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Archive for the ‘obc’ Category

“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।

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केंद्रीय मंत्रियों के समूह ने जाति गणना को कहने को तो हरी झंडी दे दी है, लेकिन वास्तविकता यह है कि मंत्रियों के समूह ने इस काम को बुरी तरह से फंसा दिया है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व में मंत्रियों के समूह का जो फॉर्मूला दिया है, उसके आधार पर जाति की गणना अगले पांच साल तक जारी ही रहेगी (यह समय बढ़ सकता है) और जो आंकड़े आएंगे, उसमें देश की लगभग आधी आबादी को शामिल नहीं किया जाएगा। साथ ही आंकड़ों के नाम पर सिर्फ जातियों की संख्या आएगी। न तो जातियों और जाति समूहों की शैक्षणिक स्थित का पता चलेगा और न ही सामाजिक-आर्थिक हैसियत का। मंत्रियों के समूह की इस बारे में की गई सिफारिश पर बहस आवश्यक है क्योंकि इसे लेकर अभी काफी उलझन बाकी है।

ओबीसी गिनती का प्रस्ताव औंधे मुंह गिरा

मंत्रियों के समूह ने उचित फैसला किया है कि जाति की गणना के दौरान सिर्फ ओबीसी की गिनती नहीं की जाएगी, बल्कि सभी जातियों के आंकड़े जुटाए जाएंगे। वामपंथी दलों ने ओबीसी गिनती के लिए प्रस्ताव दिया था।[i] कुछ समाजशास्त्री भी चाहते थे कि सभी जातियों की गिनती न करके सिर्फ ओबीसी की गिनती कर ली जाए क्योंकि सवर्ण समुदायों के लिए सरकार की ओर से कोई कार्यक्रम या योजना नहीं है। उनका सुझाव था कि सिर्फ अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी की गिनती करा ली जाए।[ii]

जाति गणना के बदले ओबीसी गणना की बात करने वाले लोग जाति के आंकड़ों को सिर्फ आरक्षण और सरकारी योजनाओं के साथ जोड़कर देखते हैं, जो बहुत ही संकीर्ण विचार है। जाति भारत में एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहचान है और इससे जुड़े समाजशास्त्रीय आंकड़ों का व्यापक महत्व है। इसी नजरिए इस देश में धर्म (जिसके आधार पर देश टूट चुका है) और भाषा (जिसकी वजह से हुए दंगों में हजारों लोग मारे गए हैं) के आधार पर हर जनगणना में गिनती होती है। अगर समाजशास्त्रीय आंकड़े जुटाने का लक्ष्य न हो तो जनगणना के नाम पर सिर्फ स्त्री और पुरुष का आंकड़ा जुटा लेना चाहिए।

जाति गणना और बायोमैट्रिक की धांधली

जाति गणना पर मंत्रियों के समूह ने जो फॉर्मूला बनाया है उसमें एक गंभीर खामी यह है कि इसमें जाति की गिनती को जनगणना कार्य से बाहर कर दिया गया है। मंत्रियों के समूह ने फैसला किया है कि जाति की गणना नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर के तहत बायोमैट्रिक ब्यौरा जुटाने के क्रम में कर ली जाएगी।[iii] बायोमैट्रिक ब्यौरा यूनिक आइडेंटिटी नंबर के लिए इकट्ठा किया जाना है। यानी जब लोग अपना यूआईडी नंबर के लिए जानकारी दर्ज कराने के लिए आएंगे तो उनसे उनकी जाति पूछ ली जाएगी। यह एक आश्चर्यजनक फैसला है। धर्म, भाषा, शैक्षणिक स्तर, आर्थिक स्तर से लेकर मकान पक्का है या कच्चा तक की सारी जानकारी जनगणना की प्रक्रिया के तहत जुटाई जाती है और ऐसा ही 2011 की जनगणना में भी किया जाएगा, लेकिन जाति की गिनती को जनगणना की जगह यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर की बायोमैट्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की बात की जा रही है।

यहां एक समस्या यह है कि बायोमैट्रिक डाटा कलेक्शन करने के लिए यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी (जिसके मुखिया नंदन निलेकणी हैं, जिन्हें सरकार ने कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा दिया है) को पांच साल का समय दिया गया है। साथ ही पांच साल में देश में सिर्फ 60 करोड़ आईडेंटिटी नंबर दिए जाएंगे। इस बात में जिसको भी शक हो वह यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी की सरकारी वेबसाइट –
http://uidai.gov.in/
पर जाकर इन दोनों बातों को चेक कर सकता है कि बायोमैट्रिक डाटा कितने साल में इकट्ठा किया जाएगा और कितने लोगों का बायोमैट्रिक डाटा जुटाया जाएगा। इंटरनेट पर इस सरकारी साइट को खोलते ही सबसे पहले पेज पर ही ये दोनों बातें आपको दिख जाएंगी।

यानी प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रियों के समूह ने जब बायोमैट्रिक दौर में जाति की गणना कराने की सिफारिश की थी, तो उन्हें यह मालूम था कि इस तरह जाति गणना का काम पांच साल या ससे भी ज्यादा समय में कराया जाएगा और इसमें भी देश के लगभग 120 करोड़ लोगों में सिर्फ 60 करोड़ लोगों के आंकड़े ही आएंगे।[iv] मंत्रियों के समूह ने देश के बहुजनों के साथ इतनी बड़ी धोखाधड़ी करने का साहस दिखाया, यह गौर करने लायक बात है। पांच साल बाद आए आकंड़ों का लेखा जोखा करने, अलग अलग जाति समूहों का आंकड़ा तैयार करने में अगर कुछ साल और लगा दिए गए, तो अगली जनगणना तक भी जाति के आंकड़े नहीं आ पाएंगे।

बायोमैट्रिक में गिनती यानी एससी/एसटी/ओबीसी की घटी हुई संख्या

15 साल में जिस देश में सभी मतदाताओं का मतदाता पहचान पत्र नहीं बना, उस देश में बायोमैट्रिक नंबर कितने साल में दिए जाएंगे, इसका अंदाजा भी आप लगा सकते हैं। मतदाता पहचान पत्र में तो सिर्फ मतदाता की फोटो ली जाती है जबकि बायोमैट्रिक नंबर के लिए तो फोटो के साथ ही अंगूठे का और आंख का डिजिटल निशान लिया जाएगा। इस काम के लिए कोई आपके घर नहीं आएगा बल्कि जगह जगह कैंप लगाकर यह काम किया जाएगा। इसमें कई लोग छूट जाएंगे जिनके लिए बारा बार कैंप लगाए जाएंगे। दर्जनों बार कैंप लगने के बावजूद अभी तक वोटर आईडी कार्ड का काम पूरा नहीं हुआ है। यह तब है जबकि वोटर आईडेंटिटी कार्ड बनवाने में राजनीतिक पार्टियां दिलचस्पी लेती हैं। बायोमैट्रिक नंबर दिलाने में पार्टियों की कोई दिलचस्पी नहीं होगी।

सरकार ने यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी की सरकारी वेबसाइट पर साफ लिखा है कि यह नंबर लेना जरूरी नहीं है।[v] यानी कोई न चाहे तो यह नंबर नहीं लेगा। बहुत सारे लोग इसका कोई और महत्व न देखकर इसे नहीं लेंगे। ऐसे में जाति की गणना से काफी लोग बाहर रह जाएंगे। जबकि जनगणना के कर्मचारी हर गांव, बस्ती के हर घर में जाकर जानकारी लेते हैं और इसमें लोगों के छूट जाने की आशंका काफी कम होती है।

बायोमैट्रिक के नाम पर जिस तरह की गड़बड़ी हो रही है और उसे देखते हुए कोई सरकार कल यह फैसला कर सकती है कि आईडेंटिटी नंबर नहीं दिए जाएंगे। इस तरह जाति गणना का काम फंस जाएगा। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि देश में लाखों लोग घुमंतू जातियों के हैं। इन लोगों का बायोमैट्रिक आंकड़ा लेना संभव नहीं है। साथ ही शहरों में अस्थायी कामकाज के लिए आने वालों गरीबों का भी बायोमैट्रिक आंकड़ा लेना आसान नहीं हैं। इस तरह आबादी का एक बड़ा हिस्सा यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर के लिए बायोमैट्रिक आंकड़ा देने की गतिविधि में शामिल नहीं हो पाएगा और उस तरह उनकी जाति का हिसाब नहीं लगाया जाएगा। आप समझ सकते हैं कि इनमें से ज्यादातर लोग अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों से हैं। इस तरह स्पष्ट है कि बायोमैट्रिक के साथ जाति गणना कराने से एससी/एसटी/ओबीसी समूहों की संख्या घटकर आएगी।

बायोमैट्रिक के नाम पर बहुत बड़ी साजिश

ताज्जुब की बात है कि 9 फरवरी से लेकर 28 फरवरी 2011 के बीच जब देश भर में जनगणना होगी और धर्म और भाषा से लेकर तमाम तरह के आंकड़े जुटाए जाएंगे तब जाति पूछ लेने में क्या दिक्कत है? जनगणना से जाति गणना के काम को बाहर करना एक बहुत बड़ी साजिश है, जिसका पर्दाफाश करना जरूरी है। 1871 से 1931 तक जनगणना विभाग जाति गणना का काम करता था और उस समय तो सरकारी कर्मचारी भी कम थे और कंप्यूटर भी नहीं थे। सवा सौ साल पहले अगर जनगणना के साथ जाति की गिनती होती थी, तो नए समय में इस काम को करने में क्या दिक्कत है।

यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि 1931 की जनगणना अभी भी जाति की गिनती से मामले में देश का एकमात्र आधिकारिक दस्तावेज है और मंडल कमीशन से लेकर तमाम सरकारी नीतियों में इसी जनगणना के आंकड़े को आधार माना जाता है। 1931 की जनगणना के तरीकों को लेकर किसी भी तरह का विवाद नहीं है और न ही किसी कोर्ट ने कभी इस पर सवाल उठाया है। जाहिर है कि 1931 में जिस तरह जाति की गिनती जनगणना के साथ हुई थी, वह 2011 में भी संभव है। अब चूंकि कंप्यूटर और दूसरे उपकरण आ गए हैं, इसलिए इस काम को ज्यादा असरदार तरीके से किया जा सकता है। जाहिर है जनगणना के साथ जाति गणना न कराना एक साजिश के अलावा कुछ नहीं है। इसका मकसद सिर्फ इतना है कि किसी भी तरह से ऐसा बंदोबस्त किया जाए कि जाति के आंकड़े सामने न आएं।

बायोमैट्रिक यानी आर्थिक-शैक्षणिक आंकड़े नहीं

बायोमैट्रिक ब्यौरा जुटाने के साथ जाति गणना को जोड़ने में और भी कई दिक्कतें हैं। इसकी एक बड़ी दिक्कत के बारे में केंद्रीय गृह सचिव जी. के. पिल्लई कैबिनेट नोट में लिख चुके हैं। बायोमैट्रिक आंकड़ा संकलन के साथ जाति की गिनती करने से जातियों से जुड़े सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक तथ्य और आंकड़े सामने नहीं आएंगे। जनगणना के फॉर्म में ये सारी जानकारियां होती हैं, जबकि बायोमैट्रिक डाटा संग्रह के साथ यह काम संभव नहीं है। बायोमैट्रिक आंकड़ा जुटाते समय लोगों से जो जानकारियां ली जाएंगी वे इस प्रकार हैं – नाम, जन्म की तारीख, लिंग, पिता/माता, पति/पत्नी या अभिभावक का नाम, पता, आपकी तस्वीर, दसों अंगुलियों के निशान और आंख की पुतली का डिजिटल ब्यौरा।[vi]

सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक आंकड़ों के बिना हासिल जाति के आंकड़े दरअसल सिर्फ जातियों की संख्या बताएंगे, जिनका कोई अर्थ नहीं होगा। सिर्फ जातियों की संख्या जानने से अलग अलग जाति और जाति समूहों की हैसियत के बारे में तुलनात्मक अध्ययन संभव नहीं होगा। यानी जिन आंकड़ों के अभाव की बात सुप्रीम कोर्ट और योजना आयोग ने कई बार की है, वे आंकड़े बायोमैट्रिक के साथ की गई जाति गणना से नहीं जुटाए जा सकेंगे।

जाति जनगणना का लक्ष्य सिर्फ जातियों की संख्या जानना नहीं होना चाहिए। न ही जाति की गणना को सिर्फ आरक्षण और आरक्षण के प्रतिशत के विवाद से जोड़कर देखा जाना चाहिए। जनगणना समाज को बेहतर तरीके से समझने और संसाधनों तथा अवसरों के बंटवारे में अलग अलग सामाजिक समूहो की स्थिति को जानने का जरिया होना चाहिए। जनगणना में जाति को शामिल करने से हर तरह के सामाजिक, शैक्षणिक और सामाजिक आंकड़े सामने आएंगे। इन आंकड़ों का तुलनात्मक अधघ्ययन भी संभव हो पाएगा। सरकार इन आंकड़ों के आधार पर विकास के लिए बेहतर योजनाएं और नीतियां बना सकती हैं। अगर ओबीसी की किसी जाति की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति बेहतर हो गई है, इसका पता भी जातियों से जुड़े तमाम आंकड़ों के आधार पर ही चलेगा। इन आंकड़ों से जातिवाद के कई झगड़ों का अंत हो जाएगा और नीतियां बनाने का आधार अनुमान नहीं तथ्य होंगे।

बायोमैट्रिक डाटा संग्रह के साथ जाति की गणना कराने में एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि पहचान पत्र बनाने वाली एजेंसी को जनगणना का कोई अनुभव नहीं है, न ही उसके पास इसके लिए संसाधन या ढांचा है। जनगणना का काम जनगणना विभाग ही सुचारू रूप से कर सकता है। जनगणना के दौरान जाति की गणना करने से जनगणना विभाग इसकी निगरानी कर पाएगा। बायोमैट्रिक आंकड़ा संकलन के दौरान यह व्यवस्था नहीं होगी।[vii] इसे देखते हुए जाति गणना के काम को जनगणना विभाग के अलावा किसी और एजेंसी के हवाले करने का कोई कारण नहीं है।

बायोमैट्रिक: एक अवैज्ञानिक तरीका

साथ ही नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर के लिए 15 साल से ज्यादा उम्र वालों की ही बायोमैट्रिक सूचना ली जाएगी। परिवार के बाकी लोगों के बारे में इन्हीं से पूछकर कॉलम भरने का समाधान गृह मंत्रालय दे रहा है, जो अवैज्ञानिक तरीका है।[viii] बायोमैट्रिक और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर का काम अभी प्रायोगिक स्तर पर है। इसे लेकर विवाद भी बहुत हैं। इसलिए यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर और बायोमैट्रिक डाटा संग्रह के साथ जाति की गणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य को शामिल करना सही नहीं है।


[i] सीपीएम नेता सीताराम येचुरी का 12 अगस्त, 2010 को दिया गया बयान
http://in.news.yahoo.com/43/20100812/818/tnl-caste-census-should-ensure-scientifi_1.html

[ii] योगेंद्र यादव का द हिंदू अखबार में 14 मई को छपा लेख
http://beta.thehindu.com/opinion/op-ed/article430140.ece?homepage=true

[iii] समाचार पत्रों में छपी रिपोर्ट, यहां देखिए टाइम्स ऑफ इंडिया का लिंक
http://timesofindia.indiatimes.com/india/GoM-clears-caste-query-in-census-at-biometric-stage/articleshow/6295048.cms

[iv] यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी की सरकारी वेबसाइट का होमपेज

[v]
http://uidai.gov.in/
देखें इस साइट का FAQs सेक्शन, पूछा गया सवाल है – Will getting a UID be compulsory?

[vi]
http://uidai.gov.in/

[vii] भारत के पूर्व रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त डॉ. एम विजयनउन्नी, कास्ट सेंसस: /टुअर्ड्स एन इनक्लूसिव इंडिया, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोशल एक्सक्लूशन एंड इनक्लूसिव पॉलिसी, नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी का प्रकाशन, पेज- 39

[viii] केंद्रीय गृह सचिव जी. के. पिल्लई का मंत्रियों के समूह की बैठक में सौंपा गया नोट

- दिलीप मण्डल , सम्पर्क -  dilipcmandal@gmail.com

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    शिक्षा की अपनी एक दुनिया है । वहीं शिक्षा-जगत व्यापक विश्व का एक हिस्सा भी है – एक उप व्यवस्था । उप व्यवस्था होने के कारण व्यापक विश्व के- मूल्य , विषमतायें , सत्ता सन्तुलन आदि के प्रतिबिम्ब आप यहाँ भी देख सकते/सकती हैं । हर जमाने की शिक्षा व्यवस्था उस जमाने के मूल्य , विषमताओं , सत्ता सन्तुलन को बरकरार रखने का एक औजार होती है । हमारी तालीम में एक छलनी-करण की प्रक्रिया अन्तर्निहित है । लगातार छाँटते जाना । मलाई बनाते हुए, छाँटते जाना। उनको बचाए रखना जो व्यवस्था को टिकाए रखने के औजार बनने ‘लायक’ हों । इस छँटनी-छलनी वाली तालीम का स्वरूप बदले इसलिए एक नारा युवा आन्दोलन में चला था – ‘खुला दाखिला ,सस्ती शिक्षा । लोकतंत्र की यही परीक्षा’ यानि जो भी पिछली परीक्षा पास कर चुका हो और आगे भी पढ़ना चाहता हो , उसे यह मौका मिले। १९७७ में यही नारा लगा कर हमारे विश्वविद्यालय में ‘खुला दाखिला’ हुआ था । इस नारे को मानने वाले उच्च शिक्षा में आरक्षण के विरोधी थे और नौकरियों में विशेष अवसर के पक्षधर । इस नारे की विफलता के कारण शिक्षा में आरक्षण की आवश्यकता आन पड़ी ।

     न्यायपालिका (जहाँ आरक्षण नहीं लागू है) ने सांसद-विधायकों के बच्चों को क्रीमी लेयर मान कर आरक्षण से वंचित रखने की बात कही है । क्रीमी लेयर के कारण वास्तविक जरूरतमंद आरक्षण से वंचित हो जाते हैं यह माना जाता है। अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति में क्रेमी लेयर के rider से न्यायपालिका ने इन्कार किया है । तीसरे तबके में क्रीमी लेयर की बाबत जज चुप हैं। क्या अनारक्षित वर्ग में मलाईदार परतें नहीं हैं ? क्या विश्वविद्यालयों में इस तबके मास्टरों के बच्चे उन्हीं विभागों में टॉप करने के बाद वहीं मास्टर नहीं बनते ? क्या अनारक्षित वर्ग के अफ़सरों के बच्चे अफ़सर नहीं बनते ? नेता के बच्चे नेता भी हर वर्ग में बनते हैं ।  गैर मलाईदार वर्गों के साथ उन्हें स्पर्धा में क्यों रखा जाता है ? गैर आरक्षित वर्ग के क्रीमी लेयर पर भी  rider लगाने की बहस भी अब शुरु होनी चाहिए ।

    पिछड़े वर्गों के कुछ अभ्यर्थी खुली स्पर्धा से भी चुने जाते हैं और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के भी । हर साल लोक सेवा आयोग द्वारा अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों के सामान्य वर्ग में चुने जाने की तादाद बढ़ने की स्वस्थ सूचना प्रेस कॉन्फ़रेन्स द्वारा दी जाती है। सामान्य सीटों पर उत्तीर्ण होने वाले पिछड़े वर्गों के अभ्यर्थियों की गिनती ‘कोटे’ के तहत क्यों नहीं की जाती इसे मण्डल कमीशन की रपट में बहुत अच्छी तरह समझाया गया है ।

  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कल दिए गए फैसले के बाद हमारे समाज की यथास्थिति ताकतें ( जैसे मनुवादी मीडिया और फिक्की , एसोकेम जैसे पूंजीपतियों के संगठन ) फिर खदबदायेंगी , यह लाजमी है ।

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योगेन्द्र यादव

समाजशास्त्री

जो लोग आरक्षण को ख़ारिज करते हैं, वो तो हमेशा से सामाजिक न्याय के सवाल को भी ख़ारिज करते रहे हैं. ये वो लोग हैं जो कि हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग को अन्य वर्गों के लिए कुछ भी छोड़ना पड़े, इस स्थिति के लिए तैयार नहीं हैं.

ये वे लोग हैं जिन्होंने न तो हमारा समाज देखा है और न ही अवसरों की ग़ैर-बराबरी को समझने की कोशिश की है. ध्यान रहे कि किसी भी समाज में भिन्नताओं को स्वीकार करना उस समाज की एकता को बढ़ावा देता है न कि विघटन करता है.

मिसाल के तौर पर अमरीकी समाज ने जबतक अश्वेत और श्वेत के सवाल को स्वीकार नहीं किया, तबतक वहाँ विद्रोह की स्थिति थी और जब इसे सरकारी तौर पर स्वीकार कर लिया गया, तब से स्थितियाँ बहुत सुधर गई हैं.

 

 

 

हाँ, अगर आप भिन्नताओं की ओर से आँख मूँदना समाज को तोड़ने का एक तयशुदा फ़ार्मूला है.

अगर पिछले 50 साल के अनुभव पर एक मोटी बात कहनी हो तो मैं एक बात ज़रूर कहूँगा कि आरक्षण की व्यवस्था एक बहुत ही सफल प्रयोग रहा है, समाज के हाशियाग्रस्त लोगों को समाज में एक स्थिति पर लाने का.

सफल कैसे, इसे समझने के लिए इसके उद्देश्य को समझना बहुत ज़रूरी है.

आरक्षण का उद्देश्य

आरक्षण की व्यवस्था पूरे दलित समाज की सामाजिक स्थिति को बदलने का आधार न तो थी और न हो सकती है. आरक्षण की व्यवस्था ग़रीबी की समस्या का समाधान भी न तो कभी थी न बन सकती है.

कुछ सरकारी महकमों और शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की व्यवस्था इस उद्देश्य से बनाई गई थी कि समाज में, राजनीति में और आधुनिक अर्थव्यवस्था के जो शीर्ष पद हैं, उनमें जो सत्ता का केंद्र है, वहाँ दलित समाज की एक न्यूनतम उपस्थिति बन सके.

इस उद्देश्य को लेकर चलाई गई यह व्यवस्था इस न्यूनतम उद्देश्य में सफल रही है.

आज अगर हम सिविल सेवाओं से लेकर चिकित्सकों, इंजीनियरों के रूप में दलित समाज के कुछ लोगों को देख पा रहे हैं तो इसका श्रेय आरक्षण को जाता है. बल्कि यूँ कह सकते हैं कि अगर यह व्यवस्था नहीं होती तो शायद दलित समाज की स्थिति वर्तमान स्थिति से भी बदतर होती.

वैश्विक रूप से देखें तो दुनिया के जिन देशों में हाशिए पर पड़े लोगों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए जो प्रयोग हुए हैं, भारत में आरक्षण की व्यवस्था उनमें सबसे सफल प्रयोग के रूप में देखा जाएगा और दुनिया के बाकी देश इससे सीख सकते हैं.

चिंता

दिक्कत की बात यह है कि इतने वर्षों तक प्रयोग चलाने के बाद आरक्षण हमारे समाज में सामाजिक न्याय का पर्याय बन गया है. कई मायनों में उसका विकल्प बन गया है. यह दुखद स्थिति है.

यह तो उस तरह है कि कोई सर्जन एक ही कैंची से हर तरह की सर्जरी करे.

असल में आरक्षण एक विशेष स्थिति से निपटने का औजार है और वह विशेष स्थिति यह है कि समाज का जो वर्ग सिर्फ़ पिछड़ा ही नहीं रहा बल्कि जिसे बहिष्कृत किया गया हो, उसे अगर कुछ चुनिंदा कुर्सियों पर बैठाना है तो उन कुर्सियों पर निशान लगाकर उन्हें आरक्षित कर देना एक बेहतर तरीका है.

अब होता यह जा रहा है कि हर वर्ग की समस्याओं के लिए आरक्षण ही एकमात्र विकल्प से रूप में सुझाया जा रहा है. सामाजिक न्याय के पक्षधर लोग भी इसके बारे में सोचते नहीं हैं और केवल इसके बारे में आरक्षण को ही विकल्प मानते हैं.

आवश्यकता इस बात की है कि हम आरक्षण की व्यवस्था को और उसके इर्द-गिर्द जो ज़रूरतें हैं, उन्हें मज़बूत करें ताकि आरक्षण की व्यवस्था का सही अर्थों में सही लोगों तक लाभ पहुँच सके.

आरक्षण से आगे

आरक्षण सरकारी नौकरियों और राजनीति तक के सीमित क्षेत्र में लाभप्रद रहा है पर और भी मुद्दे हैं जिनका समाधान आरक्षण नहीं है और उनपर काम होना बाकी है.

इनमें भूमि के बँटवारे की समस्या, शिक्षा में ग़ैर-बराबरी की समस्या और आर्थिक क्षेत्र में ग़ैर बराबरी की समस्या जैसे सवाल आते हैं जिनका समाधान आरक्षण नहीं है और हम इन सवालों पर कुछ नहीं कर रहे हैं.

जो वर्ग वर्जना और वंचना का शिकार नहीं रहे हैं, जैसे अन्य पिछड़ी जातियाँ हैं, जैसे महिलाएँ हैं, उनके लिए प्रारंभिक शिक्षा को बेहतर बनाने की ज़रूरत है.

इन वर्गों के लोगों को उससे ऊपर जाने पर जाति आधारित आरक्षण देने की ज़रूरत नहीं है बल्कि हम इसे मापने की कोशिश करें कि उसे किस तरह के पिछड़ेपन से गुज़रा है और उस आधार पर उसे वरीयता दी जाए.

साथ ही आरक्षण की व्यवस्था में कुछ बदलाव भी करने होंगे. जैसे एक पीढ़ी में जो लोग आरक्षण का लाभ उठा चुके हैं, उनकी दूसरी पीढ़ी को उस स्तर तक इस व्यवस्था का लाभ न मिले.

मसलन, अगर आरक्षण के ज़रिए कोई अध्यापक बन जाता है तो उसकी संतान को अध्यापक बनने तक के प्रयास में आरक्षण का लाभ न मिले. हाँ, अगर वो आईएएस बनना चाहता है तो ज़रूर दिया जाना चाहिए क्योंकि वहाँ स्थितियाँ दूसरी हो जाएंगी.

साथ ही जो जातियाँ राष्ट्रीय औसत से बेहतर हो चुकी हैं उनके लिए इस व्यवस्था को समाप्त करना चाहिए.

(भारत में जारी आरक्षण व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर योगेंद्र यादव ने पाणिनी आनंद के साथ कुछ समय पूर्व हई बातचीत में ये विचार व्यक्त किए थे)

साभार बी बी सी हिन्दी

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