में आयेंगे और बने रहेंगे यह सिलसिला निरंतरतापूर्वक चालू रहेगा। अगर वैसा नहीं होता है , तो राजतंत्र क्यों बुरा था ? राजतंत्र को बुरा माना गया क्योंकि अच्छे राजा का बेटा अच्छा होगा इसका कोई निश्चय नहीं है । १५० साल के अनुभव से यह मालूम हो रहा है कि जनतंत्र में भी इसका निश्चय नहीं है कि एक बुरे शासक को हटा देने के बाद अगला शासक अच्छा होगा । अत: जनतंत्र को कारगर बनाने के लिए नया सोच जरूरी है । जनतंत्र के ढाँचे में ही बुनियादी परिवर्तन की जरूरत है ।

किशनजी और लोहिया

किशनजी और लोहिया

राजनैतिक दल और राजनैतिक कार्यकर्ता आधुनिक जनतंत्र के लिए न सिर्फ अनिवार्य हैं , बल्कि उनकी भूमिका जनतंत्र के संचालन में निर्णायक हो गई है । फिर भी हमारे संविधान में ऐसा कोई सूत्र नहीं है , जिसके तहत नेताओं और दलों पर संस्थागत निगरानी रखी जा सके । ब्रिटेन या अमेरिका में जनमत यानी संचार माध्यमों की निगरानी को पर्याप्त माना जा सकता है । लेकिन भारत जैसे मुल्क में यह पर्याप्त साबित नहीं हो रही । पश्चिम के जनतंत्र को जो भी सीमित सफलता मिली है , उसके पीछे वहां के जनसाधारण की आर्थिक संपन्नता और शिक्षा का व्यापक प्रसार भी है । इसके अतिरिक्त कई प्रकार की परंपराएं वहां विकसित हो चुकी हैं । उन देशों के लोगों को यह बात बुरी नहीं लगती कि सारे स्थापित राजनैतिक दल पूँजीपतियों पर आश्रित हैं । भारत या किसी भी गरीब मुल्क में यह बात बुरी लगेगी कि सारे राजनैतिक दल पूँजीपतियों के अनुदान पर आश्रित हैं ।

राजनीति का खर्च कहाँ से आयेगा ? राजनीति का खर्च बहुत बड़ा होता है , राजनेताओं यानी राजनैतिक कार्यकर्ताओं का अपना खर्च है  , संगठन का खर्च है , चुनाव और आन्दोलनों का खर्च है । यह कल्पना बिलकुल गलत है कि  अच्छे काम के लिए पर्याप्त पैसे मिल जाते हैं । राजनीति का अनुभव है कि बुरे काम के लिए पैसे मिल जाते हैं । अच्छी राजनीति के लिए जितना पैसा जनसाधारण से मिलता है , उतने से काम नहीं चलता है । अत: राजनीति के लिए कहाँ से पैसा आयेगा ,यह जनतंत्र का एक जटिल प्रश्न है और इसका एक सांविधानिक उत्तर होना चाहिए । अगर संविधान इसका उत्तर नहीं देगा  , तो सारे के सारे राजनेता या तो पूँजीपतियों पर आश्रित होंगे या उनसे मिलकर भ्रष्टाचार को बढ़ायेंगे । कार्यकर्ता उनके पिछलग्गू हो जायेंगे । कार्यकर्ता का अपनी जीविका के लिए दल पर आश्रित रहना भी अच्छी बात नहीं है , क्योंकि वह दल का गुलाम हो जायेगा ।

( अगले भाग में समाप्य )

Read Full Post »

पिछला भाग

आधुनिकतावादियों का संकत यह है कि वे पारिवारिक वफादारी से तो मुक्त नहीं हो पाते लेकिन आधुनिकता के नाम पर अपने समाज के उन परंपरागत मूल्यों को नकार देते हैं जो हमारे समाज में कभी वैयक्तिक महत्त्वाकांक्षा पर अंकुश का काम करते थे । एक अंकुश तो था एक सीमा के बाद भौतिक वस्तुओं के प्रति उपेक्षा की दृष्टि । दूसरा अंकुश था व्यक्ति के जीवन का चार कालों में विभाजन का आदर्श जिसमें तीसरा वानप्रस्थ और चौथा सन्यास था । इसके अनुसार अधेड़ होने पर पारिवारिक जवाबदेही से निवृत्ति और बुढ़ापा आने पर सांसारिक मोहमाया से निवृत्ति जीवन का लक्ष्य था । ऐसा शायद कभी नहीं था कि आम लोगों की जिन्दगी इस आदर्श पर चलती थी । लेकिन चूँकि यह जीवन के आदर्श प्रतिमान थे,लोगों के जीवन पर परोक्ष रूप से इन आदर्शों का प्रभाव हमेशा बना रहता था । सर्वस्व दान यहाँ तक कि संतान दान तक के मिथक समाज में व्यापक थे और इनसे लोगों का जीवन प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था । इस तरह यहां के परंपरागत समाज में संपत्ति और संतान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव कभी भी प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त कर सकता था । प्राचीन भारतीय समाज में शासक  (राजा) स्वेच्छाचारी भी नहीं हो सकता था उसे धर्मशास्त्रों और अनेक श्रेणियों के बंधन में रहना पड़ता था । ये मूल्य सूफी संतों के माध्यम से इस्लाम के भारत में आने के बाद भी और मुगल सल्तनत तक में कायम रहे । औरंगजेब का अपने निजी खर्च के लिए खजाने कोई रकम लेने के बजाए कुरान के आयतों की नकल कर खर्च चलाना और अपनी कब्र तक को बिना किसी तामझाम के फकीरों की कब्रों के बीच स्थापित करने की आज्ञा देना इसका प्रमाण है । इन सबके ऊपर असंग्रह या अपरिग्रह जीवन के उच्चतम आदर्शों में थे । यह स्वाभाविक रूप से संपत्ति के प्रति के प्रति उपेक्षा का भाव पैदा करता था । महात्मा गांधी अगर संपत्ति और संतान के संकीर्ण मोह से बचे रहे तो इसका खास कारण ऊपर बताए गए मूल्यों के प्रति उनकी गहरी आस्था ही थी ।

इसके विपरीत भारत के आधुनिकतावादी जीवन का प्रधान लक्ष्य भौतिक या आर्थिक उपलब्धि मानते हैं । लेकिन इनके लिए खुली प्रतिस्पर्धा की जगह जो आधुनिकता की माँग है , पारिवारिक या जातीय खोल के भीतर से ही उपलब्धि के संघर्ष में जुटना चाहते हैं । यह दोष दिनोंदिन और भी सघन होता गया है ।

इसका एक खास सामाजिक कारण भी रहा है जिसे दूसरे समाजों में भी देखा जा सकता है । इसका सबसे प्रधान कारण है आधुनिक समाज में जीवन की उपलब्धि को एक ही आयाम यानी अर्थ उपार्जन में देखना । उपलब्धि का एक आयामी होने से व्यक्तियों के कर्म चाहे वे जिस क्षेत्र में हों आर्थिक कसौटी पर कसे जाने लगते हैं । सभी तरह के सृजन , चाहे वे शिल्प में हों , अन्य कलाओं में हों या विज्ञान में , बाजार में विनिमय की वस्तु बन जाते हैं । उनको आँकने का एक ही मापदंड है – यह देखना कि उससे कितना धन का उपार्जन होता है । इसमें सफलता के रूप में होती हैं वे सारी सामग्रियां जिन्हें पैसे से खरीदा जा सकता है । यहीं से उपभोक्तावादी संस्कृति को उर्जा मिलती है और लोग अपनी उपलब्धि के पैमाने के रूप में उपभोग के विभिन्न उपकरणों का जखीरा लगानेलगते हैं । जैसे – जैसे उपभोग की  वस्तुओं की किस्में बढ़ती जाती हैं वैसे – वैसे लोगों के जीवन के ढंग और स्तरों का फर्क भी बढ़ने लगता है । इससे एक ओर संपन्नता के प्रतीक वस्तुओं क संख्या अनगिनत होती जाती हैं और दूसरी ओर इन्हें प्राप्त करने की स्पर्धा उत्तरोत्तर अधिक कठोर होती जाती है ।

एक और चीज जो आधुनिक औद्योगिक समाज के विकास का अभिन्न अंग है वह है सुविधाओं का व्यवस्था में हासिल किए गए स्थानों पर निर्भर होना । जो व्यक्ति व्यावसायिक या राजनैतिक प्रतिष्ठानों में  जितना ही ऊँचा स्थान हासिल करता है उसकी आय और सुविधायें उतनी ही अधिक होती हैं । इसे योग्यता के आधार पर समान अवसर के सिद्धांत  के रूप में गरिमामंडित किया जाता है। इसके कारण आधुनिक समाज में कोई भी अपनी सुविधा को कानून और नियम के तहत अपने वंशजों को उस तरह हस्तांतरित नहीं कर सकता जिस तरह वंश परंपरा वाले पारंपरिक समाज में संभव था । लेकिन चूंकि समाज के भीतर जीवन स्तरों का फर्क बहुत ही ऊंचा होता है इससे कोई भी आदमी यहीं चाहता कि उसकी संतान या अन्य नजदीकी रिश्तेदार समाज की निचली सीढियों पर फेंक दिए जांए जहां उन्हें जीवन की वे सुविधायें उपलब्ध नहीं हो सकें जिनके वे अभ्यस्त हैं । यहीं से आधुनिक समाज में कुनबापरस्ती और भ्रष्टाचार की शुरुआत होती है । ऊँचे स्थानों पर जमे लोग अनेक तरह से समान अवसर के आधुनिक सिद्धांत के प्रतिकूल ऐसे तरीकों की तलाश करते हैं, जिनसे समान प्रतिस्पर्धा के कठिन रास्ते से उनके वंशजों को निजात मिलजाए  और वे चोर दरवाजे से ऊँचे स्थानों पर पहुंच जाएं , या अपनी योग्यता के अनुपात से कहीं अधिक आर्थिक लाभ ले सकें । रूस में जहाँ उत्पादन के साधनों पर राज्य का अधिकार था और सुविधायें लोगों को राज्य या अर्थव्यवस्था में हासिल पद के आधार पर मिलती थी अपने सगे-संबंधियों को आगे बढ़ाने के लिए अपनाए जाने वाले भ्रष्ट आचरण काफी व्यापक थे ।

(जारी )

Read Full Post »

हमारे देश में भ्रष्टाचार एक अन्तहीन रुदन का विषय बन गया है – इस हद तक कि इसकी चर्चा सिर्फ रस्मी रह जाए और इसके मिटने की संभावना असंभव लगने लगे । यह बढ़ता हुआ विश्वास कि सभी भ्रष्ट हैं लोगों के मन में यह भाव भी पैदा करता है कि चूँकि सभी भ्रष्ट ही हैं ईमानदार रहना , जो कठिनाइयों से भरा है जरूरी नहीं है और भ्रष्ट आचरण ही व्यावहारिक आचरण है । इस तरह जो भ्रष्ट आचरण से घबड़ाते हैं वे अव्यावहारिक या इससे भी बढ़कर निरे मूर्ख समझे जाते हैं । जब भ्रष्टाचार इतना व्यापक बन गया हो तो इससे लड़ने के लिए न सिर्फ मजबूत संकल्प की जरूरत है बल्कि भ्रष्ट आचरण के व्यापक बनने के कारणों की जानकारी के भी । अगर हम अपने देश के भ्रष्टाचार की सामाजिक जड़ों को पहचानने लगेंगे तो शायद यह विश्वास भी पैदा हो कि यह पुराण विहित कलिकाल की करामात नहीं , जिसके अनुसार हम भ्रष्ट युग या ’ मठ युग ’ में प्रवेश कर गये हैं और इससे उबरने के लिए हमें किसी नये अवतार की प्रतीक्षा या तलाश करनी चाहिए । अगर हममें यह जानकारी बढ़ी कि भ्रष्टाचार के विशेष सामाजिक कारण हैं तो हम इसके निराकरण के भी सामाजिक उपाय ढूँढेंगे । वी.पी. सिंह या किसी अन्य त्राता की ओर इस आशा भरी निगाह से देखना कि वे हमें इस राक्षस से मुक्त कर देंगे अपने यहाँ के भ्रष्टाचार की सामाजिक सन्दर्भों को नहीं समझने का ही परिणाम है ।

इस संदर्भ में सबसे बुनियादी बात यह है कि किसी आचरण को भ्रष्ट मानना काफी हद तक इस पर निर्भर करता है कि संबद्ध व्यक्ति कैसे समाज में रहता है । कोई भी समाज कुछ केन्द्रीय मूल्यों के इर्दगिर्द गठित होता है । उन्हीं मूल्यों से यह निर्धारित होता है कि कोई आचरण भ्रष्ट है या नहीं । मैक्सवेबर के बाद के अधिकांश समाजशास्त्री मोटा मोटी तौर से यह मानने लगे हैं कि किसी समाज के मूल्यों के आधार होते हैं परंपरा , करिश्मा वाला व्यक्तित्व या विवेक पर आधारित कानून नियम की व्यवस्था । इस विभाजन के अनुसार आधुनिक औद्योगिक समाज के मूल्यों के आधार होते हैं भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बनाए गए नियम कानून । यह माना जाता है कि ऐसे आधुनिक समाज में व्यवस्था वैयक्तिक या कौटुंबिक संबंधों या प्रभावों से असंपृक्त होती है । कानून नियम को लागू करने की जवाबदेही एक वेतनभोगी समुदाय या नौकरशाही पर होती है जो शुद्ध रूप से नियमों पर चलते हैं । आदर्श रूप में आधुनिक औद्योगिक समाज और चुनाव पद्धति पर आधारित राजनैतिक व्यवस्थाओं के काम इसी पद्धति से चलते हैं । अगर व्यवहार में आचरण इससे अलग होता है तो इसे विकृति माना जाता है । इसके विपरीत परंपरा पर आधारित समाज में ,और कुछ हद तक करिश्मा वाले व्यक्तित्व के प्रभाव में चलने वाली व्यवस्थाओं में  भी वैयक्तिक वफादारी और निष्ठा नियम कानून से ऊपर हो जाती है । आधुनिक राजनीति में भ्रष्टाचार कुछ आरोपों के कारण आचरण और इसके मूल्यांकन का दो भिन्न मूल्यों पर आधारित समाज व्यवस्थाओं से प्रभावित होना होता है । इसलिए आज का कोई भी समाज जिसने अपने आर्थिक और राजनैतिक ढाँचे में आधुनिक औद्योगिक समाज के मूल्यों को अपना लिया है लेकिन जिसके आपसी मानवीय संबंध परंपरागत समाज के मूल्यों पर चलते हैं एक खास तरह के भ्रष्टाचार के दबाव में रहता है । जैसा ऊपर कहा गया है परंपरागत समाज में व्यक्ति या परिवार के प्रति वफादारी सर्वोपरि महत्व की होती है । इस कारण समाज में किसी ऊँचे ओहदे पर पहुँचे हुए व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि रिश्तेदारों को अपने पद से लाभ पहुँचाए । ठीक इसके विपरीत आधुनिक औद्योगिक समाज की यह अपेक्षा है कि इसके अधिकारी अपने पद का उपयोग कानूनी दायरे के बाहर किसी संबंधी को लाभ पहुंचाने में न करें । इस तरह का व्यवहार समाज के मूल्यों के अनुसार भ्रष्ट आचरण है ।

पदों के दुरुपयोग के अधिकांश मामले इसीलिए उठते हैं क्योंकि आधुनिक मानदंडों पर आधारित संसदीय लोकतंत्र और प्रशासन के ऊँचे पदों पर वे ही लोग हैं जिनके वैयक्तिक आचरण में  परंपरागत वफादारी  घुटघुट कर समाई हुई है । विडंबना तो यह है कि जो लोग आधुनिकता की सबसे अधिक दुहाई देते हैं वे ही लोग अपने सगे-संबंधियों को आगे बढ़ाने में सबसे अधिक रुचि भी दिखलाते हैं । महात्मा गांधी जिन्हें आम तौर से पीछे देखू , परंपरावादी और घोर प्रतिक्रियावादी कहा जाता है शायद देश के बड़े नेताओं में अकेले थे जिन्होंने अपने पुत्रों को वैसे ही जीवन के लिए प्रशिक्षित किया जो देश के श्रमिक वर्ग के बच्चों को उपलब्ध है । अपनी संतान के प्रति पक्षपात रहित व्यवहार का एक दु:खद परिणाम यह हुआ कि उनके बड़े पुत्र हरिलाल गांधी विद्रोही बन गये और वह सब किया जिनका विरोध गांधीजी करते थे । इसके विपरीत जवाहरलाल नेहरू जिन्हें भारतीय आधुनिकता का प्रतीक माना जाता है हर मौके पर अपने परिवार के लोगों को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे जिसके परिणामस्वरूप देश पर तीन पीढ़ी से एक परिवार का शासन चल रहा है । इसी तरह कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं संतान प्रेम भी आधुनिकता की मर्यादाओं को नहीं मानता । अगर भारतीय व्यवस्था में उनके लिए समुचित स्थान नहीं बन पाता तो उनके लिए रूस या अन्य कम्युनिस्ट देशों के नामी प्रतिष्ठानों में पैठ मिल जाती थी जहाँ से वे पुन: अपने लिए एक विशिष्ट स्थान बना लेते थे ।

इस अंतर्विरोध को समझना जरूरी है ।

( जारी )

Read Full Post »

Older Posts »

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 2,815 other followers

%d bloggers like this: