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Archive for the ‘half pant’ Category

अपनी आवाज अपना गला ( दुनिया मेरे आगे )

Monday, 26 December 2011 06:10

अफलातून जनसत्ता 26 दिसंबर, 2011: हरे राम, हरे कृष्ण’ संप्रदाय द्वारा रूसी में अनूदित गीता पर रूस में आक्षेप लगाए गए हैं और उस पर प्रतिबंध लगाने की बात की गई है। विदेश मंत्री ने संसद और देश को आश्वस्त किया है कि वे रूस सरकार से इस मामले पर बात करेंगे। मामला पर-राष्ट्र का है। क्या भारत में ही इस पुस्तक को लेकर परस्पर विपरीत समझदारी नहीं है? यह मतभेद और संघर्ष सहिष्णु बनाम कट्टरपंथी का है। लोहिया ने इसे ‘हिंदू बनाम हिंदू’ कहा। उन्होंने गांधी-हत्या (हत्यारों की शब्दावली में ‘गांधी-वध’) को भी हिंदू बनाम हिंदू संघर्ष के रूप में देखा। देश के विभाजन के बाद एक बार गांधीजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में निमंत्रित किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई थी। सरसंघचालक गोलवलकर ने गांधीजी का स्वागत करते हुए उन्हें ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ बताया। उत्तर में गांधीजी बोले- ‘मुझे हिंदू होने का गर्व अवश्य है, लेकिन मेरा हिंदू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी हैं। हिंदू धर्म की विशिष्टता, जैसा मैंने उसे समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। अगर हिंदू यह मानते हों कि भारत में अ-हिंदुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हें घटिया दर्जे से संतोष करना होगा तो इसका परिणाम यह होगा कि हिंदू धर्म श्रीहीन हो जाएगा। मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही है कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा।’
गोलवलकर से गांधीजी के वार्तालाप के बीच में गांधी-मंडली के एक सदस्य बोल उठे- ‘संघ के लोगों ने निराश्रित शिविर में बढ़िया काम किया है। उन्होंने अनुशासन, साहस और परिश्रमशीलता का परिचय दिया है।’ गांधीजी ने उत्तर दिया- ‘लेकिन यह न भूलिए कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासिस्टों ने भी यही किया था।’ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।

(पूर्णाहुति, चतुर्थ खंड, पृष्ठ- 17) इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उसमें गांधीजी से पूछा गया- ‘क्या हिंदू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता? अगर नहीं देता तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है, उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है?’ गांधीजी ने कहा- ‘पहले प्रश्न का उत्तर ‘हां’ और ‘नहीं’ दोनों है। मारने का प्रश्न खड़ा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है? दूसरे शब्दों में- हमें ऐसा अधिकार मिल सकता है, जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जाएं। एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने या फांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है? रही बात दूसरे प्रश्न की, तो यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है, तो भी कानून द्वारा उचित रूप में स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भली-भांति कर सकती है। अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद, दोनों एक साथ बन जाएं तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जाएंगे। उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए। कानून को अपने हाथों में लेकर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए।’ (संपूर्ण गांधी वांग्मय, खंड: 89)
आध्यात्मिक सत्य को समझाने के लिए कई बार भौतिक दृष्टांत की आवश्यकता पड़ती है। यह भाइयों के बीच लड़े गए युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि हमारे स्वभाव में मौजूद ‘भले’ और ‘बुरे’ के बीच की लड़ाई का वर्णन है। मैं दुर्योधन और उसके दल को मनुष्य के भीतर की बुरी अंत:प्रेरणा और अर्जुन और उसके दल को उच्च अंत:प्रेरणा मानता हूं। हमारी अपनी काया ही युद्ध-भूमि है। इन दोनों खेमों के बीच आंतरिक लड़ाई चल रही है और ऋषि-कवि उसका वर्णन कर रहे हैं। अंतर्यामी कृष्ण, एक निर्मल हृदय में फुसफुसा रहे हैं। गांधीजी तब भले ही एक व्यक्ति हों, आज तो उनकी बातें कालपुरुष के उद्गार-सी लगती हैं और हमारे विवेक को कोंचती हैं। उस आवाज को तब न सुन कर हमने उसका ही गला घोंट दिया था। अब आज? आज तो आवाज भी अपनी है और गला भी अपना!

गांधी जी और संघ

जनसत्ता 29 दिसंबर, 2011: अपनी आवाज अपना गला’ (दुनिया मेरे आगे, 26 दिसंबर) में अफलातून जी ने कुछ तथ्यों को सही संदर्भों के साथ प्रस्तुत नहीं किया है। इसमें संघ-द्वेष से आपूरित पूर्वग्रह की झलक मिलती है। देश विभाजन के बाद गांधीजी किसी संघ शिविर में नहीं गए थे। दिल्ली में भंगी बस्ती की शाखा में उन्हें 16 सितंबर, 1947 को आमंत्रित किया गया था। आमंत्रित करने वाले व्यक्ति सरसंघचालक गोलवलकर नहीं, बल्कि दिल्ली के तत्कालीन प्रांत प्रचारक वसंत राव ओक थे। गांधीजी सदैव खुद को गौरवशाली सनातनी हिंदू कहते थे। वसंत राव ओक ने शाखा पर गांधीजी का परिचय ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ कह कर करवाया। गांधीजी ने इस परिचय पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
गोलवलकर से गांधीजी की बातचीत का वर्णन अफलातून जी ने ‘पूर्णाहुति’ का संदर्भ देकर किया है। इस मुलाकात का गांधी संपूर्ण वांग्मय में दो बार जिक्र है। पहला, 21 सितंबर, 1947 को प्रार्थना-प्रवचन में- ‘अंत में गांधीजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु (गोलवलकर) से अपनी और डॉ दिनशा मेहता की बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि मैंने सुना था कि इस संस्था के हाथ भी खून से सने हुए हैं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिलाया कि यह बात झूठ है। उनकी संस्था किसी की दुश्मन नहीं है। उसका उद्देश्य मुसलमानों की हत्या करना नहींं है। वह तो सिर्फ अपनी सामर्थ्य भर हिंदुस्तान की रक्षा करना चाहती है। उसका उद्देश्य शांति बनाए रखना है। उन्होंने (गुरुजी ने) मुझसे कहा कि मैं उनके विचारों को प्रकाशित कर दूं।’
इसका जिक्र गांधीजी ने भंगी बस्ती की शाखा पर अपने भाषण में किया- ‘कुछ दिन पहले ही आपके गुरुजी से मेरी मुलाकात हुई थी। मैंने उन्हें बताया था कि कलकत्ता और दिल्ली में संघ के बारे में क्या-क्या शिकायतें मेरे पास आई थीं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिया कि हालांकि संघ के प्रत्येक सदस्य के उचित आचरण की जिम्मेदारी नहीं ले सकते, फिर भी संघ की नीति हिंदुओं और हिंदू धर्म की सेवा करना मात्र है और वह भी किसी दूसरे को नुकसान पहुंचा कर नहीं। संघ आक्रमण में विश्वास

नहीं रखता। अहिंसा में उसका विश्वास नहीं है। वह आत्मरक्षा का कौशल सिखाता है। प्रतिशोध लेना उसने कभी नहीं सिखाया।’
इस मुलाकात का जैसा वर्णन अफलातून जी ने किया है और अंत में लिखा है कि ‘उन्होंने (गांधीजी ने) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।’ ये विचार प्यारेलाल जी के हो सकते हैं, गांधीजी के नहीं। गांधीजी ने अपने भाषण में जो संघ के विषय में कहा, वह इस प्रकार है- ‘संघ एक सुसंगठित और अनुशासित संस्था है। उसकी शक्ति भारत के हित में या उसके खिलाफ प्रयोग की जा सकती है। संघ के खिलाफ जो आरोप लगाए जाते हैं, उनमें कोई सच्चाई है या नहीं, यह संघ का काम है कि वह अपने सुसंगत कामों से इन आरोपों को झूठा साबित कर दे।’
अफलातून जी ने लिखा है- ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई।’ इसका भी वर्णन संपूर्ण वांग्मय में है। किसी संघ अधिकारी ने गीता के संदर्भ में वहां कुछ भी नहीं कहा था। एक स्वयंसेवक ने गांधीजी द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के संदर्भ में गीता का हवाला देते हुए यह पूछा था- ‘गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण कौरवों का नाश करने के लिए जो उपदेश देते हैं, उसकी आप किस तरह व्याख्या करेंगे?’ गांधीजी ने स्वयंसेवक की समझदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया, संजीदगी से जवाब दिया- ‘… पापी को सजा देने के अधिकार की जो बात गीता में कही गई है, उसका प्रयोग तो केवल सही तरीके से गठित सरकार ही कर सकती है।’ बाद में गांधीजी ने आग्रह किया कि कानून को अपने हाथ में लेकर सरकारी प्रयत्नों में बाधा न डालें।
लेख के अंत में गीता के अर्थ का जो आध्यात्मिक आयाम अफलातून जी ने प्रस्तुत किया है, उस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। अनावश्यक रूप से संघ को बदनाम करने और घृणा फैलाने के प्रयासों को जब इन आयामों में मिश्रित किया जाता है, तब हम समाज की सेवा नहीं, बल्कि उसका नुकसान कर रहे होते हैं।
’महेश चंद्र शर्मा, (पूर्व सांसद), द्वारका, नई दिल्ली

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

खुले मन की जरूरत

जनसत्ता 30 दिसंबर, 2011: जिस तरह महेश चंद्र शर्मा जी ने ‘संघ’ के बचाव में गांधीजी के निकट के साथी, सचिव और जीवनीकार प्यारेलाल जी पर लांछन लगाया है, वह ‘संघ’ के गोयबल्सवादी तौर-तरीके से मेल खाता है। संपूर्ण गांधी वांग्मय में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के दौरान छेड़छाड़ की गई थी, उस पर यूपीए-एक सरकार ने वरिष्ठ सर्वोदयकर्मी नारायण देसाई की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की थी। जांच समिति ने शोधकर्मियों द्वारा लगाए गए छेड़छाड़ के सभी आरोप सही पाए थे और उक्त संस्करण की पुस्तकों और सीडी की बिक्री पर तत्काल रोक लगाने और असंशोधित मूल रूप की ही बिक्री करने की संस्तुति की थी। बहरहाल, जितनी तफसील में इस विषय पर लिखा जा सकता है, उसका मोह न कर मैं इतिहास-क्रम में उलटा जाते हुए सिर्फ ठोस प्रसंगों को रखूंगा।
गांधी को ‘संघ’ के प्रात:-स्मरणीयों में शरीक करने की चर्चा हम महेश जी, प्रबाल जी, अशोक भगत जी, रामबहादुर जी जैसे स्वयंसेवकों से जेपी आंदोलन के दौर (1974-75) से सुनते आ रहे थे। सितंबर और अक्टूबर 2003 में प्रकाशित संघ के काशी प्रांत की शाखा पुस्तिका मेरे हाथ लग गई। स्मरणीय दिवसों में गांधी जयंती के विवरण में ‘देश विभाजन न रोक पाने और उसके परिणामस्वरूप लाखों हिंदुओं की पंजाब और बंगाल में नृशंस हत्या और करोड़ों की संख्या में अपने पूर्वजों की भूमि से पलायन, साथ ही पाकिस्तान को मुआवजे के रूप में करोड़ों रुपए दिलाने के कारण हिंदू समाज में इनकी प्रतिष्ठा गिरी।’ संघ के साहित्य-बिक्री पटलों पर ‘गांधी-वध क्यों’ नामक पुस्तक में ‘वध’ के ये कारण ही बताए गए हैं।
संघ की शाखा में गांधीजी के जाने की तारीख के उल्लेख में अपनी चूक मैं स्वीकार करता हूं। प्यारेलाल जी द्वारा लिखी जीवनी ‘महात्मा गांधी दी लास्ट फेस’ पर महेश जी ने पूर्वाग्रह का आरोप लगाया है। इसलिए दिल्ली डायरी, प्रार्थना प्रवचन और गांधी द्वारा संपादित पत्रों से ही उद्धरण पेश हैं।
गीता की बाबत दिया गया उद्धरण संपूर्ण गांधी वांग्मय (खंड 89) में मौजूद है।
‘अगस्त क्रांति-दिवस’ (9 अगस्त, 1942) को प्रकाशित ‘हरिजन’

(पृष्ठ 261) में गांधीजी ने लिखा- ‘शिकायती पत्र उर्दू में है। उसका सार यह है कि आसफ अली साहब ने अपने पत्र में जिस संस्था का जिक्र किया है (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) उसके 3,000 सदस्य रोजाना लाठी के साथ कवायद करते हैं, कवायद के बाद नारा लगाते हैं- हिंदुस्तान हिंदुओं का है और किसी का नहीं। इसके बाद संक्षिप्त भाषण होते हैं, जिनमें वक्ता कहते हैं- ‘पहले अंग्रेजों को निकाल बाहर करो, उसके बाद हम मुसलमानों को अपने अधीन कर लेंगे। अगर वे हमारी नहीं सुनेंगे तो हम उन्हें मार डालेंगे।’ बात जिस ढंग से कही गई है, उसे वैसी ही समझ कर यह कहा जा सकता है कि यह नारा गलत है और भाषण की मुख्य विषय-वस्तु तो और भी बुरी है।
नारा गलत और बेमानी है, क्योंकि हिंदुस्तान उन सब लोगों का है जो यहां पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे मुल्क का आसरा नहीं ताक सकते। इसलिए वह जितना हिंदुओं का है उतना ही पारसियों, यहूदियों, हिंदुस्तानी ईसाइयों, मुसलमानों और दूसरे गैर-हिंदुओं का भी है। आजाद हिंदुस्तान में राज हिंदुओं का नहीं, बल्कि हिंदुस्तानियों का होगा, और वह किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के निर्वाचित समूची जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा।
धर्म एक निजी विषय है, जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गई है, उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने अस्वाभाविक विभाग हो गए हैं। जब देश से विदेशी हुकूमत उठ जाएगी तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद हंसेंगे। अगर अंग्रेजों की जगह देश में हिंदुओं की या दूसरे किसी संप्रदाय की हुकूमत ही कायम होने वाली हो तो अंग्रेजों को निकाल बाहर करने की पुकार में कोई बल नहीं रह जाता। वह स्वराज्य नहीं होगा।’
महेश जी खुले दिमाग से तथ्यों को आत्मसात करें और ‘प्रात: स्मरणीय’ के पक्ष से परेशान न हों।
’अफलातून, काहिवि, वाराणसी

अप्रासंगिक विषय

चौपाल’ (30 दिसंबर) में अफलातून का जवाब पढ़ा।  उन्होंने अप्रासंगिक विषयों को अपने पत्र में उठाया है, जैसे गांधी संपूर्ण वांग्मय से राजग सरकार ने छेड़छाड़ की और संघ ने महात्मा गांधी का नाम कैसे ‘प्रात: स्मरण’ में जोड़ा। इन मुद्दों का न तो मेरे पत्र में उल्लेख था, न ही अफलातून के मूल लेख में। इस संदर्भ में केवल इतना  कहना है कि मैं संपूर्ण वांग्मय के जिन खंडों को उद्धृत कर रहा हूं, वे राजग सरकार के समय छपे हुए नहीं, बल्कि मई 1983 में नवजीवन ट्रस्ट, अमदाबाद द्वारा प्रकाशित हैं। जो उद्धरण मैंने दिए हैं वे किसी छेड़छाड़ के नहीं, उसी अधिकृत संपूर्ण वांग्मय के हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शिविरों में भारत के महान पुरुषों के नामों का स्मरण ‘प्रात: स्मरण’ में करता है। अफलातून इससे क्यों नाराज हैं! मैंने प्यारेलाल जी पर कोई लांछन अपने पत्र में नहीं लगाया, कृपया पत्र को पुन: ध्यान से पढ़ें। मैंने अफलातून को ‘पूर्वाग्रह-ग्रस्त’ अवश्य कहा है। यदि अफलातून को संघ विषयक कोई ‘पूर्वाग्रह’ नहीं है, तो निश्चय ही यह खुशी की बात है।
अफलातून ने पुन: गांधीजी को सही प्रकार से उद्धृत नहीं किया। जिस तथाकथित नारे और भाषण की शिकायत दिल्ली प्रांत कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने गांधीजी से की थी, उसके संदर्भ में गांधीजी ने जो कुछ ‘हरिजन’ में लिखा उसके वे अंश जो अफलातून ने उद्धृत नहीं किए उन्हें उद्धृत करने से पूरी वास्तविकता ही बदल जाती है।
गांधीजी ने कहा है ‘‘मैं तो यही उम्मीद कर सकता हूं यह नारा अनधिकृत है, और जिस वक्ता के बारे में यह कहा गया है कि उसने ऊपर के विचार व्यक्त किए हैं, वह कोई जिम्मेदार आदमी नहीं है।’’ एक अनधिकृत, गैर-जिम्मेदार नारे और वक्तव्य को लेकर अफलातून क्या सिद्ध करना चाहते हैं, जिसके लेखक के बारे में किसी को कुछ पता नहीं। ऐसे वाहियात नारों और वक्तव्यों के आधार पर आप संघ का आकलन करना चाहते हैं और चाहते हैं कि कोई आपको पूर्वाग्रही भी न कहे! संघ को थोड़ा भी जानने वाला व्यक्ति जानता है कि शाखाओं में कभी नारेबाजी नहीं होती।
उस वाहियात भाषण का भी गांधीजी जवाब देते हैं, यह उनकी संजीदगी है।
अफलातून से केवल इतना निवेदन है कि उन्हें संघ से जो शिकायत हो, वे स्वयं अपने तर्कों से उसे प्रस्तुत करें, किसी महापुरुष की आड़ लेकर उन्हें प्रहार करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। पता नहीं काशी प्रांत की कौन-सी शाखा पुस्तिका उनके हाथ लग गई। देश विभाजन को न रोक पाने के कारण महात्मा जी बहुत दुखी थे, वे 15 अगस्त 1947 के उत्सव में भी शामिल नहीं हुए और द्वि-राष्ट्रवादी पृथकतावादियों के आक्रमण से परेशान हिंदुओं ने गांधीजी के सामने अपनी पीड़ाओं और आक्रोश को व्यक्त किया था। इसका उल्लेख करने में अफलातून को उस पुस्तिका से क्या शिकायत है?
’महेश चंद्र शर्मा, नई दिल्ली

हिन्दू द्विराष्ट्रवादी

महात्मा गांधी का संपूर्ण वांग्मय हिंदी और अंग्रेजी (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी) में प्रकाशन विभाग, भारत सरकार ने छापा है, नवजीवन ट्रस्ट ने नहीं। उसका स्वत्वाधिकार जरूर 1983 से 2008 तक नवजीवन ट्रस्ट के पास रहा। ‘गांधीजीनो अक्षरदेह’ (गुजराती वांग्मय) जरूर नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किया गया है। जिस उद्धरण का हवाला महेश जी ने दिया है, उसे मैंने ‘हरिजन’ (गांधीजी का अंग्रेजी मुखपत्र) के पृष्ठ 261 से लिया है। द्वि-राष्ट्रवादी केवल मुसलिम लीग के लोग नहीं थे, हिंदुओं के लिए हिंदू राष्ट्र को मानने वाले भी द्वि-राष्ट्रवादी हैं।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुसलिम लीग से पहले सावरकर ने धर्म के आधार पर देश के बंटवारे

की बात शुरू कर दी थी। हिंदू-राष्ट्रवादी गांधी के समक्ष अपनी शिकायत कभी प्रार्थना सभा में बम फेंक कर कर रहे थे। अंतत: उन्हीं गांधी जी को गोली मार दी। महेश जी के शब्दों में यह उनकी पीड़ा और आक्रोश मात्र था, जिन्हें शाखा-पुस्तिका में असली हिंदू माना गया है। महेश जी ने शाखा-पुस्तिका के उद्धरण का खंडन नहीं किया है, भले ही उन्हें यह पता न हो कि मेरे हाथ कौन-सी पुस्तिका लग गई। शाखा में नारे नहीं उद्घोष होते हैं, पथ-संचलन भी मौन नहीं हुआ करते।
गांधी-हत्या को ‘गांधी-वध’ कहने वालों की किताबें भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय 11, अशोक मार्ग पर भी बिक रही थीं-

http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2011/09/post-195.html
’अफलातून, वाराणसी

 

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उच्चतम न्यायालय ने २००२ के गुजरात में हुए नरसंहार के लिए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जिम्मेदार हैं कि नहीं इस बात की जांच अहमदाबाद के मेजिस्ट्रेट की अदालत को सुपुर्द कर दी है. उच्चतम न्यायालय ने यह भी निर्देश दिए कि इस जांच में उसके द्वारा नियुक्त स्पेशियल इन्वेस्टिगेशन टीम एवं एमिकस क्यूरी (वरिष्ट अधिवक्ता) की रपट को ध्यान में रखा जाए. साथ ही नरसंहार में जिन लोगों ने अपने परिजनों को खोया है उनके द्वारा अतिरिक्त गवाही एवं सबूतों को भी सुना और देखा जाए.
भारतीय जनता पार्टी ने उच्चतम न्यायालय के इस निर्देश को मोदी को निर्दोष घोषित किए जाना बतलाया है, जो कि अर्ध सत्य ही नहीं बल्कि सरासर झूठ है. उच्चतम न्यायालय ने मोदी के खिलाफ़ लगाए गए आरोपों का कोई खंडन नहीं किया है. बल्कि, २००२ में हुए दंगों में उनकी भूमिका की मेजिस्ट्रेट की अदालत में जांच करने के आदेश ही दिए हैं. अब यह मामला निचली अदालत में चलेगा, और शायद यह एक लंबी प्रक्रिया होगी. गौर तलब है कि उच्चतम न्यायालय में किसी भी फ़ौजदारी केस की सुनवाई नहीं होती, वहां सिर्फ़ निचली अदालतों के फ़ैसलों पर सुनवाई होती है और उन पर अंतिम फ़ैसला सुनाया जाता है.
लेकिन इस तथ्य को छुपा कर, भाजपा नेता इस भ्रामक प्रचार में जुट गए हैं कि उच्च अदालत ने मोदी को तमाम आरोपों से बरी कर दिया है और यह कि विपक्ष तथा नागरिक अधिकार संगठन पिछले ११ सालों से मोदी को बदनाम करने की कोशिश में लगे हैं. स्वयं मोदी ने उच्चतम न्यायालय के निर्देश को ’विवादों का अंत’ बतलाया है और अपने खिलाफ़ लगे आरोपों को गुजरात की ६ करोड़ जनता को बदनाम करने की साजिश कहा है. मोदी ने २००२ के नरसंहार को ’एक क्रिया की प्रतिक्रिया’ कहा था, जब कि तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने गोआ के भाजपा अधिवेशन में मोदी सरकार की आलोचना यह कह कर की थी कि मोदी अपना राजधर्म भूल गए हैं.
जो मोदी करण थापर के टीवी चैट शो के बीच से तब भाग खडे हो गए जब उन्हें २००२ के नरसंहार के कारण धूमिल हुई उनकी छवि को सुधार ने लिए सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगने को कहा गया था, अब उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद १७ सितम्बर से तीन दिन का उपवास कर रहे हैं इस घोषित उद्देश्य के साथ की गुजरात में सद्भाव का वातावरण बने. अपने दस वर्ष के कार्यकाल में पहली बार मोदी ने जनता के नाम एक खुला पत्र भी लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत ने अब तक उठाए सभी विवादों का अंत कर दिया है और इसलिए वे अब समाज में सद्भावना अभियान चलाना चाहते हैं.
उनकी मुसलमान विरोधी छवि के कारण बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने मोदी को विधान सभा चुनाव प्रचार से दूर रखा था. राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के कई घटक दल मोदी के अतिवादी सांप्रदायिक तेवर के कारण उनसे कतराते रहे हैं. दूसरी ओर, भाजपा कई युवा नेता मोदी को भावी प्रधान मंत्री के रूप में प्रचारित कर रहे हैं. अब जब २००२ के नरसंहार में उनकी भूमिका का मामला निचली अदालत में चलाए जाने में एक लंबा समय लगने की संभावना है तब मोदी अपने आप को एक सेक्यूलर राष्ट्रीय नेता के रूप में साबित करना चाह रहे हैं. जब तक उन पर लगाए आरोप साबित या खारिज नहीं होते, साबरमती नदी में बहुत पानी बह चुका होगा और राष्ट्रीय राजनीति भी किसी अनिश्चित मोड़ पर पहुंच चुकी होगी.
भाजपा के वरिष्ट नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने भी मोदी की राष्ट्रीय राजनीति में संभावित भूमिका के बारे में अटकलों को यह कह कर बढावा दिया कि देश को मोदी जैसे बहु प्रतिभावान एवं प्रभावी नेता की आवश्यकता है. लेकिन गुजरात में मोदी की मौजूदा हालत नाजुक प्रतीत हो रही है. एक ओर जहां उनकी २००२ के नरसंहार में भूमिका को लेकर वरिष्ट पुलिस अधिकारी जैसे संजीव भट्ट, राहुल शर्मा और रजनीश राय ने हलफ़नामा देकर सवालिया निशान खड़े कर रखे हैं, जिसको निचली अदालत अनदेखा नहीं कर सकती, वहीं दूसरी ओर राज्यपाल श्रीमती कमला बेनीवाल द्वारा गुजरात उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश आर ए मेहता की लोकपाल के पद पर की गई नियुक्ति को राज्य सरकार द्वार चुनौती देने से मोदी पेंचीदी परिस्थिति में फ़ंस गए हैं.
लोकपाल के लिए पूर्व न्यायाधीश मेहता के नाम का सुझाव गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं दिया था. तदुपरांत, वर्तमान कानून में लोकपाल की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल को ही है, न कि राज्य के मुख्यमंत्री को. लोकपाल का पद पिछले सात साल से खाली पड़ा था जिसे मोदी सरकार ने अपनी आपत्ति जता कर भरने नहीं दिया था. इस पर उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के दाखिल करने पर, राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी करने के प्रयास किए जिसमें लोकपाल की नियुक्ति का अधिकार मुख्यमंत्री को दिए जाने का प्रावधान था. इस अध्यादेश पर राज्यपाल ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और तत्काल न्यायाधीश मेहता की नियुक्ति की घोषणा कर दी.
राज्यपाल द्वारा मेहता की नियुक्ति की घोषणा के दूसरे ही दिन मोदी सरकार ने लोकपाल कार्यालय पर ताला लगा दिया और उनकी नियुक्ति को उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी. उच्च न्यायालय ने इस मामले में राज्यपाल को प्रतिवादी बनाने से इनकार कर दिया और मोदी सरकार को एक नोटिस भेजी कि वह इस बात की सफ़ाई दे कि कैसे मोदी द्वारा प्रधान मंत्री को लिखा गया पत्र अखबारों तक पहुंच गया जिसमें मोदी ने न्यायाधीश मेहता के खिलाफ़ सरकार के प्रति द्वेषपूर्ण भावना रखने का आरोप लगाया गया था.
इस से पूर्व राज्य कोंग्रेस के एक प्रतिनिधि दल ने राष्ट्रपति को मिल कर मोदी सरकार के खिलाफ़ एक प्रतिवेदन दिया गया था जिसमें गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप थे. कोंग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने कई औद्योगिक घरानों को करोडों रुपए की जमीन माटी के मोल बेच दी है जिसमे सरकार को एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान पहुंचा है.
इन आरोपों की जांच लोकपाल न कर सके इस उद्देश्य से मोदी सरकार ने एक जांच आयोग की घोषणा कर दी. जब कोई जांच आयोग किसी मामले में जांच कर रहा हो उस परिस्थि्ति में लोकपाल उस पर कोई कार्रवाही नहीं कर सकता ऐसा लोकपाल कानून में प्रावधान है.
— (साभार : पीपुल्स डेली, सितम्बर १५,२०११ )
नचिकेता देसाई
१०/११७, अखबार नगर
अहमदाबाद – ३८० ०१३

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30 सितंबर, 2010 को अयोध्या विवाद के विषय में लखनऊ उच्च न्यायालय के फैसले के बाद देश ने राहत की सांस ली है। तीनों पक्षों को एक तिहाई – एक तिहाई भूमि बांटने के इस फैसले के कारण कोई भी पक्ष पूरी हार – जीत का दावा नहीं कर पाया। कोई खून-खराबा या उपद्रव इसलिए भी नहीं हुआ, क्योंकि देश की आम जनता इस विवाद से तंग आ चुकी है और इसको लेकर अब कोई बखेड़े, दंगों या मार-काट के पक्ष में नहीं है।
किन्तु इस फैसले से कोई पक्ष संतुष्ट नहीं है और यह तय है कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाएगा और इसमें कई साल और लग सकते हैं। इस विवाद का फैसला चाहे सर्वोच्च न्यायालय से हो चाहे आपसी समझौते से, किन्तु अब यह तय हो जाना चाहिए कि इसका व इस तरह के विवादों का फैसला सड़कों पर खून – खच्चर व मारकाट से नहीं होगा। ऐसा कोई नया विवाद नहीं उठाया जाएगा। धार्मिक कट्टरता और उन्माद फैलाने वाली फिरकापरस्त ताकतों को देश को बंधक बनाने, पीछे ले जाने और अपना उल्लू सीधा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
इस फैसले को लेकर कुछ चिन्ताजनक बातें हैं । एक तो यह कि इसमें जमीन एवं सम्पत्ति के मुकदमे को हल करने के लिए आस्था और धार्मिक विश्वास को आधार बनाया गया है, जो एक खतरनाक शुरुआत है। ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ की जिस रपट का इसमें सहारा लिया गया है, वह भी काफी विवादास्पद रही है।
दूसरी बात यह है कि 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद को तोड़ने की जो गुण्डागर्दी की गई, इसके दोषियों को अभी तक सजा नहीं मिली है। यह घटना करीब-करीब वैसी ही थी, जैसी अफगानिस्तान में तालिबान शासकों द्वारा बुद्ध की मूर्ति को तोड़ने की। यह भारत के संविधान के खिलाफ थी और भारत की विविधता वाली संस्कृति पर तथा इसकी धर्मनिरपेक्षता पर गहरी चोट थी। अडवाणी, सिंघल जैसे लोग इस फैसले के आने के बाद अपने इस अपराधिक कृत्य को फिर से उचित ठहरा रहे हैं। इस घटना के बाद देश में कई जगह दंगे हुए थे, किन्तु उनके दोषियों को भी अभी तक सजा नहीं मिली है। मुम्बई दंगों के बारे में श्रीकृष्ण आयोग की रपट पर भी कार्रवाई नहीं हुई है। इसी तरह से 1949 में मस्जिद परिसर में रातोंरात राम की मूर्ति रखने वालों को भी सजा नहीं मिली है। ऐसा ही चलता रहा तो भारत के अंदर इंसाफ पाने में अल्पसंख्यकों का भरोसा खतम होता जाएगा। इन घटनाओं से बहुसंख्यक कट्टरता और अल्पसंख्यक कट्टरता दोनों को बल मिल सकता है, जो भारत राष्ट्र के भविष्य के लिए खतरनाक है।
ऐसी हालत मे, समाजवादी जन परिषद देश के सभी लोगों और इस विवाद के सभी पक्षों से अपील करती है कि -
1. इस मौके की तरह आगे भी भविष्य में इस विवाद को न्यायालय से या आपसी समझौते से सुलझाने के रास्ते को ही मान्य किया जाए। यदि कोई आपसी समझौता नहीं होता है तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सभी मंजूर करें।
2. किसी भी हालत में इस विवाद या ऐसे अन्य विवादों को लेकर हिंसा, मारकाट, बलप्रयोग, नफरत व उन्माद फैलाने का काम न किया जाए। धार्मिक विवादों को लेकर राजनीति बंद की जाए। जो ऐसा करने की कोशिश करते हैं, उन्हें जनता मजबूती से ठुकराए।
3. मंदिर, मस्जिद या अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर कोई नया विवाद न खड़ा किया जाए। वर्ष 1993 में भारतीय संसद यह कानून बना चुकी है कि (अयोध्या विवाद को छोड़कर) भारत में धर्मस्थलों की जो स्थिति 15, अगस्त, 1947 को थी, उसे बरकरार रखा जाएगा। इस कानून का सभी सम्मान व पालन करें।
4. 6 दिसंबर, 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस, उसके बाद के दंगो तथा ऐसी अन्य हिंसा के दोषियों को शीघ्र सजा दी जाए।

लिंगराज सुनील सोमनाथ त्रिपाठी अजित झा
अध्यक्ष उपाध्यक्ष महामन्त्री मन्त्री

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हमने एक त्रिशिर राक्षस का वध किया है
कि अपनी देव-त्रयी को बींध दिया है
हमें नहीं मालूम

हमें नहीं मालूम
कि हम खुश हैं कि उदास
सुन्न पड़ गया है हमारा हृदय हठात्

दिशाओं से चलता हमारा दशानन संवाद
एक काली चुप्पी में बदल गया है
दसो दिशाओं में एक साथ दौड़ जाना चाहते हम
दिशाहीन ठिठके खड़े हैं
अपने छोट बच्चे के सामने

कौतुक से चमकती आँखों वाला हमारा छोटा बच्चा
जिसे हम छोड़ आये थे
कंधे पर बोरे का बुभुक्षित झोला लटकाये
बचपन-वंचित उन बच्चों से तनिक दूर
जो किसी के बच्चे नहीं हैं
दिनभर बीनते कुछ-न-कुछ कूड़े-कचरे के ढेरों में
ताकते सूनी-सूखी आँखों से तमाशा
जब हम चिल्लाते गुजरे थे बलिदानी-अभिमानी टोलियों में
रामलला हम आयेंगे
रामलला हम आयेंगे
मंदिर वहीं बनायेंगे….
बगैर विचारे कि क्या रामायण के अक्षर-घर से
मानस-मंदिर से
भव्य होगा कोई बासा
दिव्य होगा कोई आलय?
हम राम-भक्त थे किसी के लिए राम-विभक्त ?

आज हमारी झुकी-झुकी आँखों के सामने है
फटी-फटी आँखों वाला हमारा छोटा बच्चा
जितनी भी हमारे भीतर वहशत उससे कई गुना है जिसके भीतर दहशत
बेजुबां दहशत जिसकी खामोश चीख से भरी जा रही है पूरी दुनिया
शोर-शराबे से भरी दुनिया एक पल को स्तब्ध

अखबारों की सुर्खियाँ आज काले मोटे हर्फ भर नहीं हैं
सचमुच लिखी हैं लहू से
जिनके नीचे वे बस पंकिल पंक्तियां नहीं
खौफ़ और गम से फटती शिरायें हैं वतन की

और हम सोच नहीं पा रहे हैं कि ऐसा कैसे हुआ
कि हम जो अपनी करुणा के कपास से
ढँक देना चाहते थे सभ्यता के चौराहे पर भटकती
काली अनंगी हड़ीली देहें
इथियोपिया और सोमालिया की
विवस्त्र-त्रस्त कर बैठे अपने ही हाथों मातृभूमि को
लज्जित और लहूलुहान

एक बड़ के बहुत पुराने पितामह पेड़ को काट देने वाली
कुल्हाड़ियाँ हैं हमारी बाहें
धूप-शीत-सधे जिसके प्रचीन छतनार शीश को अब
कभी नहीं देख सकेंगी आँखें
अब हम जानते हैं हमारी उँगलियाँ मूँगफलियों की तरह
आसानी से तोड़ सकती हैं आदमियों को
और बादाम की तरह बगैर खास दिक्कत के
मकान-दर-मकान
लेकिन हमारी हथेलियाँ अब कब
सहला सकेंगी हमारे बच्चे के काँपते कपोल
सपने की नदी में उसके डूबने को
नींद के नभ में उड़ने में बदलती हुई ?

बेघर हो गया है जो हमारे अन्त:करण के गर्भगृह में
रमने वाला देवता
उसे कितने बरस का बनवास दिया है हमने
वह कब लौटेगा अपनी अयोध्या में ?

- ज्ञानेन्द्रपति
(दिसंबर ’९२ )

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हिन्दुस्तानी में कहावत है – खोदा पहाड़ निकली चुहिया – लम्बे तथा कठिन रियाज के बाद जब नतीजा अपेक्षतया बहुत कम निकलता है – उन हालात में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है ।
न्यायमूर्ती एम.एस. लिबर्हान ने १७ साल परिश्रम किया जिस दरमियान शुरुआती तीन माह की नियुक्ति के उनके कार्यकाल को ४० बार बढ़ाया गया , उन्होंने १०२९ पृष्टों की एक रिपोर्ट तैयार की जो उन तमाम हकीकतों और हालात का तफ़सील से ब्यौरा देती है जिनके के कारण १९९२ में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया । उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले नहीं है बल्कि स्पष्ट तथा बुलन्द हैं  : यह विध्वंस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था – ” यह एक संयुक्त उद्यम था “- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , विश्व हिन्दू परिषद ,शिव सेना तथा भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा यह षड़यन्त्र रचा गया था , इनमें से अन्त में उल्लिखित संगठन को रिपोर्ट ने सही ही आर.एस.एस का मोहरा बताया है ।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन निर्भीक तथ्यान्वेषणों के बावजूद जो सिफारिशें दी गई हुई हैं वे फुस्स अथवा कायराना हैं तथा उनका इन निष्कपट निष्कर्षों से कोई मेल नहीं बैठता । देश को साम्प्रदायिक महाविपदा के मुहाने पर ढकलने के लिए ६८ व्यक्तियों को दोषी पाए जाने के बावजूद  श्री लिब्रहान अब तक विध्वंस-मामले में आरोपित होने से बच रहे लोगों के खिलाफ़ आरोप दाखिल करने की संस्तुति नहीं करते हैं न ही वे आपराधिक कार्रवाई को तेजी से निपटाने की बात करते हैं ।
षड़यंत्र की बाबत  ’ संयुक्त उद्यम ’का जुमला बार – बार दोहराने की वजह से यह चौंकाने वाली बात लगती है । १९९९ में तत्कालीन युगोस्लाविया की बाबत टैडिक फैसले के बाद से सीधी भागीदारी न होने के बावजूद जिन लोगों ने जानबूझकर इन कृत्यों को बढ़ावा दिया हो तथा जो लोग इन कृत्यों में लिप्त संगठनों के शीर्ष पर होते हैं उन पर दायित्व डालने की अन्तर्राष्ट्रीय फौजदारी कानून में सामूहिक अपराधों के ऐसे मामलों की बाबत बाद के वर्षों में एक धारणा  विकसित हुई है ।
यदि श्री लिब्रहान ने अपनी सिफारिशों में इस विचार को लागू किया होता तथा इस बात पर जोर दिया होता कि राजनेता , पुलिस अफ़सर, और नौकरशाह जिस व्यापक दण्डाभाव का लाभ लेते आए हैं उस का अन्त हो तो यह मुल्क उनका एहसान मानता । परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है । धर्म तथा राजनीति को अलग रखने तथा अन्य कुछ अन्य ढीले ढाले सुझाव देने के उपरान्त , यह रिपोर्ट विध्वंस मामले में तात्कालिक न्याय सुनिश्चित करने अथवा देश को इस त्रासदी की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए संस्तुति देने से खुद को बचा ले गई है ।
शायद  श्री लिब्रहान अथवा उनके कमीशन की यह इतनी कमी नहीं है जितना हमारी पुलिस तथा न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था द्वारा उन्हीं नतीजों पर पहुंच कर फिर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करने की अक्षमता का दोष है ।
दसवें अध्याय में न्यायमूर्ति लिब्रहान सदोषता की बाबत एक निश्चयात्मक वक्तव्य देते हैं : ” किसी औचित्यपूर्ण सन्देह से परे यह स्थापित है कि यह ’संयुक्त-सामान्य-उद्यम’ विध्वंस की पूर्व नियोजित कार्रवाई थी जिसकी तात्कालिक रहनुमाई विनय कटियार , परमहंस रामचन्द्र दास , अशोक सिंघल , चम्पत राय , श्रीषचन्द दीक्षित , बी. पी. सिंघल तथा आचार्य गिरिराज कर रहे थे । यह सब मौके पर मौजूद नेता थे जिन्हें आर.एस.एस.एस द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित करना था । लालकृष्ण अडवाणी मुरली मनोहर जोशी तथा अन्य उनके स्थानापन्न दायित्व के कारण दोषमुक्त नहीं हैं वे भी आर.एस.एस. द्वारा निर्देशित भूमिका को स्वेच्छा से कबूले हुए सह-षड़यन्त्रकारी हैं । अयोध्या अभियान को उनका निश्चित समर्थन तथा दीर्घकाल तक चले  अभियान के निर्णायक चरण में उनकी सशरीर मौजूदगी से यह अकाट्य रूप से स्थापित हो चुका है ।
मेरा यह निष्कर्ष है कि आर.एस.एस. , भाजपा , विहिप , शिव सेना तथा उनके वे पदाधिकारी जिनका इस रिपोर्ट में नाम दिया गया है  ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मन्त्री कल्याण सिंह के साथ आपराधिक गठजोड़ स्थापित कर विवादित जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए एक ’संयुक्त-समान-उद्यम’(Joint Common Enterprise) स्थापित कर लिया था । उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल करने का काम किया तथा लोकतंत्र को नष्ट करने की सोची समझी कार्रवाई में लिप्त रहे । “
मस्जिद गिराया जाना , “धार्मिक , राजनैतिक , तथा भीड़-तंत्र के सर्वमन्दिरों को एक साथ समेटने वाले संगठित व सुनियोजित षड़यन्त्र का चरम बिन्दु था ” । न्यायमूर्ति लिबर्हान यह सही ही नोट किया कि, ” कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उन्हें सुरक्षित रखा जा सके एवं आगे के राजनैतिक इस्तेमाल के लिए उनकी सेक्युलर विश्वसनीयता को बचाये रखा जा सके । “इस प्रकार श्री अडवाणी और श्री जोशी इस दूसरे दर्जे के भाग रहे हों परन्तु वे भी राजनैतिक तथा कानूनी दायित्व से नहीं बच सकते , बावजूद इसके कि वे संघ परिवार द्वारा प्रदत्त ’मुमकिन इन्कार’ की ढाल से लैस हों ।
आज ,सत्रह साल बीत जाने के बाद , इस संयुक्त उद्यम में लिप्त कई अपराधी मर चुके हैं । परन्तु कई इस बिना पर फले फूले हैं कि वे कानून के ऊपर हैं । इस मुल्क के द्वारा न्यायमूर्ति लिबर्हान की इन सिफ़ारिशों के माध्यम से ’इस चूहे को निकालने के लिए ’ चाहे जितनी भी झूठी निन्दा हो , इस रपट में वह खजाना है जिसकी मदद से कोई ख्यातिनाम जाँच एजेन्सी ठोस षड़यन्त्र का मामला बना सकती है । ऐसे कई किरदार जिनकी स्मृति इस आयोग के समक्ष धूमिल हो गयी थी , नार्को विश्लेषण समेत पुलिस की पारंगत पूछताछ , के समक्ष ज्यादा देर न टिक पायें । उत्तर प्रदेश सरकार यदि गंभीर हो तो पूरक आरोप पत्र दाखिल कर सकती है तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के मामले को त्वरित-ट्रैक न्यायालय में ले जा सकती है ताकि आखिरकार न्याय हो सके ।

( मूल अंग्रेजी लेख )

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  मध्यप्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराजसिंह चौहान ने केन्द्र सरकार द्वारा बिजली पैदा करने के लिए जरूरी कोयले की आपूर्ति न किए जाने के विरुद्ध अपने प्रतिकार-कार्यक्रम को ‘कोयला सत्याग्रह’ कहा है । गांधी द्वारा इस औजार के प्रयोग की शताब्दी पूरी होने के बाद तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा ‘प्रात: स्मरणीयों’ में गांधी को शुमार किए जाने के करीब ३५ वर्षों बाद भाजपा के इस युवा मुख्यमन्त्री ने मालूम नहीं कितनी शिद्दत से गांधी को याद किया होगा ? यह गौरतलब है कि इस विचारधारा वाले इस प्रात: स्मरणीय की हत्या नहीं ‘वध’ का वर्णन करते हैं ।

     विधानसभा चुनाव में हाल ही में जनता ने शिवराजसिंह चौहान को साफ़ बहुमत दिया है । बहैसियत सूबे के मुख्यमन्त्री उन्होंने हम्मालों और मजदूरों की पंचायत भी आयोजित की । इनके ‘सत्याग्रहों’ और ‘पंचायतों’ से मुझे ‘७४ के दौर में बिहार के तत्कालीन मुख्यमन्त्री अब्दुल गफ़ूर के समर्थन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित भाड़े की रैलियों की याद आती है । एक तरफ़ सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन के मद्दे नजर राज्य सरकार द्वारा बस , स्टीमर बन्द किए जाने के बावजूद पूरे बिहार से लाखों की तादाद में छात्र-युवा-मजदूर-किसान कई किलोमीटर चौड़ी हुई पटना की गंगाजी को केले के तनों से बने बेडों पर बैठ कर पार कर जयप्रकाश की रैलियों में पहुँचते थे वहीं राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित भाकपा अथवा इन्दिरा ब्रिगेड के जनविहीन प्रदर्शनों में गुलाब जल और शरबत की व्यवस्था रहती थी ।

    यह वही दौर था जब नागार्जुन बाबा ने लिखा , ‘ अख़्तर हुसैन बन्द है पटना की जेल में , अब्दुल गफ़ूर मस्त है सत्ता के खेल में ‘। अख़्तर हुसैन छात्र-युवा-संघर्ष-समिति तथा लोहिया विचार मंच से जुड़े हमारे साथी थे और पुलिस की बर्बर पिटाई के बाद उनकी गिरफ़्तारी हुई थी ।

    पिछले एक पखवारे से दो साल पुराने निहायत फर्जी मुकदमों के तहत हरदा और होशंगाबाद जेलों में निरुद्ध समाजवादी जनपरिषद की प्रान्तीय उपाध्यक्ष साथी शमीम मोदी की गिरफ़्तारी के विरुद्ध दल द्वारा भोपाल में आयोजित प्रदर्शन में भाग लेने जब मैं भोपाल पहुँचा तब लगातार नागार्जुन बाबा की उक्त पंक्तियाँ दिमाग में कौंधती रहीं । अपनी नेता की रिहाई करने वाले जो आदिवासी , किसान , मजदूर और हम्माल वहाँ जुटे थे वे इस प्रान्त के सबसे कमजोर तबके के प्रतिनिधी थे । तम्बाकू से भरी अपनी चिलम को दगाने के लिए जो दियासलाई नहीं खरीदते हैं – चकमक पत्थर और सेमर की रूई का प्रयोग करते हैं । पूरा दिन पैदल चल कर अपने गाँव से रेलवे स्टेशन तक पहुँची महिलाएँ और न्यूनतम मजदूरी और काम के घण्टों को तय करने के लिए श्रम कानूनों को लागू करवाने की माँग कर रहे हम्माल और आरा मशीनों के मजदूर ।

जेल में जब तक चना रहेगा,आना-जाना बना रहेगा

जेल में जब तक चना रहेगा,आना-जाना बना रहेगा

 

 

 

 

 

 

 

 

गुलामी की कड़ी तोड़ो,तड़ातड़ हथकड़ी तोड़ो

गुलामी की कड़ी तोड़ो,तड़ातड़ हथकड़ी तोड़ो

फूलमती के अपहरण का फर्जी आरोप !

फूलमती के अपहरण का फर्जी आरोप !

९ फरवरी २००९ को हरदा के चन्द उद्योगपतियों और व्यापारियों ने जिला प्रशासन को ४८ घण्टे का अल्टीमेटम दे कर अनुराग और शमीम मोदी के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की थी । हम्मालों के लिए श्रम कानून लागू करने के बजाए शान्तिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से इसकी माँग करने वालों को २४ घण्टे बाद    जेल में बन्द कर दिया गया  ।
    शिवराजसिंह को ‘सत्याग्रह’ पसंद आया है । गाँधी से काफ़ी पहले हेनरी डेविड थोरो ने कहा था कि जिस राज्य में चहुँ ओर अन्याय व्याप्त हो वहाँ हर न्यायप्रिय व्यक्ति के लिए सर्वाधिक न्यायपूर्ण स्थान जेल ही हो सकती है। मुख्यमन्त्री के ‘सरकारी सत्याग्रह’ में पूरी राजधानी उठ कर बैतूल जिले के पाथाखेड़ा पहुँच गयी थी । सरकारी अफ़सरों की फौज ‘सत्याग्रहियों’ की सेवा में जुटी हुई थी । अब्दुल गफ़ूर के समर्थन में भाकपा की रैलियों की भांति ।
    शमीम पर अपहरण , हत्या के इरादे से मारपीट , घातक हथियारों से हमला , जान से मारने की धमकी और डकैती जैसी गंभीर आपराधिक धाराएं लगायी गयी हैं। हमारा अ-सरकारी सत्याग्रह इसलिए असरकारी हो गया था कि तथाकथित आरोपों की शिकार फूलमती भी आन्दोलन में शामिल थी । सूबे के गृह मन्त्री के समक्ष भी उसने वस्तुस्थिति का बयान किया ।
  शमीम पर लगाये गये प्रकरणों की बाबत निम्न तथ्य गौरतलब हैं :
  1. म.प्र उच्च न्यायालय के मुख्य न्या्याधीश श्री ए.के पटनायक ने ३० जुलाई २००७ को अपने सामने शमीम द्वारा कथित तौर पर अपहृत महिलाओं के बयान लिए,जिसमें उन्होंने रेंजर के अत्याचारों की बाबत स्पष्ट बताया । उच्च न्यायालय के निर्देश पर उनका मेडिकल परीक्षण एवं इलाज कराया गया ।
  2. दो दिन पहले की घटना में जिन आदिवासियों को भड़काने का आरोप शमीम पर लगाया गया है , दो दिन बाद उन्हीं आदिवासियों का अपहरण वे कैसे कर सकती हैं ? अपहृत व्यक्तियों अथवा उनके स्वजनों द्वारा कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई गई है ।
  3. उच्च न्यायालय द्वारा उक्त गाँव में रेंजर द्वारा अपनी बन्दूक से गोली चलाने की पुष्टि सागर की फोरेन्सिक प्रयोगशाला में हुई है ।
     दरअसल २००३ में शमीम ने जबलपुर उच्च न्यायालय में बैतूल के वनक्षेत्रों में अवैध उत्खनन , आदिवासियों के घरों में आग लगाने के मामले दायर किए थे और खुद पैरवी की थी । माननीय उच्च न्यायालय ने इनमें जाँच , कार्रवाई ,मुआवजे और भर्त्सना के महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं ।
    समाजवादी जनपरिषद ‘वोट’ ( संसदीय लोकतंत्र ) , ‘फावड़ा’ ( रचनात्मक कार्यक्रम ) तथा ‘जेल’ (सिविल नाफरमानी द्वारा संघर्ष ) – डॉ. लोहिया के बताये इन त्रिविध उपायों में न सिर्फ यकीन रखती है अपितु उन्हें अपनी राजनीति द्वारा लागू करती है । शिवराज सिंह की चुनी हुई सरकार को महात्मा गांधी द्वारा लिखी गयी तथा गांधीजी की हिन्दी पत्रिका ‘हरिजनसेवक’ के सम्पादक मध्यप्रदेश के सपूत स्वर्गीय काशीनाथ त्रिवेदी द्वारा अनुदित पुस्तिका ‘रचनात्मक कार्यक्रम : उसका रहस्य और स्थान’ से इस उद्धरण की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ । सत्याग्रह की मूल शक्ति कहाँ अवस्थित है इसका अन्दाज शायद उन्हें लग जाएगा : -
   हम एक अरसेसे इस बात को मानने के आदी बन गये हैं कि आम जनताको सत्ता या हुकूमत सिर्फ धारासभाओंके (विधायिका)    जरिए मिलती है । इस खयाल को मैं अपने लोगोंकी एक गंभीर भूल मानता रहा हूँ । इस भ्रम या भूल की वजह या तो हमारी जड़ता है या वह मोहिनी है , जो अंग्रेजोंके रीति-रिवाजोंने हम पर डाल रखी है । अंग्रेज जातिके इतिहासके छिछले या ऊपर-ऊपरके अध्ययनसे हमने यह समझ लिया है कि सत्ता शासन-तंत्रकी सबसे बड़ी संस्था पार्लमेण्टसे छनकर जनता तक पहुँचती है । सच बात यह है कि हुकूमत या सत्ता जनता के बीच रहती है ,जनता की होती है और जनता समय-समय पर अपने प्रतिनिधियोंकी हैसियतसे जिनको पसंद करती है , उनको उतने समय के लिए उसे सौंप देती है । यही क्यों , जनतासे भिन्न या स्वतंत्र पार्लमेण्टों की सत्ता तो ठीक , हस्ती तक नहीं होती । सत्ता का असली भण्डार या खजाना तो सत्याग्रहकी या सविनय कानून-भंग की शक्ति में है ।”(मो.क.गाँधी,रचनात्मक कार्यक्रम ,पृष्ट १० – ११ )

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  हिन्दुस्तान लौटने के बाद खिलाफ़त आन्दोलन में साथ दे कर गांधीजी ने राष्ट्रीय स्तर पर कौमी एकता स्थापित करने का प्रथम प्रयास किया था । खुद को आदर्शोन्मुख व्यवहारवादी गिनवाने वाले गांधीजी ने राष्ट्रीय स्तर पर यथासंभव व्यावहारिक बनने का प्रयास किया था । ऐसा करने में उन्होंने स्तुति व निन्दा , लोकप्रियता व अप्रियता दोनों ग्रहण किए थे । इस आन्दोलन के कारण ही कुछ लोग उनके जीवनभर के दोस्त बने तथा अन्य कुछ लोगों ने उन्हें दुश्मन माना था।

    खिलाफ़त आन्दोलन गांधी ने शुरु नहीं किया था । इस आन्दोलन का प्रमुख कारण अन्तर्राष्ट्रीय था । प्रथम महायुद्ध शुरु हुआ तब हिन्द के मुसलमानों को न छेड़ने और युद्ध-प्रयासों में उनकी मदद की अपेक्षा से ब्रिटिश सरकार ने अपनी मुसलिम प्रजा को सम्बोधित एक गंभीर घोषणा की थी , जिसमें कहा गया था कि : युद्ध तो उसकी इच्छा न होने के बावजूद ऑटॉमन सरकार(तुर्की) ने उस पर लादा है। घोषणा में आगे कहा गया था कि अरबिस्तान तथा मेसोपोटामिया के मुस्लिम धार्मिक स्थलों और जेद्दाह के बंदरगाह पर हरगिज़ आक्रमण नहीं किया जाएगा । हज करने वाले यात्रियों को कोई दिक्कत आने न दी जाएगी । ब्रिटिश प्रधान मन्त्री लॉयड जॉर्ज ने कहा था कि साथी देश तुर्की को एशिया माइनर की उसकी भूमि से उसे वंचित नहीं करेगे । अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी इस घोषणा को समर्थन दिया था । इससे हिन्दुस्तान के मुसलमानों को भरोसा था कि तुर्की की आज़ादी बची रहेगी । युद्ध के बाद की संधि में विजेता राष्ट्रों ने तुर्की के इलाकों की बन्दर बाँट की तथा सुल्तान के अधिकारों को सीमित करते हुए साथी देशों द्वारा नामित हाई कमिशनरों के मार्गदर्शन के तहत रखा गया ।

    खुले वचन भंग की इस संधि से हिन्द के मुसलमानों को जबरदस्त निराशा हुई ,जो स्वाभाविक थी । इसके अलावा खिलाफ़त आन्दोलन शुरु करने के पीछे हिन्द के मुसलिम नेतृत्व के मन में एक और महत्वपूर्ण कारण था – वे चाहते थे कि हिन्द के मुसलमानों में राष्ट्रीय अस्मिता का भाव जागृत हो । हिन्द के तमाम मुसलिम किसी एक अखंडित विचार या संस्कार के नहीं थे । उनमें कई मतभेद तथा खास कर नेताओं की स्पर्धा के कारण पैदा किए गए भेद थे । उनकी ज्यादातर संस्थायें धार्मिक थी । पश्चिमी शिक्षा प्राप्त तथा उलेमाओं से मदरसों में तालीम प्राप्त लोगों में खूब फरक था । ज्यादातर धार्मिक संस्था सरकार के प्रति नरम थी लेकिन देवबन्द के दारुल उलूम सरकार विरोधी रुझान वाली थी।  पढे लिखों में अलीगढ़ मुसलिम युनिवर्सिटी के पढ़े तरुण , उनके प्राध्यापक और प्रशासक पश्चिमी रुझान वाले थे। पश्चिमी तालीमयाफ़्ता ज्यादातर शहरों में थे और सरकारी नौकरियों में भी। मुसलमानों का विशाल समुदाय तो किसान , कारीगर तथा छोटे व्यापारी थे ।

   भारतीय मुसलमानों के सबसे महान समाज सुधारक सर सैय्यद ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्थापना की । अलीगढ विश्वविद्यालय ही नहीं ‘ अलीगढ़ तहरीक ‘ मानी जाती थी । खिलाफ़त आन्दोलन शुरु होने के पूर्व तीन साप्ताहिकों ने हिन्द के मुसलमानों पर जबरदस्त असर  डालअना शुरु किया था । मोहम्मद अली कलकत्ते से कॉमरेड ,कलकत्ते से ही मौलाना अबुल कलाम आज़ाद अलहिलाल  तथा लाहौर से जफ़र अली खां जमींदार निकालते थे ।

    खिलाफ़त आन्दोलन के प्रमुख नेता अली बन्धु , डॉ. अंसारी ,मौलाना हसरत मोहानी  और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद प्रमुख थे । गांधी की तरह ये सभी धार्मिक रुझान वाले थे , नेहरू और जिन्ना की तरह अधार्मिक सेक्युलर नहीं थे । मुस्लिम लीग उस समय मात्र अमीर और पढ़े लिखों की संस्था थी।हांलाकि खिलाफ़त आन्दोलन के समर्थन में उन्होंने भी प्रस्ताव पास किया था लेकिन उसकी शाखायें और समितियां इसमें सक्रिय नहीं थीं। खिलाफ़त की शुरुआत में माना गया था कि तीन मार्ग मुसलमानों के लिए खुले हैं (१) खून खराबा (२) पूरी कौम की हिजरत (३) असहयोग । पहले दो विकल्प न ग्रहण करने के पीछे गांधी का प्रमुख योगदान था । इस दौर में अली बन्धुओं की माता आबेद बानु बेगम ने स्त्री जागृति का महत्वपूर्ण काम किया ।वे खुद पर्दा नशीं थी लेकिन खिलाफ़त की मीटिंगों में पहुंच कर पर्दा निकाल देतीं और कहती,’तुम सब मेरे बेटों की तरह हो तुम्हारे सामने कैसा परदा?’ बाद में अली बन्धुओं की गिरफ़्तारी के बाद शौकत अली की पत्नी भी सक्रिय हुईं । ६ अप्रैल १९१९ के दिन रॉलेट कानून के खिलाफ़ जब देशव्यापी हड़ताल हुई तब मुम्बई की दो मस्जिदों में श्रीमती सरोजिनी नायडू को बुलाया गया ।

   खिलाफ़त के माध्यम से गांधी गरीब मुसलमानों तक पहुंचे और उन्हें सक्रिय बनाया ।

  

   कॉग्रेस और खिलाफ़त कमिटी की संयुक्त बैठक में एक तरफ़ श्रीमती एनी बेसेण्ट तथा महामना मालवीय तथा दूसरी तरफ़ शौकत अली थे । उन लोगों ने कहा कि अभी विचार करने के लिए वक्त दीजिए , इन लोगों ने कहा कि कब तक इन्तेज़ार किया जाएगा । हसरत मोहानी ने यह कह कर धमाका कर दिया कि अफ़गानिस्तान के अमीर यदि ब्रिटिश सरकार पर हमला करते हैम तो मैं उनका साथ दूंगा । गांधी ने मुसलिम नेताओं से अहिंसक असहयोग की शपथ ली थी और कहा था कि इसका उल्लंघन हुआ तो मैं अलग हट जाऊंगा । इस आधार पर उन्होंने खिलाफ़त आन्दोलन के मुसलमानों का समर्थन किया । यह सच्चाई कहीं दबाई नहीं गई है ,उस दौर की बाबत लिखी तमाम इतिहास की किताबों में मिलती हैं । (मिनोल्ट गेईल की The Khilafat Movement , पृष्ट ९९,उक्त पुस्तक में गृह विभाग के दस्तावेज से लिया गया,राष्ट्रीय अभिलेखागार,नई दिल्ली से) । खिलाफ़त के मुसलिम नेताओं पर आरोप तब भी लगते थे जिनकी बाबत गांधी ने कहा था , ‘ वे द्वेष मुक्त हैं यह मैं नहीं कहता ,परन्तु उनके द्वेषभाव के साथ मेरा प्रेम भाव मिलाने पर द्वेष भाव का वेग मैं कम कर दे रहा हूं यह मुझे यकीन है।’ ( गांधी शिक्षण -भाग १०,पृ ८)

     ” मैं मुसलमान पहले हूं फिर हिन्दुस्तानी हूँ(मोहम्मद अली) इसका मैं बचाव करता हूँ।क्योंकि मैं भी तो यह कहने वाला हूँ कि पहले हिन्दू हूं इसीलिए सच्चा हिन्दुस्तानी हूं ।”(महादेव भाईनी डायरी ,भाग ६,पृ- ४३६-४३७)

    [ इस विषय पर यदि पाठक रुचि लेंगे तो नारायण देसाई की ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी पुरस्कार प्राप्त किताब 'मारूं जीवन एज मारी वाणी' के सम्बन्धित अध्याय का पूरा अनुवाद कर पेश किया जाएगा। खिलाफ़त आन्दोलन के नेताओं के बारे में विस्तार से चर्चा की जा सकती है ]

[ बिना दोहराये पोस्ट कर रहा हूं ]

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‘ यह सिर्फ अफवाह ही हो सकती है कि सुबह नहीं होगी । ‘ इस सुस्पष्ट हकीकत को बयान करने की जरूरत क्यों पड़ी थी । अफवाह और अफवाह फैलाने वालों की विशिष्टता को समझाने के लिए कवि-मित्र राजेन्द्र राजन द्वारा २४ साल पहले हमारे चुनावी परचे में लिखा गया यह वाक्य कितना प्रभावी था ! एक निश्चित अवधि के बाद हर अफवाह अपने आप गलत साबित हो जाती है । परन्तु उस छोटी अवधि में टिके रहने के लिए भी हर अफवाह को किसी अर्धसत्य अथवा सत्यांश की आवश्यकता होती है । अर्धसत्य अफवाहों को भरोसेमन्द बनाते हैं ।

हमारे देश में फैल जाने वाली कुछ प्रसिद्ध अफवाहों और उन से जुड़े अर्धसत्य पर गौर करें । आपातकाल की गिरफ्तारी के दौरान लोकनायक जयप्रकाश के गुर्दे खराब हो गये थे इसलिए उन्हें डाइलिसिस पर रहना पड़ता था । उनकी मृत्यु की अफवाह ऐसी फैली कि तत्कालीन प्रधान मन्त्री मोरारजी देसाई ने लोकसभा में इसकी घोषणा भी कर दी थी ।

संजय गांधी की मौत हवाई जहाज उड़ाते वक्त दुर्घटना में हुई थी । तब टेलिविजन और एस.टी.डी की सुविधा आज जितनी व्यापक नहीं थी । अफवाह यह उड़ी कि दुर्घटना स्थल पर श्रीमती इन्दिरा गांधी पहुंची और उन्होंने संजय की जेब से एक चाभी निकाल ली । कांग्रेस पारटी में एक खानदान के प्रभुत्व की बात हकीकत है । इसलिए खानदान के एक सदस्य की मौत पर दूसरी सदस्य द्वारा चाभी हासिल करने की अफवाह चल पाई ।

कश्मीर घाटी में थोक में मन्दिरों को तोड़े जाने की अफवाह याद कीजिए । काश्मीरियत का सवाल ‘हिन्दू बनाम मुस्लिम का सवाल’ बने इसके लिए अलगाववादी आतंकी और शेष भारत में फैले फिरकापरस्त संगठन दोनों ही उन दिनों तत्पर थे । वरिष्ट पत्रकार बी.जी. वर्गीज को एक जाँच कर ठोस खण्डन वाली रपट जारी करनी पड़ी थी ।

गणेशजी की प्रतिमाओं के दूध पीने की घटना याद कीजिए । व्यापक अंधविश्वास और भौतिकीय तथ्य के आधार पर यह अफवाह फैलने में कितनी सफल हुई थी ।

गद्दारों के इतिहास और राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवाद की विचारधारा वाले समूह का प्रमुख औजार झू्ठ और अफवाहें फैलाना है । तानाशाही , संकीर्ण राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता की उनकी मुहिम के साथ – साथ उनके संकीर्ण ‘हिन्दू राष्ट्र’ की अवधारणा में वर्णाधारित – पुरुषसत्तात्मक समाज का अक्स दिखाई देता है । इस विचारधारा के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता , जातिविहीन समाज और स्त्री-पुरुष समता के मूल्य सबसे बड़ा खतरा होते हैं । भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में न सिर्फ भाग न लेने अपितु उसका विरोध करने और अंग्रेजों का साथ देने के धब्बे से त्रस्त हो कर राष्ट्र की मुख्यधारा के आन्दोलन पर कीचड़ उछालने के प्रयास के सिवा उनके पास दंगे कराना रह जाता है ।

अनूप शुक्ल , तरुण ,विष्णु बैरागी , विवेक सिंह , रौशन जैसे कुछ प्रिय चिट्ठेकारों को एक पोस्ट पर उद्वेलित होता देख कर इतिहास को तोड़ने – मरोड़ने अथवा ‘लुंज-पुंज सोच की वजह से अन्तिम मन बिना बने ही’ प्रकाशित की गयी घटनाओं पर कुछ कहने जा रहा हूँ ।

घटनाओं पर आने के पहले कुछ सामान्य बातों पर गौर करें । जब हम पिछली शताब्दी की घटनाओं का हवाला देते हैं तब हमें तिथि , स्थान , समाचारपत्र अथवा राष्ट्रीय अभिलेखागार जैसे स्रोतों तथा तथ्यों का उल्लेख जरूर करना चाहिए । १९९२ में एक सज्जन ने दावा किया कि गांधी बाबरी मस्जिद के स्थान पर रामजनमभूमि के हक में थे । गांधी के कॉपीराइट के अधिकारी नवजीवन प्रकाशन ,अहमदाबाद के अधिकारियों ने प्रेस को बुला कर उस झूठे दावे का खण्डन कर दिया । तब मैंने हिन्दू धर्म की इन दो धाराओं के उस संघर्ष की कुछ घटनाओं का हवाला देते हुए एक लेख लिखा । ‘धर्मयुग’ के तत्कालीन सम्पादक ने लेख प्रकाशित करने की स्वीकृति वाले पत्र में लिखा कि गांधीजी के उद्धरणों से सन्दर्भों की अच्छी तरह पुष्टि कर ली जाए । मैंने सन्दर्भ ढंग से दिए थे लेकिन सम्पादक के कहने की वजह से इसका महत्व समझ में आया ।

यह उल्लेखनीय है कि यह समूह अपने पूज्य ‘गुरुजी’ गोलवलकर की लिखी पुस्तक को भी किसी अन्य पुस्तक का अनुवाद होने तथा मौलिक न होने की बात कहने लगे हैं ।

अब आइए उक्त पोस्ट तथा उस पर आई एक टिप्पणी पर

राष्ट्रीय नारे

खिलाफत ( यह नाम ‘मुखालफ़त शब्द से नही खलीफ़ा से आया है ) और असहयोग आन्दोलन के दौरान प्रयुक्त नारों की बाबत अपने अखबार यंग इण्डिया के ८ सितम्बर , १९२० , पृष्ट ६ पर गांधी ने एक लेख लिखा । उन्होंने उस लेख में सुझाव दिया कि नारे आदर्शों पर केन्द्रित हों व्यक्तियों पर नहीं । उन्होंने श्रोताओं से कहा कि , ‘महात्मा गांधी की जय’ तथा ‘ मोहम्मद अली-शौकत अली की जय’ नारे के स्थान पर ‘हिन्दू-मुस्लिम की जय’ लगे ।उसी लेख में गांधी बताते हैं कि उसी दौरे ( मद्रास दौरे में बेजवाड़ा में ) भाई शौकत अली ने नारों की बाबत सकारात्मक तरीके से एक नियम पेश किया । ‘ उन्होंने गौर किया यदि हिन्दू ‘ वन्दे मातरम’ का नारा लगाते हैं और मुस्लिम ‘अल्लाह-ओ-अक़बर’ तो यह कानों में चुभता है और लगता है कि एक मन से नारा नहीं लगाया गया ।इसलिए तीन नारों को मान्यता दी जानी चाहिए जिन्हें हिन्दू-मुस्लिम मिलकर सहर्ष लगायें । (१) ‘अल्लाह-ओ-अक़बर’ अर्थात ईश्वर ही श्रेष्ट है , (२) वन्दे मातरम ( मातृभूमि की जय ) अथवा भारतमाता की जय तथा (३) हिन्दू-मुसलमान की जय जिसके बिना भारत की जय संभव नहीं है तथा ईश्वर की श्रेष्टता का सच्चा प्रदर्शन नहीं हो सकता। यह सभी नारे अर्थपूर्ण हैं । पहला अपनी क्षुद्रता कबूल करने तथा इस प्रकार विनय प्रकट करने की प्रार्थना है । हिन्दू इन अरबी अल्फ़ाज़ से संकोच नहीं करेंगे जिनके माएने न सिर्फ पूर्णरूपेण अनाक्रामक हैं अपितु विनम्र बनाने वाला है । ईश्वर किसी ज़बान विशेष की तरफ़दारी नहीं नहीं करता । ‘वन्दे मातरम’ अपने उत्कृष्ट इतिहास के अलावा एकमेव राष्ट्रीय आकांक्षा का प्रतीक है – भारत को सर्वोच्च उत्थान मिले – इसका । मैं (गांधी) ‘भारतमाता की जय’ की तुलना में ‘वन्दे मातरम’ पसंद करता हूं चूँकि यह बंगाल की बौद्धिक और भावनात्मक श्रेष्टता का प्रतीक है । हिन्दू-मुस्लिम एकता के बिना भारत कुछ नहीं बन सकता इसलिए हम इसे कभी न भूलें ।

‘ इन नारों को लगाने में असंगति नहीं प्रकट होनी चाहिए । इनमें से कोई नारा किसीनी लगाया तो अन्य लोगों को उसे पूरा करना चाहिए न कि अपने प्संदीदा को चीख कर लगाने के बाद अन्य को दबाने की कोशिश । जिन्हें इच्छा नहीं है वे न लगायें लेकिन नारा लग जाने के बाद मनमानापन तहज़ीब का उल्लंघन माना जाना चाहिए ।

विभाजन के बाद के कौमी हुल्लड़ों के दौर में गांधी प्रार्थना सभाओं से वन्दे मातरम के शुरु होते ही बहिष्कार से ज्यादा योजनाबद्ध तरीके से कुरान की आयतों के पाठ पूर्व होने वाला बहिष्कार था । इस वजह से गांधी जी ने प्रार्थना पूर्व भाग लेने वालों से कुरान-पाक के पाठ पर आपत्ति के बारे में पूछना शुरु किया ।

वन्दे मातरम के प्रथम दो छन्द राष्ट्रगान के रूप में मान्य किया गया है । आगे के अनुच्छेद में ‘ माँ’  ‘तुमी दुर्गा’ हो जाती हैं जिन पर आपत्ति की जाती है ।

[ अगली किश्तों में अफ़गान अमीर का साथ , जिन्ना बनाम अली बन्धु ]

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कुश के चिट्ठे पर हमारे मित्र संजय बेंगाणी ( जिनसे हमारी भी कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है) ने कहा -

अफ्लातुनजी से व्यक्तिगत कोई शिकायत नहीं, हम में मित्रता है. उन्हे मैं बताना चाहुंगा की आतंकवादियों में और हिन्दु संगठनो में जो सबसे बड़ा फर्क है वह है भारत के प्रति निष्ठा. अगर आपको यह नजर नहीं आता तो क्या कहें! :)

हमें इन हिन्दू संगठनों की भारत के प्रति निष्ठा भी राष्ट्रतोड़क लगती है । देश में फैली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में भगवा झंडे को हिंदू राष्ट्र के ध्वज के रूप में सलाम करने की सीख दी जाती है और अबोध बच्चों को यह बताया जाता है कि सिर्फ हिंदू ही इस राष्ट्र के असली नागरिक हैं । दूसरे धर्म वालों के खिलाफ़ नफ़रत भरी जाती है । इक़बाल के गीत में कहा गया है कि , ‘ सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा,हम बुलबुलें हैं इसकी,यह गुलिस्तां हमारा’ । इन शाखाओं में प्रचलित इसी तर्ज के एक गाने में कहा गया है , ‘ उन बुलबुलों को कह दो कहीं और चमन ढूँढें ‘ । यह स्पष्ट रूप से गैर हिन्दुओं को देश छोड़ने को कहना है । अगर देश के करोड़ों बच्चों के मन में इस तरह का जहर भर दिया गया तो हमारा राष्ट्र क्या बनेगा ?

    कुछ ही दिन पहले संजय , जिनका पूर्वोत्तर से विशेष नाता है ने काश्मीर से तुलना करते हुए वहाँ अन्य प्रान्तों के नागरिकों को जमीन खरीदने पर रोक आदि का जिक्र किया था। हमने संजय  से गुजरात ( जहाँ वे रहते हैं ) में आदिवासी की जमीन खरीद सकते हैं ,क्या ? - यह सवाल किया था। गुजरात के इस प्रगतिशील भूमि सुधार कानून को यदि वे समझ लेते तब शायद पूर्वोत्तर की बात भी समझ पाते । परन्तु वे महटिया गए ।

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राष्ट्र की हिटलरी कल्पना फासीवाद के नाम से कुख्यात है । हिटलर ने ‘नस्ल’ की कथित शुद्धता और यहूदी विद्वेष की विक्षिप्तता को फैलाकर जर्मनी को भीषण बर्बरता और रक्तपात में डुबो दिया और विश्व भर की लांछना का पात्र बना दिया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का धर्म आधारित राष्ट्र भी उसी प्रकार का एक बर्बर उद्देश्य है । हिटलर से तुलना करके या हिटलर का उदाहरण देकर हम संघ-परिवार पर कोई काल्पनिक आरोप नहीं लगा रहे हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गौरव-पुरुष गुरु गोलवलकर ने खुद १९३९ में लिखी अपनी पुस्तक ‘ वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड ‘ ( हम या हमारी राष्ट्रीयता परिभाषित ) ( अब उनके चेले अधिकृत रूप से कहने लगे हैं कि यह उनकी लिखी किताब नहीं है , उनका अनुवाद है ) में कहा था -

नस्ल और इसकी संस्कृति की पवित्रता को बनाए रखने के लिए जर्मनी ने यहूदियों से अपने देश को रिक्त कर दुनिया को स्तम्भित कर दिया । नस्ल का गर्व यहाँ अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पाता है। जर्मनी ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि संस्कृतियों और नस्लों के फर्क जो बुनियाद तक जाते हैं , एक संपूर्ण इकाई में जज़्ब नहीं किए जा सकते । हम भारतीयों के लिए यह एक अच्छा सबक है जिससे लाभ उठाना चाहिए । “

    यह सचमुच बड़े शर्म की बात है कि जिस विद्वेष और क्रूरता के लिए हिटलर का जर्मनी पूरी दुनिया में लांछित हुआ , गोलवलकर ने ने उसी की प्रशंसा की और भारत के लिए उसी हिटलरी रास्ते की सिफारिश की । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुरु गोलवलकर के बताए हुए फासीवाद के रास्ते पर चल रहा है । वह जिस हिन्दू राष्ट्र की बात करता है , वह सिर्फ मुस्लिम विद्वेष तक सीमित नहीं है । स्त्रियों और शूद्र कही जाने वाली जातियों , जिन्हें सबसे अधिक धर्माचार्यों द्वारा अनुमोदित क्रूर प्रथाओं और परम्परागत ऊँच-नीच का शिकार होना पड़ा है , की दुर्दशा कम होने के बजाए , धर्म आधारित राष्ट्र में काफ़ी बढ़ जाएगी । सती प्रथा और बाल-विवाह पर रोक सम्बन्धी कानून हटाने और वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने की मांग धर्म-संसद के प्रस्तावों में होने लगी थीं । स्त्रियों को सम्पत्ति में हक देने वाले हिन्दू कोड बिल का भी गोलवलकर ने विरोध किया था ।

   इसलिए यदि आप कूप मंडूकता , धर्मान्धता , स्त्री उत्पीड़न और दलितों तथा पिछड़ों की सामाजिक दुर्दशा को देश की नियति नहीं बनाना चाहते तो हिन्दू राष्ट्र के नारे से सतर्क रहे। हम किस प्रकार पूजा पाठ करें , त्योहार किस ढंग से मनाएं , धार्मिक प्रतीकों का क्या अर्थ ग्रहण करें और दूसरे धर्म के अनुयायियों के साथ क्या व्यवहार करें , इन बातों को संघ परिवार और महंत मठाधीश नियंत्रित करनी की कोशिश करते हैं । इनके चलते हमारे धार्मिक आचरण की स्वाधीनता सुरक्षित नहीं है । ऐसे तत्वों को धार्मिक मान्यता और राजनैतिक समर्थन देना बन्द करें नहीं तो ये हमें एक अन्धी सुरंग में पहुंचा देंगे ।

    दुनिया के कई धर्म आधारित राष्ट्रों में जनता का उत्पीड़न और रुदन हमसे छिपा नहीं है। धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के बारे में हम जानते हैं कि इस्लामियत के नाम पर कैसे कठमुल्लों , सामन्तों , फौजी अफसरों , भ्रष्ट नेताओं और असामाजिक तत्वों का वह चारागाह बन गया है । क्या हम भारत में भी उसी दुष्चक्र को स्थापित करना चाहता हैं ? धर्म आधारित राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी अवधारणा है । किसी धर्म आधारित राष्ट्र में लोकतंत्र कभी पनप नहीं सकता । संविधान , न्यायपालिका , और प्रेस का हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर अपमान कट्टरपंथियों के लोकतंत्र विरोधी रुख की ही बानगी है । गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

[ दोनों चित्रों का स्रोत :  विकीपीडिया ]

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