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Archive for the ‘kishan patanayak’ Category

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पिछले भाग से आगे :

भारत जैसे देश में जनतंत्र को चलाने के लिए हजारों ( शायद लाखों ) राजनैतिक कार्यकर्ता चाहिए । संसद , विधान सभा , जिला परिषद , ग्राम पंचायत आदि को मिला कर हजारों राजनैतिक पद हैं । प्रत्येक पद के लिए अगर दो या तीन उम्मीदवार होंगे , तब भी बहुत बड़ी संख्या हो जायेगी । इनमें से बहुत सारे कार्यकर्ता होंगे , जिन्हें पूर्णकालिक तौर पर सार्वजनिक काम में रहना होगा तो उनके परिवारों का खर्च कहाँ से आएगा ? भ्रष्टाचार की बात करनेवालों को इस प्रश्न का भी गंभीरतापूर्वक उत्तर ढूँढना पड़ेगा ।

    पिछले ५० साल की राजनीति पर हम संवेदनशील हो कर गौर करें , तो इस बात से हम चमत्कृत हो सकते हैं कि हजारों आदर्शवादी नौजवान देश के भविष्य को संदर बनाने के लिए परिवर्तनवादी राजनीति में कूद पड़े थे । आज अगर उनके जीवन इतिहासों का विश्लेषण करेंगे , तो मालूम होगा कि उनमें से अधिकांश बाद के दिनों में , जब उनको परिवार का भी दायित्व वहन करना पड़ा , या तो राजनीति से हट गये या अपने आदर्शों के साथ समझौता करने लगे ।  निजी तथा सार्वजनिक जीवन की जरूरतों को पूरी करने के लिए शुरु में छोटे-छोटे ठेकेदारों से , भ्रष्ट प्रशासकों से या काले व्यापारियों से चंदा लेना पड़ा । बाद में जब लगातार खर्च बढ़ता गया और प्रतिष्ठा भी बढ़ती गई , तब बड़े व्यापारियों और पूँजीपतियों के साथ साँठगाँठ करनी पड़ी । अगर वे आज भी राजनीति में हैं , तो अब तक इतना समझौता कर चुके हैं कि भ्रष्टाचार या शोषण के विरुद्ध खड़े होने का नैतिक साहस नहीं है । पिछले ५० साल आदर्शवादी कार्यकर्ताओं के सार्वजनिक जीवन में पतन और निजी जीवन में हताशा का इतिहास है ।

    अगर शुरु से ही समाज का कोई प्रावधान होता कि राजनीति में प्रवेश करनेवाले नौजवानों का प्रशिक्षण-प्रतिपालन हो सके , उनके लिए एक न्यूनतम आय की व्यवस्था हो सके , तो शायद वे टूटते नहीं , हटते नहीं , भ्रष्ट नहीं होते । कम से कम ५० फीसदी कार्यकर्ता और नेता स्वाधीन मिजाज के होकर रहते । अगर किसी जनतंत्र में १० फीसदी राजनेता बेईमान होंगे तो देश का कुछ बिगड़ेगा नहीं । अगर ५० फीसदी बेईमान हो जायें, तब भी देश चल सकता है । अब तो इस पर भी संदेह होता है कि सर्वोच्च नेताओं के ५ फीसदी भे देशभक्त और इमानदार हैं या नहीं ।

From Andolan_Tumkur_Hampi

    समाज के अभिभावकों का , देशभक्त कार्यकर्ताओं का संरक्षण समाज के द्वारा ही होना चाहिए । सारे राजनेताओं को हम पूँजीपतियों पर आश्रित होने के लिए छोड़ नहीं सकते । समाज खुद उनके प्रशिक्षण और प्रतिपालन का दायित्व ले । इस दायित्व को निभाने के लिए यदि बनी बनाई संस्थाएँ नहीं हैं , तो सांविधानिक तौर पर राज्य के अनुदान से संस्थायें खड़ी की जाएं । जिस प्रकार न्यायपालिका राज्य के अनुदान पर आधारित है , लेकिन स्वतंत्र है , उसी तरह राजनेताओं का प्रशिक्षण और प्रतिपालन करनेवाली संस्थायें भी स्वतंत्र होंगी। केवल चरित्र , निष्ठा और त्याग के आधार पर राजनैतिक संरक्षण मिलना चाहिए । जो आजीवन सामाजिक दायित्व वहन करने के लिए संकल्प करेगा . जो कभी धन संचय नहीं करेगा , जो संतान पैदा नहीं करेगा , उसीको सामाजिक संरक्षण मिलेगा । जो धन संचय करता है , तो संतान पैदा करता है , उसको भी राजनीति करने , चुनाव लड़ने का अधिकार होगा , लेकिन उसे सामाजिक संरक्षण नहें मिलेगा । जिसे सामाजिक संरक्षण मिलेगा उसके विचारों पर अनुदान देनेवालों का कोई नियंत्रण नहीं रहेगा । सिर्फ आचरण पर निगरानी होगी । निगरानी की पद्धति पूर्वनिर्धारित रहेगी।

  यह कोई विचित्र या अभूतपूर्व प्रस्ताव नहीं है । कोई भी राज्य व्यवस्था हो , सार्वजनिक जीवन में चरित्र की जरूरत होगी । किसी भी समाज में समर्पित कार्यकर्ताओं का एक समूह चाहिए । आधुनिक युग के पहले संगठित धर्म ने कई देशों में सार्वजनिक जीवन का मार्गदर्शन किया । धार्मिक संस्थाओं ने भिक्षुओं, ब्राह्मणों ,बिशपों को प्रशिक्षण और संरक्षण दिया , ताकि वे सार्वजनिक जीवन का मानदंड बनाये रखें । ग्रीस में और चीन में प्लेटो और कन्फ्यूशियस ने राजनैतिक कार्य के लिए प्रशिक्षित और समर्पित समूहों के निर्माण पर जोर दिया । सिर्फ आधुनिक काल में सार्वजनिक जीवन के मानदंडों को ऊँचा रखने की कोई संस्थागत प्रक्रिया नहीं तय की गयी है । इसलिए सारी दुनिया का सार्वजनिक जीवन अस्त-व्यस्त है । सार्वजनिक जीवन का दायरा बढ़ गया है , लेकिन मूल्यों और आदर्शों को बनाये रखने की संस्थायें नहीं हैं ।

    संविधान के तहत या राजकोष से राजनीति का खर्च वहन करना भी कोई नयी बात नहीं है । विपक्षी सांसदों और विधायकों का खर्च राजकोष से ही आता है । यह एक पुरानी मांग है कि चुनाव का खर्च भी क्यों नहीं ? राजनीति का खर्च भी क्यों नहीं ? कुछ प्रकार के राजनेताओं का जीवन बचाने के लिए केन्द्रीय बजट का प्रतिमाह ५१ करोड़ रुपये खर्च होता है । करोड़पति सांसदों को भी पेंशन भत्ता आदि मिलता है । इनमें से कई अनावश्यक खर्चों को काट कर देशभक्त राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक सामाजिक कोष का निर्माण शुरु हो सकता है ।

    अगर विवेकशील लोग राजनीति में दखल नहीं देंगे तो भारत की राजनीति कुछ ही अरसे  के अंदर अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के हाथों में चली जायेगी । जो लोग इसके बारे में चिंतित हो रहे हैं ,उन्हें एक मूल्य आधारित राजनैतिक खेमा खड़ा करना होगा ।इस खेमे के लिए एक बड़े पैमाने का कोष निर्माण करना होगा ।  आज की संसद या विधान सभा इसके लिए अनुदान नहीं देगी । सामाजिक और स्वैच्छिक ढंग से ही इस काम को शुरु करना होगा ।

    अन्ना हजारे इस काम को शुरु करेंगे , तो अच्छा असर होगा । यह राजनैतिक काम नहीं है , जनतांत्रिक राजनीति को बचा कर रखने के लिए यह एक सामाजिक काम है । धर्मविहीन राज्य में चरित्र का मानदंड बना कर रखने का यह एक संस्थागत उपाय है । अंततोगत्वा इसे ( ऐसी संस्थाओं को ) समाज का स्थायी अंग बना देना होगा या सांविधानिक बनाना होगा ।

    धर्म-नियंत्रित समाजों के पतन के बाद नैतिक मूल्यों पर आधारित एक मानव समाज के पुनर्निर्माण के बारे में कोई व्यापक बहस नहीं हो पायी है , यह बहस अनेक बिंदुओं से शुरु करनी होगी । यह भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है ।

(स्रोत : दूसरा शनिवार , सितंबर १९९७ )

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इस लेख के पिछले भाग : एक , दो

अंगरेजी पत्रकारिता और राजनैतिक चर्चा सदाचार को एक व्यक्तिगत गुण के रूप में समझती है । व्यक्ति का स्वभाव और संकल्प सार्वजनिक जीवन में सदाचार का एक स्रोत जरूर है , लेकिन राजनीतिक व्यक्तियों को सदाचार का प्रशिक्षण देकर या अच्छे स्वभाव के ’सज्जनों’  को राजनीति में लाकर सार्वजनिक जीवन में सदाचार की गारंटी नहीं दी जा सकती है । भारत की ही राजनीति में ऐसे सैकड़ों उदाहरण होंगे कि जो व्यक्ति सत्ता-राजनीति में प्रवेश के पहले बिलकुल सज्जन था , सत्ता प्राप्ति के बाद बेईमान या भ्रष्ट हो गया । सदाचार की एक संस्कृति और संरचना होती है । सदाचार का क्षेत्र समाज हो सकता है , राजनैतिक समुदाय हो सकता है ,या एक निर्दिष्ट राजनैतिक समूह यानी दल हो सकता है । प्रत्येक क्षेत्र में भ्रष्टाचार कितना होगा,किस प्रकार का होगा, यह उस क्षेत्र की भौतिक संरचना और संस्कृति के द्वारा निरूपित होता है ।

क्या इस वक्त भारत के राजनैतिक दलों में कोई दल ऐसा है जो अन्य दलों की तुलना में गुणात्मक रूप में कम भ्रष्ट है। और, यह अन्तर एक गुणात्मक अन्तर है । भारतीय कम्युनिस्टों को वैचारिक दिशाहीनता और संघर्ष न करने की निष्क्रियता तेजी से ग्रस रही है और वे पतनशील अवस्था में हैं । पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी नेताओं के भ्रष्टाचार के बारे में अभियोग बढ़ता जा रहा है । इसके बावजूद भ्रष्टाचार के मामले में उनमें और बाकी दलों में अभी गुणात्मक अन्तर है ।

राजनीतिक समूहों में सदाचार के तीन आधार होते हैं : १. आदर्शवादी लक्ष्यों से प्रेरित होकर समाज को बदलने – सुधारने के विचारों का सामूहिक रूप में अनुवर्ती होना ; २. समाज के शोषित-पीड़ित वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति की भावनाओं को वाणी और कर्म के स्तर पर एक संस्कृति के रूप में विकसित करना ; ३. समूह या दल के अन्दर समानता , भाईचारा और अनुशासन का होना । राजनीति में धन और सत्ता की प्रबलता होती है । इसीलिए संस्कृति-विहीन राजनीति में भ्रष्टाचार का तुरन्त प्रवेश हो जाता है । इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है , न इस कारण से राजनीति का तिरस्कार होना चाहिए । यह एक चुनौती है कि राजनीति को संस्कृतिनिष्ठ बनाकर सशक्त करें और धन तथा सत्ता का केन्द्रीकरण न होने दें । राजनीति अवश्यंभावी है ; उसको मानव-हित में लगाने के लिए आदर्शवादी विचारों , क्रांतिकारी भावनाओं और कठिन श्रम की संस्कृति के द्वारा उसे एक महान कर्म का दरजा प्रदान करें ।

अगर अंग्रेजी पत्रकार चाहता है कि राजनीति से क्रान्तिकारी विचारों की विदाई हो जाए , आदर्शवाद की खिल्ली उड़ाई जाए, धन का केन्द्रीकरण और भोग का प्रदर्शन बढ़ता जाए, राजनीति शोषितों के हित में नहीं बाजार के हित में संचालित हो और फिर भी वह उम्मीद करता है कि भ्रष्टाचार हटे तो उसकी सोच गम्भीर नहीं है ।

राजनैतिक दल तत्काल दो काम कर सकते हैं । मीडिया और जनमत का दबाव इस दिशा में बनना चाहिए ।आपराधिक रेकार्ड वाले व्यक्तियों को पार्टी का टिकट या पद देना सारे राजनैतिक दल बन्द कर दें । कम से कम विपक्षी दल अवश्य कर दें । जो तीसरा मंच बन रहा है वह इसके लिए तैयार हो जाए तब भी एक आचरण संहिता की शुरुआत हो सकती है ; एक राजनैतिक संस्कृति की शुरआत हो सकती है । उसी तरह से राजनेताओं और उनके दलोम के द्वारा जो धनसंग्रह होता है उसमें पारदर्शिता के नियम बनाये जा सकते हैं । यह काम विपक्षी राजनैतिक दल खुद अपने स्तर पर कर सकते हैं । अगर इतना भी करने के लिए वे तैयार नहीं हैं तो संसद कार्यवाही को ठपकर देने से क्या फायदा ? संसद को ठप करना एक उग्र कदम है और उसकी जरूरत होती है जब शासक दल जरूरी बहस को नहीं होने देता है । अगर उपर्युक्त आचरण संहिता पर बहस की माँग करते हुए विपक्षी दल संसद संसद में हल्ला करते तो शासक दल की नैतिक पराजय होती । अन्यथा एक दिन शासक दल ( भाजपा ) के नेता को घूस लेते हुए विडियो टेप में दिखाया जाएगा तो दूसरे दिन विपक्षी दल (कांग्रेसी ) के नेता को घूस लेते हुए दिखाया जाएगा । इस कुचक्र से देश की राजनीति का उद्धार करने का उपाय यह है कि एक राजनैतिक संस्कृति को विकसित करने की पहल कुछ प्रभावी लोग करें ।

केवल राजनीति को नहीं , समाज को भी सदाचार की जरूरत है । यह भावुकता का मुद्दा नहीं है ; यह मनुष्य के अस्तित्व का मुद्दा बनने जा रहा है ।

( सामयिक वार्ता , अप्रैल,२००१)

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जनसत्ता और हिन्दुस्तान आदि में हिन्दी में कई लेख छपे हैं जिनमें नए प्रतिमानों को स्थापित करने की कोशिश है । एक लेख से यह साफ होता है कि तहलका के चलते हम जिस रक्षा मंत्रालय या रक्षा विभाग की बात बार-बार कर रहे हैं वह तो असल में हमारी सेना है । प्रतिरक्षा में भ्रष्टाचार न कहकर ’ हमारी भ्रष्ट सेना ’ कहने से असलियत ज्यादा सामने आती है । उच्च शिक्षित समूहों में कुछ लोग हमेशा कहते रहे हैं कि निर्वाचित राजनेताओं के हाथों से सत्ता लेकर सेना के अफसरों के हाथ सौंप देने से भ्रष्टाचार पर काबू हो जायेगा । तहलका उनको बता सकता है कि भ्रष्ट राजनेताओं से भ्रष्ट सेनापति बदतर होगा । हमारी सेना शुरु से अकुशल और भ्रष्ट रही है । भारतीय सेना से शायद ज्यादा भ्रष्ट शायद पाकिस्तान की सेना है । इस कारण पाकिस्तान से कभी कभी मुकाबला हो जाता है । किसी देश की सेना अपने से कम भ्रष्ट है तो उसके सामने सीमा छोड़कर भागने की शर्मनाक परम्परा भारतीय सेना की है । तहलका में दिखाये गये चेहरों से इसकी सत्यता पुष्ट होनी चाहिए । भविष्य के युद्ध में भारत की अखंडता को बनाये रखने के लिए हमारी सेना का कायापलट करना होगा – जो काम १९४७ में ही हो जाना चाहिए था । इस सेना को भ्रष्ट बनाने में हमारे नौकरशाहों और प्रधानमन्त्रियों का भी काफी योगदान है । भारत की दीर्घकालीन प्रतिरक्षानीति कभी बन नहीं पाई है । सेना कोई मशीन नहीं होती है । एक कुशल और देशरक्षक प्रतिरक्षानीति के न होने पर सेना कैसे अपना काम कर सकती है ? सेना के इन अफसरों को मंगल-तिलक लगाने के लिए जब भी सजी-धजी संभ्रान्त महिलाओं का झुंड खड़ा होता है तो एक भावनात्मक आभामंडल से सेना का चेहरा उज्जवल दिखाई पड़ने लगता है । लेकिन इस सेना के बारे में कुछ कठोर समीक्षाएं जरूरी हैं । भ्रष्टाचार सेना के अन्दर व्याप्त है , तहलका के बाद हम यह जोर देकर कह सकते हैं । यह पूछा जा सकता है कि क्या जो सेना भ्रष्टाचार में इतनी डूबी हुई है , वह कैसे एक उम्दा किस्म की सेना हो सकती है ? क्या वह राष्ट्र की अखंडता की रक्षा को एक पवित्र कार्य मानकर मर-मिटने को तैयार हो सकती है ?

सेना की राष्ट्रभक्ति को हम अस्वीकार नहीं कर सकते हैं , लेकिन यह राष्ट्रभक्ति बहुत गहरी नहीं है । अनुशासन की कमी के चलते यह राष्ट्रभक्ति दुर्बल तो होगी ही । अगर हमारा लक्ष्य एक महान राष्ट्र होना है और अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता के साथ समझौता नहीं होने देना है , तो तो जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है उन चुनौतियों के लिए यह सेना योग्य नहीं है – ऐसा सन्देह पैदा होना स्वाभाविक है और इस पर गम्भीर सोच-विचार होना चाहिए ।

एक दूसरा पहलू भी है – जब भी राष्ट्र के अन्दर के किसी क्षेत्र के लोग लम्बे समय तक विद्रोही बने रहते हैं और सीमावर्ती इलाका होने के नाते सेना की किसी टुकड़ी को उस क्षेत्र की शांतिव्यवस्था में विशेष जिम्मेदारी दी जाती है , तो वहाँ सेना का व्यवहार अपने नागरिकों के प्रति ऐसी हो जाता है , जैसा किसी शत्रु देश के नागरिकों के प्रति होता है । भारत के उत्तर-पूर्व इलाकों तथा कश्मीर में सैनिक तथा अर्धसैनिक बलों का जो रेकार्ड है वह बहुत गन्दा है । सामूहिक बलात्कार तक के आरोप लगते रहते हैं। इन विद्रोही इलाकों के प्रति सरकार की नीतियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार हैं । लेकिन ऐसा भी कभी नहीं हुआ है कि सेना के अन्दर होनेवाली गन्दी वारदातों के प्रतिवाद में सेना के किसी अधिकारी ने इस्तीफा दिया हो या जोखिम उठाकर विरोध किया हो ।

एक तीसरा पहलू है , सेना के अन्दर की गैर-बराबरी । पाकिस्तान और भारत की सेना पर सामन्तवाद हावी है । भारत की तुलना में पाकिस्तान की शासक श्रेणी का सामन्ती चरित्र ज्यादा स्प्ष्ट है , लेकिन भारतीय सेना के अधिकारियों का भी अपने सामान्य सिपाही के प्रति रवैया सामन्ती है । उसके साथ घरेलू नौकर की तरह बरताव किया जाता है और उसकी जरूरतों का कोई ख्याल नहीं रखा जाता है । युद्धक्षेत्र में सेना के अधिकारियों को मिलनेवाला भोजन और आराम की सुविधाओं तथा सिपाहियों को मिलनेवाली सुविधाओं की अगर तुलना की जाएगी तो यह बात ज्यादा स्पष्ट होगी । हो सकता है कि सेना के अधिकारियों का यह सामन्ती चरित्र उनको भ्रष्टाचार के प्रति उन्मुख करता है ।

( जारी )आगे – रा्जनीतिक समूहों में सदाचार के आधार ।

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बड़े मीडिया के अधिकांश अंग्रेजी स्तम्भ लेखकों के लेखों में चालाकी का भारी पुट रहता है । चालाकी एक प्रकार की बेईमानी है । आउटलुक (१० अप्रैल , २००१) में प्रेमशंकर झा तहलका से प्रकट हुए भ्रष्टाचार पर अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए जो लिखते हैं उसके पीछे उनका सामाजिक दर्शन भी छुपा हुआ है । सामाजिक दर्शन इस प्रकार है : समाज इसी तरह चलता रहेगा ; व्यक्ति-जीवन में भोग एकमात्र लक्ष्य है ; सामाजिक सन्दर्भ में उसको प्राप्त करने के लिए नैतिकता का पक्ष लेना पड़ेगा और भ्रष्टाचार की निन्दा करनी होगी ; क्योंकि समाज को चलाये रखना है ; अन्यथा नैतिकता कुछ होती नहीं है ।

प्रेमशंकर झा का कहना है कि बंगारु लक्ष्मण , जया जेटली और जार्ज फर्नांडीज चोर हैं । उनके निर्दोष होने की कल्पना करके और जार्ज को राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (राजग) के संयोजक के रूप में बरकरार रखकर प्रधानमन्त्री ने भारी गलती की है । जाँच के पहले इन राजनैतिक नेताओं को निर्दोष समझना और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कदम नहीं उठाना भ्रष्टाचार से समझौता है ।

ये बातें सही हैं और भाजपा के सारे विरोधी भी यही बात कर रहे हैं । यह बात भी सही है कि जाँच से कुछ निकलता नहीं है और निकले भी तो मुकदमा चलाकर कभी किसी बड़े नौकरशाह या नेता को कठोर दंड देने की मिसाल स्मृति में नहीं आती है । हवाला कांड का क्या हुआ ? शेयर घोटाले का क्या हुआ ?

राजनैतिक नेताओं को नरक में ढकेलने के बाद प्रेमशंकर झा एक नौकरशाह को स्वर्ग में स्थापित करने के लिए अंगरेजी के चुने हुए शब्दों का इस्तेमाल करते हैं । वे इस आदमी का वर्णन ” भारत के सार्वजनिक संगठनों का योग्यतम नौकरशाह ” के रूप में करते हैं जिसको कुछ साल पहले ” अनावश्यक ही गर्मी के दिनों में सुविधाविहीन तिहाड़ जेल में रखा गया था , जबकि अदालत में वह निर्दोष पाया गया , क्योंकि पुलिस के पास प्रमाण नाम की चीज नहीं थी । ” वे उस घोटाले का नाम भी नहीं बताते है जिसके यह शख्स यानी बी. कृष्णमूर्ति प्रधान खलनायक थे ।  यह था उदारीकरण युग का पहला भ्यावह घोटाला , जिसके बारे में एक भारी-भरकम जाँच हुई और रिपोर्ट भी बढ़िया ढंग से तैयार हुई , लेकिन अन्त में किसी भी नामी आदमी को जेल में जीवन नहीं बिताना पड़ा । कारण , पुलिस के पास प्रमाण नहीं थे । एक तरफ जाँच के पहले एक अभियुक्त को प्रधानमन्त्री निर्दोष होने की मान्यता दे रहे हैं , दूसरी तरफ़ अदालत में अभियोग प्रमाणित न होने के कारण झा जीउस अभियुक्त को सर्वश्रेष्ठ नौकरशाह का खिताब दे रहे हैं और मुकदमे के पहले दिए गए दंड को बर्बरता कह रहे हैं । दोनों ही गलत प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं । अंगरेजी का स्तंभ लेखक नौकरशाह का बचाव कर रहा है और प्रधान मन्त्री नेता तथा नौकरशाह दोनों का बचाव कर रहे हैं ।

गलत प्रतिमानों के चलते ही पिछले पचास सालों में भ्रष्टाचारी नेता और नौकरशाह दंड से बचे हुए हैं; वे सामाजिक प्रतिष्ठा भी पा रहे हैं । सीवान के शहाबुद्दीन प्रतिष्ठित हो रहे हैं। अगर अंग्रेजी पत्रकार की कसौटी को मान लें, तो यह कसौटी शाह्बुद्दीन के पक्ष में है । पुलिस अभी तक शहाबुद्दीन को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दंडित कराने में असफल रही है । किसी भी भाषा में शब्दों के चालाकी -भरे प्रयोग से तर्क की विसंगतियां छुप जाती हैं ; अंगरेजी में यह ज्यादा होता है ।

हिन्दी का पत्रका ज्यादा ईमानदारी से भारतीय समाज के कुछ प्रश्नों की दीवारों पर सर टकराता है । जनसत्ता के लेखक अरुण कुमार त्रिपाठी लिखते हैं कि मौजूदा राजनीति भ्रष्टाचार द्वारा कलंकित होने से अपने को बचाने में असमर्थ है । कारण , उसके पास बचाव के दो ही उपाय हैं : सबूत का अभाव और साजिश । ( भ्रष्ट कृष्णमूर्ति को बचाने के लिए प्रेमशंकर झा ने दोनों उपायों का इस्तेमाल किया है – साजिश के द्वारा उसको फँसाया गया और अदालत ने उसे दंडित नहीं किया )। अरुण कुमार त्रिपाठी ने लिखा है कि ऐसे कमजोर प्रतिमानों को चलाकर भ्रष्टाचार को रोका नहीं जा सकता , क्योंकि  भ्रष्टाचार अपने में एक बीमारी नहीं है बल्कि एक बड़ी बीमारी का लक्षण मात्र है । इसी बड़ी बीमारी को बढ़ाने के लिए हिन्दी लेखक उदारीकरण को उत्तरदायी मानता है ।

उदारीकरण भ्रष्टाचार को शुरु नहीं करता है , लेकिन जब उदारीकरण के द्वारा समाज के सारे स्वास्थ्य-प्रदायक तन्तुओं  को कमजोर कर दिया जाता तब भ्रष्टाचार न सिर्फ बढ़ता है बल्कि नियंत्रण के बाहर हो जाता है । भारत में उदारीकरण का यह चरण आ चुका है । जब अधिकांश नागरिकों के जीवन में भविष्य की अनिश्चितता आ जाती है , चन्द लोगों के लिए धनवृद्धि और खर्चवृद्धि की सीमा नहीं रह जाती , वर्गों और समूहों के बीच गैर-बराबरियाँ निरन्तर बढ़ती जाती हैं ,सार्वजनिक सम्पत्तियों को बेचने की छूट मिल जाती है , उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को देश के बाहर से निर्देश लेने होते हैं , जायज तरीकों से मिलनेवाली आय और नाजायज कमाई की मात्रा में आकाश-पाताल का अन्तर होता है , तब भ्रष्टाचार को रोकेगा कौन ?

( जारी )

पढ़ें , भ्रष्टाचार पर किशन पटनायक के कुछ अन्य लेख :

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पिछला भाग

ऐसी स्थिति में बुराई का उद्घाटन या भ्रष्टाचार का भंडाफोड सिर्फ कुछ तथ्यों को दर्शाता है , जो सत्य है लेकिन असहाय सत्य है । जिस सत्य के साथ न्याय जुड़ता नहीं , वह कहने के लिए सत्य है । वह सिर्फ घटनाओं और आँकड़ों की सूची है , प्रतिभूति घोटाले पर मिर्धा समिति का प्रतिवेदन बहुत सारे प्रसंगों और आँकड़ों की सूची है । बोफोर्स कुछ नामों और रकमों की सूची है । चीनी घोटाला , सार्वजनिक उद्योगों के अंश(शेयर) बिक्री का घोटाला – सबके सब तथ्यों की फेहरिस्त हैं । इन तथ्यों को न्याय के ढाँचें में बाँधने की शक्ति भारतीय समाज खो चुका है ।

तथ्यों का उद्घाटन तो हर्षद मेहता भी करता है। प्रधानमन्त्री के बारे में उसने रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन किया था । कभी कोई पुलिस अफसर , कभी कोई प्रशासनिक अधिकारी अपने भीतर के सत्य को बाहर निकालने की हिम्मत जुटा लेता है । कुछ सत्य जो अपच हो रहा है , कुछ सत्य जो विवेक को परेशान कर रहा है , बाहर आ जाता है । बाहर आ जाने के बाद वह सत्य नहीं रह जाता है – तथ्यों और आँकड़ों के रूप में ग्रंथागारों के अन्दर छिप जाता है । थोड़े समय के लिए अखबार के पाठकों का मनोरंजन करता है।

अत: तथ्यों  का उद्घाटन कोई महान कार्य नहीं है । खैरनार उस अनुपात में प्रशंसा के पात्र हैं जिस अनुपात में उन्होंने व्यक्तिगत जोखिम उठाया है – शरद पवार के विरुद्ध आरोप लगाना खतरनाक काम है । पता चला है कि खैरनार शुरु से ही एक ईमानदार अधिकारी रहे हैं । कभी सचमुच व्यवस्था बदलनी होगी , तो शेषन और खैरनार जैसे अधिकारियों की जरूरत पड़ेगी । लेकिन खैरनार एक महान व्यक्ति हैं या नहीं  , इसका निर्णय अभी नहीं हो सकता है । क्या उन्होंने अपने समूचे सत्य को बाहर निकाला है ? तथ्यों को प्रकट करने के लिए सत्य को पहचानना भी पड़ता है । क्या सत्य कुछ बुराइयों के विवरण तक सीमित है ? देश की आज की स्थिति में सत्य नहीं है तो नहीं है , लेकिन कोई अगर उसको पकड़ने की कोशिश करेगा तो सत्य की आकृति इतनी बड़ी हो जाती है कि सत्य को स्थापित करनेवाला खुद सत्य के द्वारा कुचल दिया जाता है ।

टी.एन. चतुर्वेदी को लोग भूल चुके हैं। हालाँकि अभी वे जिस स्थान पर पहुँच गए हैं वहाँ से उनकी गतिविधियाँ ( अगर हों तो ) ज्यादा प्रसारित और प्रभावी होनी चाहिए । अभी वे एक महत्वपूर्ण राजनैतिक दल के सांसद हैं । नौकरशाही की भाषा में यह बहुत बड़ी ’ पदोन्नति ’ है। बोफोर्स से सम्बन्धित कुछ सरकारी तथ्यों को प्रकाशित कर उन्होंने उस घोटाले के बारे में रहस्यमय जानकारियाँ दी थीं । उससे उनको जो सार्वजनिक प्रशंसा और सम्मान मिला था , उसीके बल पर उन्होंने भाजपा से राज्यसभा का टिकट प्राप्त कर लिया । भाजपा के बारे में हमारी राय जो भी हो , क्या चतुर्वेदीजी अपने विवेक को सन्तुष्ट कर पाए हैं  कि राज्यसभा और भाजपा के माध्यम से वे सत्य का अनुसन्धान कर रहे हैं ? या उनके अन्दर उतना ही सत्य था जितना उन्होंने महालेखा परीक्षक के रूप में उद्घाटित किया ।

घोटालों में से प्रत्येक हमारे राष्ट्र और समाज के विरुद्ध एक साजिश है । साजिश की घटनाओं का विवरण आ जाता है ; दोषी कौन है दिखाई पड़ जाता है , लेकिन इन साजिशों का दमन भारतीय व्यवस्था नहीं कर सकती है । संसद के अगस्त अधिवेशन में प्रतिभूति घोटाले को लेकर जो हुआ वह इस बात को पुष्ट करता है कि विपक्ष के नेता एक सीमा तक ही सत्य का पीछा कर सकते हैं उससे आगे नहीं । अब यह माना जा सकता है कि जो इस घोटाले के मुख्य अपराधी थे , जिन्होंने लगभग दस हजार करोड़ रुपये की लू्ट की और देश की वित्तीय व्यवस्था का मजाक उड़ाया , कभी भी दंडित नहीं होंगे । उनको दंडित करना मुख्य बात नहीं है, उनको दंडित न करने से हमारी अर्थव्यवस्था असुरक्षित हो गई है । अब कभी भी (जब तक माहौल यही है ) यह अर्थव्यवस्था सुधरनेवाली नहीं है ।

इसलिए तथ्यों का उद्घाटन कोई पवित्र कार्य नहीं है । राजनेता-प्रशासक-न्यायाधीश ऐसे-ऐसे कुकर्म कर रहे हैं जिनके उद्घाटन की जरूरत नहीं है – सबकी नजर के सामने कर रहे हैं और खुद अपना ’भंडाफोड’  कर रहे हैं । हत्याओं और बहुत सारी डकैतियों के अपराधी दुलारचन्द को बिहार के मुख्यमन्त्री ने सरकारी गाड़ी , बंगला और टेलीफोन देकर सामाजिक कार्यकर्ता घोषित किया है और एक ’जन अदालत’ चलाने की सलाह दी है । यही नहीं अपराधी स्वयं अपने अपराध को महिमामंडित कर उसे ” पुण्यकार्य ” बता रहे हैं । किसे यह बात याद आती है कि बीजू पटनायक ने यह दावा किया था कि अतीत में जब वे मुख्य मन्त्री थे , पारादीप बन्दरगाह के काम में तेजी लाने के लिए उन्होंने देहाती सड़कों पर सैंकड़ों ट्रक चलाने की अनुमति दी थी। फलस्वरूप दो सौ बच्चों की दुर्घटना जनित मृत्यु हुई थी । बीजू पटनायक ने गर्व से यह कहा था कि इन दुर्घटनाओं की प्राथमिक ( एफ.आई. आर.) दर्ज न करने के लिए पुलिस विभाग को निर्देश दिया गया था ।

यह एक असलियत बन रही है कि अपराधी खुद अपना भंडाफोड कर रहा है , बहादुरी बताने के लिए। राजनीतिशास्त्र से पूछा जा सकता है कि इस अवस्था में या इससे भी बदतर स्थिति होने पर लोकतंत्र कितना टिकाऊ होगा ?

हम अपने से इसी सवाल को दूसरे ढंग से पूछ सकते हैं : भारतीय समाज में न्यायशक्ति को पुन:स्थापित करने के लिए या मौजूदा राजनीति को बदलने के लिए क्या उपाय है ? सिर्फ राजनेताओं की निन्दा और विभिन्न तबकों की अपनी – अपनी मा~म्गों के आन्दोलनों तक सीमित रहने से क्या न्याशक्ति स्थापित की जा सकती है या राजनीति को बदला जा सकता है ? इसके लिए क्या उपाय है ?

(सामयिक वार्ता , जुलाई , १९९४)

अगला लेख : तहलका से उठे सवाल

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” हमारे भीतर और सभी की जड़ में एक विराट सत्य है ; यह बात  जो लोग अपने भीतर से उपलब्ध (ग्रहण) नहीं कर सकेंगे , वे कैसे विश्वास करेंगे कि मनुष्य का चरम लक्ष्य है : अपने भीतर छुपे हुए उस (विराट) सत्य को सभी आवरणों को भेदकर प्रकाशित करना … ।”

- रवीन्द्रनाथ ठाकुर (घर और बाहर )

महाराष्ट्र के खैरनार और ओडिशा के अनादि साहू के बयानों से लगता है कि देश में एक शेषन-लहर चल रही है । (ओडिशा के अनादि साहू एक पुलिस अफ़सर हैं , जिन्होंने बिजू पटनायक की सरकार के एक प्रमुख मन्त्री को जहरीली शराब बिक्री के  मुख्य अपराधी का सहयोगी होने का न्यायिक प्रमाण अदालती जाँच के सामने पेश किया है । ) शेषन ने समकालीन इतिहास में अपना स्थान बना लिया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि उसने चुनाव-राजनीति में ( यानी भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में )कानून का का राज स्थापित करने का प्रयास दम्भ के साथ किया है ।दम्भी होना एक अवगुण है ; लेकिन दम्भी होना न गैर कानूनी है और न भ्रष्ट आचरण है । बल्कि अगर वह दम्भी न होता तो सारे राजनीतिक दलों को झकझोरने की इच्छाशक्ति एक नौकरशाह में कैसे आती ?

चरित्र के मामले में विकासशील देशों का नौकरशाह सबसे घटिया होता है । पिछले एक-डेढ़ दशक से उन देशों की राजनीति का जो चरित्र उभर रहा है उसमें राजनेता नौकरशाह से भी ज्यादा घटिया और खतरनाक साबित हो रहा है । विकासशील देशों के नौकरशाह के बारे में यह शक रहता है कि वह देशी-विदेशी निहित स्वार्थों से निजी फायदा उठाने के लिए देशहित के विरुद्ध कार्य करता है और सर्वोच्च राजनेताओं को भी गलत सलाह देता है । लेकिन जब देश एक ऐसी कालावधि से गुजर रहा है जब देश का राजनीतिक नेतृत्व देश के स्वार्थ को बेचकर अपनी सत्ता को बरकरार रखने की कोशिश कर रहा है ।

दूसरी ओर राजनेता-अपराधी सम्बन्ध भी मामूली स्तर को पार कर चुका है , उस स्तर को पार कर चुका है , जहाँ राजनेता यदाकदा मजदूर आन्दोलन को दबाने के लिए या चुनाव जीतने के लिए अपराधियों का इस्तेमाल करता था । लेकिन अब ? राजनीतिक सत्ता को आधार बनाकर अपराधियों के गिरोह संगठित हो रहे हैं और राजनेता इन गिरोहों के सदस्य हैं (जलगाँव प्रकरण ) । बहुत सारे अपराध इस प्रकार घटित हो रहे हैं जो सत्ता के प्रत्यक्ष सहयोग के बगैर सम्भव नहीं हैं । अनेक हत्याएँ, अनेक बलात्कार और अपहरण के घटनाएं इसी कोटि की हैं । अपराधी गिरोहों का निर्माण अन्तरराष्ट्रीय पैमाने पर हो रहा है तो उनका सहयोगी होकर राजनेता किसी भी समय जाने-अनजाने विदेशी कूटनीतिक साजिशों का औजार बन सकता है । जब रजनीति इस अवस्था में पहुंच जाती है तब यह स्वाभाविक है कि कहीं – कहीं नौकरशाह इसके खिलाफ विद्रोह करे तथा राजनेताओं को सदाचार सिखाने का दम्भ भरे ।

ऐसा करनेवाले नौकरशाहों में से इक्के-दुक्के बहुत लोकप्रिय भी हो सकते हैं । इस लोकप्रियता में कोई सामाजिक उर्जा नहीं होती । यह किसी फिल्मी दृश्य की लोकप्रियता जैसी है । डाकू मानसिंह और फूलन देवी की लोकप्रियता जैसी है । इसका मतलब यह नहीं कि यह घटनायें सकारात्मक नहीं हैं। भ्रष्टाचार का भंडाफोड हमारी सामाजिक और बौद्धिक अधोगति की कुत्सित वास्तविकता का चित्रण करता है और समाज में बचे-खुचे नैतिक आक्रोश को अभिव्यक्त करता है ।

भंडाफोड कोई प्रतिकार नहीं रह गया है । शायद दो-तीन दशकों के पहले एक समय ऐसा था जब बुराई का उद्घाटन अपने में एक प्रतिकार था । यह तब होता है जब समाज की अपनी एक अन्दरूनी ताकत होती है,जिसको कुछ लोग नैतिक शक्ति कहना पसंद करेंगे , हम उसको न्यायशक्ति कहेंगे । जब समाज में यह न्यायशक्ति रहती है तब भ्रष्टाचार का उद्घाटन अपने आप प्रतिकार की तरफ बढ़ने लगता है। मानो न्याचक्र घूमने लगता है । दोषी को दंडित होना यहां अनिवार्य है, लेकिन मुख्य बात यह नहीं है। मुख्य बात यह है कि समाज सुरक्षित रहता है । न्यायशक्ति वह तत्त्व है जो समाज को धारण करती है । ’धर्म’ शब्द की कई भारतीय परिभाषाओं में यह एक है : समाज को धारण करनेवाला तत्त्व । इस तत्त्व के बनाए रखने के लिए कानून की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है । सामाजिक-राजनैतिक मान्यताओं, प्रथाओं,मर्यादाओं और बुद्धिजीवी वर्ग की नैतिक प्रतिक्रियाओं के द्वारा ही इस तत्त्व की पुष्टि होती है । इसके बगैर कानून भी अप्रभावी हो जाता है । न्यायचक्र के निश्चल होने  के पीछे मुख्य जिम्मेदार बुद्धिजीवी वर्ग है । जब तक बुद्धिजीवी वर्ग भ्रष्ट नहीं होगा तब तक किसी भी समाज की न्याय शक्ति, नैतिक शक्ति पंगु नहीं हो जाएगी । इसके बाद ही राजनेता निरंकुश होता है और न्याय का गला घोटता है। जब सेठों , अफसरों या छोते नेताओं का भ्रष्टाचार पकड़ा जाता था , तब लोगों को खुशी होती थी कि सर्वोच्च नेतृत्व प्रतिकार करेगा और समाज को सुरक्षित रखेगा । लेकिन जिस चरण में सर्वोच्च नेतृत्व खुद अपराधियों की जमात बन गया है तो दंड प्रक्रिया कौन चलाएगा ? उसके ऊपर कोई संवैधानिक शक्ति नहीं है;उसके नीचे कोई नैतिक शक्ति नहीं है। उसका मुखौटा उतर जाने के बाद भी वह बेशर्म रहेगा तो कहाँ से उसका प्रतिकार होगा ?

(जारी)

आगे : भ्रष्टाचार का असहाय सत्य क्या है ?

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पिछले हिस्से : एक , दो , तीन

सार्वजनिक आचरण तथा निजी आचरण का एक राष्ट्रीय पैमाना होता है ( यहाँ राष्ट्र का अर्थ देश है – स्वाभाविक रूप से प्रत्येक व्यक्ति और समुदाय का एक भौगोलिक-सांस्कृति-राजनीतिक अंचल होता है , वही देश है )। व्यक्ति आचरण का इस राष्ट्रीय चरित्र से दोतरफ़ा सम्बन्ध और संवाद होता है । आचरण की एक खास परिधि के भीतर व्यक्ति और राष्ट्र एक-दूसरे को प्रभावित तथा निर्मित करते रहते हैं । कुछ समाजों में यह राष्ट्रीय चरित्र बहुत ही कमजोर और पतनोन्मुख रहता है । प्रशासन , राजनीति तथा सामाजिक जीवन में बढ़ने वाला भ्रष्टाचार इसी का अंग है ।

सवाल उठता है कि राष्ट्रीय चरित्र को कैसे बदला जा सकता है ? क्या हम भारत के राष्ट्रीय चरित्र को बदलने की कोशिश कर सकते हैं , ताकि हमारा समाज स्वस्थ हो ?

शायद राष्ट्रीय चरित्र के पतन का कारण और उसके पुनरुत्थान का उपाय एक है । जिस समय समाज को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, खासकर बाहर से आई हुई चुनौतियों का । उस समय अगर समाज का नेतृत्व करनेवाला राजनीतिक-बौद्धिक समूह उनका सही मुकाबला नहीं कर पाता , तब राष्ट्रीय चरित्र में भारी गिरावट आती है । पुनुरुत्थान की कुंजी भी इसीमें है । लम्बे अरसे के पतन के बाद अगर किसी काल बिन्दु पर उस समाज ने चुनौतियों का , खासकर बाह्य चुनौतियों का , मुकाबला करना स्वीकार कर लिया , तब राष्ट्रीय चरित्र का पुनरुत्थान शुरु हो सकता है । बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत में ऐसी प्रक्रिया शुरु हुई थी ।

अगर आज पुन: हम उस प्रक्रिया को जीवित और पुष्ट करना चाहें , तो कर सकते हैं । इसके लिए देश में एक नए बौद्धिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समूह को पैदा होना होगा । राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण क्षेत्र में हस्तक्षेप करना पड़ेगा । राजनीति , अर्थनीति और धर्म के क्षेत्र में प्रभावी हस्तक्षेप के साथ साथ ही एक नया सांस्कृतिक आन्दोलन विश्वसनीय होगा । लेकिन सांस्कृतिक आन्दोलन का अपना एक मौलिक क्षेत्र है। सम्भवत: सांस्कृतिक मूल्यों को स्पष्ट और गतिशील किए बिना राजनीति और अर्थनीति में भी सार्थक हस्तक्षेप करना सम्भव नहीं होगा,क्योंकि प्रचलित राजनीति, अर्थनीति और धर्म प्रचलित सभ्यता के अंग बन चुके हैं । इस सभ्यता को चुनौती देना नए सांस्कृतिक आन्दोलन के लिए अनिवार्य है । मनुष्य की संस्कृति मनुष्य के कुछ बुनियादी सम्बन्धों पर आधारित होती है – मनुष्य का प्रकृति से सम्बन्ध , मनुष्य का मनुष्य से सम्बन्ध और मनुष्य का समुदायों से सम्बन्ध । प्रचलित सभ्यता में ये सम्बन्ध विकृत या असन्तुलित हो चुके हैं । इस सभ्यता को आगे बढ़ाकर मनुष्य के सुख , शान्ति या स्वास्थ्य को बनाए रखना सम्भव नहीं रह गया है । इन सम्बन्धों को बदलने से ही नए मूल्यों की स्थापना होगी । नई संस्कृति इसी का परिणाम होगी।

इन सारे गहरे और व्यापक पहलुओं को छुए बगैर भ्रष्टाचार विरोधी अभियान बेमानी हो जाता है। भ्रष्टाचार का मुद्दा इसलिए उठाना चाहिए कि लोग इस मुद्दे को समझते हैं और इसके प्रति संवेदनशील होते हैं । लेकिन इस मुद्दे को निर्णायक बनाने के लिए भ्रष्टाचार की बुनियाद में जाना पड़ेगा ।

( सामयिक वार्ता , अक्टूबर ,१९९४)

आगे : भ्रष्टाचार – असहाय सत्य , लेखक किशन पटनायक

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पिछला भाग - (प्रथम)

यह बात सभी को मालूम है ( जिसे मालूम नहीं है , वह सचेत नागरिक नहीं ) कि सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को महीनों तक  , सालों तक , कभी – कभी मरने तक पेंशन नहीं मिलती । ऐसी कोई प्रक्रिया या नियम अभी नहीं बना है कि सेवानिवृत्त होने एक महीने बाद से ही मासिक पेंशन मिलने लगे। साल-दो साल के अन्दर पेंशन मिल सके इसके लिए हजारों कर्मचारी प्रतिवर्ष घूस देते हैं । सेवानिवृत्त होने के एक महीने बाद अगर पेंशन मिलने लगेगी , तो बहुतों को लगेगा कि रामराज्य आ गया है । हमारे सामान्य नागरिक इस तरह की स्थितियों में जीते हैं कि कुछ मामूली परिवर्तनों से ही रामराज्य का एहसास दिलाया जा सकता है । कुछ प्रक्रियाओं में परिवर्तन कर न सिर्फ प्रति दिन होने वाली करोड़ों की घूसखोरी को रोका जा सकता है , बल्कि देश के किसानों को रामराज्य के दर्शन कराये जा सकते हैं । जमीन के हस्तांतरण तथा खरीद – बिक्री के नियमों का सरलीकरण इसके लिए जरूरी है । दूसरी जरूरत यह है कि सरकारी प्रशासन से किसानों का कृषि सम्बन्धी जितना काम पड़ता है , उसके लिए ’एक खिड़की’ की व्यवस्था कर दी जाए और यह खिड़की किसी भी गाँव से दस कि.मी. से ज्यादा दूर न हो । क्या ऐसा नियम नहीं हो सकता कि  किसी जायज काम के लिए एक किसान को दो बार से ज्यादा सम्बन्धित दफ़्तर में न जाना पड़े ?

किताबों के अनुसार कचहरी (अदालत) लोकतंत्र में नागरिकों की आजादी का प्रतीक है ।  लेकिन गाँववालों के लिए कचहरी और पुलिस में कोई फर्क नहीं होता ।कचहरी वह है ,जिसके द्वारा पुलिस या पटवारी किसानों को सताता है । क्या यह समाजशास्त्रियों और राजनीतिशास्त्रियों के खोज का विषय नहीं है कि भारत के आम नागरिकों के लिए न्याय विभाग सुरक्षा का एक प्रतीक है या नहीं ? झूठे मामले में फँसना उतनी बड़ी यातना नहीं है जितनी सैंकड़ों बार कचहरी और वकील के यहाँ जाना और बार-बार कचहरी में घूस और वकील की फीस अदा करना ।किसानों से करोदओं रुपयों की लूट प्रति दिन इसी तरीके से होती है । अगर अधिकांश मामलों के निपटारे के लिए समय की सीमा बँध जाए और झूठे मामलों की छानबीन की कोई प्रक्रिया तय हो जाए , तो यह घूसखोरी और जलालत पचास फीसदी घट जाएगी ।

ये सब हैं जनता के स्तर पर होनेवाली घूसखोरी और भ्रष्टाचार । इस तरफ़ पालकीवाला या तारकुंडे जैसे महानुभावों का ध्यान नहीं जाता ।भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलनों में ज्यादातर शहरी लोग दिलचस्पी लेते हैं । इसीलिए उनमें भ्रष्टाचार की इस बुनियाद की समझ दिखाई नहीं पड़ती ।

यह सवाल उठ सकता है कि अगर इन प्रशासनिक व्यवस्थाओं तथा प्रक्रियाओं को बदलना इतना आसान है तो यह क्यों नहीं कर लिया जाता ? इसका उत्तर यह है कि इससे करोड़ों लोगों की आजादी बढ़ जाएगी । किसानों को अगर पुलिस और पटवारी के सामने झुकना नहीं पदएगा , शहर के वकीलों के मुकाबले अगर उनमें हीनभावना नहीं रहेगी , तो यह औपनिवेशिक व्यवस्था चलेगी कैसे ? अगर लोगों का जायज काम समय पर सही ढंग से होने लगेगा , तो उन्हें आजादी का जो बोध होगा , वह क्या उन बहुत सारे अन्यायों अत्याचारों के लिए बाधक नहीं हो जाएगा  , जिन अन्यायों-अत्याचारों के सहारे भारत का शिक्षित समाज इतना आत्मसन्तुष्ट रहता है ?

प्रशासन के सुधार को हम इसलिए आसान मानते हैं कि इसके लिए संविधान या देश की आर्थिक व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन जरूरी नहीं होगा । सिर्फ औपनिवेशिक नियमों को बदलकर लोकतांत्रिक नियम प्रचलित करने होंगे । लेकिन अनुभव बतलाता है कि देश के उदारवादी नेता और बुद्धिजीवी इस सम्बन्ध में बिलकुल संवेदनशील नहीं हैं । इसीलिए यह मामूली परिवर्तन अब कठिन लगता है । इस कठिनाई को समझना चाहिए । ब्रिटिश राज में जो औपनिवेशिक प्रशासन था , नेहरू जी ने अगरुसी को बरकरार रखा , तो लोग मौके – मौके पर क्यों कहते हैं कि इससे तो अंग्रेजी राज बेहतर था ? एक अन्तर यह आ गया है ब्रिटिश राज में जवाबदेही तथा नियंत्रण का एक मजबूत केन्द्र था । कोई भी भारतीय कर्मचारी , अफसर या मजिस्ट्रेट अंग्रेज साहब से डरता था । इस डर के स्थान पर जवाबदेही का एक लोकतांत्रिक ढांचा बनाना जरूरी था , जो कभी नहीं बना । किसी भी प्रशासन के लिए जवाबदेही केन्द्रीय महत्व की चीज है , जो भारतीय प्रशासन में नदारद है । किसी गांव में पुल बना और चार महीने बाद टूट गया, तो इंजीनियर को दंडित किया जाएगा या नहीं ? कोई सेना बिना लड़े भागती जाएगी तोतो सेनापति को दंड मिलना चाहिए या नहीं ? कोई कंपनी लगातार घाटे में चलती है,तो मैनेजर से जवाबतलबी होनी चाहिए या नहीं ? अगर दिल्ली के बैंक में पतना का चेक जमा होता है और छह महीने बाद भी भुगतान नहीं होता है,तो किसी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं ? आजादी के बाद से  इस जवाबदेही की तरफ राजनेता , प्रशासक , समाजशास्त्री किसी ने गम्भीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया है । फलस्वरूप लापरवाही और अराजकता की ऐसी आदतें बन गई हैं कि कोई भी इसे बदलना चाहेगा तो उसे बहुत सारे कठोर कदम काम करने होंगे । अगर कोई सरकार ये कठोर काम करने लगेगी,तो आई.ए.एस अफसर और वामपंथी ट्रेड यूनियन सबसे ज्यादा बाधा डालेंगे । फिर भी संकल्प के बल पर सुधार का काम शुरु हो सकता है, हमने देखा है कि कभी – कभी एक बदआ और ईमानदार अधिकारी अपने विभाग में व्यक्तिगत संकल्प के बल पर भ्रष्टाचार को रोकने में सफल भी होता है । लेकिन यह कोई कारगर उपाय नहीं ।

(जारी)

यह भी पढ़ें :

राजनीति में मूल्य : किशन पटनायक

भ्रष्टाचार की बुनियाद कहां है ?

प्रशासन के

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प्रश्न : क्या भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए जनान्दोलन एक कारगर उपाय हो सकता है ?
उत्तर : नहीं । सिर्फ भ्रष्टाचार की विशेष घटनाओं के प्रति जन आक्रोश को संगठित किया जा सकता है , किसी एक घटना को मुद्दा बनाकर एक राजनैतिक कार्यक्रम चलाया जा सकता है , जैसे बोफोर्स , बैंक घोटाला इत्यादि । भ्रष्टाचार्करनेवाले व्यक्ति के विरुद्ध प्रचार अभियान चलाकर उसे थोदए समय के लिए बदनाम भी किया जा सकता है ।लेकिन इन कार्यक्रमों से भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं होता । समाज , राजनीति ,और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार इस तरह के आन्दोलनों के द्वारा प्रभावित नहीं होता है , ज्यों का त्यों बना रहता है ।
प्रश्न : तो क्या भ्रष्टाचार बना रहेगा और मान लेना पड़ेगा कि यह एक अनिवार्यता है , इससे छुटकारा संभव ही नहीं ?
उत्तर : कुछ मात्रा में भ्रष्टाचार रहेगा ही , वह अनिवार्य है । इसीलिए तो राज्य व्यवस्था बनी हुई है – हिंसा और भ्रष्टाचार को नियंत्रित रखने के लिए । सवाल वहाँ उठता है , जहाँ भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं हो रहा है। एक निम्नतम स्तर तक भ्रष्टाचार रहेगा , तो राज्य व्यवस्था उसे संभाल लेगी , उससे जनजीवन अस्तव्यस्त नहीं हो जाएगा ।भ्रष्टाचार तब एक केन्द्रीय समस्या बनता है जब उसके कारण एक औसत नागरिक के लिए सामान्य ढंग से ईमानदारी का जीवन जीना मुश्किल हो जाता है । जब भ्रष्टाचार का शिकार हुए बगैर रोजमर्रा का काम नहीं चल पाता है , तब भ्रष्टाचार से मुक्त होने के लिए तपस्या करनी पड़ती है । तब तो और भी , जब यह आशंका होने लगती है कि मंत्री, विधायक , अफ़सर या सेनापति अपने स्वार्थ के लिए देश हित और समाज हित के विरुद्ध जानबूझकर काम कर सकते हैं। इस प्रकार का भ्रष्टाचार न स्वाभाविक है और न ही अनिवार्य । यह मनुष्य-कृत और समाज-कृत है । यह इस बात की चेतावनी है कि समाज के सचेत लोग सामूहिक जीवन को संचालित करने में विफल हो रहे हैं । मानो न्यायचक्र का घूमना बन्द हो गया है । इस अवस्था में नेक आदमी भी भ्रष्टाचार करने लगता है और कोई आदमी ईमानदारी से अपना काम करता है , तो उसकी हालत दयनीय हो जाती है । पूरा तंत्र उसके खिलाफ हो जाता है । इसके विपरीत सामान्य अवस्था में भ्रष्टाचार सिर्फ लोभी और बेशर्म आदमियों तक सीमित रहता है और अधिकांश घटनाओं में लोग आश्वस्त रहते हैं कि दोषी दण्डित होगा ।

जब भ्रष्टाचार इस दूसरी , खतरनाक अवस्था में पहुँच जाता है , तब ’भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार ’ चिल्लाने से उसमें कोई कमी नहीं आती । इसका मतलब है कि भ्रष्टाचार को नियंत्रण में रखनेवाली स्थितियाँ बिगड़ चुकी हैं और नियंत्रण करनेवाली व्यवस्था में बहुत खोट आ गई है । कभी – कभी भ्रष्टाचार की कुछ सनसनीखेज घटनाओं को लेकर जो भ्रष्टाचार विरोधी वातावरण बनता है या ’ लहर’ देश में पैदा होती है । उसका खोखलापन यह है कि उसमें सामाजिक स्थिति और नियंत्रण व्यवस्था की बुनियादी खामियों पर ध्यान नहीं जाता है । यहाँ तक कि मुख्य अपराधी को दंडित करने के बारे में गंभीरता नहीं रहती । वह सिर्फ एक व्यक्ति-विरोधी या घटना-विरोधी प्रचार होकर रह जाता है । कभी-कभी तो लगता है कि इस प्रकार के विरोधी प्रचार को चलाने के पीछे कुछ निहित स्वार्थ सक्रिय हैं ।

भ्रष्टाचार को जड़ से समझने के लिए निम्नलिखित आधारभूत विकृतियों की ओर ध्यान देना होगा – (१) प्रशासन के ढाँचे की गलतियाँ । जवाबदेही की स्पष्ट और समयबद्ध प्रक्रिया का न होना , भारतीय शासन प्रणाली का मुख्य दोष है । (२) समाज में आय-व्यय तथा जीवन-स्तरों की गैर-बराबरियाँ अत्यधिक हैं । जहाँ ज्यादा गैर-बराबरियाँ रहेंगी , वहाँ भ्रष्टाचार अवश्य व्याप्त होगा । (३) राष्ट्रीय चरित्र का पतनशील होना ।

जो लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ बहुत ज्यादा आक्रोश दिखाते हैं और भ्रष्टाचार को ही देश की अधोगति का केन्द्रीय मुद्दा मानते हैं , वे इस समस्या की जटिलताओं को बिलकुल अनदेखा कर देते हैं , मानो भ्रष्टाचार सिर्फ व्यक्ति-चरित्र का सवाल है । मानो प्रशासन और अर्थनीति जैसे हैं वैसे ही रहें , लेकिन भ्रष्टाचार , लेकिन भ्रष्टाचार खत्म हो जाना चाहिए । वे , दरअसल , जटिल और कठिन प्रश्नों से दूर भागने की अन्दरूनी इच्छा से प्रेरित हैं , जबकि जटिल प्रश्नों के साथ जोड़कर ही भ्रष्टाचार के सवाल का कोई कारगर समाधान निकल पाएगा ।

भ्रष्टाचार भारत में व्यवस्था का एक अंग है । ऐसे नियम-काएदे बने हुए हैं कि भ्रष्टाचार पनपेगा ही । प्रशासन के नियमों के बारे में कुछ उदाहरण दिए जा सकते हैं । प्रशासन में सुधार करना राजनीति का कोई मुद्दा नहीं है , भ्रष्टाचार-विरोधियों का भी मुद्दा नहीं है । अगर होता , तो इस तरह के गलत नियम अब तक नहीं रह पाते । उदाहरण के लिए , कुछ राज्यों में , जहाँ गैर-सरकारी स्कूलों के के शिक्षकों को वेतन सरकार देती है , ऐसे नियम बने हुए हैं कि प्रत्येक स्कूल का अध्यक्ष जिले के एक शिक्षा अधिकारी के दफ्तर में जाकर अपने स्कूल के लिए वेतन की रकम ले आयेगा और वितरित करेगा । अधिकारी बहाना बनाकर कई हफ़्तों तक टाल भी सकता है या घूस लेकर समूची राशि सही समय पर दे सकता है । प्रत्येक शिक्षक जानता है कि उसके मासिक वेतन का कुछ अंश घूस में जा रहा है । इस विकृति को सुधारना मामूली बात है – चेक द्वारा वेतन सीधे शिक्षकों के खाते में ही जमा होना चाहिए । इस प्रकार के हजारों गलत नियम बने हुए हैं , जिन्हें बदलने की जरूरत है । लेकिन प्रशासन में सुधार किसी राजनैतिक दल का महत्वपूर्ण कार्यक्रम नहीं है । भ्रष्टाचार विरोध को एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के रूप में चलानेवाले लोग भी इस पर कोई ध्यान नहीं देते ।

( जारी )

किशन पटनायक द्वारा लिखे गये इस विषय पर अन्य लेख :

राजनीति में मूल्य

भ्रष्टाचार की एक पड़ताल (१)

“               “     “    ” (२) राजनैतिक दल और भ्रष्टाचार

“           “        “    ” (३) फिजूलखर्ची और विलास

“          “         “    (४) प्रशासनिक सुधार

“           “       “    (५) विकास और मूल्य वृद्धि

 

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