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Archive for the ‘environment’ Category

    जब राहुल गांधी ने पिछले हफ्ते उत्तरप्रदेश के नौजवानों को फटकारते हुए कहा कि यूपी वालों  , कब तक महाराष्ट्र में भीख मांगोगे और पंजाब में मजदूरी करोगे, तो कई लोगों को यह नागवार गुजरा। इसकी भाषा शायद ठीक नहीं थी। आखिर भारत के अंदर रोजी-रोटी के लिए लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने को भीख मांगना तो नहीं कहा जा सकता। वे अपनी मेहनत की रोटी खाते हैं, भीख या मुफ्तखोरी की नहीं।
किन्तु राहुल आधुनिक भारत की एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा कर रहे हैं। हमारा विकास कुछ इस तरह हुआ है कि रोजगार और समृद्धि देश के कुछ हिस्सों तथा महानगरों तक सीमित हो गई है। बाकी हिस्से पिछड़े, रोजगारहीन और श्रीहीन बने हुए हैं। देहातों में तो हालत और खराब है। वहां बेकारी और मुर्दानगी छायी हुई है और भारी पलायन हो रहा है। जो देहात में रहते हैं वे भी ज्यादातर मजबूरी में रह रहे हैं। दूसरी ओर नगरों व महानगरों में भीड़ बढ़ती जा रही है तथा वहां झोपड़पट्टियों की तादाद विस्फोटक तरीके से बढ़ रही है।
सिर्फ यूपी-बिहार ही नहीं, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बंगाल, उड़ीसा, उत्तराखंड, तेलगांना और विदर्भ से भी बड़ी संख्या में रोजगार की तलाष में नौजवान बाहर जाते हैं। मुंबई, सूरत, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई जहां भी काम मिले, वे निकल पड़ते हैं। कई बार उनके साथ धोखा होता है। पूरी मजदूरी नहीं मिलती, खुले आसमान के नीचे पड़े रहते हैं या गंदगी के बीच नरकतुल्य झुग्गियों में रहते हैं, पुलिस उन्हें तंग करती हैं, दुर्घटना में घायल होने पर ठेकेदार ठीक से इलाज नहीं कराता है। कई बार बेमौत मारे जाते हैं और घर वालों को खबर भी नहीं होती। पिछले दिनों आगरा के पास यमुना एक्सप्रेसवे के निर्माण में लगे इलाहाबाद के मजदूरों पर रात में सोते समय जेसीबी मशीन चढ़ जाने की मार्मिक खबर आई थी।
पिछले दो सौ सालों से चल रही भारतीय गांवों के कुटीर उद्योगों व धंधों के नष्ट होने की प्रक्रिया का नतीजा हुआ है कि खेती छोड़कर वहां कोई धंधा नहीं बचा है। खेती में भी गहरा संकट है और वह घाटे का धंधा बनी हुई है। यह आधुनिक पूंजीवादी विकास से उपजा बुनियादी संकट है जो मनरेगा जैसी योजनाओं से न हल हो सकता था और न हुआ।
गांव से पलायन इसलिए भी बढ़ रहा है कि वहां शिक्षा और इलाज की व्यवस्था या तो है नहीं, या है तो बुरी तरह चरमरा गई है। सरकारी स्कूलों की व्यवस्था तो सुधरने की बजाय बाजारीकरण और निजीकरण के हमले की भेंट चढ़ रही है। गांवों के बहुत लोग अब अपने बच्चों को अच्छी षिक्षा दिलाने के लिए कष्ट उठाकर भी शहरों में रहने लगे हैं।
कभी-कभी लोग भोलेपन से सोचते हैं कि हमारे इलाके में कोई कारखाना लग जाएगा तो हमारा विकास हो जाएगा और हमें यहीं पर रोजगार मिलने लगेगा। कारखाने को ही विकास का पर्याय मान लिया जाता है किन्तु हर जगह कुछ ठेकेदारों, व्यापारियों और दलालों को छोड़कर बाकी लोगों को इसमें निराशा ही हाथ लगती है।
मध्यप्रदेश में रीवा के पास जेपी सीमेन्ट कारखाने का अनुभव इस मामले में बड़ा मौजूं है। करीब 25 साल पहले इस कारखाने के लिए जमीन लेते समय गांववासियों को इसी तरह रोजगार, विकास और खुषहाली के सपने दिखाये गये थे। किन्तु दैनिक मजदूरी पर कुछ चैकीदारों को लगाने के अलावा उन्हें रोजगार नहीं मिला। कारखाना चलाने के लिए तकनीकी कौशल वाले कर्मचारी बाहर से आये। उल्टे कारखाने के प्रदूषण और चूना पत्थर खदानों के विस्फोटों से लोगों का जीना हराम हो गया। स्वास्थ्य, खेती, मकान सब प्रभावित होने लगे। ज्ञापन देते-देते थक गए तो सितंबर 2008 में रोजगार और प्रदूषण रोकथाम की मांग को लेकर उन्होंने आंदोलन किया। उन पर गोली चली। उसमें एक नौजवान मारा गया, 70-75 घायल हुए। जो नौजवान मारा गया, वह सूरत में काम करता था और छुट्टी में घर आया था। सवाल यह है कि जिस गांव की जमीन पर यह विशाल कारखाना बना, वहां के नौजवानों को काम की तलाष में एक हजार किलोमीटर दूर क्यों जाना पड़ रहा है ?
दरअसल आधुनिक कारखानों से रोजगार की समस्या कहीं भी हल नहीं होती। यह एक भ्रम है। उनसे रोजगार का सृजन कम होता है, पारंपरिक आजीविका स्त्रोतों का नाश ज्यादा होता है। यहां तक की औद्योगिक क्रांति के दौर में भी ब्रिटेन और पश्चिमी यूरोप की रोजगार समस्या गोरे लोगों के अमरीका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका और एशिया में फैल जाने तथा बस जाने से हल हुई, कारखानों से नहीं। अब जो नए कारखाने लग रहे हैं उनमें मशीनीकरण, स्वचालन तथा कम्प्यूटरीकरण के चलते तो रोजगार और भी कम मिलता है। मशीनीकरण के कारण खेती में भी रोजगार कम हो रहा है। हारवेस्टरों और ट्रैक्टरों की क्रांति ने भूमिहीन गरीबों और प्रवासी आदिवासी मजदूरों का रोजगार भी छीन लिया है। अब रोजगार की विकराल समस्या खड़ी होती जा रही है। इस समय रोजगार का संकट पूरी दुनिया पर छाया है। लंदन के दंगे हो, वाल स्ट्रीट कब्जे का आंदोलन या अरब देशों की जनक्रांतियाँ – सबके पीछे बेरोजगारी-गरीबी से उपजी कुंठा, अनिश्चितता  व असंतोष है।
क्या कोई ऐसा तरीका नहीं हो सकता है, जिससे लोगों को अपने जिले में, अपने घर के पास या अपने गांव में ही अच्छा रोजगार मिलने लगे ? जरुर हो सकता है, किन्तु इसके लिए हमें राहुल गांधी नहीं, एक दूसरे गांधी की ओर देखना पड़ेगा जिसे हम 2 अक्टूबर तथा 30 जनवरी को रस्म अदायगी के अलावा भूल चुके हैं। हमें आधुनिक विकास की चकाचैंध से अपने को मुक्त करना होगा। शहर के बजाय गांव को, मशीन की जगह इंसान को और कंपनियों की जगह जनता को विकास के केन्द्र में रखना होगा। गांवों को पुनर्जीवित करना होगा। बड़े कारखानों की जगह छोटे उद्योगों व ग्रामोद्योगों को प्राथमिकता देनी होगी। भोग-विलास की जगह सादगीपूर्ण जीवन को आदर्श बनाना होगा। विकास और प्रगति की आधुनिक धारणाओं और मान्यताओं को भी समय तथा जमीनी अनुभवों की कसौटी पर कसना होगा।
यदि हम चाहते हैं कि यह दुनिया ऐसी बने, जिसमें सबको सम्मानजनक रोजगार घर के पास मिले, सबकी बुनियादी जरुरतें पूरी हों, कोई भूखा या कुपोषित न रहे, कोई अनपढ़ न रहे, इलाज के अभाव में कोई तिल-तिल कर न मरे, अमीर-गरीब की खाई चौड़ी होने के बजाय खतम हो, सब चैन से रहे तो हमें विकास की पूरी दिशा बदलना होगा। आधुनिक सभ्यता इस मामले में बुरी तरह असफल हुई है। इसका विकल्प ढूंढना होगा। अफसोस की बात है कि राहुल हो या नीतीश, मायावती हो या मुलायम, किसी के पास इसकी समझ या तैयारी नहीं दिखाई देती।
(ईमेल – sjpsunilATgmailDOTcom)
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(लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं आर्थिक-राजनीतिक विषयों पर टिप्पणीकार है।)

- सुनील
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111 मोबाईल 09425040452 

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[ भारत भर में खनिज संपदा के दोहन के लिए सरकार अब दमन पर उतारू हो गई है। मध्यप्रदेश जैसे राज्य तो इस बात पर उतर आए हैं कि प्रदेश के ऐसे जिले जहां पर पूर्णतया शांतिपूर्ण आंदोलन चल रहे हैं उन्हें भी अनावश्यक रूप से नक्सल प्रभावित घोषित कर दिया जाए। प्रस्तुत आलेख सर्वोदय भावना की प्रासंगिकता को विश्लेषित कर रहा है। का.सं.,सप्रेस ]

ओडिशा के वरिष्ठ सर्वोदयी नेता मदनमोहन साहू रोज सुबह टहलते हुए गंधमार्दन पर्वत पर स्थित नृसिंहनाथ और हरिशंकर मन्दिर पर तैनात ओडिशा मिलिटरी पुलिस के जवानों से बतियाने पहुँच जाते थे और उनसे कहते ‘यदि बाल्को कम्पनी खनन करेगी तो उसका इस इलाके की खेती पर क्या प्रभाव पड़ेगा, जानते हो?‘, ‘इस पहाड़ से निकलने वाले 22 सदा सलिला स्त्रोतों के नष्ट हो जाने पर क्या होगा?‘ तुम्हें पता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर पाणिग्राही ने‘ भारत के ‘वानस्पतिक सर्वेक्षण के लिए किए गए अध्ययन में पाया था कि इस पहाड़ पर 200 से ज्यादा औषधि वनस्पतियाँ हैं?‘

मदन बाबू इसी पहाड़ के नीचे बने ‘निसर्ग-निवास‘ में अलेख पात्र जैसे गांधीजनों तथा स्वतंत्रता सेनानी के साथ रहते थे। गंधमार्दन बचाओ आन्दोलन के तहत मदन बाबू के प्रतिदिन के इस अहिंसक संवाद का यह असर पड़ा कि पहाड़ के पास से गुजरने वाले कम्पनी के वाहनों को जब महिलाएं और बच्चे रोकते थे तब भी इन जवानों ने दमनात्मक कार्रवाई नहीं की। 1987 में अपने दो बच्चों के साथ जामवती बीजरा नामक आदिवासी महिला जब कम्पनी की दर्जनों चक्कों वाली गाड़ी के सामने लेट गई तो यह आन्दोलन का चरम बिन्दु था।

इस इलाके के लोगों का मानना है कि हनुमान को इसी पहाड़ से घायल लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी ले जानी थी। पहाड़ पर नृसिंहनाथ और हरिशंकर के मन्दिर हैं जिनके दर्शनार्थ पश्चिम ओडिशा और छत्तीसगढ़ से भक्त पहुंचते हैं।

यह इलाका तत्कालीन सम्बलपुर जिले में था। सार्वजनिक क्षेत्र की बाल्को कम्पनी को गंधमार्दन पर्वत से बॉक्साईट खनन की अनुमति दी गई थी। राष्ट्रीय सेवा योजना के लड़के-लड़कियां इलाके के गांवों में घर-घर जाते और ग्रामीणों के मन में प्रस्तावित बॉक्साईट खनन को लेकर जो असंतोष और भय व्याप्त था उसे समझते थे। इस पृष्ठभूमि में अगस्त 1985 में ‘गंधमार्दन सुरक्षा युवा परिषद‘ का गठन हुआ जिसके द्वारा आन्दोलन का संचालन होता था। युवा परिषद में समता संगठन और छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी से जुडे़ तरुण थे।

देश की खनिज सम्पदा को बचाने के लिए चला यह पहला जनआन्दोलन था। गंधमार्दन पहाड़ के इलाकों में पर्यावरणीय संतुलन की सुरक्षा इसका प्राथमिक मुद्दा बना। आन्दोलन से जुडे़ समाजवादी चिन्तक किशन पटनायक ने खनन की बाबत कहा था, ‘युद्ध और आधुनिक शान-ओ-शौकत का जीवन यदि अपरिहार्य नहीं है तो बाॅक्साइट का खनन अपरिहार्य कैसे है? एल्युमिनियम के सालाना उत्पादन का कितना बड़ा हिस्सा शस्त्रास्त्रों, वायुयान और धनिकों की चका-चैंध को बढ़ाने में जाता है। यदि हम खनन को घटा कर सौंवे भाग तक ले आयेंगे तब शायद आधुनिक खनन से जुड़ी क्रूरता और चकाचैंध में कुछ कमी आ पायेगी। आदिवासी आधुनिक खनन का प्रतिकार कर रहे हैं तथा गंधमार्दन आन्दोलन में सफल भी हुए हैं। यदि वे घुटने टेक देंगे तो उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।‘

बॉक्साइट खनन और विपुल जल-स्त्रोतों का नालबद्ध नाता है। गंधमार्दन सुरक्षा हेतु गठित युवा परिषद के लिंगराज प्रधान को इलाके के एक आदिवासी किसान ने इस पहाड़ी से निकलने वाले 22 सदा सलिला स्त्रोतों के बारे में बताया था। इससे पहले उन्हें खनन से उसका सम्बन्ध पता नही था। गंधमार्दन और नियमगिरी में कई भौगोलिक समानताएं हैं। गंधमार्दन से अंग तथा सुखतेल नामक नदियां निकलती हैं जो आगे जाकर महानदी में मिल जाती हैं।

1992 में देश में उदारीकरण की नीतियों के आगाज के साथ-साथ निजी व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को देश की बहुमूल्य खनिज सम्पदा सौंपने के लिए कानूनों में परिवर्तन किए गए। गंधमार्दन में सार्वजनिक क्षेत्र की बाल्को कम्पनी को खनन करना था। इस कम्पनी को टाटा तथा कनाड़ा की अलकान तथा अलकोआ कम्पनियों ने खरीद लिया और ओडिशा के रायगढ़ जिले के काशीपुर इलाके में इन तीनों कम्पनियों के संघ ‘उत्कल एल्युमिना‘ ने खनन की ठानी। क्षेत्रीय जनता ने वर्षों तक कम्पनी को अपने इलाके में काम करने से रोके रखा। ओडिशा के बालेश्वर जिले के बालियापाल में मिसाइल टेस्टिंग रेन्ज तथा गंधमार्दन के आन्दोलनों की सफलता से संगठित होने पर सफल होने का आत्मविश्वास लोगों में पैदा हो सका।

1997 में वेदान्त कम्पनी के साथ नियमगिरी पहाड़ पर बॉक्साइट खनन के लिए समझौता हुआ। नियमगिरी पहाड़ की रक्षा के लिए समाजवादी जनपरिषद के युवा कार्यकर्ता लिंगराज आजाद, राजकिशोर और प्रेमलाल की पहल पर ‘नियमगिरी सुरक्षा समिति‘ का गठन हुआ। वेदान्त कम्पनी ने पहली बार आन्दोलन के दमन के लिए खुलकर निजी गुंडा-वाहिनी का गठन किया। समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लिंगराज प्रधान पर इन गुंड़ों ने दो बार हमला किया। लिंगराज आजाद और राजकिशोर पर भी गुंड़ों का हमला हुआ तथा वे तीन माह तक जेल में निरुद्ध भी रहे। नियमगिरी सुरक्षा समिति की पहल पर दस हजार लोगों ने एक बार मानव श्रृंखला बनाई थी। सरोज मोहंती जैसे कार्यकर्ता भी लम्बे समय तक जेल में रहे।

संघर्ष के इन प्रचलित तरीकों के अलावा दो अन्य मोर्चों पर नियमगिरी बचाने की लड़ाई लड़ी गई। गंधमार्दन बचाओ आन्दोलन के समय इन मोर्चो की आवश्यकता न थी। ये मोर्चे हैं न्यायपालिका तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अभियान।

केन्द्र सरकार नियमगिरी में इंग्लैंड की कम्पनी वेदान्त को खनन का निमंत्रण दे सकती है। समाजवादी जनपरिषद के नेता द्वय लिंगराज प्रधान और लिंगराज आजाद ने ऐसी किसी भी चुनौती को स्वीकार करते हुए ओड़िशा में कही भी वेदान्त द्वारा खनन न होने देने के संकल्प की घोषणा की है। महात्मा गांधी के निकट सहयोगी रहे जे.सी कुमारप्पा ने इस बात पर बल दिया था कि धातु-अयस्कों का निर्यात कतई नहीं होना चाहिए। इसका प्रतिकार भी गांधी के बताये तौर-तरीकों से ही करना होगा। (सर्वोदय प्रेस सर्विस )

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पूंजीवाद एक बार फिर संकट में है। पिछले दिनों आई जबरदस्त मंदी ने इसकी चूलें हिला दी है और दुनिया अभी इससे पूरी तरह उबरी नहीं है। पूंजीवाद का संकट सिर्फ बैंकों, कंपनियों व शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। दुनिया में भूखे, कुपोषित, बेघर और बेरोजगार लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। आज दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोग भूखे रहते हैं, यानी हर छठा आदमी भरपेट नहीं खा पाता है। इंसान की सबसे बुनियादी जरुरत भोजन को भी पूरा नहीं कर पाना पूंजीवादी सभ्यता की सबसे बड़ी विफलता है। पर्यावरण का संकट भी गहराता जा रहा है, जिसे कोपनहेगन सम्मेलन की विफलता ने और उजागर कर दिया है।

इन संकटो ने पूंजीवादी सभ्यता के चमत्कारिक दावों पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इसके विकल्पों की तलाश तेज हो गई है। लेकिन इसके लिए जरुरी है कि पहले इसकी बुनियादी गड़बड़ियों को समझा जाए और उनका सम्यक रुप से विश्लेषण किया जा सके।

कार्ल मार्क्स पूंजीजीवाद के सबसे बड़े और सशक्त व्याख्याकार व टीकाकार रहे हैं। किन्तु डेढ़ सौ सालों बाद उनके विश्लेषण और सिद्धांतों में कई कमियां दिखाई देती है। पूंजीवाद के विकास ,विनाश और क्रांति के बारे में उनकी भविष्यवाणियां सही साबित नहीं हुई हैं। पूरी दुनिया पूंजीपतियों और मजदूरों में नहीं बंटी। कारखानों का संगठित मजदूर वर्ग क्रांति का अगुआ अब नहीं रहा। रुस, पूर्वी यूरोप, चीन, वियतनाम आदि में जो कम्युनिस्ट क्रांतियां हुई, वे धराशायी हो गई हैं, और ये देश वापस पूंजीवाद के आगोश में चले गए हैं। इधर लातीनी अमरीका में जो समाजवाद की बयार चली है, वह शास्त्रीय मार्क्सवादी धारा से काफी अलग है।

दुनिया में आंदोलन और संघर्ष तो बहुत हो रहे हैं। किन्तु मजदूर-मालिक संघर्ष अब खबरों में नहीं है। किसानों, आदिवासियों और असंगठित मजदूरों के आंदोलन, जल-जंगल-जमीन के आंदोलन, धार्मिक-सामुदायिक-राष्ट्रीय पहचान आधारित आंदोलन तो हैं , किन्तु वे मार्क्स के विचारों से काफी अलग हैं। तब हम इन्हें कैसे समझे ?

इस मामले में डॉ० राममनोहर लोहिया से हमें मदद मिल सकती है। उन्होंनें 1943 में ‘अर्थशास्त्र मार्क्स के आगे’ नामक निबंध लिखा। उन्होंने बताया कि पूंजीवादी शोषण का मुख्य आधार एक कारखाने या एक देश के अंदर मालिक द्वारा मजदूर का शोषण नहीं, बल्कि उपनिवेशों का शोषण है। उपनिवेशों के किसान, कारीगर व मजदूर ही असली सर्वहारा है। लेनिन का यह कथन गलत है कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अंतिम अवस्था है। बल्कि, यह पूंजीवाद की पहली और अनिवार्य अवस्था है। यदि पश्चिम यूरोप के देशों ने अमरीका, अफ्रीका, एशिया और आस्ट्रेलिया के विशाल भूभागों पर कब्जा करने और लूटने का काम न किया होता, तो वहां औद्योगिक क्रांति नहीं हो सकती थी।

उपनिवेशों के आजाद होने के बाद भी नव-औपनिवेशिक और नव-साम्राज्यवादी तरीकों से यह लूट व शोषण चालू है और इसीलिए पूंजीवाद फल-फूल रहा है। यह शोषण सिर्फ औपनिवेशिक श्रम का ही नहीं है। इसमें पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता हुआ दोहन, लूट और विनाश भी अनिवार्य रुप से छिपा है। इसीलिए आज दुनिया में सबसे ज्यादा झगड़े प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हो रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण के संकट भी पैदा हो रहे हैं।

औपनिवेशिक शोषण की जरुरत पूंजीवादी विकास के लिए इतनी जरुरी है, कि तीसरी दुनिया के जिन देशों ने इस तरह का विकास करने की कोशिश की, बाहरी उपनिवेश न होने पर उन्होंनें आंतरिक उपनिवेश विकसित किए। आंतरिक उपनिवेश सिर्फ क्षेत्रीय व भौगोलिक ही नहीं होते हैं। अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्से भी (जैसे गांव या खेती) आंतरिक उपनिवेश बन जाते हैं। भारतीय खेती के अभूतपूर्व संकट और किसानों की आत्महत्याओं के पीछे आंतरिक उपनिवेश की व्यवस्था ही है।

सोवियत संघ का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही था कि उसने उसी तरह का औद्योगीकरण और विकास करने की कोशिश की, जैसा पूंजीवादी यूरोप-अमरीका में हुआ था। किन्तु बाहरी और आंतरिक उपनिवेशों की वैसी सुविधा उसके पास नहीं थी।

इसलिए, पूंजीवाद का एक बुनियादी नियम हम इस तरह बयान कर सकते हैं :

पूंजीवादी विकास के लिए औपनिवेशिक, नव-औपनिवेशिक या आंतरिक – औपनिवेशिक

शोषण जरुरी है। यह शोषण दोनों का होता है – श्रम का भी और प्राकृतिक संसाधनों का भी।

दुनिया के स्तर पर इस नियम का अभी तक कोई महत्वपूर्ण अपवाद नहीं है।

लोहिया के पहले गांधी ने आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता के इस शोषणकारी-विनाशकारी चरित्र के बारे में चेतावनी दी थी। मार्क्स के अनुयायियों में रोजा लक्ज़मबर्ग ने इस विषय में मार्क्स की खामियों को उजागर किया था और उसे सुधारने की कोशिश की। लोहिया के बाद लातीनी अमरीका के आन्द्रे गुन्दर फ्रेंक और मिस्त्र के समीर अमीन नामक मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों ने लोहिया से मिलती-जुलती बातें कही है।

यदि ऊपर कही गई बातें सही हैं, तो इनसे कई निष्कर्ष निकलते हैं :

’ तीसरी दुनिया के गरीब देशों में यूरोप-अमरीका जैसा औद्योगीकरण एवं विकास संभव नहीं है, चाहे वह पूंजीवादी तरीके से किया जाए या साम्यवादी (राज्य पूंजीवादी) तरीके से किया जाए।

’ चूंकि अमरीका-यूरोप की समृद्धि व जीवन-शैली पूरी दुनिया के श्रम व प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर टिकी है, वह दुनिया के सारे लोगों के लिए हासिल करना संभव नहीं है। इसलिए समाजवादियों को उसका सपना छोड़ देना होगा। सबकी न्यूनतम बुनियादी जरुरतें तो पूरी हो सकती हैं, किन्तु विलासितापूर्ण जीवन सबका नहीं हो सकता है। दूसरे शब्दों में ‘स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व’ के साथ ‘सादगी’ और ‘स्वावलंबन’ भी समाजवादी समाज के निर्माण के महत्वपूर्ण एवं जरुरी सूत्र होंगे।

’ इस अर्थ में दुनिया का आर्थिक-राजनैतिक संकट और पर्यावरणीय संकट आपस में जुड़े हैं। एक वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था में ही दोनों संकटों से मुक्ति मिल सकेगी। दूसरे शब्दों में, समाजवाद निर्माण के किसी भी प्रयास में दोनों तरह के आंदोलनों – आर्थिक-सामाजिक बराबरी के आंदोलन एवं पर्यावरण के आंदोलन – को मिलकर ताकत लगाना होगा।

’ विकल्प सिर्फ पूंजीवाद (उत्पादन संबंधों के संकुचित अर्थ में) का नहीं हो सकता। निजी संपत्ति को खतम करना काफी नहीं है। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के साथ पूंजीवादी तकनालॉजी, जीवन-शैली और जीवन-मूल्यों का भी विकल्प खोजना होगा। दूसरे शब्दों में हमें ‘पूंजीवादी सभ्यता’ का विकल्प खोजना होगा। एक नयी सभ्यता का निर्माण करना होगा।

इक्कीसवीं सदी में समाजवाद की किसी भी संकल्पना, तलाश और कोशिश में ये महत्वपूर्ण सूत्र होंगे। इनके लिए हम लोहिया के आभारी हैं।

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(साहित्य अकादमी द्वारा डॉ० राममनोहर लोहिया पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी (18-20फरवरी 2010) में पेश आलेख – हिन्दी सारांश)

- सुनील

ग्रा/पो केसला,

जि. होशंगाबाद, मध्य प्रदेश

461111

ईमेल – sjpsunil@gmail.com

कार्य :- समाजवादी विचारों का प्रचार-प्रसार। आदिवासियों, किसानों,

मछुआरों एवं विस्थापितों के संघर्ष एवं संगठन में पिछले 25 वर्ष से सक्रिय। अखबारों, पत्रिकाओं में लेखन। कई पुस्तिकाएं भी प्रकाशित।

पद :- राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, समाजवादी जन परिषद।

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बीते गणतंत्र दिवस पर केरल के कन्नूर जिले के श्री पल्लिपरम प्रसन्नन कमर तक प्रदूषित पानी में तीन घण्टे तिरंगा ले कर खड़े रहे । उनके साथी दिन भर के उपवास पर थे । यह जगह कन्नूर नगरपालिका की सरहद से केवल चार किलोमीटर दूर स्थित पुज़ाथी पंचायत के अन्तर्गत है। कन्नूर जिले की ’जिला पर्यावरण संरक्षण समिति’ से जुड़े कभी बहते पानी का स्रोत रही कक्काड नदी को बचाने के लिए लड़ रहे हैं । जिला समिति के संयोजक मेरे दल समाजवादी जनपरिषद के विनोद पय्याडा हैं । समिति के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक के बाद मुझे ’कक्काड पुज़ा संरक्षण समिति’ से जुड़े देवदास मौके पर ले गये । देवदास एल.एल.एम उत्तीर्ण युवा वकील हैं तथा मुख्यधारा के दलों के रवैय्ये के प्रति उन्हें काफ़ी रोष है ।
कक्काड नदी १९६६ तक वालापत्तनम नदी की एक उप-नदी के रूप में बहती थी । उत्तरी कन्नूर जिले के पहाड़ी इलाकों से कन्नूर शहर तक फेरी से आने-जाने का यह प्रमुख जरिया थी। वालापत्तनम नदी के ज्वार-भाँटा से जुड़ी़ ’काईपाड कृषि पद्धति’ से इस इलाके लोग साल में धान की एक फसल प्राप्त कर लेते थे । राज्य सरकार ने १९६६ में कट्टमपल्ली बाँध परियोजना शुरु की तथा दावा किया कि इलाके किसान एक की जगह तीन फसल प्राप्त कर सकेंगे । बाँध के नाम पर इस नदी के नाम पर इस नदी का पानी गेट बना कर रोक दिया गया । इसके फलस्वरूप पारम्परिक ’काईपाड खेती’ तो चौपट हो ही गई , मछलियां आना बन्द हो गईं तथा आठ पंचायत क्षेत्रों की करीब ५००० एकड़ खेती प्रभावित हो गई ।
मैंने नदी के पाट पर बने मां अमृतानन्दमयी की संस्था का हाई स्कूल , खेल का मैदान , प्लाईवुड कारखाना और मछली बाजार देखे । यह नदी एक गंदे पानी की तल्लैय्या बन चुकी है। पंचायत के बूचड़खानों का कचरा इसमें बहाया जा रहा है ।
हाल ही में जन सूचना अधिकार के तहत माँगी गई सूचना के तहत एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है । पुज़ाथी पंचायत ने इस नदी को गांव की एक प्लाईवुड कारखाने के मालिक को मात्र एक सौ रुपये में लीज़ पर दे दिया है ।
कुदरती संसाधनों पर स्थानीय आबादी के हक़ का नासमझी से भी इस्तेमाल किया जा सकता है यह बात इस प्रसंग में सामने आई है । क्या पंचायत का यह फैसला शहर से उसकी केवल चार किलोमीटर की दूरी के कारण तो नहीं है – शहरी मानस से प्रभावित ? उम्मीद की जाती है कि संरक्षण समिति बूचड़खानों के कचरे को नदी में बहाए जाने के बजाए उसके निस्तारण का कोई वैकल्पिक तरीका ढूँढ़ लेगी । ऐसा हो जाने पर समिति की ताकत भी बढ़ सकेगी ।

्नदी पर मछली बाजार

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आम के पेड़ के नीचे बैठक चल रही है। इसमें दूर-दूर के गांव के लोग आए हैं। बातचीत हो रही है। यह दृश्य मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के आदिवासी बहुल केसला विकासखंड स्थित किसान आदिवासी संगठन के कार्यालय का है। यहां 5 जनवरी को किसान आदिवासी संगठन की मासिक बैठक थी जिसमें कई गांव के स्त्री-पुरुष एकत्र हुए थे। जिसमें केसला, सोहागपुर और बोरी अभयारण्य के लोग भी शामिल थे। इस बार मुद्दा था- पंचायत के उम्मीदवार का चुनाव प्रचार कैसे किया जाए? यहां 21 जनवरी को वोट पडेंगे।

बैठक में फैसला लिया गया कि कोई भी उम्मीदवार चुनाव में घर से पैसा नहीं लगाएगा। इसके लिए गांव-गांव से चंदा इकट्ठा किया जाएगा। चुनाव में मुर्गा-मटन की पारटी नहीं दी जाएगी बल्कि संगठन के लोग इसका विरोध करेंगे। गांव-गांव में साइकिल यात्रा निकालकर प्रचार किया जाएगा। यहां किसान आदिवासी संगठन के समर्थन से एक जिला पंचायत सदस्य और चार जनपद सदस्य के उम्मीदवार खड़े किए गए हैं।

सतपुड़ा की घाटी में किसान आदिवासी संगठन पिछले 25 बरस से आदिवासियों और किसानों के हक और इज्जत की लड़ाई लड़ रहा है। यह इलाका एक तरह से उजड़े और भगाए गए लोगों का ही है। यहां के आदिवासियों को अलग-अलग परियोजनाओं से विस्थापन की पीड़ा से गुजरना पड़ा है। इस संगठन की शुरूआत करने वालों में इटारसी के समाजवादी युवक राजनारायण थे। बाद मे सुनील आए और यहीं के होकर रह गए। उनकी पत्नी स्मिता भी इस संघर्ष का हिस्सा बनीं। राजनारायण अब नहीं है उनकी एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है। लेकिन स्थानीय आदिवासी युवाओं की भागीदारी ने संगठन में नए तेवर दिए।

इन विस्थापितों की लड़ाई भी इसी संगठन के नेतृत्व में लड़ी गई जिसमें सफलता भी मिली। तवा जलाशय में आदिवासियों को मछली का अधिकार मिला जो वर्ष 1996 से वर्ष 2006 तक चला। आदिवासियों की मछुआ सहकारिता ने बहुत ही शानदार काम किया जिसकी सराहना भी हुई। लेकिन अब यह अधिकार उनसे छिन गया है। तवा जलाषय में अब मछली पकड़ने पर रोक है। हालांकि अवैध रूप से मछली की चोरी का नेटवर्क बन गया है।

लेकिन अब आदिवासी पंचायतों में अपने प्रतिनिधित्व के लिए खड़े हैं। इसमें पिछली बार उन्हें सफलता भी मिली थी। उनके के ही बीच के आदिवासी नेता फागराम जनपद उपाध्यक्ष भी बने। इस बार फागराम जिला पंचायत सदस्य के लिए उम्मीदवार हैं। फागराम की पहचान इलाके में तेजतर्रार, निडर और ईमानदार नेता के रूप में हैं। फागराम केसला के पास भुमकापुरा के रहने वाले हैं। वे पूर्व में विधानसभा का चुनाव में उम्मीदवार भी रह चुके हैं।

संगठन के पर्चे में जनता को याद दिलाया गया है कि उनके संघर्ष की लड़ाई को जिन प्रतिनिधियों ने लड़ा है, उसे मजबूत करने की जरूरत है। चाहे वन अधिकार की लड़ाई हो या मजदूरों की मजदूरी का भुगतान, चाहे बुजुर्गों को पेंशन का मामला हो या गरीबी रेखा में नाम जुड़वाना हो, सोसायटी में राषन की मांग हो या घूसखोरी का विरोध, यह सब किसने किया है?

जाहिर है किसान आदिवासी संगठन ही इसकी लड़ाई लड़ता है। किसान आदिवासी संगठन राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी जन परिषद से जुड़ा है। समाजवादी जन परिषद एक पंजीकृत राजनैतिक दल है जिसकी स्थापना 1995 में हुई थी। समाजवादी चिंतक किशन पटनायक इसके संस्थापकों में हैं। किशन जी स्वयं कई बार इस इलाके में आ चुके हैं और उन्होंने आदिवासियों की हक और इज्जत की लड़ाई को अपना समर्थन दिया है।

सतपुड़ा की जंगल पट्टी में मुख्य रूप से गोंड और कोरकू निवास करते हैं जबकि मैदानी क्षेत्र में गैर आदिवासी। नर्मदा भी यहां से गुजरती है जिसका कछार उपजाउ है। सतपुड़ा की रानी के नाम से प्रसिद्ध पचमढ़ी भी यहीं है।

होशंगाबाद जिला राजनैतिक रूप से भिन्न रहा है। यह जिला कभी समाजवादी आंदोलन का भी केन्द्र रहा है। हरिविष्णु कामथ को संसद में भेजने का काम इसी जिले ने किया है। कुछ समर्पित युवक-युवतियों ने 1970 के दशक में स्वयंसेवी संस्था किशोर भारती को खड़ा किया था जिसने कृषि के अलावा षिक्षा की नई पद्धति होषंगाबाद विज्ञान की शुरूआत भी यहीं से की , जो अन्तरराष्ट्रीय पटल भी चर्चित रही। अब नई राजनीति की धारा भी यहीं से बह रही है।

इस बैठक में मौजूद रावल सिंह कहता है उम्मीदवार ऐसा हो जो गरीबों के लिए लड़ सके, अड़ सके और बोल सके। रावल सिंह खुद की स्कूली शिक्षा नहीं के बराबर है। लेकिन उन्होंने संगठन के कार्यकर्ता के रूप में काम करते-करते पढ़ना-लिखना सीख लिया है।

समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सुनील कहते है कि हम पंचायत चुनाव में झूठे वायदे नहीं करेंगे। जो लड़ाई संगठन ने लड़ी है, वह दूसरों ने नहीं लड़ी। प्रतिनिधि ऐसा हो जो गांव की सलाह में चले। पंचायतों में चुप रहने वाले दब्बू और स्वार्थी प्रतिनिधि नहीं चाहिए। वे कहते है कि यह सत्य, न्याय व जनता की लड़ाई है।

फागराम

अगर ये प्रतिनिधि निर्वाचित होते हैं तो राजनीति में यह नई शुरूआत होगी। आज जब राजनीति में सभी दल और पार्टियां भले ही अलग-अलग बैनर और झंडे तले चुनाव लड़ें लेकिन व्यवहार में एक जैसे हो गए हैं। उनमें किसी भी तरह का फर्क जनता नहीं देख पाती हैं। जनता के दुख दर्द कम नहीं कर पाते। पांच साल तक जनता से दूर रहते हैं।

मध्यप्रदेश में जमीनी स्तर पर वंचितों, दलितों, आदिवासियों, किसानों और विस्थापितों के संघर्श करने वाले कई जन संगठन व जन आंदोलन हैं। यह मायने में मध्यप्रदेश जन संगठनों की राजधानी है। यह नई राजनैतिक संस्कृति की शुरूआत भी है। यह राजनीति में स्वागत योग्य कदम है।

- बाबा मायाराम की रपट । साभार जुगनु

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रात भर चली वार्ताओं में विश्व के राष्ट्राध्यक्ष कोपेनहेगन एक लचर सहमती पर पहुँचे जिसमें पृथ्वी के गरम होने की प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए उद्योगों के उत्सर्जन पर नकेल कसने के लिए कोई लक्ष्य तय नहीं किए गये हैं । यह समझौता फन्डिंग के मामले में मजबूत था परन्तु मौसम परिवर्तन की बाबत बाध्यकारी नहीं है तथा किसी वास्तविक मौसम सम्बन्धी समझौते पर पर पहुंचने के लिए इसमें किसी निश्चित तिथि की घोषणा भी नहीं की गई है । अमेरिका तथा चीन जैसे सबसे बड़े प्रदूषक मुल्क कमजओर समझौता ही चाहते थे तथा यूरोप , ब्राजील तथा दक्षिण अफ़्रीका जैसे भविष्य के प्रदू्षण चैम्पियन इन दोनों की मंशा को विफल करने के लिए कुछ खास नहीं किया ।

दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष इतिहास न बना सके लेकिन विश्व भर की जनता ने इतिहास बनाया । मुख्यधारा की मीडिया ने जानबूझकर इनकी ढंग से चर्चा नहीं की । ऐसे मौके कई बार आते हैं । बांग्लादेश को दुनिया के किसी देश ने मान्यता जब नहीं दी थी तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विश्व यात्रा में बांग्लादेश को मान्यता दिए जाने की मांग को हर जगह जनता का समर्थन मिला था । विश्व व्यापार संगठन की बैठकों का भी जगह जनता द्वारा विरोध हुआ था और वैश्वीकरण का यह प्रमुख औजार आज ठप-सा पड़ गया है । कोपेनहेगन के सम्मेलन के विरोध में जनता का पक्ष रखने के लिए दुनिया भर में हजारों रैलियाँ और प्रदर्शन हुए । समझौते पर टिप्पणी करते हुए एक अफ़्रीकी आन्दोलनकारी ने कहा , “किसी हाथी को चलवाने में बहुत बड़े प्रयास की जरूरत होती है लेकिन एक बार यदि आप सफल हो गये तो उसे रोकना आसान भी नहीं होता । हाथी डोलने लगा है । “

प्रदर्शनकारियों के समक्ष इंग्लैण्ड के प्रधान मन्त्री को कहना पड़ा , ’ आप लोगों ने दुनिया के लिए आदर्श स्थिति को प्रस्तुत किया है …..राष्ट्राध्यक्षों पर इसका जो असर हुआ है उसे कम कर न आँकिएगा । “

नोबेल पुरस्कार विजेता डेस्मन्ड टुटु ने आन्दोलनकारियों को कहा ,” इस बड़े  मकसद की मशाल आप लोग जलाए रखिएगा । “

पृथ्वी को बचाने की मुहिम एक सम्मेलन से पूरी नहं होने वाली । जनता को मौजूदा औद्योगिक व्यवस्था के विकल्प तैयार करने होंगे ।

कोपेनहेगन सम्मेलन की विफलता के जश्न मिटाने वाले भी मौजूद थी- प्रदूषणकारी उद्योगों की लॉबी की पार्टियों में जश्न मना और शैम्पेन की बोतलें खुलीं । जिन लॉबियों ने दुनिया की जम्हूरी निजाम पर कब्जा जमा रखा है तथा हमारे नेताओं को खरीद रखा है उन्होंने अपनी जीत का जश्न मनाया । जश्न का जाम हाथों में लिए उन्हें भी थोड़ी चिन्ता जनता की ताकत के आधार पर खड़े हो रहे आन्दोलन की हुई होगी । जनता की इस आवाज को खामोश करने की कोशिश भी इस लॉबी के द्वारा शुरु हो चुकी है ।



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बाबा मायाराम द्वारा लिखी गयीं सशक्त रिपोर्टों से चिट्ठा जगत परिचित है । ’सतपुड़ा के बाशिन्दे’ नामक उनकी किताब का लोकार्पण कल इटारसी में हुआ ।
इस अवसर पर प्रबुद्ध नागरिकों के अलावा उन क्षेत्रों के ग्रामीण भी शामिल थे, जिनके बारे में इस पुस्तक में विवरण है।

इटारसी स्थित पत्रकार भवन में पर्यावरण बचाओ, धरती बचाओ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में इस पुस्तक का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार और प्राचार्य श्री कश्मीर उप्पल और समाजवादी जन परिषद के उपाध्यक्ष श्री सुनील ने किया। इस संगोष्ठी में पर्यावरण के कई पहलुओं पर चर्चा की गई। वनों का विनाश, नदियों का सूखना, रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव आदि ऐसे मानव जीवन से जुड़े कई मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया।

बाबा मायाराम ने पिछले एक शवर्ष में उन्हें प्रदत्त दो फैलोशिप के तहत हो्शंगाबाद जिले के वनांचलों में घूम-घूमकर यह पुस्तक तैयार की है जिसमें यहां रहने वाले आदिवासियों की जिंदगी में चल रही उथल-पुथल, आकांक्षाओं और विस्थापन की त्रासदियों का जीवंत चित्रण किया गया है। इस पुस्तक की प्रस्तावना देश के जाने-माने प्रसिद्ध पत्रकार भारत डोगरा ने लिखी है और संपादन डॉ. सुशील जोशीने किया है। उल्लेखनीय है कि बाबा मायाराम पिछले दो दशकों से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। पूर्व में वे कई समाचार पत्र-पत्रिकाओं से संबद्ध रह चुके हैं। विभिन्न मुद्दों पर उनके लेख, रिपोर्टस व टिप्पणियां देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में छपती रही हैं।

सतपुड़ा के बाशिन्दे

पुस्तक से कुछ विचारणीय मुद्दे :

  • आजादी के बाद अब तक जितनी विकास परियोजनायें बनी हैं उनमें सबसे ज्यादा विस्थापन का शिकार आदिवासियों को होना पड़ा है । आंकड़ों में सिर्फ प्रत्यक्ष विस्थापन ही शामिल है । काफ़ी विस्थापन अप्रत्यक्ष होता है ।
  • एक बार विस्थापित होने के बाद लोगों की जिन्दगी फिर व्यवस्थित नहीं हो पाती । उलटे लोगों की हालत बदतर हो जाती है । विस्थापन का समाधान पुनर्वास से नहीं होता ।
  • वन्य प्राणी संरक्षण के सन्दर्भ में ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ है कि मानवविहीन करके ही वन तथा वन्य जीवों को बचाया जा सकता है । बल्कि बोरी अभ्यारण्य के अनुभव से तो लगता है कि वन , वन्य जीव तथा वनवासियों  का सहअस्तित्व संभव है ।
  • वन्य जीवों के संरक्षण से जुड़ा है वन संरक्षण । जंगली जानवर जंगल में ही रहते हैं । यह विडंबना ही है कि वन्य प्राणी संरक्षण योजना की शुरुआत वनों को काट कर की जाए ।
  • वन्य संरक्षण की योजनायें व नीतियां विरोधाभासी हैं । एक तरफ़ तो शेरों को बसाने के लिए लोगों को उजाड़ा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ़ पर्यटकों के लिए सैर सपाटे के इंजाम किए जा रहे हैं ।
  • एक दलील यह दी जाती है कि जंगलों में बसे आदिवासियों का विकास नहीं हो रहा है । तथ्य यह है कि जो गाँव विस्थापित किए गए हैं उनमें हर दृष्टि से लोगों की जिन्दगी पहले से बदतर हुई है ।

प्रकाशक व उपलब्धि केन्द्र -  किसान आदिवासी संगठन , ग्रा/पो केसला , जिला – होशंगाबाद , मध्य प्रदेश,४६११११

मूल्य – पच्चीस रुपये ।

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भोपाल गैस काण्ड के २५ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं | दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी से जुड़े  सवाल ज्यों के त्यों खड़े हैं | हाल ही में इस बाबत मनमोहन सिंह से जब प्रश्न किए गए तो उन्होंने इन सवालों को भूल जाने की हिदायत दी | राजेन्द्र राजन की ये कविताएं भी पिछले  २५ वर्षों से आस्तीन के इन साँपों को बेनकाब करने की कोशिश में हैं |

 

मुनाफ़ा उनका है

श्मशान अपना है

जहर उनका है

जहरीला आसमान अपना है

अन्धे यमदूत उनके हैं

यमदूतों को नेत्रदान अपना है

हमारी आँखों में जिस विकास का अँधेरा है

उनकी आँखों में उसी विकास का सपना है

जितना जहर है मिथाइल आइसो साइनेट में

हाइड्रोजन साइनाइड में

फास्जीन में

उससे ज्यादा जहर है

सरकार की आस्तीन में

जिसमें हजार- हजार देशी

हजार – हजार विदेशी सांप पलते हैं ।

यह कैसा विकास है जहरीला आकाश है

सांप की फुफकार सी चल रही बतास है

आदमी की बात क्या पेड़ तक उदास है

आह सुन , कराह सुन , राह उनकी छोड़ तू

विकास की मत भीख ले

भोपाल से तू सीख ले

भोपाल एक सवाल है

सवाल का जवाब दो .

आलाकमान का ऐलान है

कि हमें पूरे देश को नए सिरे से बनाना है

और इसके लिए हमने जो योजनायें

विदेशों से मँगवाकर मैदानों में लागू की हैं

उन्हें हमें पहाड़ों पर भी लागू करना है

क्योंकि हमें मैदानों की तरह

पहाड़ों को भी ऊँचा उठाना है

अब मुल्क की हर दीवार पर लिखो

कोई बाजार नहीं है हमारा देश

कोई कारागार नहीं है हमारा देश

हमारे जवान दिलों की पुकार है हमारा देश

मुक्ति का ऊँचा गान है हमारा देश

जो गूँजता है जमीन से आसमान तक

सारे बन्धन तोड़ .

- राजेन्द्र राजन

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[ २८ , २९ , ३० अक्टूबर २००९ को धनबाद में समाजवादी जनपरिषद का द्विवार्षिक सम्मेलन सम्पन्न हुआ । सम्मेलन का उद्घाटन  दल से जुड़े चिन्तक सच्चिदानन्द सिन्हा ने किया । प्रस्तुत है उनका उद्घाटन भाषण ]

सच्चिदानन्द सिन्हा

सच्चिदानन्द सिन्हा

झारखण्ड , जहाँ हम सम्मेलन में बैठे हैं , एक अर्थ में मानव इतिहास की समेकित प्रतिछाया प्रस्तुत करता है । अपनी बात को मैं थोड़ा स्पष्ट करना चाहता हूँ । मानव समाज के अनुभवों के परिपेक्ष्य में पिछली दो शताब्दी का इतिहास यह बतलाता है कि सारी आदिम समाज से कारपोरेटीकरण की तरफ़ संक्रमण और इस क्रम में आम आदमी के दरिद्रीकरण की रही है । दरिद्रीकरण , आधुनिक अर्थ में धन के अभाव से ही नहीं , बल्कि आदमी की स्वायत्तता , आत्म सम्मान एवं सामाजिक दायित्व बोध के लोप के अर्थ में भी । मार्क्स समेत ज्यादातर चिंतकों के विचार इस प्रक्रिया से बाहर कोष्ठकों में बन्द विवरण भर हैं ।

आम आदमी के जीवन में यह संक्रमण तीन चरणों में आया है – पहला , जब आदमी कबीले के सम्मानित सदस्य के रूप में स्थित था , दूसरा , जब वह किसान बना और अपने उत्पादन के अधिशेष से व्यवस्था एवं इसके शीर्ष पर उपस्थित विभिन्न तरह के शोषक समूहों का पोषण करता रहा , और तीसरा जब वह आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था में सर्वहारा या श्रमिक बन अपने काम और आय दोनों के लिए पराश्रित बना । वर्तमान पूंजीवादी समाज में वह कौन सा काम करेगा और किन उपक्रमों में किन स्थितियों में करेगा , दूसरों द्वारा निर्धारित होता है । दरअसल इतिहास बतलाता है मनुष्य पूर्ण स्वायत्तता की स्थिति में सिर्फ प्रथम चरण में ही था जब वह सामूहिक शिकार या वनोपजों के संग्रह से जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था । उस काल में सभी लोग वास्तविक या कल्पित लहू के संबंध से सगे और सहयोगी थे । हाल के अनेक अध्ययनों से यह बात सिद्ध होती है कि उनके कठोर जीवन और आपसी खूनी संघर्षों की कहानी प्राय: विद्वानों द्वारा वर्तमान समाज में फैले द्वेष – राग का प्रचीन स्थितियों पर प्रक्षेपण का परिणाम है ।

झारखण्ड में हम एक विकृत रूप में विकास के इन तीनों खण्डों का सह – अस्तित्व पाते हैं । (१) यहाँ आज भी अनेक कबीलायी समूह हैं जो मूल्त: आखेट और वनोपजों के संग्रह से जीविका पाते हैं – हाँलाकि आधुनिक खदानों , उद्योगों और शहरीकरण ने उन्हें अति छोटे दायरों में सीमित कर दिया है । वे आज विलुप्त होने की कगार पर हैं । (२) वर्तमान भूमि व्यवस्था के तहत खेतीबारी करने वाले किसान और (३) खदानों , कारखानों , निर्माण कार्यों एवं परिवहन में कार्यरत मजदूर जो स्थायी या दिहाड़ी मजदूरी पर काम करते हैं ।

झारखण्ड की त्रासदी यह है कि यहाँ वनोपजों की भरमार है ( या थी )और खनिजों का विपुल भंडार है – शायद भारत के तमाम खनिजों के तीस से चालीस प्रतिशत तक । इसलिए जब से भारत में आधुनिक औद्योगीकरण ने अपना पांव पसारना शुरु किया तब से कोयला , लौह – अयस्क , और दूसरे खनिजों के लिए यहाँ के उर्वर वनों से हरे भरे प्रदेश की खदानों के लिए खुदाई शुरु हुई । और यह हरा भरा प्रदेश उबड़ खाबड़ खड्डों और खंडहरों का बियाबान बनने लगा ।  पारंपरिक जीवन के आधार से विस्थापित यहाँ के स्वस्थ और सुन्दर पुरुष और स्त्रियों को बिचौलियों के माध्यम से दूर दराज स्थानों पर उत्तर बंग से लेकर असम तक के चाय बगानों में काम करने के लिए ले जाया गया । वहाँ वे अपनी पूरी सांस्कृतिक विरासत से कट गये , और आज जहाँ हैं और जिस जमीन को उन्होंने अपने खून पसीने से सींचा और बनाया है ,उस पर भी उनके सत्व की स्वीकृति नहीं है । पारंपरिक जीवन के आधार के नष्ट होने से आजीविका के साधन से हीन यहाँ के लोगों को आज भी बड़ी संख्या में ठेकेदारों द्वारा कठोर अस्थायी निर्माण कार्यों के लिए बाहर ले जाया रहा है ।

दूसरी तरफ़ झाखण्ड के खदानों और कारखानों में काम करने के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों से बड़ी तादाद में श्रमिक यहाँ आये । वे भी अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पैदा की गयी दरिद्रता और विस्थापन की एक कहानी के साथ आये थे । अंग्रेजी शासन ने वहाँ भी दरिद्रता और अकाल की एक व्यवस्था पैदा की थी । अत्यधिक शोषण और शासकीय लापरवाही से कृषि व्यवस्था नष्ट हो गयी थी और अकालों का एक सिलसिला शुरु हुआ । दूसरी ओर औद्योगिक क्रांति के बाद के बर्तानी उद्योगों की प्रतिस्पर्धा और शासकीय पक्षपात के कारण वहां के पारंपरिक घरेलू उद्योग नष्ट हो गये और इनमें लगे शिल्पी बेरोजगार हो गये । इसी पृष्टभूमि में वहाँ से बड़ी संख्या में लोगों को बंधुआ मजदूरों के रूप में मॉरिशस , सुरीनाम , गायना, फिजी आदि में ले जाया गया । जो बाकी बचे उनमें बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में कोलकाता , जैसे महानगरों या फिर झारखण्ड की खदानों में काम करने आये । कुछ ऐसे ही कारणों से छत्तीसगढ़ और बिलासपुर से भी बड़ी संख्या में लोग झारखंड की खदानों में काम करने आये । इससे इस इलाके में विभिन्न स्थानों से आये मजदूरों में भी एक दूसरे के प्रति तनाव पैदा होता रहा है । कोयला या दूसरे अयस्कों की ढुलाई के खर्च से बचने के लिए कुछ बड़े औद्योगिक संयन्त्र टाटा , बोकारो , हटिया , सिंदरी  आदि में लगे । पर इनमें दक्षता और बड़ी आय वाले स्थानों पर प्राय: वैसे लोगों को लगाया गया जो विकसित औद्योगिक क्षेत्रों से आते थे और दक्षता वाले कामों में प्रशिक्षित थे । नये तरह के उद्योगों में रोजगार देने की क्षमता घटती जा रही है और इससे रोजगार के लिए प्रतिस्पर्धा और श्रमिकों के विभिन्न समूहों में आपसी तनाव बढ़ता गया है । लोग इस बात को नजरअंदाज करते रहे हैं कि समस्या के मूल में आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था ही है जो लगातार उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या ऑटोमेशन और कम्प्यूटरीकरण के जरिये घटाती चलती है । चूँकि उद्योग धन्धे मूलत: वहीं विकसित होते हैं जहाँ संरचनात्मक सुविधाओं का विकास हुआ होता है । उद्योग प्राय: वहीं फैलते हैं जहाँ  इनका आधार एक बार निर्मित हो चुका होता है । देश के हर हिस्से से लोग ऐसे औद्योगिक नगरों की ओर रुख करते हैं और काम नहीं मिलने पर उनकी झुग्गियों और झोपड़ पट्टी को आबाद करते हैं । इन स्थानों पर लोगों में प्राय: मूल , भाषा आदि के सवाल पर तनाव पैदा होता है ।  यूरोप के देशों में इस तरह का विरोध बाहर से काम की तलाश में आने वाले अप्रवासियों के खिलाफ़ होता है । झारखंड में भी यदा कदा इस तरह का तनाव विभिन्न मूल के लोगों के बीच देखा जा सकता है । इसके मूल में वर्तमान पूंजीवादी उद्योगों का चरित्र है जिस में स्थायी और अस्थायी बेरोजगारी निहित है । इससे सीमित रोजगार के लिए मजदूरों में छीना झपटी होती रहती है ।

( जारी )

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[मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में वन्य प्राणियों के लिए तीन सुरक्षित उद्यान/अभयारण्य बनाए गए है– सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान, बोरी अभयारण्य और पचमढ़ी अभयारण्य। तीनों को मिलाकर फिर सतपुड़ा टाईगर रिजर्व बनाया गया है। तीनों के अंदर कुल मिलाकर  आदिवासियों के लगभग 75 गांव है और इतने ही गांव बाहर सीमा से लगे हुए है। इन गांवों के लोगों की जिंदगी और रोजी–रोटी का मुख्य आधार जंगल है। पर अब इन गांवों को हटाया जा रहा है। बोरी अभयारण्य का धांई पहला गांव है जिसे हटाया जा चुका है। बाबा मायाराम विस्थापन झेल रहे आदिवासियों पर मेरे चिट्ठों पर लिखते रहे हैं । प्रस्तुत है इस क्रम की दूसरी कड़ी। बाबा मायाराम की अति शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक में इस प्रकार के लेख होंगे । उन्होंने यह लेख इन्टरनेट पाठकों के लिए सहर्ष दिए हैं । कोई पत्रिका/अखबार/फीचर एजंसी/वेब साइट यदि इसे प्रकाशित करना चाहती है तो यह उम्मीद की जाती है कि पारिश्रमिक और कतरन बाबा मायाराम को भेजे। - अफ़लातून]
दोपहर भोजन की छुट्टी में बच्चे खेल रहे हैं। उछल–कूद रहे हैं। शिक्षक अपने कक्ष में बैठे कुछ लोगों से गप–शप कर रहे हैं। इसी समय मैं अपने एक सहयोगी के साथ नई धांई स्कूल पहुंचा। यह गांव नया है, जो वर्ष 2005 के आसपास ही अस्तित्व में आया है। पहले यह गांव बोरी अभयारण्य के अंदर बसा था। सतपुड़ा टाईगर रिजर्व के अंतर्गत आने वाले बोरी अभयारण्य के इस गांव को विस्थापित कर बाबई तहसील में सेमरी हरचंद के पास बसाया गया है।

एक साथ पांच कक्षाएं

एक साथ पांच कक्षाएं

नई धांई की बसाहट पूरी हो गई है। बड़े आकार के कबेलू (खपरैल) वाले मकान बन गए हैं। घरों के पीछे बाड़ी है, जिसमें मक्का बोया गया है। आधी–अधूरी पक्की सड़कें बन गई है। गांव में घुसते ही एक बोर्ड लगा है जिसमें नई धांई का मोटा–मोटी ब्यौरा दिया गया है। सतही तौर पर देखने में यहां सुंदर बसाहट और पुनर्वास का आभास मिलता है पर यहां के  बच्चों और ग्रामीणों से बात करने पर उजड़ने का दर्द छलकने लगता है।

यहां की आबादी 336 के करीब है। यहां के बाशिन्दे सभी कोरकू आदिवासी हैं। पुराना गांव धांई जंगल के अंदर था। जहां आदिवासियों का जीवन जंगल और आंशिक तौर पर  खेती पर आधारित था। नई बसाहट में यहां हर परिवार को 5–5 एकड़ जमीन मिली है। पर ज्यादातर खेतों में पेड़ के ठूंठ होने के कारण खेती में अड़चन आ रही है।

छुट्टी के बाद स्कूल फिर शुरू हुआ। यहां पांच कक्षाएं और शिक्षक एक है। नियुक्ति तो एक और शिक्षिका की है पर वह 3 माह के लिए प्रसूति अवकाश पर है। स्कूल में बच्चों की कुल दर्ज संख्या 78 है। जब शिक्षक से यह पूछा कि आप अकेले 5 कक्षाएं कैसे संभालते हैं ? शिक्षक ने इसके जवाब में आसमान की ओर देखा जैसे कह रहे हो– भगवान भरोसे। फिर संभलते हुए कहा कि गांव का एक और पढ़ा–लिखा लड़का स्वैच्छिक रूप से बच्चों की पढ़ाई में मदद करता है।

दीदी के साथ पढ़ते हैं

दीदी के साथ पढ़ते हैं

एक ही कमरे में सभी पांचों कक्षाओं  के बच्चे ठुंसे हुए थे। मैले–कुचैले और फटे–पुराने कपड़े पहने आपस में बतिया रहे थे। स्वैच्छिक मदद करनेवाला युवक कुर्सी पर बैठकर उन्हें पढ़ा रहा था। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि वह कौन सी कक्षा के छात्रों को पढ़ा रहे हैं क्योंकि उनके हाथ में कोई किताब तो थी नहीं। जाहिर है जब उनकी नियुक्ति नहीं हुई है तो उन्हें पढ़ाने–लिखाने का कोई प्रशिक्षण भी नहीं मिला होगा।

जब मैंने कक्षा में जाकर बच्चों से बात करने की इच्छा जाहिर की। वह युवक अपने आप कुर्सी छोड़कर बाहर चला गया। जैसे वह इससे मुक्त होना चाह रहा था। तत्काल कक्षा हमारे हवाले कर दी। उस कमरे में शायद ज्यादा लोगों के बैठने की जगह भी नहीं थी। मैं बच्चों के साथ टाटपट्टी पर बैठ गया। शिक्षक ने हमें बच्चों से बात करने का मौका दिया। मैंने उनसे पूछा आपकी अपने पुराने गांव की सबसे अच्छी क्या याद है? सबने कोरस में जवाब दिया–नदी की।

इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक नदियों के नाम गिनाएं–बोरी नदी, काकड़ी नदी और सोनभद्रा। सोनभद्रा यहां की बड़ी नदी है। कई और छोटे नदी–नाले हैं। छोटे–छोटे नदी घाटों के नाम बताएं। वे आगे कहते है कि हम इनमें कूद–कूदकर नहाते थे, डंगनियां से मछली और केकड़ा पकड़ते थे। अब यहां पानी ही नहीं है। वे सब तैरना जानते हैं। इनमें से कुछ नदियां सदानीरा है। इनमें साल भर पानी रहता है। वहां तो एक नदी में मगर भी रहता था।

क्या आपको जंगल से भी कुछ चीजें खाने की मिलती थी? इसके जवाब में दिलीप, सोनू, आशा और विजय आदि ने बहुत सारे फल, फूल और पत्तों के नाम गिनाए। जैसे तेंदू , अचार (जिसे फोड़कर चिरौंजी प्राप्त होती है) , कबीट , सीताफल , गुल्ली (महुए के बीज वाला फल)  , पीपल का बीज, जामुन, इमली, आम, बेर, मकोई, आंवला इत्यादि। उन्होंने कई जंगली जानवरों को भी देखा है– जैसे शेर, भालू, हाथी, सुअर, चीतल, नीलगाय, जंगली भैंसा, सोनकुत्ता, सियार, बंदर आदि।

इस बातचीत के दौरान धीरे–धीरे उनकी झिझक खत्म हो गई। उनका उत्साह बढ़ने लगा। वे वहां की कई बातें खुलकर बताने लगे। कक्षा में बहुत शोर होने लगा। हर बच्चा कुछ न कुछ बताना चाह रहा था। लड़के–लड़कियां सब कोई। उन्हें याद है वहां के पहाड़, पत्थर, पेड़, नदी और वहां का अपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य। सोनू, दिलीप, आशा, सीमा, विनेश, विजय, रवि आदि कई बच्चों ने अपनी यादें साझा कीं। वे ऐसे बता रहे थे जैसे यह सब बातें कल की हो।
यहां का चौथी कक्षा में पढ़नेवाला अनिकेश कहता है मुझे यहां कुछ अच्छा नहीं लगता। जब वे अपने गांव से उजड़ रहे थे तब उसे पता भी नहीं था कि कहां जा रहे है। वह कहता है हम अपनी बात अपने मां–बाप से भी नहीं कह पाते। वे सुबह से काम पर चले जाते हैं। फिर उनसे क्या कहें ? जब कभी ज्यादा मन भर आता है तब दोस्तों के साथ पास ही सिद्ध बाबा चले जाते हैं। जब उससे यह पूछा कि अगर उसे कहीं और ले जाया जाए तो उसे क्या–क्या चीजें चाहिए जिनसे उसे अच्छा लगेगा। उसने जवाब दिया– नदी, जंगल, पहाड़ और गाय–बैल। मैं सोच रहा था कि इन जंगल क्षेत्र के बच्चों को अपने परिवेश, जंगल–पहाड़ कितने प्रिय हैं ? काश, उनके आसपास ये चीजें होती और उनके पाठ्यक्रम में होती।

यह साफ है कि अब इन बच्चों को वह स्वच्छ , ठंडा और खुला वातावरण नहीं मिलेगा। उन्हें जंगल, पेड़ , पहाड़ , पत्थर , नदियां नहीं मिलेगी , जिनसे वे रोज साक्षात्कार करते थे, वहां खेलते थे।  जंगली जानवर नहीं मिलेंगे, जिनके संग खेलकर वे बड़े हुए थे। वे फल–फूल, पत्तियां और शहद नहीं मिलेगी , जिसे वे यूं ही तोड़कर खा लिया करते थे। अब उनकी दिनचर्या और जिंदगी बदल गई है। अब नदी की जगह उनके पास हैंडपंप हैं जिनमें ज्यादा मेहनत करने पर पानी कम टपकता है। जंगल और पहाड़ उनकी स्मृतियों में हैं। इन बच्चों को ठीक से पता भी नहीं है ​कि वे जंगल के गांव से यहां क्यों आ गए ?

बच्चों से संबंधित तमाम कानूनों की मोटी किताबों में बच्चों के लिए बहुत से प्रावधान हैं। संयुक्त राष्ट्र का समझौता है। संविधान में शिक्षा व पोषण का अधिकार है। बच्चों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट का समझौता है। उस पर भारत सरकार ने 12 नवंबर 1992 को दस्तख्वत कर अपनी मुहर लगाई है। उसमें बच्चों के जीने का अधिकार , विकास का , सुरक्षा और सहभागिता का अधिकार दिए गए है।  लेकिन इसके बावजूद हमारे देश में बच्चों की हालत अच्छी नहीं है। मध्यप्रदेश में तो इस साल कई स्थानों से कुपोषण से मौतों की खबरें आई है। आदिवासियों में कुपोषण और भी अधिक है। विस्थापन जैसे जीवन में बड़े जीवन में बड़े बदलाव लानेवाले निर्णयों में बच्चों के बारे में विशेष ध्यान देने की जरूरत है। जीवन में उथल–पुथल लाने वाले ऐसे निर्णयों में उनकी सहभागिता होनी चाहिए। लेकिन उनसे कभी उनकी रूचियों व राय के बारे में नहीं पूछा जाता है। उनकी शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता है।

पाठशाला : नई धाईं

पाठशाला : नई धाईं

अक्सर विस्थापन के समय यह दलील दी जाती है कि बच्चों का भविष्य बेहतर होगा। और ग्रामीण भी अपने बच्चों का भविष्य जंगल के बाहर ही देखते हैं। यह स्वाभाविक है। लेकिन नई धांई के स्कूल को देखकर ऐसी कोई उम्मीद बंधती नजर नहीं आती। जहां पांच कक्षा और एक शिक्षक है। स्कूल के ही एक हिस्से में राशन का वितरण होता है। जबकि राशन का भंडारण बाजू में स्थित आंगनबाड़ी भवन में है। ऐसे में बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद नहीं की जा सकती।

- बाबा मायाराम

लेखक का सम्पर्क पता : अग्रवाल भवन , निकट पचमढ़ी नाका , रामनगर कॉलॉनी, पिपरिया , जिला – होशंगाबाद , मध्य प्रदेश , 461775 .

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