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Archive for the ‘fdi’ Category

     निजीकरण-उदारीकरण के घोटाले

    निजीकरण के पीछे एक और दलील थी कि सरकारी काम में काफी भ्रष्टाचार है । लेकिन जिस तरीके से निजीकरण और उदारीकरण हो रहा है , उसने तो भ्रष्टाचार की सारी मर्यादाएं तोड़ दी हैं ।पिछले कुछ सालों में इतने घोटाले हुए हैं और इतने बड़े घोटाले हुए हैं कि ‘घोटाला’ शब्द के मायने बदल गये हैं। पहले दो-चार लाख रुपए का गबन होता था तो अखबारों के मुखपृष्ट पर बड़ी खबर बनता था । लेकिन अब करोड़ों ही नहीं , अरबों-खरबों रुपयों के घोटाले होते हैं। इन घोटालों में विदेशी कंपनियाँ बढ़-चढ़ कर भाग लेती हैं। इस देश को लूटने में वे पूरी तरह शामिल हैं ।

    उदारीकरण-वैश्वीकरण के इस दौर का पहला बड़ा घोटाला शेयर घोटाला था , जिसमें हर्षद मेहता-हितेन दलाल-भूपेन दलाल जैसों का हाथ था । लगभग १०,००० करोड़ रुपए के इस घोटाले की जाँच संयुक्त संसदीय समिति ने की थी । इस समिति की रिपोर्ट में बताया गया कि घोटाले में सबसे अग्रणी चार विदेशी बैंक थे – स्टेनचार्ट बैंक , ए एन्ड ज़ेड ग्रिन्ड्लेज़ बैंक , सिटी बैंक और बैंक ओफ़ अमेरिका । इनके खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने की सिफ़ारिश इस समिति ने की थी । लेकिन भारत सरकार ने कुछ विशेष नहीं किया । न उनके लाइसेन्स रद्द किए , न उन पर जुर्माना किया , न उनको भारत छोड़ने को कहा। बल्कि विदेशी बैंकों को और ज्यादा प्रवेश व छूट दी । हमारे देश में , हमारी भूमि पर आकर , विदेशी बैंक घोटाले करें तथा करवाएं और उन पर कार्रवाई न हो – यह सिर्फ हमारे देश में ही सम्भव है। वैश्वीकरण ने हमारे स्वाभीमान को तथा देशहित को कितना गिराया है तथा गुलामी को कितना मजबूत किया है , उसका यह एक और उदाहरण है ।

    देश की अस्मिता ,गरिमा तथा हितों के खिलाफ ऐसा ही एक घोटाला मारिशस रूट से हुआ । भारत और मारिशस के बीच एक संधि है , जिसमें एक दूसरे की कंपनियों पर दोहरा करारोपण नहीं करने का समझौता हुआ है । इसका अनुचित लाभ उठाने के लिए , भारत के शेयर बाजार में पूंजी लगाने वाली कई विदेशी कंपनियों ने अपना फर्जी रजिस्ट्रेशन मारिशस में करवा लिया तथा अरबों रुपयों का पूंजी लाभ कर की चोरी द्वारा कमाया।कुछ वर्ष पहले भारत सरकार के आयकर विभाग के कुछ ईमानदार अफसरों ने इन कंपनियों की जाँच शुरु की तो हडकंप मच गया । विदेशी कंपनियों ने धमकी दी कि यदि उनके खिलाफ जाँच नहीं रोकी गयी तो वे अपनी पूंजी वापस ले जाएंगे । शेयर बाजार का सूचकांक नीचे जाने लगा। तब वित्त मन्त्रालय ने हस्तक्षेप किया और आयकर अधिकारियों को आदेश दिया गया कि वे यह जाँच बन्द कर दें ।स्पष्ट है कि भारत सरकार पूरी तरह विदेशी पूंजी और विदेशी कंपनियों की बंधक बन गई है तथा कर चोरी और घोटालों को भी अनदेखा करते हुए उन्हें खुश रखना चाहती है।

    सेन्टूर हो्टल बिक्री , माडर्न फूड इंडस्ट्रीज की बिक्री,बाल्को की बिक्री जैसे कई मामले हैं,जिनमें घोटालों की गूँज उठी है । महाराष्ट्र में अमरीकी कंपनी एनरोन के बिजली कारखाने के लिए बिना निविदा के जो समझौता हुआ,उसका घोटाला तो काफ़ी चर्चित रहा है । मध्यप्रदेश में सड़कों के निजीकरण का उदाहरण भी काफ़ी मौजू है । म.प्र. सरकार ने ने बी.ओ.टी. (Bulid-Operate-Transfer) योजना के तहत १५ सड़कों का ठेका निजी कंपनियों को देने का फैसला किया। एशियाई विकास बैंक के कर्ज से बनी इस योजना मेम प्रत्येक सड़क के लिए ५० से ६० प्रतिशत अनुदान सरकार ने दिया ।मान लीजिए,एक सड़क की लागत १०० करोड़ आंकी गई है और उसमें ५५ करोड़ का अनुदान है। लेकिन निश्चित रूप से सड़क की वास्तविक लागत बहुत कम होगी,तथा १०० करोड़ की लागत बढ़ा-चढ़ा कर बताई होगी । यदि वास्तविक लागत ८० करोड़ रु. है,तो उस कंपनी को मात्र २५ करोड़ रुपए ही अपने पास से लगाने होगा ।लेकिन टोल टैक्स की वसूली तो वह पूरी करेगी । याने पैसा सरकार का , कमाई कंपनियों की- निजीकरण का मतलब यही है । म.प्र. की सड़कों कि इस बन्दरबाँट में भी विदेशी कंपनियां पीछे नही रही हैं ।इसी तरह टेलीफोन का ढांचा गांव – गांव तक पहुंचाने का काम सरकारी विभाग ने किया और उस पर काफी सार्वजनिक पैसे का विशाल निवेश हुआ । लेकिन जब टेलीफोन से कमाई का समय आया, यो निजी देशी-विदेशी कंपनियाँ मैदान में आ गयीं ।

[अगली प्रविष्टी- देश हित से ऊपर विदेशी पूंजी ]

 

 

   

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विदेशी कंपनियों का हड़पो अभियान

गतांक से आगे : दूसरे प्रकार की विदेशी पूंजी-प्रत्यक्ष विदेशी निवेश- वास्तव में देश के अन्दर आती है । इसे दो भागों में बांटा जा सकता है – (एक) विलय और अधिग्रहण ( Merger & Acquisition ) तथा (दो) हरित निवेश ( Greenfield investment ) । भारत में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश का लगभग आधा हिस्सा तो दूसरी कंपनियों के विलय और अधिग्रहण में लग रहा है । अर्थात विदेशी कंपनियां कोई नया कारखाना या नया करोबार शुरु करने के बजाय पहले से चली आ रही देशी कंपनी के कारोबार को खरीद लेती हैं । इससे भी देश में कोई नई उत्पादक गतिविधि नहीं शुरु होती है , रोजगार नहीं बढ़ता है , सिर्फ देश में पहले से चले आ रहे कारोबार के मालिक बदल जाते हैं और उसकी कमाई विदेश जाने लगती है । पारले कंपनी के शीतल पेय व्यवसाय को अमरीका की कोका कोला कंपनी द्वारा खरीदना , टाटा की टोमको कंपनी के साबुन ब्रान्डों तथा साबुन व्य्वसाय को हिन्दुस्तान लीवर द्वारा खरीदना , फ्रांसीसी कंपनी लाफ़ार्ज द्वारा सीमेंट के अनेक कारखानों को खरीदना , इसके कुछ उदाहरण हैं। भारत के सरकारी उपक्रमों के शेयर खरीदकर उन पर अपना वर्चस्व कायम करने को भी इस श्रेणी में रखा जाएगा ( जैसे मारुति कंपनी पर सुज़ुकी नामक जापानी कंपनी का कब्जा)। पूरी दुनिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा विलय और अधिग्रहण की प्रवृत्ति जोरशोर से चल रही है । इससे बाजारों में चन्द बड़ी कंपनियों का एकाधिकारी वर्चस्व कायम हो रहा है । भारत के विभिन्न वस्तुओं के कारोबार में भी विदेशी कंपनियों का कब्जा तेजी से हुआ है । उदारीकरण के इस दौर में विलय , अधिग्रहण अवं एकाधिकार पर पाबन्दियाँ हटाने के बाद यह संभव हुआ है । इसके लिए ‘ एकाधिकार एवं प्रतिबन्धित व्यापार पद्धतियाँ अधिनियम (MRTP Act) को बदला गया है । इस प्रकार , विदेशी पूंजी के आने से प्रतिस्पर्धा का भी लाभ देश को नहीं मिला है , जिसका बहुत गुणगान किया जा रहा था । बल्कि कई क्षेत्रों में एकाधिकारी प्रवृत्तियाँ मजबूत हुई हैं ।

    इस प्रकार जिस हरित निवेश से ही देश में उत्पादन , आय और रोजगार बढ़ने की कुछ उम्मीद की जा सकती है , वह देश में आ रही पूंजी का मात्र एक-चौथाई है । इसके बल पर भारत के शासक कैसे देश के विकास की उम्मीद कर रहे हैं , यह एक हैरानी का विषय है । इसे अंधविश्वास या अंधश्रद्धा ही कहा जा सकता है । महाराष्ट्र के प्रगतिशील समूहों ने अंधश्रद्धा निर्मूलन का काम काफी लगन से किया है । अब उन्हें भूमण्डलीकरण की इन अंधश्रद्धाओं के निर्मूलन का भी बीड़ा उठाना चाहिए ।

पूरा देश विदेशी कंपनियों के हवाले

    इसी प्रकार , निजीकरण की नीति पर भी भारत सरकार तथा हमारी राज्य सरकारें अंधे की तरह चल रही हैं  । यूरोप के कई देशों में जितना निजीकरण नहीं हुआ, उससे ज्यादा ज्यादा निजीकरण भारत में हो चुका है । विदेशी कंपनियों के लिए जिस तरह से दरवाजे खोले गए हैं और पूरी छूट दे दी गई है, उस स्थिति में निजीकरण का मतलब विदेशीकरण ही है । अर्थात देर-सबेर विदेशी कंपनियों का वर्चस्व यहाँ कायम हो जाएगा। देश के उद्योग , खेती , खदानें , बैंक , बीमा , शेयर बाजार , बिजली ,हवाई अड्डे , सड़कें , होटल , भवन निर्माण , मीडिया , शिक्षा , चिकित्सा , टेलीफोन , कानूनी सेवाएं , आडिट , पानी व्यवसाय – सबको विदेशियों के लिए खोला जा रहा है और उन्हे दावत दी जा रही है । एक ईस्ट इण्डिया कंपनी के कारण भारत को २०० वर्षों की गुलामी और बरबादी झेलनी पड़ी थी । अब हजारों विदेशी कंपनियाँ देश में पैर जमा रही हैं , तब देश का भविष्य क्या होगा , इसकी चिन्ता सरकार में किसी को नहीं है । विदेशी कंपनियों को प्रवेश देने का सरकार का सबसे ताजा पैकेज खुदरा व्यापार के क्षेत्र में है । यह एक प्रकार से भारत में बढ़ती बेरोजगारी की स्थिति में अंतिम शरणस्थली है । जब कोई और रोजगार नहीं मिला , तो माँ-बाप बेटे के लिए दुकान खोल देते हैं । लेकिन अब वहाँ भी विदेशी कंपनियों का हमला शुरु हो जाएगा ।

    जिसे विनिवेश ( disinvestment ) कहा जा रहा है , उसका भी औचित्य संदेहास्पद है। भारत सरकार हर बजट में सरकारी उद्यमों को बेचने के लक्ष्य रखती है और तेजी से उनको बेचती जा रही है । सरकार का यह काम वैसा ही है , जैसे कोई बिगड़ा हुआ , आवारा , कामचोर बेटा स्वयं कुछ कमाने के बजाय बाप-दादे की कमाइ हुई संपत्ति को बेचता जाए । भारत सरकार ठीक वही कर रही है । इससे बड़ी वित्तीय गैर जिम्मेदारी और क्या हो सकती है , क्योंकि यह संपदा एक न एक दिन तो खतम हो ही जाएगी ? विश्व बैंक के निर्देश पर वित्तीय अनुशासन के लिए भारत सरकार ने ‘वित्तीय जिम्मेदारी एवं बजट प्रबंधन अधिनियम ‘ तो पारित किया है , लेकिन उसमें इसे वितीय गैर-जिम्मेदारी नहीं माना गया है । उसका मतलब तो सिर्फ गरीबों और आम जनता की भलाई के लिए किए जाने वाले खर्चों में कटौती करते जाना है ।

    पहले सरकार ने कहा कि जिन सरकारी उपक्रमों में हानि हो रही है , उन्हें बेचा जाएगा । हानि क्यों हो रही है , उसे कैसे दूर किया जा सकता है , यह विचार तथा कोशिश करने की जरूरत सरकार ने नहीं समझी । कई मामलों में तो स्वयं सरकार या उच्च पदस्थ अफसरों के निर्णयों , नीतियों और लापरवाही के कारण ये हानियाँ हुईं और बढ़ीं । लेकिन अब तो हानि की बात एक तरफ रह गयी है ।सरकार उन सरकारी उद्यमों को बेच रही है, जो मुनाफे में चल रहे हैं । इसका कारण भी स्पष्ट है । देशी-विदेशी कंपनियां उन उपक्रमों को आखिर क्यों खरीदेंगे , जो घाटे में चल रहे हैं ? इसलिए बजट के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अब लाभ वाले सरकारी उपक्रमों को बेचा जा रहा है । अब तो ‘नवरत्नों’ की बारी भी आ गयी है।[ अगली प्रविष्टी : ' निजीकरण -उदारीकरण के घोटाले ' ]

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विदेशियों का हुक्म सिर-आँखों पर ( गत प्रविष्टी से आगे )

    देशप्रेम के स्थान पर विदेश प्रेम तथा आम जनता के स्थान पर कंपनियों के हितों को बढ़ाना – यही भूमंडलीकरण की नई व्यवस्था का मर्म है । इस अंधे विदेश प्रेम ने हमारे मंत्रियों , अधिकारियों , विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों की सोचने की शक्ति को भी कुंद कर दिया है । पिछले पन्द्रह वर्षों से उन्होंने मान लिया है कि देश का विकास विदेशी पूंजी और विदेशी कंपनियों से ही होगा । विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए और खुश करने के लिए भारत की सरकारों ने पिछले पन्द्रह वर्षों में सारी नीतियाँ और नियम-कानून बदल डाले । पिछले पन्द्रह वर्षों में हमारी संसद तथा विधानसभाओं ने कानूनों में जितने संशोधन किए हैं और नए कानून बनाए हैं , उनकी जाँच की जाए तो पता लगेगा कि ज्यादातर परिवर्तन विदेशी कंपनियों के हित में तथा विदेशी कंपनियों के कहने पर किए गए हैं । अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष , विश्व बैंक , एशियाई विकास बैंक , विश्व व्यापार संगठन , अमरीका सरकार या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कहने पर ये परिवर्तन किए जा रहे हैं । देश की जनता कोई मांग करती है तो सरकार को साँप सूँघ जाता है या या वह लाठी – गोली चलाने में संकोच नहीं करती है । लेकिन विदेशी कंपनियों की मांगें वह एक – एक करके पूरी करती जा रही है ।

    गौरतलब है कि जिस विदेशी पूँजी को लाने और खुश करने के लिए नीतियों-कानूनों में ये सारे परिवर्तन किए जा रहे हैं और जिस पर ही सरकार की , योजना आयोग की , सारी आशाएं केन्द्रित हैं,वह विदेशी पूंजी अभी भी देश में बहुत मात्रा में नहीं आ रह है । उसकी मात्रा धीरे-धीरी बढ़ी है ,लेकिन पिछले पांच वर्षों का भी औसत लें , तो भारत के कुल घरेलू पूंजी निर्माण में उसका हिस्सा ४-५ प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो पाया है । मात्र ४-५ प्रतिशत पूंजी के लिए हम अपनी सारी नीतिय्यँ कानून बदल रहे हैं और देश को विदेशियों के कहने पर चला रहे हैम , क्या यह उचित है? यह सवाल पूछने का सम्य आ गया है।

उड़न-छू विदेशी पूंजी

    सीमित मात्रा में जो विदेशी पूंजी आ रही है , उसका भी कोई विशेष लाभ देश को नहीं मिल रहा है । विदेशी पूंजी निवेश को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है – पोर्टफोलियो निवेश और प्रत्यक्ष निवेश (FDI ) । विदेशी पूंजी का लगभग आधा हिस्सा पोर्टफोलियो निवेश के रूप में आ रहा है,अर्थात यह हमारे शेयर बाजार में शेयरों की खरीद-फरोख्त करने और सेयरों की सट्टेबाजी से कमाई करने आती है । अभी जब सेन्सेक्स दस हजार से ऊपर पहुंचता है,वह इसीका कमाल है । इस प्रकार,यह पूंजी तो सही अर्थों में देश के अन्दर आती ही नहीं है । इससे देश में कोई नया रोजगार नहीं मिलता या नई आर्थिक उत्पादक गतिवि्धि चालू नहीं होती है। बल्कि , शेयर बाजार में आई यह विदेशी पूंजी बहुत चंचल और अस्थिर होती है । यह कभी भी वापस जा सकती है और पूरी अर्थव्यवस्था को संकट में डाल सकती है । इसे ‘ उड़न-छू पूंजी ‘ भी कहा जाता है । दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में कुछ वर्ष पहले जो संकट आया था,उसमें इसी विदेशी पूंजी के भागने तथा अल्पकालीन विदेशी ऋणों के प्रवाह के बंदे हो जाने का बड़ा योगदान था । इस संकट के पहले इंडोनेशिया , थाईलैण्ड , मलेशिया , फिलीप्पीन , दक्षिण कोरिया आदि देश विश्व बैंक की सफलता के प्रिय उदाहरन थे और इन्हें ‘एशियाई शेर ‘ कहा जाने लगा था । लेकिन विदेशी पूं जी के पलायन ने इन शेरों को अचानक गीदड़ों में बदल दिया । दूसरे देशों के अनुभव से भी हमारे शासक सीखते नहीं हैं , यह एक विडंबना है ।

अगली प्रविष्टी : विदेशी कंपनियों का हड़पो अभियान

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    लगभग सात वर्ष पहले की बात है । दूरसंचार क्षेत्र में निजी कंपनियों को लाइसेन्स दिये हुए कुछ वर्ष हो चुके थे । किन्तु इन कंपनियों ने सरकार को लाइसेन्स शुल्क का नियमित भुगतान नहीं किया था और उनके ऊपर अरबों रुपया बकाया हो गया था । जब उनको नोटिस दिए जाने लगे , तो इन कंपनियों ने फरियाद की कि उनका धन्धा ठीक नहीं चल रहा है , उनका शुल्क कम किया जाये और बकाया शुल्क माफ किया जाये । तब भारत सरकार के दूरसंचार मन्त्री श्री जगमोहन , एक सख्त आदमी थे । उन्होंने निजी टेलीफोन कंपनियों की बात मानने से इन्कार कर दिया और बकाया शुल्क जमा नहीं करने पर लाइसेन्स रद्द करने की चेतावनी दी । उन्होंने कहा कि आपका धन्धा नहीं चल रहा है तो बन्द कर दो । लेकिन सरकार को पैसा तो देना पड़ेगा । तब ये कंपनियाँ मिलकर प्रधानमन्त्री कार्यालय में गयीं और वहाँ फरियाद की । प्रधानमन्त्री कार्यालय ने भी उनकी तरफदारी की , किंतु जगमोहन टस से मस नहीं हुए । नतीजा यह हुआ कि जगमोहन को दूरसंचार मन्त्रालय से हटा दिया गया , प्रमोद महाजन को दूरसंचार मन्त्री बनाया गया और निजी कंपनियों की लाइसेन्स शर्तों को बदलकर करीब ५००० करोड़ रुपये की राहत उनको दे दी गई । एक ईमानदार मन्त्री और निजी कंपनियों के बीच संघर्ष में जीत कंपनियों की हुई । इस खेल में कितना कमीशन किसको मिला होगा , इसका अंदाज आप लगा सकते हैं । निजीकरण , उदारीकरण , भूमंडलीकरण के नाम पर यही खेल पिछले डेढ़ दशक से चल रहा है ।

    दूसरी ओर , ठीक इसी समय देश के कई हिस्सों में किसानों की आत्महत्याएं भी शुरू हो गयी थीं । खेती एक गहरे संकट में फंस चुकी थी , जिसके लिए स्वयं भूमंडलीकरण की नीतियाँ जिम्मेदार थीं । विश्व बैंक के निर्देश पर खाद , बीज , पानी , डीजल , बिजली आदि की कीमतें लगातार बढ़ाई जा रही हैं । विश्व व्यापार संगठन की नई खुली व्यवस्था के तहत खुले आयात के कारण किसानों की उपज के दाम या तो गिर रहे हैं या पर्याप्त नहीं बढ़ रहे हैं । किसानों पर भारी कर्जा हो गया है । देशी – विदेशी टेलीफोन कंपनियों को ५००० करोड़ रुपये की राहत देने वाली सरकार को यह ख्याल नहीं आया कि किसानों का करजा माफ कर दें या खाद – डीजल – बिजली सस्ता कर दें या समर्थन – मूल्य पर्याप्त बढ़ा दें । यदि कंपनियों का धन्धा नहीं चल रहा था , तो किसान की खेती में भी तो भारी घाटा हो रहा है ! लेकिन किसानों को , गरीबों को या आम जनता को राहत देना अब सर्कार के एज्ण्डे में नहीं है । [ अगली प्रविष्टि - ' विदेशियों का हुक्म सिर आँखों पर ' ]

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[ विशेष आर्थिक क्षेत्रों के कारण सिर्फ भारत सरकार को अगले चार वर्षों में लगभग ९३,००० करोड़ रुपए के कर - राजस्व का नुकसान होगा । एक तरफ तो भारत सरकार पैसे की तंगी का रोना रोती है और अपना घाटा व अनुदान कम करने के लिए गरीबों व आम जनता के लिए राशन , बिजली ,पानी , खाद ,शिक्षा , इलाज आदि को मँहगा करती जा रही है..]

गतांक से आगे :

    उल्टे नुकसान यह होगा कि करों व शुल्कों में भारी रियायतों से भारत सरकार व राज्य सरकारों की आय कम हो जाएगी और वे अपने कर – राजस्व के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से से वंचित हो जाएगी। अनुमान लगाया गया है कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों के कारण सिर्फ भारत सरकार को अगले चार वर्षों में लगभग ९३,००० करोड़ रुपए के कर-राजस्व का नुकसान होगा । एक तरफ तो भारत सरकार पैसे की तंगी का रोना रोती है और अपना घटा व अनुदान कम करने के लिए गरीबों व आम जनता के लिए राशन , बिजली , पानी , खाद , शिक्षा , इलाज आदि को मंहगा करती जा रही है, दूसरी तरफ़ इन कंपनियों को दिल खोल कर करों व शुल्कों से छूट दे रही है । देश की जनता को वंचित करके कंपनियों को लाभ पहुँचाने का काम इन ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के जरिए होगा ।

    इस मामले में , इसके पहले के ‘ निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों ‘ का क्या अनुभव रहा , यह भी देखना चाहिए । वर्ष १९९८ की रिपोर्ट में भारत के महाअंकेक्षक एवं लेखा परीक्षक ने टिप्पणी की थी कि ” ४७०० करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा कमाने के लिए ७५०० करोड़ रुपए के आयात शुल्क की हानि हुई तथा ऐसा लगता है कि सरकार ने कोई नफ़ा-नुकसान का विश्लेषण ही नहीं किया। ” हो सकता है कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों का अनुभव भी इससे ज्यादा अलग न हो ।

    दरअसल , चीन ने दो दशक पहले जब इस तरह के विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाये थे , तो वहाँ स्थिति काफी अलग थी । एक, चीन के अन्दर काफी समय तक विदेशी कंपनियों को इजाजत नहीं थी तथा चीन की अपनी देशी निजी कंपनियाँ भी नहीं पनपीं थीं । इसलिए इन क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों को चीन में घुसने का एक मौका मिला , वे बड़ी संख्या में आईं और इन क्षेत्रों से चीन को निर्यात बढ़ाने में मदद मिली । जबकि भारत में तो सारे दरवाजे पहले ही खुले हैं तथा भारत के देशी कंपनियां भी काफी विकसित हैं । दूसरा फर्क यह है कि बीस वर्ष पहले सब जगह आयात और निर्यात शुल्क काफी ऊँचे थे तथा विशेष आर्थिक क्षेत्रों के माध्यम से कंपनियों को ऊँचे शुल्कों की इन दीवारों को भेदने की सुविधा मिलती थी । लेकिन १९९५ में विश्वव्यापार संगठन बनने के बाद से ये शुल्क लगातार कम होते गए हैं और अब शून्य से लेकर दस-पन्द्रह प्रतिशत के बीच में रह गए हैं । इसलिए उत्पादन व निर्यात के लिए कम सीमा-शुल्कों वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने का औचित्य बहुत कम रह गया है । हम चीन के विकास मॊडल की नकल तो करने की कोशिश कर रहे हैम,लेकिन नकल में भी अपनी अकल कम लगा रहे हैं ।

    यह भी हो सकता है कि निर्यात के लिए करों में छूट और सुविधाओं को विश्वव्यापार संगठन में कोई देश चुनौती दे या स्वयं अपने देश में उन वस्तुओं पर संतुलित करने वाले शुल्क लगा दे। ऐसी हालत में निर्यात संवर्धन के उद्देश्य को पूरा करने पर भी प्रश्नचिह्न लग जाएगा ।

    भारत पिछले कई वर्षों से अपना निर्यात बढाने की कोशिश कर रहा है । निर्यात बढने से ही देश का विकास होगा ,यह पाठ विश्वबैंक,अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्वव्यापार संगठन से ले कर वैश्वीकरण समर्थक सभी अर्थशास्त्री पढाते रहे हैं । इसके लिए चीन , दक्षिण कोरिया , मक्सिको व लाटिनी अमेरिका के अन्य देशों का उदाहरण दिया जाता रहा है। निर्यात बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा विदेशी कंपनियों को देश में बुलाना होगा तथा देशी-विदेशी कंपनियों को नियमों और करों में छूट व अनुदान देने होंगे – इस नीति पर भारत सरकार चलती रही है । ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र’ इस शृंखला में सबसे ताजा पैकेज है । किन्तु इन सब कोशिशों के बावजूद भारत को अभी तक इस मोर्चे पर सफलता नहीं मिली है । भारत के निर्यात तो बहुत नहीं बढ़ पाए , आयात उससे ज्यादा बढ़ते गए। पि्छले काफी समय से भारत के विदेश व्यापर में लगातार विशाल घाटा चला आ रहा है ।

    निर्यात-आधारित विकास की इस पूरी संकल्पना पर ही सवाल उठाने का समय आ गया है । सही माएने में देखा जाए, तो यह एक मृग-मरीचिका है और दुनिया के गरीब देशों को लूटने का एक और खेल है । जब दुनिया के सारे गरीब देश निर्यात बढ़ाने की कोशिश करते हैं,तो जाहिर है कि सबका निर्यात एक साथ नहीं बढ़ सकता । कुछ देशों के निर्यात कम होंगे, तो दूसरे देशों के निर्यात बढ़ेंगे । लेकिन निर्यात बढाने की इस होड़ में वे अपने सामानों और सेवाओं को सस्ता करते जाते हैं । अपने देश की बहुसंख्यक गरीब आबादी की जरूरतों की उपेक्षा भी करते हैं । अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में माल सस्ता होने पर अमीर देशों व उनके नागरिकों व उनके नागरिकों कोफायदा होता है , जिनके पास क्रय शक्ति है ,या यूँ कहें कि जिनके पास डॊलर है । इस प्रकार ‘निर्यातोन्मुखी विकास’ के इस खेल में अमेरिका-यूरोप-जापान की सेवा में पूरी दुनिया के संसाधन लग जाते हैं और उनके लिए चीजें और सेवाएं सस्ती होती चली जाती हैं । यह शोषण का एक जरिया है । साथ ही निर्यात बढ़ाने के लिए विदेशी कंपनियां ही माहिर हैं , इस तर्क के चलते अमीर देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सर्वत्र घुसपैठ हो रही है और उनका वर्चस्व पूरी दुनिया पर पायम होता चला जा रहा है । उनके मुनाफ़े व रायल्टी , गरीब दुनिया के शोषण का एक जरिया है । ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ तो विशेष तौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अड्डे बनेंगे ।

  ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ हों , निर्यात आधारित विकास की बात हो , विदेशी पूंजी आकर्षित करने की होड़ हो या वैश्वीकरण का गुणगान हो , चीन की मिसाल बार-बार दी जाती है । चीन आधुनिक भारत के लिए एक मॊडल है ,जिसका वह अनुकरण करना चाहता है । वह मनमोहन सिंह और बुद्धदेव भट्टाचार्य दोनों के लिए मॊडल है।चीन की विकास दर लगातार कई वर्षों से नौ-दस प्रतिशत के आस-पास चल रही है । चीन भारत से तीन-चार गुना ज्यादा विदेशी पूंजी अकर्षित कर रहा है । चीन का निर्यात तेजी से बढ़ रहा है और चीनी वस्तुएं अमरीका से ले कर भारत तक के बाजार में छा गयी हैं । यह सब तो खूब प्रचार होता है । लेकिन चीन की जनता का क्या हाल है ? इस मॊडल के चीन के अन्दर की क्या वस्तुस्थिति है ?

    जो जानकारी मिल रही है , उससे पता चलता है कि चीन का विकास और औद्योगीकरण मुख्यरूप से हांग्कांग से लगे चीन के पूर्वी तटीय इलाकों तक सीमित है । चीन के गाँवों में और चीन के विशाल मुख्य भूमि में  गरीबी , बेरोजगारी व गैरबराबरी बहुत तेजी से बढ़ रही है तथा बड़े पैमाने पर विस्थापन और पलायन हो रहा है । भारत की तरह बड़ी संख्या में आत्महत्याएं भी हो रही हैं । कारखानों और खदानों में काम करने की दशाएं बहुत खराब हैं ।दुनिया में खनन और औद्योगिक दुर्घटनाओं स्बसे ऊँची दर चीन में है । भारत से भी ज्यादा दुर्घटनाएं वहाँ हो रही हैं । संपत्ति व आय के वितरण में भी गैरबराबरी चीन में भारत से ज्यादा हो चुकी है । पूरे चीन में जबरदस्त जन-असंतोष खदबदा रहा है , जिसे केन्द्रीय सत्ता की तानाशाही के चलते दबाकर रखा गया है । वर्ष २००५ में पूरे चीन में ८७,००० विरोध प्रदर्शन हुए , यह आंकड़ा स्वयं चीन सरकार की सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय का है । क्या यही हमारा मॊडल है ?

    शायद , वैश्वीकरण की नई व्यवस्था में गरीब देशों का कोई ‘विकास’ हो सकता है,तो वह इसी तरह का होगा । थोड़े लोगों और थोड़े इलाकों में बहुत गतिविधियाँ , स्मृद्धि और शान-शौकत दिखाई देगी । लेकिन बाकी विशाल इलाके की विशाल आबादी कंगाली , जाहिली , बेरोजगारी ,विस्थापन व पलायन की पीड़ा भोगने को अभिशप्त होगी । आधुनिक पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता की यह खूबी की यह खूबी है कि इसमें सबका विकास नहीं हो सकता । लेकिन बाकी लोगों की कीमत पर कुछ लोग व कुछ इलाके विकास व समृद्धि की अभूतपूर्व उचाइयां हासिल कर सकते हैं । इस पूंजीवाद ने पहले दुनिया में बडे-बडे उपनिवेश बनाये थे । फिर उपनिवेश आजाद होने पर नव-औपनवेशिक तरीकों से उनका शोषण जारी रखा । नव-औपनिवेशिक लूट के साथ -साथ देशों के अन्दर भी उपनिवेश बनने की प्रक्रिया निरंतर चल रही है । इससे देश के अंदर भी गैरबराबरी व शोषण तेजी से बढ़ेगा ,जो अन्तर्राष्ट्रीय सम्राज्यवादी शोषण का पूरक होगा और मददगार होगा। ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ भी इस आंतरिक उपनिवेश और बाहरी उपनिवेश वाली द्वन्द्वात्मक व्यवस्था का एक नया औजार है। यही इसका असली रूप और इसकी असली भूमिका है ।

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[मुम्बई के पास नवी मुम्बई से लगा ३५००० एकड़ का रिलायन्स का ' महामुम्बई विशेष आर्थिक क्षेत्र ' तो इतना विशाल है कि यह मुम्बई महानगर के एक तिहाई क्षेत्रफल के बराबर है। ]

गतांक से आगे

    इसी प्रकार  , विशेष आर्थिक क्षेत्र कानून में विनिर्माण की परिभाषा इतनी व्यापक रखी गयी है कि उसमें रेफ्रिजरेशन ( प्रशीतन ) , रंगाई , कटाई , मरम्मत करना , पुननिर्माण , पुन: इंजीनियरिंग आदि को भी विनिर्माण मान लिया गया है। इसका मतलब है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र में वास्तविक उत्पादन न हो कर कहीं और हो , सिर्फ वहाँ एक मामूली गतिविधि की इकाई डालकर तमाम कर-छूटों का लाभ उठाया जा सकता है।

    ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ बनाने के लिए कोई भी सरकारी या निजी कंपनी आवेदन कर सकती है। राज्य सरकार से सहमति लेने के बाद केन्द्र सरकार को आवेदन किया जा सकता है। इन आवेदनों पर शीघ्र फैसला लेने के लिए , इसे काफ़ी प्राथमिकता देते हुए भारत सरकार ने रक्षा मन्त्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता मे मन्त्रियों की एक समिति बना दी है , जिसे ‘ मन्त्रियों का अधिकार प्राप्त समूह ‘ नाम दिया गया है। इन ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के लिए जमीन हासिल करने का काम वैसे तो इन्हें विकसित करने वाली कंपनियों को स्वयं खुले बाजार में करना चाहिए। लेकिन इन्हें सुविधा देने की होड़ में लगी राज्य सरकारें स्वयं भूमि अधिग्रहित करके सस्ती दरों पर इन्हें दे रही हैं। बाजार की प्रचलित दरों से काफी कम दरों पर जमीन मिलने से इन कंपनियों की पौ-बारह हो गयी है।

    खूब कमाई , करों से मुक्ति , सस्ती जमीन आदि कारणों से  ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ बनाने के लिए अचानक दौड़ व होड़ मच गयी है। विशेष आर्थिक क्षेत्र का कानून बनने से पहले भारत में पन्द्रह विशेष आर्थिक क्षेत्र काम कर रहे थे – कांडला , सूरत , मुम्बई , कोच्चि , नोएडा , विशाखापत्तनम , इन्दौर , जयपुर , फाल्स , मनिकंचन , साल्ट लेक , और चेन्नई में तीन। अब लगभग १६४ नए प्रस्ताव केन्द्र सरकार स्वीकृत कर चुकी है। इनमें ‘ तेल व प्राकृतिक गैस आयोग ‘ तथा ‘ गुजरात औद्योगिक विकास विगम ‘ के प्रस्तावों को छोड़ कर बकी सब निजी कंपनियों के प्रस्ताव हैं। देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी की रिलायंस कम्पनी इनमें सबसे आगे है जिसके द्वारा नवी मुम्बई , हैदराबाद , गुड़गाँव (हरियाणा) और जामनगर (गुजरात) में विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं। कलकत्ता के पास बनाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार से भी उसकी वार्ता चल रही है। एस्सार , भारत फोर्ज , अदारी , विप्रो , सत्यम , बायोकोन , बजाज , नोकिया , केदिला , डा. रेड्डी आदि उद्योग जगत के अनेक बड़े नाम विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने में लग गए हैं। दिल्ली से नजदीकी के कारण हरियाणा व पंजाब में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लगभग ५० प्रस्ताव आ चुके हैं। मात्र गुड़गाँव के पास १२ विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के प्रस्ताव हैम , जिनमें आठ को स्वीकृति मिल चुकी है। गुजरात में १९ विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लगभग ५० प्रस्ताव विचाराधीन हैं। यह दावा किया जा रहा है कि जो १४८ प्रस्ताव पहले स्वीकृत हुए हैं , वे कुल ४०,००० हेक्टेयर (अर्थात एक लाख एकड़) क्षेत्र में फैले हुए होंगे और उनमें १,००,००० करोड़ रुपए का पूंजी निवेश होगा तथा उससे लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा। (more…)

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