देश हित से ऊपर विदेशी पूंजी
विदेशी पूंजी का मोह इतना ज्यादा है कि देश हित , जन स्वास्थ्य , पर्यावरण सबको धता बताई जा रही है । शीतल पेय की कोका कोला - पेप्सी कंपनी की बोतलें नुकसानदायक हैं , यह प्रमाणित हो चुका है । फिर भी उन्हें प्रतिबन्धित करने की हिम्मत भारत [...]
Archive for the ‘globalisation , privatisation’ Category
विदेशी पूंजी से विकास का अन्धविश्वास (५)
Posted in corporatisation, fdi, globalisation , privatisation on January 9, 2007 | No Comments »
प्लाचीमाडा की महिला नेता मायलम्मा
Posted in colas, globalisation , privatisation, obituary, water on January 7, 2007 | 3 Comments »
” पृथ्वी से अच्छा बरताव करो ।पृथ्वी तुम्हें माँ-बाप ने नहीं दी है,आगे आने वाली पीढियों ने उसे तुम्हे कर्ज के रूप में दिया है ।हमें अपने बच्चों से उधार में मिली है पृथ्वी ।”
आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के प्रथम शिकार ‘रेड इन्डियन’ लोगों की यह प्रसिद्ध कहावत प्लाचीमाडा के कोका-कोला विरोधी आन्दोलन की जुझारू [...]
विदेशी पूंजी से विकास का अन्धविश्वास(४)
Posted in corporatisation, fdi, globalisation , privatisation on January 6, 2007 | No Comments »
निजीकरण-उदारीकरण के घोटाले
निजीकरण के पीछे एक और दलील थी कि सरकारी काम में काफी भ्रष्टाचार है । लेकिन जिस तरीके से निजीकरण और उदारीकरण हो रहा है , उसने तो भ्रष्टाचार की सारी मर्यादाएं तोड़ दी हैं ।पिछले कुछ सालों में इतने घोटाले हुए हैं और इतने बड़े घोटाले हुए हैं कि ‘घोटाला’ शब्द के मायने बदल गये [...]
विदेशी पूंजी से विकास का अन्धविश्वास (३)
Posted in corporatisation, fdi, globalisation , privatisation on January 5, 2007 | No Comments »
विदेशी कंपनियों का हड़पो अभियान
गतांक से आगे : दूसरे प्रकार की विदेशी पूंजी-प्रत्यक्ष विदेशी निवेश- वास्तव में देश के अन्दर आती है । इसे दो भागों में बांटा जा सकता है - (एक) विलय और अधिग्रहण ( Merger & Acquisition ) तथा (दो) हरित निवेश ( Greenfield investment ) । भारत में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश [...]
विदेशी पूँजी से विकास का अन्धविश्वास (२)
Posted in corporatisation, fdi, globalisation , privatisation on January 4, 2007 | No Comments »
विदेशियों का हुक्म सिर-आँखों पर ( गत प्रविष्टी से आगे )
देशप्रेम के स्थान पर विदेश प्रेम तथा आम जनता के स्थान पर कंपनियों के हितों को बढ़ाना - यही भूमंडलीकरण की नई व्यवस्था का मर्म है । इस अंधे विदेश प्रेम ने हमारे मंत्रियों , अधिकारियों , विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों की सोचने की शक्ति को भी [...]
विदेशी पूंजी से विकास का अंधविश्वास : ले. सुनील
Posted in corporatisation, fdi, globalisation , privatisation on January 3, 2007 | 1 Comment »
लगभग सात वर्ष पहले की बात है । दूरसंचार क्षेत्र में निजी कंपनियों को लाइसेन्स दिये हुए कुछ वर्ष हो चुके थे । किन्तु इन कंपनियों ने सरकार को लाइसेन्स शुल्क का नियमित भुगतान नहीं किया था और उनके ऊपर अरबों रुपया बकाया हो गया था । जब उनको नोटिस दिए जाने लगे , [...]
भारत भूमि पर विदेशी टापू (५)
Posted in corporatisation, fdi, globalisation , privatisation, sez on January 1, 2007 | No Comments »
[ विशेष आर्थिक क्षेत्रों के कारण सिर्फ भारत सरकार को अगले चार वर्षों में लगभग ९३,००० करोड़ रुपए के कर - राजस्व का नुकसान होगा । एक तरफ तो भारत सरकार पैसे की तंगी का रोना रोती है और अपना घाटा व अनुदान कम करने के लिए गरीबों व आम जनता के लिए राशन , [...]
भारत भूमि पर विदेशी टापू (४)
Posted in corporatisation, globalisation , privatisation, sez on December 30, 2006 | 1 Comment »
गत प्रविष्टी से आगे : आन्ध्रप्रदेश में काकिनाडा में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग के विशेष आर्थिक क्षेत्र एवं तेलशोधक कारखाने के लिए १०,००० एकड़ खेती की उपजाऊ भूमि ली जा रही है , जिसे छोड़ने के लिए किसान तैयार नहीं है। हरियाणा में रिलायन्स का विशेष आर्थिक क्षेत्र भी विवादों से घिर गया है। हरियाणा [...]
भारत भूमि पर विदेशी टापू (३)
Posted in corporatisation, fdi, globalisation , privatisation, sez on December 29, 2006 | No Comments »
[मुम्बई के पास नवी मुम्बई से लगा ३५००० एकड़ का रिलायन्स का ' महामुम्बई विशेष आर्थिक क्षेत्र ' तो इतना विशाल है कि यह मुम्बई महानगर के एक तिहाई क्षेत्रफल के बराबर है। ]
गतांक से आगे
इसी प्रकार , विशेष आर्थिक क्षेत्र कानून में विनिर्माण की परिभाषा इतनी व्यापक रखी गयी है कि उसमें रेफ्रिजरेशन ( [...]
भारत भूमि पर विदेशी टापू ( २ )
Posted in corporatisation, globalisation , privatisation on December 28, 2006 | No Comments »
[ महानगरों के पास सस्ती जमीन , करों में छूट और बाहर से सीमेंट, इस्पात , लिफ़्ट , बिजली उपकरण आदि नि:शुल्क आयात करने की सुविधा के कारण कई जमीन - जायदाद का धन्धा करने वाली निर्माण कंपनियों के लिए भी ' विशेष आर्थिक क्षेत्रों ' का आकर्षण बढ़ गया है। ]
पिछली प्रविष्टि से आगे :
[...]

