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Archive for the ‘journalism’ Category

15 अगस्त 2006 को ‘समाजवादी जनपरिषद’ नाम से ब्लागर पर हिन्दी चिट्ठा शुरु किया था । 14 दिनों बाद ही लगा कि निजी कम्पनी(गूगल) पर पूरी तरह आश्रित होना ठीक नहीं । सो , ‘ओपन सोर्स’ में यकीन रखने वाले वर्डप्रेस पर भी आ गया । नेट पर देवनागरी टंकण सीखने के पहले दिसम्बर 2003  में अंग्रेजी चिट्ठा बना लिया था ।
यह मेरी हिन्दी चिट्ठे की पहली पोस्ट  है । उस वक्त हिन्दी चिट्ठों की नई पोस्ट दिखाने के लिए एक मात्र संकलक या एग्रीगेटर ’नारद’ था। मेरे चिट्ठों को नारद से जोडने में चार महीने लगे। इन चार महीनों में भूले भटके पाठक ही पहुंचते थे। कुछ दोस्तों ने अपने चिट्ठों पर लिंक दी थी , उनसे कुछ पाठक पहुंच जाते थे। साल भर पूरा किया तो उस वक्त के धुरंधर चिट्ठेकारों से भरपूर प्रोत्साहन मिला ।
वर्डप्रेस अपने ब्लगर्स को काफी तफसील में आंकडे देता है । दो साल पूरा होने पर मैंने इन आंकडों को प्रस्तुत किया -  इन्हें
१५ अगस्त की तारीख चुनने के पीछे १९४२ की एक शहादत की स्मृति थी ।

हिन्दी चिट्ठों की प्रविष्टियों को दिखाने वाला दूसरे संकलक चिट्ठाजगत और ब्लागवाणी भी आए और चले गये । संकलकों पर आश्रित हिन्दी चिट्ठेकारी का भारी नुकसान इनके बन्द हो जाने से हुआ । अपने चिट्ठों में नित्य-नूतन प्रविष्टियां डालने में जो सातत्य था वह टूटा ।लोग अपने ब्लागों पर जितना लिखते थे और जितनी गंभीरता से लिखते थे वह कम हो गया है। बने बनाये आकर्षक स्वरूप वाले फेसबुक ने रही-सही कसर पूरी कर दी है । फेसबुक पर छपी कृतियों पर लेखक का नहीं फेसबुक का हक हो जाता है – यह चिन्ता की बात है । फेसबुक के हिन्दी सदस्यों में समुदाय या समूह विकसित नहीं हुए हैं । मराठी में फेसबुक पर ‘अस्वस्थ भारत’ जैसे पृष्ट पर अच्छी बहस भी चलती है ।

हिन्दी लिखने वाले तरुण मित्रों से मेरी हार्दिक गुजारिश है कि वे चिट्ठेकारी अथवा ब्लागिंग से जुडें और उन पर सतत लिखें । पुराने ब्लागर मित्रों से भी निवेदन कर रहा हूं कि अपना सृजनात्मक लेखन अपने ब्लाग पर प्रकाशित करना न भूलें । मैं भी अपने चिट्ठों पर ज्यादा लिखने का प्रयास करूंगा ।

 

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भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ती गानेन्द्र नारायण रे ने आम चुनाव में मुष्टीमेय समाचार पत्रों द्वारा चुनाव रिपोर्टिंग की बाबत प्रेस परिषद के दिशा निर्देशों के खुले आम उल्लंघन को गंभीरता से लिया है । न्यायमूर्ती रे आज लखनऊ में हिन्दी समाचार-पत्र सम्मेलन के मीडिया सेन्टर के नवनिर्मित भवन का उद्घाटन करने पधारे थे । इस अवसर पर हिन्दी समाचार-पत्र सम्मेलन के अध्यक्ष श्री उत्तम चन्द शर्मा ने प्रेस परिषद के अध्यक्ष का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि प्रेस परिषद के चुनाव-रिपोर्टिंग सम्बन्धी दिशा निर्देशों का कुछ प्रमुख हिन्दी अखबारों ने खुले आम उल्लंघन किया है । श्री शर्मा ने कहा है व्यावसायिकता के मोह में इन अखबारों द्वारा चुनाव के दौर में खबरों और विज्ञापन के बीच की सीमा रेखा का लोप कर दिया गया है । यह पाठकों और मतदाताओं के प्रति अन्याय है।
इस ब्लॉग के पाठक जानते हैं कि हिन्दी के दो प्रमुख दैनिक – हिन्दुस्तान तथा दैनिक जागरण द्वारा मौजूदा आम चुनाव के दौरान उम्मीदवारों से १० से २० लाख रुपये ले कर विज्ञापननुमा खबरें छापने की एक नई अलोकतांत्रिक परम्परा की शुरुआत की गई है । इस सन्दर्भ में १६ अप्रैल के वाराणसी हिन्दुस्तान के वाराणसी तथा चन्दौली-मुगलसराय संस्करण के मुखपृष्ट पर मुख्य सम्पादक के स्पष्टीकरण की छवि प्रस्तुत की गई थी । पता चला है कि कि समाजवादी जनपरिषद द्वारा चुनाव आयोग तथा सम्पादक को लिखे जाने के अलावा इस बाबत कांग्रेस के महामंत्री श्री राहुल गांधी ने हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की प्रमुख सुश्री शोभना भरतिया से फोन पर शिकायत की थी ।
बहरहाल प्रेस परिषद के अध्यक्ष के लखनऊ के आज के दौरे में अखबारों द्वारा चुनाव में निभाई जा रही भूमिका का मुद्दा छाया रहा । हिन्दी समाचार पत्र सम्मेलन के अध्यक्ष उत्तम चन्द शर्मा के अलावा कई पत्रकारों ने इस सवाल को उठाया । कार्यक्रम में न्यायमूर्ती रे का स्वागत सम्मेलन की ओर से जुगलकिशोर शरण शास्त्री ने किया । कार्यक्रम का संचालन दैनिक जनमोर्चा की सुमन गुप्ता ने किया । सुश्री सुमन गुप्ता प्रेस परिषद की सदस्य भी हैं तथा प्रेस परिषद की आगामी बैठक में इस मसले को उठाने का उन्होंने आश्वासन दिया है । आज के कार्यक्रम में मुख्य रूप से पत्रकार अरविन्द सिंह और जनमोर्चा के सम्पादक शीतला सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए । कार्यक्रम के अन्त में वाराणसी से प्रकाशित सांध्य दैनिक गाण्डीव के सम्पादक तथा हिन्दी समाचार पत्र सम्मेलन के महामन्त्री राजीव अरोड़ा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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जो महत्व कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के लिए मार्क्स और एंगेल्स के ’कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ का है ,बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा लाहौर के जाति तोड़क सम्मेलन(जिसमें आयोजकों ने उन्हें बुलाने के बाद फिर निमन्त्रण वापस ले लिया था) के लिए लिखे गये ’भारत में जाति-प्रथा का उच्छेद’ नामक पुस्तिका का जो महत्व हर समतावादी कार्यकर्ता के लिए है, वैसा ही महत्व ’आधुनिक सभ्यता की सख़्त टीका’ करने वाली गांधीजी द्वारा लिखी गई पुस्तिका ’हिन्द स्वराज’ का है ।
’किलडोनन कैसल’ नामक जहाज पर १९०९ में इस किताब को गांधीजी ने ’पाठक’ और ’सम्पादक’ के बीच हुए सवाल-जवाब के रूप में लिखा । २००९ शताब्दी वर्ष है ।
गांधीजी की पत्रकारिता इसके पहले शुरु हो चुकी थी । दक्षिण अफ़्रीका के उनके सत्याग्रह के बहुभाषी मुखपत्र ’इंडियन ओपीनियन’ के बारे में उन्होंने अपनी मौलिक पुस्तक ’दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह का इतिहास’ में एक अध्याय लिखा है । ’सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा’ में भी उन्होंने अपने अखबार ’नवजीवन’ तथा ’यंग इंडिया’ पर एक अध्याय लिखा है ।
’हिन्द स्वराज’ में पाठक द्वारा पूछे गए पहले सवाल के जवाब में ही वे बतौर ’सम्पादक’ अखबार का काम बताते हैं :

अखबारका एक काम तो है लोगों की भावनायें जानना और उन्हें जाहिर करना ; दूसरा काम है लोगोंमें अमुक जरूरी भावनायें पैदा करना ; और तीसरा काम है लोगोमें दोष हों तो चाहे जितनी मुसीबतें आने पर भी बेधड़क होकर उन्हें दिखाना ।’

जहां तक वाणी स्वातंत्र्य की बात है गांधी उसमें किसी तरह के हस्तक्षेप के खिलाफ़ थे । इस आज़ादी को वे अकाट्य मानते थे। अखबारों को गलत छापने के भी वे हक़ में थी । जब अखबारों के खिलाफ़ अंग्रेजों का दमन चल रहा था तब उन्होंने कहा कि -

’हमें प्रेस की मशीनों और सीसे के अक्षरों की स्थापित प्रतिमा को तोड़ना होगा । कलम हमारी फौन्ड्री होगी नकल बनाने वाले कातिबों के हाथ प्रिंटिंग मशीन! हिन्दू धर्म में मूर्ति-पूजा की इजाजत तब होती है जब वह किसी आदर्श हेतु सहायक हो । जब मूर्ति ही आदर्श बन जाती है तब वह पापपूर्ण वस्तु-रति का रूप धारण कर लेती है । अपने विचारों की बेरोक अभिव्यक्ति के लिए हम मशीन और टाइप का जब तक उपयोग कर सकते हों करें । बाप बनी सत्ता जब टाइप-अक्षरों के हर संयोजन तथा मशीन की हर हरकत पर निगरानी रखने लगे तब हमे असहाय नहीं हो जाना चाहिए ।…. यह मैं जरूर कबूलूंगा कि हाथ से निकाले गये अखबार वीरोचित समय में अपनाया गया वीरोचित उपाय है ।….इस अधिकार की बहाली के लिए हमे सिविल नाफ़रमानी भी अपनानी होगी क्योंकि संगठन और अभिव्यक्ति के अधिकार का मतलब – लगभग पूर्ण स्वराज के है।’

( यंग इंडिया , १२-१-’२२,पृष्ट २९ )

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    मौजूदा आम चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख दैनिक ’हिन्दुस्तान’ तथा ’दैनिक जागरण’ द्वारा चुनाव रिपोर्टिंग के प्रेस परिषद द्वारा जारी दिशा निर्देशों की खुले आम धज्जियाँ उड़ाने के बारे में मैंने ४ अप्रैल , २००९ को लिखा था । प्रेस परिषद की शिकायत प्रक्रिया के तहत मैंने उक्त दैनिकों के सम्पादकों से ऐसे आचरण पर तत्काल रोक लगाने की अपील भी की थी । यह उल्लेखनीय है कि हिन्दुस्तान के लखनऊ के स्थानीय सम्पादक श्री नवीन जोशी ने भी एकदा अखबारों के इस प्रकार के व्यावसायीकरण के खिलाफ़ अपनी लेखनी मजबूती से चलाई थी ।

    चुनाव आयोग को लिखे पत्र में मैंने कहा था कि चूँकि प्रेस परिषद में शिकायत की प्रक्रिया लम्बी है (पहले सम्पादक को लिखना आदि) इसलिए चुनाव आयोग तत्काल हस्तक्षेप करे । परसों शाम पहले चरण का प्रचार थमने के बाद १५ अप्रैल का जो हिन्दुस्तान आया उसके मुखपृष्ट पर प्रतिदिन की तरह दो टूक (पहले पन्ने पर छपने वाली सम्पादकीय टिप्पणी), सूर्योदय-सूर्यास्त का समय तथा तापमान,’हिन्दुस्तान की आवाज’(अखबार द्वारा कराये गये जनमत संग्रह का परिणाम तथा ’आज का सवाल’) एवं राजेन्द्र धोड़पकर का नियमित कार्टून स्तम्भ -’औकात’ छापे गये थे । इन नियमित तथा नियमित प्रथम पृष्ट होने का अहसास दिलाने वाले उपर्युक्त तमाम तत्वों के अलावा खबरों और चित्रों में जो कुछ छपा था आप खुद देख सकते हैं ।

   आज मतदान का दिन है । अपने बूथ पर शीघ्र पहुंचने वाला मैं छठा मतदाता था । मतदान के बाद इत्मीनान से आज १६ अप्रैल ,२००९ का हिन्दुस्तान देखा जिसमें  ’मुख्य सम्पादक’ ने एक ’माइक्रो नाप का स्पष्टीकरण छापा है । इसे भी आप चित्रों में देखें । सभी चित्रों को देखने के लिए चित्र पर खटका मारें । अलबम खुल जाने के बाद हर चित्र पर खटका मार कर बड़े आकार में देख सकते हैं ।

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वाराणसी लोक सभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार मुरलीमनोहर जोशी ने शुरुआत में इन अखबारों का प्रचार-पैकेज खरीदने से इनकार किया था लेकिन अन्तिम दौर में उन्होंने भी ’पैकेज” ग्रहण कर लिया ।
बहरहाल , दीवाल – लेखन और बैनर लेखन जैसे पारम्परिक प्रचार करने वाले मेहनतकशों को इस प्रक्रिया के बाहर ढ़केलने के बाद कथित निर्वाचन-सुधारों के तहत न सिर्फ़ बड़े अखबारों की तिजोरी भरी जा रही है , अखबारों की निष्पक्षता खत्म की जा रही है , भारी खर्च न कर पाने वाले प्रत्याशियों की खबरें ऐलानियां नहीं छप रही हैं तथा आम मतदाता – पाठक निष्पक्ष खबरें पाने से वंचित किया जा रहा है तथा इस प्रकार लोकतंत्र को बीमार और कमजोर करने में मीडिया का लोभी हिस्सा अपना घिनौना रोल अदा कर रहा है ।
समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश समस्त राजनैतिक दलों ,पत्रकार एवं नागरिक अधिकार संगठनों तथा जागरूक नागरिकों से अपील करता है कि (१) अध्यक्ष प्रेस परिषद ,६ कॉपर्निकस मार्ग,नई दिल्ली तथा (२) मुख्य चुनाव आयुक्त,भारत का निर्वाचन आयोग,निर्वाचन सदन,अशोक मार्ग, नई दिल्ली (ईमेल cecATeciDOTgovDOTin ) को इस प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए लिखें ताकि कुछ कमजोर चौथे खम्भों की यह हरकत रुके ।

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१. पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य है ? : महादेव देसाई

२.  पत्रकारिता दुधारी तलवार

३. खबरों की शुद्धता

४. ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? ”

५.  ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘

६.  हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ?

७.  समाचारपत्रों में गन्दगी

 ८. क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?

 ९.  समाचार : व्यापक दृष्टि में

  १०.  रिपोर्टिंग

  ११.  तिलक महाराज का ‘ केसरी ‘ और मैंचेस्टर गार्डियन

  १२. विशिष्ट विषयों पर लेखन

  १३. अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा

  १४. अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व

   १५ .  अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक

१५.    कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८)

 

 

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