‘ विचारधारा और इतिहास के अंत की ‘ घोषणाओं का वैश्वीकरण के हक़ में एक निश्चित बौद्धिक सहयोग है । फोर्ड फाउन्डेशन पोषित एक शोध में पुराने राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के स्थान पर राज्य-राष्ट्र और ‘मल्टीनेशनल स्टेट’ जैसी अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कस्मीर और उत्तर-पूर्वी भारत के उदाहरण दिए गए हैं । ऐसे विद्वानों द्वारा तमिलनाडु के [...]
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‘बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त’ शीर्षक से ७ दिसम्बर २००५ को जनसत्ता के सम्पादकीय पृष्ट पर छपे लेख का प्रथम भाग ‘मोहल्ला’ में छपा था । आज दूसरा भाग प्रस्तुत है ।
जिनका भाँडा फूट चुका है
फोर्ड फाउन्डेशन और सीआईए के अधिकारी रिचर्ड बिसेल ने परराष्ट्र संबंध परिषद के एक चर्चा समूह से मुखातिब होते हुए कहा [...]
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मानव समाज में खेती का स्थान तीन कारणों से महत्वपूर्ण रहा है और रहेगा ।
एक , अमरीका-यूरोप में खेती का स्थान गौण हो सकता है , लेकिन तमाम औद्योगीकरण और विकास के बावजूद आज भी मानव जाति का बड़ा हिस्सा गांवों में रहता है और अपनी जीविका के लिए खेती , पशु - [...]
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Technorati tags: औद्योगीकरण का अन्धविश्वास, superstition of industralisation, mahatma gandhi, marx
सिंगूर और नन्दीग्राम की घटनाओं से और इनके पहले कलिंगनगर तथा दादरी जैसे संघर्षों से इतना जरूर हुआ है कि भूमण्डलीकरण के रास्ते पर दौड़ते मदांध शासक वर्ग के पैर कुछ ठिठके हैं तथा देश में एक बहस छिड़ी है । विशेष आर्थिक क्षेत्रों [...]
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Posted in globalisation, women on April 30, 2007 | 9 Comments »
चीन में बड़े पैमाने पर धुँआधार ‘विकास’ के खिलाफ़ एक महिला की इच्छा-शक्ति के प्रदर्शन और पराक्रम ने उस देश के करोड़ों नागरिकों का ध्यान खींचा है ।
वू पिंग नामक इस महिला ने अपने घर को उस स्थान से हटाने से इनकार कर दिया है जहाँ एक दानवाकार निर्माण होना था । वू पिंग के [...]
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विकास दर के आँकड़े कितने भ्रामक हो सकते हैं , विकास के दावे कितने खोखले हो सकते हैं , वैश्वीकरण की व्यवस्था कितनी विसंगतिपूर्ण हो सकती है , यह आज जितना स्पष्ट हो गया है , उतना शायद पहले कभी नहीं था । भारत सरकार बड़े गर्व से [...]
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