जिलाधिकारी,मऊ।
इस संदेश द्वारा मैं आज सुबह घटित एक आपराधिक घटना की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं।हमारे पंजीकृत राजनैतिक दल-समाजवादी जनपरिषद के प्रान्तीय संगठन मन्त्री साथी विक्रमा मौर्य अपने गांव के स्व. राजेन्द्र मौर्य की हत्या में गवाह हैं और गवाही दे चुके हैं।इस हत्या के नामजद अभियुक्तों द्वारा उन्हें गवाही न देने के लिए धमकाया जा रहा था जिसकी सूचना उन्होंने प्रशासन को दी थी।यह अभियुक्त जमानत पर रिहा हैं तथा आज एक सूमो वाहन पर सवार होकर चौथी मील के निकट साइकिल पर सिपाह जा रहे साथी विक्रमा मौर्य पर हत्या की नियत से इन लोगों ने वाहन चढ़ा दिया।वे पलट कर जब दूसरी बार विक्रमा पर गाड़ी चढ़ाने जा रहे थे तब प्रत्यक्षद्र्शियों के शोर मचाने से भाग गये।पूर्व बी.डी.सी. सदस्य विक्रमा मऊ सदर अस्पताल में जीवन संघर्ष कर रहे हैं। आप से निवेदन है कि शासकीय अधिवक्ता द्वारा हत्या के मामले में जमानत पर रिहा इन लोगों की जमानत रद्द करवाने के लिए आवेदन का निर्देश दें।तथ सुनिश्चित करें कि विक्रमा मौर्य द्वारा मधुबन थाने में दी गई तहरीर पर मुकदमा कायम कर तत्काल कार्रवाई हो।
विनीत,
अफलातून,
सदस्य,राष्ट्रीय कार्यकारिणी,समाजवादी जनपरिषद.
5जी एफ रीडर्स फ्लैट,जोधपुर कॉलॉनी,का,हि.वि.वि.,
वाराणसी – 221005,फोन – 08004085923
इन्हें भेजिए,बात कीजिए ः
मुख्यमन्त्री ,उत्तर प्रदेश ई-मेल cmup@nic.in
पुलिस महानिरीक्षक,वाराणसी जोन – ईमेल igzonevns@up.nic.in
जिलाधिकारी मऊ , फोन- 09454417523 , ईमेल – dmmau@nic.in
पुलिस अधीक्षक मऊ, मो. 09454400292 , Email – spmau@up.nic.in
Archive for the ‘criminalisation’ Category
संगठन मंत्री साथी विक्रमा मौर्य पर प्राणघातक हमला/ साथ दीजिए
Posted in criminalisation, samajwadi janparishad, tagged विक्रमा मौर्य, समाजवादी जनपरिषद, हमला on मार्च 21, 2013 | 5 Comments »
फिर धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है
Posted in communalism, corruption, criminalisation, election, fdi, jayaprakash narayan, samajwadi janparishad on जनवरी 17, 2012 | 5 Comments »
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए।
आजादी की लड़ाई का एक साफ मकसद था , गुलामी के जुए को उतार फेकना। जब उद्देश्य ऊंचा और साफ-साफ होता है तब समाज का हर तबका उस राजनीति से जुड़ जाता है । मौजूदा विधान सभा चुनाव एक ऐसे दौर में हो रहा है जब देश के हर नागरिक के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ तीव्र भावना है । लेकिन राजनीति की मुख्यधारा के अधिकांश’ दलों के पांव भ्रष्टाचार के कीचड से सने हैं। इसी वजह से आम जनता का इन चुनावों में उत्साह कम दिख रहा है। देश में बड़े बड़े घोटालों की आई बाढ़ की जड़ से १९९२ से चलाई गई आर्थिक नीतियों का सीधा सम्बन्ध है। इन नीतियों को केन्द्र और राज्य में रही हर दल की सरकार ने अपना लिया है। इसीलिए ये तमाम पारटियां इस चुनाव में इन मसलों से मुंह चुरा रही हैं । 
शिक्षित नौजवानों को छोटी-सी नौकरी भी बिना रिश्वत नहीं मिल रही। नई आर्थिक नीतियों से रोजगार के अवसर संकुचित हुए हैं। आबादी के मुट्ठी-भर लोगों के लिए रोजगार,स्वास्थ्य,शिक्षा की सुविधाओं को बढ़ावा देने का सीधा मतलब है कि आम लोगों को इन सुविधाओं से दूर किया जाना। जब आम जनता की जरूरतों को पूरा करना उद्देश्य होगा तब ही रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और वे रोजगार सुरक्षित रहेंगे। एक प्रभावशाली जन लोकपाल कानून की धज्जियां उड़ाने में सभी बड़े दलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी । भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिए जन लोकपाल के अलावा भी अन्य पहल भी करनी होंगी।
बुनकरी-जरदोजी तथा अन्य रोजगार , स्वास्थ्य , शिक्षा – इन सभी क्षेत्रों में जनता की दुशवारियां बढ़ गई हैं। आम बुनकर और दस्तकार को ध्यान में रखकर कपड़ा नीति और दस्तकार नीति अब तक नहीं बनी है । सभी बड़ी पार्टियां इसके लिए जिम्मेदार हैं । बुनकरों की सहकारी समिति के नाम पर फर्जीवाड़े के मामले भी सामने आए हैं । जरदोजी और दस्तकारी से जुड़े लोगों को बुनकरों के समान सुविधायें मिलनी चाहिए। बुनकर और दस्तकार इस देश के लिए बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं लेकिन उनकी तरक्की की हमेशा अनदेखी की जाती है।
खेती और दस्तकारी के बाद हमारे देश में सबसे बड़ा रोजगार खुदरा-व्यापार है जिस पर हमले की रणनीति बन चुकी है। केन्द्र सरकार की पार्टी के राजकुंवर की समझदारी के अनुसार दानवाकार विदेशी कम्पनियों को देश का खुदरा-व्यापार सौंप कर वे किसानों का भला करने जा रहे हैं । देश के सबसे बड़े घराने के द्वारा जिन सूबों में सब्जी का खुदरा-व्यवसाय हो रहा है क्या वहां के किसानों ने खुदकुशी से मुक्ति पा ली है ?
प्रदेश की सरकार द्वारा भ्रष्टाचार को नया संस्थागत रूप दे दिया गया है। किसानों की जमीनें लेकर जो बिल्डर नये नगर और एक्सप्रेस-वे बनाने की जुगत में है, उनके खर्च पर प्रदेश सरकार पुलिस थाने ( चुनार ) का निर्माण करवाया है। कई पुलिस चौकियां अपराधियों के पैसों से बनवाई गई हैं। समाजवादी जनपरिषद नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए बना है। जिन इलाकों में दल ने संघर्ष किया है और मजबूत जमीन बना ली है सिर्फ वहीं चुनाव में शिरकत करता है। मजबूत राजनैतिक विकल्प बनाने का काम व्यापक जन-आन्दोलन द्वारा ही संभव है । इसलिए भ्रष्ट राजनीति के दाएरे से बाहर चलने वाले आन्दोलनों और संगठनों के मोर्चे का वह हिस्सा है। राष्ट्रीय-स्तर पर ‘ लोक राजनीति मंच’ तथा जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय ऐसी बड़ी पहल हैं तथा स्थानीय स्तर पर साझा संस्कृति मंच , जो सामाजिक सरोकारों का साझा मंच है ।
वाराणसी के हमारे प्रत्याशी की राजनैतिक यात्रा इसी शहर में भ्रष्टाचार विरोधी जयप्रकाश आन्दोलन के किशोर कार्यकर्ता के रूप में शुरु हुई| छात्र-राजनीति को जाति-पैसे-गुंडागर्दी से मुक्त कराने की दिशा में समता युवजन सभा से वे जुड़े और एक नयी राजनीति की सफलता के शुरुआती प्रतीक बने। लोकतांत्रिक अधिकार और विकेन्द्रीकरण , सामाजिक न्याय ,पर्यावरण तथा आर्थिक नीति के दुष्परिणामों के विरुद्ध संगठनकर्ता बने तथा इन्हीं संघर्षों के लिए समाज-विरोधी ताकतों के लाठी-डंडे खाये और थोपे गए फर्जी मुकदमों में कई बार जेल गये। फिरकावाराना ताकतों का मुकाबला करने के लिए नगर में गठित ‘सद्भाव अभियान’ से वे सक्रियता से जुड़े । साम्प्रदायिक दंगों के दौरान थोपे गये फर्जी मुकदमों को हटाने के पक्ष में तथा हिंसा में शरीक लोगों पर लगे मुकदमों को सरकार द्वारा हटाने के विरुद्ध अफलातून ने कामयाब कोशिश की। पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ हमारे समूह ने रचनात्मक संघर्ष का सहारा लिया है तथा मानवाधिकार आयोग द्वारा सार्थक हस्तक्षेप के लिए पहल की है ।
वाराणसी के स्त्री सरोकारों के साझा मंच – समन्वय के माध्यम से शहर में ही नहीं समूचे राज्य में हुए नारी-उत्पीड़न के विरुद्ध कारगर आवाज उठाई गई है ।
रोज-ब-रोज की नागरिक समस्याओं का समाधान नगर निगम और उसके सभासदों के स्तर पर होना चाहिए । विधायक-नीधि का दुरुपयोग ज्यादा होगा यदि कोई ठेकेदार ही विधायक बन जाए।
इसलिए वाराणसी कैन्ट क्षेत्र में भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलों का विकल्प खोजने की आप कोशिश करेंगे तो आपकी निराशा दूर हो सकती है । बड़े दलों से जनता की निराशा के कारण फिर अस्पष्ट बहुमत का दौर शुरु होगा ऐसा प्रतीत हो रहा है।इसलिए समाजवादी जनपरिषद के उम्मीदवार विधान सभा में विपक्ष में रहने और जन आकांक्षाओं की आवाज को बुलन्द करने का संकल्प लेते हैं। हमें जनता के विवेक पर भरोसा है। यह सिर्फ अफवाह ही हो सकती है कि सुबह होगी ही नहीं । सुबह होगी क्योंकि मत, बल,समर्थन आपके हाथ में है। भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलो से छुटकारा पाने की आपकी कोशिश सफल होगी यह हमे यकीन है। विधान सभा में आपकी आवाज बुलन्द हो इसलिए हम आप से अपील करते हैं कि अपना अमूल्य वोट देकर वाराणसी कैन्ट से समाजवादी जनपरिषद के साफ-सुथरे और जुझारु उम्मीदवार अफ़लातून को भारी मतों से विजयी बनाएं ।निवेदक,
समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश
लोक राजनैतिक मंच साझा संस्कृति मंच
खनिज सम्पदा की लूट और कलिंगनगर पर दूसरा हमला
Posted in विस्थापन, corporatisation, criminalisation, displacement, globalisation , privatisation, industralisation, odisha, tribal, tagged ओडिशा, कलिंगनगर, दमनचक्र, kalinganagar on अप्रैल 2, 2010 | 13 Comments »
पिछले साल नौ सितम्बर को ’ब्लैक रोज़’ नामक मंगोलियाई पानी का एक बड़ा जहाज ओड़िशा के पारादीप बन्दरगाह के निकट डूब गया । जहाज में हजार २३८४७ टन लौह अयस्क लदा था । जिनका माल लदा था उन्होंने यह कबूल कर लिया कि एक अन्य जहाज ’टोरोस पर्ल’ के दस्तावेजों को जमाकर उन्होंने पारादीप बन्दरगाह में शरण पाई थी । जहाज का मालिक ब्लैक रोज़ नाम से दो जहाज चलाता था । बन्दरगाह से अन्य जहाज बाहर निकल सकें इसके लिए डूबे जहाज को हटाना जरूरी था । यह काम मजबूरन बन्दरगाह प्रशासन करवाना पपड़ रहा है । देश की अमूल्य खनिज सम्पदा की लूट की अवैध कारगुजारी का एक नमूना इस घटना से प्रकट हुआ । आदिवासी , दलित और पिछड़े गरीब किसानों का यह प्रान्त खनिज सम्पदा से समृद्ध है और उदारीकरण के दौर में देशी-विदेशी कम्पनियों में इसे लूटने की होड़ मची है । अनिल अग्रवाल ,मित्तल और टाटा सरीखों द्वारा लूट-खसोट में राज्य की पुलिस और कम्पनियों की ’निजी वाहिनी’ (भाड़े के गुण्डे) ग्रामीणों पर दमन का दौर चला रहे हैं ।
पारादीप बन्दरगाह के निर्माण के दौरान ट्रकों से कुचल कर २५० बच्चे मारे गये थे तब बीजू पटनायक ने कहा था ,’इन बच्चों की मौत विकास के लिए हुई शहादत है ” । ओडिशा मैंगनीज़ , लौह अयस्क तथा बॉक्साईट से समृद्ध है । ओडिशा के तट पर १२ नये बन्दरगाहों के निर्माण की योजना है । इनके द्वारा खनिज अयस्क तथा कोयले का निर्यात होगा । उदारीकरण के दौर में खनिज तथा वन कानूनों को ठेंगा दिखा कर दो सौ से दो सौ चालीस रुपये प्रति टन की लागत से प्राप्त लौह अयस्क चीन जैसे देशों को वैध/अवैध तरीकों से तीन हजार रुपये प्रति टन बेचा जा रहा है ।
इन तथ्यों के आधार पर ओडिशा के वरिष्ट पत्रकार एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता रवि दास ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है । ओडिशा-दिवस (पहली अप्रैल) पर वाराणसेय उत्कल समाज के आयोजन में वे बतौर मुख्य अतिथि बनारस आये हुए थे । ओड़िया के प्रसिद्ध अखबार ’प्रगतिवादी’ से बरसों से जुड़े रहने के बाद अब वे ’ आमो राजधानी’ नामक एक मध्याह्न दैनिक निकाल रहे हैं तथा वकीलों,पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों और पत्रकारों द्वारा बनाये गये ’ओडिशा जन सम्मेलनी’ नामक संगठन के अध्यक्ष हैं । रवि दास ३० मार्च को जाजपुर जिले के कलिंगनगर इलाके में हुए बर्बर दमन की तफ़तीश करने गई टीम में शामिल थे । टीम का नेतृत्व उच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त जज चौधरी प्रताप मिश्र ने किया । टीम में एक चिकित्सक तथा चित्त महान्ती (लेखक तथा राजनैतिक कार्यकर्ता),सुधीर पटनायक (पत्रकार) तथा महेन्द्र परीडा (ट्रेड यूनियन कर्मी) शामिल थे । मुख्यधारा की मीडिया द्वारा पुलिस दमन की घटना की खबर गायब किए जाने के कारण इस समिति की रपट के मुख्य अंश यहां दिए जा रहे हैं :
जाँच दल ने गोली चालन के शिकार ग्रामीणों से बालिगूथा ,चाँदिया तथा बरगड़िया में मुलाकात की तथा उनकी झोपड़ियों , पशु धन , खाद्यान्न ,साइकिल आदि के नुकसान का जायजा लिया।
बालिगूथा के सरपंच ने टीम को बताया कि उसके घर से नगद तथा आभूषण भी लिए गये हैं। आन्दोलनकारी आदिवासियों के नेता रवि जरिका पुलिस की गोली से घायल हुए हैं । उन्होंने घटना का पूरा ब्यौरा दिया। समिति गोली से घायल पचीस लोगों से मिली जिनमें नौ महिलाएं थी । जाँच दल के साथ गये चिकित्सक ने घायलों का उपचार किया ।
मुख्य तथ्य :
- करीब ३० से ४० आदिवासी गोली से घायल हैं । गंभीर रूप से घायल ४ लोग अस्पताल में भर्ती किए गये हैं । घायलों के जख़्म देख कर लगता है कि यह रबर की गोलियों के अलावा भी चलाई गई गोलियों से हुए हैं ।
- प्रशासन द्वारा घायलों के उपचार के लिए कुछ भी नहीं किया गया हैं । उत्पीड़न और गिरफ़्तारी के भय से घायल ग्रामीण बाहर नहीं निकलना चाहते ।
- बालिगूथा के करीब स्थित विवादास्पद ’कॉमन गलियारा’ के निर्माण स्थल पर किया पुलिस का गोली चालन बेजा था , किसी भड़कावे के बिना था तथा इसलिए पूर्वनियोजित था ।
- हथिया्रबन्द पुलिस की २९ प्लाटून , एन एस जी के दो प्लाटून , ७० पुलिस अधिकारी तथा ७ मजिस्ट्रेटों की मौजूदगी इलाके में व्याप्त आतंक के माहौल का अन्दाज देने के लिए काफ़ी हैं।
- सत्ताधारी दल से जुड़े जाने-पहचाने चेहरे पुलिस की वर्दी में बालीगूथा में घरों पर हमला करने वालों में थे । उनके पास बन्दूकें नहीं थी लेकिन वे तलवारों तथा वैसे ही घातक शस्त्रों से लैस थे।
- धारा १४४ लागू होने के बावजूद कम्पनी के गुण्डे भारी तादाद में छुट्टा घूम रहे थे ।
- विस्थापन विरोधी मंच के नेताओं के घरों को पहचान कर नुकसान पहुंचाया गया है तथा उन घरों के मूल्यवान सामान और खाद्यान्न नष्ट किए गए।
- आंदोलनकार पीडित आदिवासी बिना सोए रात गुजार रहे हैं क्योंकि उन्हें भय है कि स्थानीय प्रशासन के सहयोग से पुलिस , कम्पनी के गुण्डे,तथा सत्ताधारी दल से जुड़े अपराधी फिर से हमला कर सकते हैं ।
- इतनी भारी मात्रा में पुलिस बल की तैनाती अपने आप में इलाके की शान्ति के लिए खतरा है।
- ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन आन्दोलनकारी आदिवासियों की समस्या के प्रति असंवेदनशील है तथा उसे सिर्फ़ कलिंगनगर स्थित कम्पनियों की परवाह है ।
संस्तुतियाँ :
- मुख्य मन्त्री तत्काल हस्तक्षेप कर विवादित गलियारा प्रोजेक्ट के काम को रोकें ।
- प्रशासन ने कलिंगनगर में पहले हुए गोली कांड के बाद लोगों से जो वाएदे किए थे उनके प्रति धोखा किया है इसलिए आदिवासियों की माँगों की बाबत सर्वोच्च स्तर पर वार्ता होनी चाहिए। जमीन के बद्ले जमीन देने की बात को नजरअंदाज किया गया है तथा गलियारे की भूमि के मलिकों से भी राय नहीं ली गई है ।
- कम्पनियों के खर्च पर छोटे से इलाके में एक बाद एक थाने खोलते जाने के बजाय मुख्यमन्त्री को सुनिश्चित करना चाहिए कि हर गाँव को शिक्षा ,स्वास्थ्य,पानी,सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिले। विधवा पेंशन जैसी योजनाओं को बेतुके रूप से इलाके में स्थगित कर दिया गया है ।
- पुलिस या नागरिक कानून को अपने हाथों में न ले । ३० मार्च को हुए गोली चालन तथा उसके पहले आदिवासियों में भय फैलाने वाली अपराधिक कारगुजारियों में लिप्त समस्त अधिकारियों को तत्काल निलम्बित किया जाए तथा उन पर मुकदमे चलाये जाँए ।
- गोली चालन से घायल पीडित हर व्यक्ति को एक लाख रुपये का जुर्माना दिया जाए ।
ओडिशा में नागरिक अधिकार आन्दोलन तथा किसान आन्दोलन पर रवि दास तथा किसान नेता बालगोपाल मिश्र से बातचीत आगे दी जाएगी ।
आर.एस.एस , भाजपा को कुम्हला देने वाले आरोप , लेकिन कार्यवाही की सिफारिश – सिफ़र ! – सिद्धार्थ वरदराजन , डेप्युटी एडिटर – द हिन्दू द्वारा समाचार विश्लेषण
Posted in communalism, criminalisation, half pant, politics, terrorism, tagged बाबरी मस्जिद, लिबर्हान, वरदराजन, संघ, संयुक्त उद्यम, सिद्धार्थ on नवम्बर 28, 2009 | 13 Comments »
हिन्दुस्तानी में कहावत है – खोदा पहाड़ निकली चुहिया – लम्बे तथा कठिन रियाज के बाद जब नतीजा अपेक्षतया बहुत कम निकलता है – उन हालात में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है ।
न्यायमूर्ती एम.एस. लिबर्हान ने १७ साल परिश्रम किया जिस दरमियान शुरुआती तीन माह की नियुक्ति के उनके कार्यकाल को ४० बार बढ़ाया गया , उन्होंने १०२९ पृष्टों की एक रिपोर्ट तैयार की जो उन तमाम हकीकतों और हालात का तफ़सील से ब्यौरा देती है जिनके के कारण १९९२ में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया । उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले नहीं है बल्कि स्पष्ट तथा बुलन्द हैं : यह विध्वंस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था – ” यह एक संयुक्त उद्यम था “- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , विश्व हिन्दू परिषद ,शिव सेना तथा भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा यह षड़यन्त्र रचा गया था , इनमें से अन्त में उल्लिखित संगठन को रिपोर्ट ने सही ही आर.एस.एस का मोहरा बताया है ।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन निर्भीक तथ्यान्वेषणों के बावजूद जो सिफारिशें दी गई हुई हैं वे फुस्स अथवा कायराना हैं तथा उनका इन निष्कपट निष्कर्षों से कोई मेल नहीं बैठता । देश को साम्प्रदायिक महाविपदा के मुहाने पर ढकलने के लिए ६८ व्यक्तियों को दोषी पाए जाने के बावजूद श्री लिब्रहान अब तक विध्वंस-मामले में आरोपित होने से बच रहे लोगों के खिलाफ़ आरोप दाखिल करने की संस्तुति नहीं करते हैं न ही वे आपराधिक कार्रवाई को तेजी से निपटाने की बात करते हैं ।
षड़यंत्र की बाबत ’ संयुक्त उद्यम ’का जुमला बार – बार दोहराने की वजह से यह चौंकाने वाली बात लगती है । १९९९ में तत्कालीन युगोस्लाविया की बाबत टैडिक फैसले के बाद से सीधी भागीदारी न होने के बावजूद जिन लोगों ने जानबूझकर इन कृत्यों को बढ़ावा दिया हो तथा जो लोग इन कृत्यों में लिप्त संगठनों के शीर्ष पर होते हैं उन पर दायित्व डालने की अन्तर्राष्ट्रीय फौजदारी कानून में सामूहिक अपराधों के ऐसे मामलों की बाबत बाद के वर्षों में एक धारणा विकसित हुई है ।
यदि श्री लिब्रहान ने अपनी सिफारिशों में इस विचार को लागू किया होता तथा इस बात पर जोर दिया होता कि राजनेता , पुलिस अफ़सर, और नौकरशाह जिस व्यापक दण्डाभाव का लाभ लेते आए हैं उस का अन्त हो तो यह मुल्क उनका एहसान मानता । परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है । धर्म तथा राजनीति को अलग रखने तथा अन्य कुछ अन्य ढीले ढाले सुझाव देने के उपरान्त , यह रिपोर्ट विध्वंस मामले में तात्कालिक न्याय सुनिश्चित करने अथवा देश को इस त्रासदी की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए संस्तुति देने से खुद को बचा ले गई है ।
शायद श्री लिब्रहान अथवा उनके कमीशन की यह इतनी कमी नहीं है जितना हमारी पुलिस तथा न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था द्वारा उन्हीं नतीजों पर पहुंच कर फिर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करने की अक्षमता का दोष है ।
दसवें अध्याय में न्यायमूर्ति लिब्रहान सदोषता की बाबत एक निश्चयात्मक वक्तव्य देते हैं : ” किसी औचित्यपूर्ण सन्देह से परे यह स्थापित है कि यह ’संयुक्त-सामान्य-उद्यम’ विध्वंस की पूर्व नियोजित कार्रवाई थी जिसकी तात्कालिक रहनुमाई विनय कटियार , परमहंस रामचन्द्र दास , अशोक सिंघल , चम्पत राय , श्रीषचन्द दीक्षित , बी. पी. सिंघल तथा आचार्य गिरिराज कर रहे थे । यह सब मौके पर मौजूद नेता थे जिन्हें आर.एस.एस.एस द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित करना था । लालकृष्ण अडवाणी मुरली मनोहर जोशी तथा अन्य उनके स्थानापन्न दायित्व के कारण दोषमुक्त नहीं हैं वे भी आर.एस.एस. द्वारा निर्देशित भूमिका को स्वेच्छा से कबूले हुए सह-षड़यन्त्रकारी हैं । अयोध्या अभियान को उनका निश्चित समर्थन तथा दीर्घकाल तक चले अभियान के निर्णायक चरण में उनकी सशरीर मौजूदगी से यह अकाट्य रूप से स्थापित हो चुका है ।
मेरा यह निष्कर्ष है कि आर.एस.एस. , भाजपा , विहिप , शिव सेना तथा उनके वे पदाधिकारी जिनका इस रिपोर्ट में नाम दिया गया है ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मन्त्री कल्याण सिंह के साथ आपराधिक गठजोड़ स्थापित कर विवादित जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए एक ’संयुक्त-समान-उद्यम’(Joint Common Enterprise) स्थापित कर लिया था । उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल करने का काम किया तथा लोकतंत्र को नष्ट करने की सोची समझी कार्रवाई में लिप्त रहे । “
मस्जिद गिराया जाना , “धार्मिक , राजनैतिक , तथा भीड़-तंत्र के सर्वमन्दिरों को एक साथ समेटने वाले संगठित व सुनियोजित षड़यन्त्र का चरम बिन्दु था ” । न्यायमूर्ति लिबर्हान यह सही ही नोट किया कि, ” कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उन्हें सुरक्षित रखा जा सके एवं आगे के राजनैतिक इस्तेमाल के लिए उनकी सेक्युलर विश्वसनीयता को बचाये रखा जा सके । “इस प्रकार श्री अडवाणी और श्री जोशी इस दूसरे दर्जे के भाग रहे हों परन्तु वे भी राजनैतिक तथा कानूनी दायित्व से नहीं बच सकते , बावजूद इसके कि वे संघ परिवार द्वारा प्रदत्त ’मुमकिन इन्कार’ की ढाल से लैस हों ।
आज ,सत्रह साल बीत जाने के बाद , इस संयुक्त उद्यम में लिप्त कई अपराधी मर चुके हैं । परन्तु कई इस बिना पर फले फूले हैं कि वे कानून के ऊपर हैं । इस मुल्क के द्वारा न्यायमूर्ति लिबर्हान की इन सिफ़ारिशों के माध्यम से ’इस चूहे को निकालने के लिए ’ चाहे जितनी भी झूठी निन्दा हो , इस रपट में वह खजाना है जिसकी मदद से कोई ख्यातिनाम जाँच एजेन्सी ठोस षड़यन्त्र का मामला बना सकती है । ऐसे कई किरदार जिनकी स्मृति इस आयोग के समक्ष धूमिल हो गयी थी , नार्को विश्लेषण समेत पुलिस की पारंगत पूछताछ , के समक्ष ज्यादा देर न टिक पायें । उत्तर प्रदेश सरकार यदि गंभीर हो तो पूरक आरोप पत्र दाखिल कर सकती है तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के मामले को त्वरित-ट्रैक न्यायालय में ले जा सकती है ताकि आखिरकार न्याय हो सके ।
( मूल अंग्रेजी लेख )
शमीम मोदी पर प्राण घातक हमला
Posted in criminalisation, madhya pradesh, politics, samajwadi janparishad, women, tagged attack, मध्य प्रदेश, वसई, शमीम, शमीम मोदी, समाजवादी जनपरिषद, हमला, criminalisation, madhya pradesh, samajwadi janaparishad, shamim on जुलाई 27, 2009 | 25 Comments »
[ इस चिट्ठे के पाठक हमारे दल समाजवादी जनपरिषद की प्रान्तीय उपाध्यक्ष साथी शमीम मोदी की हिम्मत और उनके संघर्ष से अच्छी तरह परिचित हैं । हिन्दी चिट्ठों के पाठकों ने शमीम की जेल यात्रा के दौरान उनके प्रति समर्थन भी जताया था ।
गत दिनों उन्होंने प्रतिष्ठित शोध संस्थान टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ ,मुम्बई में बतौर एसिस्टेन्ट प्रोफेसर काम करना शुरु किया है । वे अपने बेटे पलाश के साथ मुम्बई के निकट वसई में किराये के फ्लैट में रह रही थीं ।
मध्य प्रदेश की पिछली सरकार में मन्त्री रहे जंगल की अवैध कटाई और अवैध खनन से जुड़े माफिया कमल पटेल के कारनामों के खिलाफ़ सड़क से उच्च न्यायालय तक शमीम ने बुलन्द आवाज उठाई । फलस्वरूप हत्या के एक मामले में कमल पटेल के लड़के को लम्बे समय तक गिरफ़्तारी से बचा रहने के बाद हाल ही में जेल जाना पड़ा ।
गत दिनों जिस हाउसिंग सोसाईटी में वे रहती थीं उसीके चौकीदार द्वारा उन पर चाकू से प्राणघातक हमला किया गया । शमीम ने पूरी बहादुरी और मुस्तैदी के साथ हत्या की नियत से हुए इस हमले का मुकाबला किया । उनके पति और दल के नेता साथी अनुराग ने इसका विवरण भेजा है वह दहला देने वाला है । हम शमीम के साहस , जीवट और हिम्मत को सलाम करते हैं । आप सबसे अपील है कि महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री को पत्र या ईमेल भेजकर हमलावर की गिरफ़्तारी की मांग करें ताकि उसके पीछे के षड़यन्त्र का पर्दाफाश हो सके । कमल पटेल जैसे देश के शत्रुओं को हम सावधान भी कर देना चाहते हैं कि हम गांधी - लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले जुल्मी से टकराना और जुल्म खत्म करना जानते हैं । प्रस्तुत है अनुराग के पत्र के आधार पर घटना का विवरण । ]
मित्रों ,
यह शमीम ही थी जो पूरे शरीर पर हुए इन घातक प्रहारों को झेल कर बची रही । ज़ख्मों का अन्दाज उसे लगे ११८ टाँकों से लगाया जा सकता है । घटना का विवरण नीचे मुताबिक है -
२३ जुलाई को हाउसिंग सोसाइटी का चौकीदार दोपहर करीब सवा तीन बजे हमारे किराये के इस फ्लैट में पानी आपूर्ति देखने के बहाने आया । शमीम यह गौर नहीं कर पाई कि घुसते वक्त उसने दरवाजा अन्दर से लॉक कर दिया था । फ्लैट के अन्दर बनी ओवरहेड टंकी से पानी आ रहा है या नहीं यह देखते वक्त वह शमीम का गला दबाने लगा। उसकी पकड़ छुड़ाने में शमीम की दो उँगलियों की हड्डियाँ टूट गईं । फिर उसके बाल पकड़कर जमीन पर सिर पटका और एक बैटन(जो वह साथ में लाया था) से बुरी तरह वार

भोपाल में शमीम की रिहाई के लिए
करने लगा । वह इतनी ताकत से मार रहा था कि कुछ समय बाद वह बैटन टूट गया । शमीम की चोटों से बहुत तेजी से खून बह रहा था । शमीम ने हमलावर से कई बार पूछा कि उसे पैसा चाहिए या वह बलात्कार करना चाहता है । इस पर वह साफ़ साफ़ इनकार करता रहा । शमीम ने सोचा कि वह मरा हुआ होने का बहाना कर लेटी रहेगी लेकिन इसके बावजूद उसने मारना न छोड़ा तथा एक लोहा-काट आरी (जो साथ में लाया था ) से गले में तथा कपड़े उठा कर पेट में चीरा लगाया । आलमारी में लगे आईने में शमीम अपनी श्वास नली देख पा रही थी । अब शमीम ने सोचा कि बिना लड़े कुछ न होगा । उसने हमालावर से के हाथ से आरी छीन ली और रक्षार्थ वार किया । इससे वह कुछ सहमा और उसने कहा कि रुपये दे दो । शमीम ने पर्स से तीन हजार रुपये निकाल कर उसे दे दिए । लेकिन उसने एक बार भी घर में लॉकर के बारे में नहीं पूछा । अपने बचाव में शमीम ने उससे कहा कि वह उसे कमरे में बाहर से बन्द करके चला जाए । वह रक्तस्राव से मर जाएगी । शमीम अपना होश संभाले हुए थी । वह पलाश के कमरे में बन्द हो गयी (जो कमरा हकीकत में अन्दर से ही बन्द होता है )। हमलावर बाहर से कुन्डी लगा कर चला गया । शमीम ने तय कर लिया था कि वह होशोहवास में रहेगी और हर बार जब वह चोट करता , वह उठ कर खड़ी हो जाती । हमलावर के जाने के बाद वह कमरे से बाहर आई और पहले पड़ोसियों , फिर मुझको और अपने माता-पिता को खबर दी। अस्पताल ले जाते तक वह पूरी तरह होश में रही ।

दाँए से बाँए:शमीम,पन्नालाल सुराणा,स्मिता
कुछ सवाल उठते हैं : चौकीदार ने लॉकर खोलने की कोशिश नहीं की जो वहीं था जहाँ वह शमीम पर वार कर रहा था । उसने पैसे कहां रखे हैं इसके बारे में बिलकुल नहीं पूछा । वह गालियाँ नहीं दे रहा था और उसके शरीर को किसी और मंशा से स्पर्श नहीं कर रहा था । यदि वह मानसिक रोगी या वहशी होता तो शायद शमीम उससे नहीं निपट पाती । वह सिर्फ़ जान से मारने की बात कह रहा था । शमीम के एक भी सवाल का वह जवाब नहीं दे रहा था । सेल-फोन और लैपटॉप वहीं थे लेकिन उसने उन्हें नहीं छूआ । इन परिस्थितियों में हमें लगता है कि इसके पीछे कोई राजनैतिक षड़यन्त्र हो सकता है ।
शमीम को मध्य प्रदेश के पूर्व राजस्व मन्त्री कमल पटेल और उसके बेटे सन्दीप पटेल से जान से मारने की धमकियाँ मिलती रही हैं । इसकी शिकायत हमने स्थानीय पुलिस से लेकर पुलिस महानिदेशक से की हैं । मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देश पर २००५ की शुरुआत से २००७ के अन्त तक उसे सुरक्षा मुहैय्या कराई गई थी । इसलिए हमें उन पर शक है । हमले के पीछे उनका हाथ हो सकता है ।
पेशेवर तरीके से कराई गयी हत्या न लगे इस लिए इस गैर पेशेवर व्यक्ति को इस काम के लिए चुना गया होगा । जब तक राकेश नेपाली नामक यह हमलावर गिरफ़्तार नहीं होता वास्तविक मन्शा पर से परदा नहीं उठेगा ।
हम सबको महाराष्ट्र शासन और मुख्यमन्त्री पर उसकी गिरफ़्तारी के लिए दबाव बनाना होगा ।
अनुराग मोदी
शमीम मोदी के संघर्ष से जुड़ी खबरें और आलेख :
’सत्याग्रही’ शिवराज के राज में
बाबासाहब की जन्मतिथि पर दलित नेता की हत्या
Posted in ambedkar, criminalisation, election, tagged bahadur sonkar, dhananjay singh, jaunpur, murder on अप्रैल 14, 2009 | 9 Comments »
आज बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जन्मतिथि है । इस जन्मतिथि की पूर्व सन्ध्या पर उनकी विचारधारा की कथित धरोहर पार्टी बहुजन समाज पार्टी के जौनपुर से प्रत्याशी माफिया धनन्जय सिंह ने एक अन्य दलित नेता बहादुर सोनकार की हत्या कर पेड़ पर लटका दिया । बहादुर सोनकर एक अन्य दलित नेतृत्व वाली पार्टी इन्डियन जस्टिस पार्टी का उम्मीदवार था ।
धनन्जय सिंह की आपराधिक पृष्टभूमि किसी से छिपी नहीं है । वह दलित नेता रामबिलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी तथा शरद यादव – नितीश कुमार की जद(यू) से भी टिकट लेकर विधान सभा का चुनाव लड़ चुका है । बहरहाल , इस मामले में धनन्जय के साथ दो पुलिस अधिकारियों का नाम भी आ रहा है । गत दिनों लिखी मेरी एक पोस्ट पर आनन्द प्रधान की टिप्पणी का स्मरण दिला रहा हूँ -
लेकिन गुण्डों की ताकत इसलिए बढ़ी है और उन्हें एक वैधता मिली है क्योंकि राज्य लोगों को न्याय और सुशासन देने में विफल हो गया है। ..गुण्डों ने एक समानान्तर व्यवस्था खड़ी कर दी है ।….राज्य ने उनके आगे घुटने टेक दिये हैं ।”
चूँकि इन्डियन जस्टिस पार्टी पंजीकृत किन्तु गैर मान्यता प्राप्त दल है इसलिए उसके प्रत्याशी की हत्या पर चुनाव रद्द नहीं होगा । चुनाव कानून में यह संशोधन हाल का है । एक काल्पनिक स्थिति पर विचार करें – यदि मतदाता बहादुर सोनकर को ही सर्वाधिक मत प्रदान करते हैं तब ही चुनाव रद्द होंगे । चूंकि मृत प्रत्याशी का नाम मशीन से नहीं हटेगा इसलिए उसे मिले मतों से चुनाव परिणाम को प्रभावित नहीं माना जाएगा ?
अपराधियों की ही जाति होती है
Posted in criminalisation, election, politics, tagged banaras, bihar, caste, casteism, criminals, elections on अप्रैल 9, 2009 | 24 Comments »
काशी विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से जुड़े़ सभी बहुत फक्र से कहा करते थे कि यहाँ का विद्यार्थी गुंडों को हरा देता है । पूर्व अध्यक्ष और राजनारायण के निकट सहयोगी मार्कण्डेय सिंह के जमाने में गुंडा दामोदर सिंह हो अथवा बाद में मोहन प्रकाश के जमाने में माफ़िया वीरेन्द्र साही का सहयोगी उपेन्द्र विक्रम सिंह अथवा मेरे चुनाव लड़ना शुरु करने पर उपेन्द्र विक्रम का साथी भगवती सिंह – आपराधिक पृष्टभूमि के सभी धुरंधरों को छात्रों ने नकारा ।
मेरे छात्रावास (बिड़ला) का छात्रावास – अध्यक्ष बिना चुनाव के बना राजेन्द्र पहलवान था । उसका बहनोई हिटलर सिंह भी उसी छात्रावास में रहता था । ’हॉस्टल – डे’ पर रंडी का नाच कराने के नाम पर कमरे – कमरे हिटलर चन्दा मांगने निकले । मेरे कमरे कमरा नं २८६ में पहुंचे तब मैंने चन्दा देने से इनकार कर दिया ।
हिटलर – ’अभी पांच रुपैय्या नहीं दे रहे हो , कल शाम तक इन्हीं पांवों पर पांच सौ रुपये रखोगे ”
मैं – “रमाकान्त सिंह (उसका वास्तविक नाम यही है) जब पैसा देने से इनकार कर कर दिया तब उसका परिणाम भी झेलने की तैयारी है ।”
इसके बाद राजेन्द्र पहलवान कमरे में पहुंचे और हिटलर को पकड़ कर ले गये । मैंने अपनी लॉबी के अन्य कमरों में भी उस ’सांस्कृतिक – कार्यक्रम’ के लिए चन्दा देने से लड़कों को मना कर दिया । फलस्वरूप वे मेरी लॉबी को छोड़कर चले गये । अगले दिन परिसर में इस छोटी सी घटना की चर्चा तेजी से फैल गयी । मेरे कमरे में मनोबल बढ़ाने के लिए समाजवादी युवजन राधेश्याम , समाजवादी शिक्षक आनन्द कुमार और छात्र संघ अध्यक्ष मनोज सिन्हा अलग – अलग पहुंचे । उक्त ’सांस्कृतिक कार्यक्रम’ नहीं हुआ और रमाकान्त सिंह ने मुझे नमस्कार करना शुरु कर दिया । यह उलझन वाली बात थी लेकिन हमारे संगठन की इकाई के उद्घाटन के लिए जब हमारे नेता किशन पटनायक ब्रोचा छात्रावास में बोले तब उन्होंने कहा -’गुंडा वह है जो अपने से कमजोर को सताता है और खुद से मजबूत के पांव चाटता है’।
पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रमुख माफ़िया सरगना मोख्तार अन्सारी बनारस से बहुजन समाज पार्टी का उम्मीदवार है । अपराध की दुनिया में उसके प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी बृजेश सिंह का भतीजा सुशील सिंह भी इसी पार्टी का विधायक है । बनारस के अलग अलग मोहल्लों से एक साथ ३० से ४५ के समूह में लोगों को गाजीपुर के जिला कारागार में मोख्तार से मिलाने ले जाया जाता है । जेल से रुपये भी बाँटे जाते हैं। चुनाव आयोग के निर्देश पर आज उसका स्थानान्तरण कानपुर जेल हुआ है ।
मोख्तार को अपराधियों की ’आचार – संहिता’ की भी परवाह नहीं करता । बनारस के प्रमुख व्यवसाई नन्दकिशोर रुँगटा के अपहरण के बाद उसने फिरौती की मोटी रकम भी वसूली उसके बाद उनकी निर्मम हत्या कर दी थी ।
अक्सर भाषणों में लोग कहते हैं कि अपराधियों की जाति नहीं होती । यह कह कर मानो वे जाति को कोई पुनीत संस्था साबित करना चाहते हैं । जातियों का ध्रुवीकरण हमेशा मजबूतों के लिए होता है । इसलिए मुझे यह कहना ज्यादा उचित लगता है कि अपराधियों की ही जाति होती है । बनारस में तीन प्रमुख सवर्ण उम्मीदवारों के मुकाबले मोख्तार के लिए मुसलिम और दलित के अलावा कुछ पिछड़ों का भी जुड़ाव हो रहा है । बहुजन समाज पार्टी यदि यादवों के बीच सभा कर रही है तो उसके मंच पर पुलिस मुटभेड़ में मारे गये सपा के अपराधी सभासद बाबू यादव की विधवा अथवा एक अन्य मृत अपराधी अभिषेक यादव ’गुड्ड” के स्वजनों को बैठाती है। यानी- बिरादरी के गुंडे का नुकसान मतलब बिरादरी का नुकसान । जातिवाद जाति के प्रति प्रेम से ज्यादा जाति का उपयोग जाति के मजबूत लोगों की स्वार्थ – सिद्धि के लिए करना होता है ।
आज ही बिहार आन्दोलन के एक सिपाही मुजफ़्फ़रपुर के रमण कुमार से भेंट हुई। तिब्बती केन्द्रीय विश्वविद्यालय में चल रहे ’हिन्द स्वराज” की शताब्दी के मौके पर आयोजित एक शिबिर में भाग लेने वे सारनाथ आये हुए हैं । उन्होंने बताया उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी सहयोगी विहीन कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रत्याशी जुटाने का संकट था इसलिए उसने अपराधियों को थोक में अपना उम्मीदवार बना डाला है ।

