Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘politics’ Category

समाजवादी जनपरिषद के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष साथी विष्णुदेव गुप्त द्वारा स्थापित डॉ राममनोहर लोहिया बालिका विद्यालय , मधुबन के प्रांगण में सजप-उ.प्र राज्य समिति की बैठक दिनांक २४ नवम्बर , २०१२ को राज्य उपाध्यक्ष साथी रामछबीला साहनी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई।
उपस्थिति – शैलेश कुमार (वि.यु.स.,निमंत्रित),नंदकिशोर विश्वकर्मा (निमंत्रित), सदस्य- लोकनाथ मौर्य,लालबिहारी राजभर,विजयी मौर्य,रामछबीला साहनी,शेषमणि त्रिपाठी,रामलच्छन मौर्य,शिवप्रसाद दुबे,सत्येन्द्र दुबे,रामकेवल चौहान,रामसरीख विश्वकर्मा,विक्रमा मौर्य,जयराम भारती,डॉ. स्वाति, बृजबिहारी मल्ल,चंचल मुखर्जी,सुनील कुमार,अफलातून तथा रामजनम ने भाग लिया ।

    शेषमणि त्रिपाठी (सदस्य, राष्ट्रीय कार्यकारिणी)

- १९९१-’९२ में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को लागू किए जाने के बाद से घपले-घोटाले बढ़ रहे हैं । इन्होंने मार्क्स ,लेनिन व लोहिया को उद्धृत करते हुए भ्रष्टाचार के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को जिम्मेदार बताया।
भले ही , १००० पंजीकृत दल हों मगर विचारधारा पर आधारित एक मात्र सजप है । पिछले दो सालों से अन्ना हजारे के नेतृत्व में जो आन्दोलन चल रहा है उसका नाम अंग्रेजी में क्यों है ? इसके कार्यक्रमों में जो मजमा जुटता है वह शहरी मध्य वर्ग का होता है । अन्ना की ईमानदारी पर शक नहीं लेकिन आन्दोलन के कार्यकर्ताओं किसानों – मजलूमों से कोई मतलब नहीं । इन्हें मीडिया का जो फोकस मिल रहा है उसमें भी पैसे का खेल है । गोरखपुर इकाई ने २७ सितम्बर २०१२ को समान शिक्षा ,सांस्कृतिक क्रांति,अंग्रेजी के वर्चस्व की समाप्ति के मुद्दों से भ्रष्टाचार का संबंध रेखांकित करते हुए धरना दिया था। हमें अपनी भीतरी कमियों को दूर करना होगा,त्याग करना होगा और सक्रियता बढ़ानी होगी ।

    अफलातून (सदस्य , राष्ट्रीय कार्यकारिणी)

शेषमणिजी की बातों से यह स्पष्ट हो गया कि इस दल का हर सदस्य मजबूत धरातल पर खड़ा है और उसके भ्रमित होने का सवाल नहीं है।हम विकेन्द्रीकरण में विश्वास रखते हैं तो राजनैतिक प्रक्रियाओं की चर्चा भी बुनियादी इकाइयों से शुरु होकर जिला , राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक होगी। केजरीवाल टीम स्वयंसेवी संस्थाओ पर सूचना अधिकार कानून लागू करने के विरुद्ध है। हम सोमनाथ त्रिपाठी के पत्र की इस बात की निन्दा करते हैं जिसमें वह कह रहे हैं कि ‘कुछ लोग अफवाह फैला रहे हैं।राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उन्होंने खुद कहा है सजप को पूरी तरह नए दल में चले जाना चाहिए।
उ.प्र. में साथी विक्रमा मौर्य और सत्येन्द्र यादव को केजरीवाल के दल के प्रति लुभाते हुए इस मुद्दे पर जेपी सिंह ने फोन किया लेकिन राज्य समिति में भाग लेने से वे कतरा गए।
बिहार इकाई के साथी २६ नवम्बर , २०१२ की केजरीवाल की रैली में सजप के झण्डे-बैनर के साथ यदि शामिल हुए तो उससे विलय का भ्रम पैदा होगा इसलिए राष्ट्रीय नेतृत्व को चाहिए उन्हें तत्काल ऐसा न करने के लिए सावधान कर दें ।

    शिवप्रसाद दुबे

अखबारों में योगेन्द्र यादव का नाम देख कर लगा था’हमारे लोग भी लगे हैं।’ १९९५ में जब सजप बनी थी तब भी भारत दलविहीन नहीं था। आज भी दल किसी को रोकता नहीं है । यदि कोई एम.पी-एम.एल.ए बनने के लिए किसी दल में जाते हों तो जाएं। मुलायम सिंह यादव के दल में शामिल होने की पात्रता (आपराधिक पृष्टभूमि) हमारे कार्यकर्ताओं में है ही नहीं ।
हमने वह दौर देखा है जब विष्णुदेवजी ,अफलातूनजी और चंचल मुखर्जी प्रदेश में जम कर दौरा करते थे ।
अन्ना-केजरीवाल के आन्दोलन से जनता कुछ समय के लिए जरूर उत्साहित हुई। प्रान्तीय अध्यक्ष साथी सुभाषचन्द्र जी ने संदीप पाण्डे को साफ शब्दों में कहा था कि बिना राजनीति परिवर्तन संभव नहीं है ।
१७ वर्षों बाद हमारा दल किसी अन्य दल में जाने की बात सोचे भी तो यह मुझे गलत लगता है । घोटालों के खुलासों के दम पर भ्रष्टाचार हट जाएगा यह संभव नहीं है। कुछ लोग अगर यह सोचते हैं तो वे गलत हैं ।

    सत्येन्द्र यादव

७-८ वर्षों से दल से जुड़ा हूं । मेरे राजनैतिक जीवन की शुरुआत यहीं से हुई है। केजरीवाल की नीतियां क्या हैं ? उन्हें हमारे दल में शामिल हो जाना चाहिए। केजरीवाल जन-लोकपाल के दाएरे में NGO को क्यों नहीं चाहते ?

    रामकेवल चौहान (सदस्य,राष्ट्रीय कार्यकारिणी )

जलपाईगुड़ी की राष्ट्रीय परिषद के समय लग रहा था कि पार्टी टूट जाएगी । उस समय सोपा(इंडिया) गठित होने वाली थी ।केजरीवाल का दल १७ महीने भी नहीं चलेगा । उनके काम को देखने के बाद संवाद हो । अगर हमारे साथी केजरीवाल के दल में गये तो वह सीधा सीधा धोखा होगा । विलय का मैं कट्टर विरोधी हूं ।
साथी रामकेवल ने नागपुर में जीरो बजट खेती के शिविर से पहले जेपी सिंह द्वारा बदतमीजी का जिक्र किया।

    रामसरीख विश्वकर्मा

पार्टी के अस्तित्व के पक्ष में खड़ा रहूंगा ।

    जयराम भारती

कुछ निजी कारणों से मेरी सक्रियता में कुछ कमी आई है। दल और संगठन के साथ हूं ।

    विक्रमा मौर्य(संगठन मंत्री)

हमें किसी अन्य दल के विधान को जांचने की जरूरत नहीं । अपने विधान को सामने रख कर सक्रियता से काम करना चाहिए।
हम बरसों से दिन-प्रतिदिन ब्लॉक , तहसील के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हैं । कार्यकर्ता आंखों की पुतली होते हैं । जेपी सिंह का व्यवहार इस परिभाषा के विपरीत है । उन्होंने फोन पर मुझे केजरीवाल की पार्टी के प्रति प्रोत्साहित करने की निष्फल कोशिश की थी।

    बृजबिहारी मल्ल

केजरीवाल की पार्टी चार दिनों की है ।

    डॉ स्वाति (स्थाई आमंत्रित राष्ट्रीय कार्यकारिणी )

सजप का गठन अचानक हुई किसी घोषणा से नहीं हुआ था। कई सहमना संगठनों ने लम्बे समय तक जरूरी मसलों पर चर्चा-बहस के बाद एक राय कायम की थी । अचानक हुई घोषणा गलत होती है । विचारों के आदान-प्रदान का इस बार अभाव है ।
इस प्रस्तावित दल की सामाजिक-आर्थिक नीतियां अस्पष्ट हैं । सिर्फ मीडिया में छा जाने से व्यवस्था परिवर्तन नहीं होता ।हम अपने विश्लेषण को अंतिम सत्य नहीं मानते इसलिए बराबरी के आधार पर चर्चा के हक में हैं । विचार मिलने पर साथ काम हो सकता है । विलय का तो सवाल ही नहीं उठता । जमीन से जुड़े लोग कार्यकर्ताओं से हमेशा संवाद रखते हैं ।

    चंचल मुखर्जी

अगर दो व्यक्ति IAC से बात के लिए अधिकृत थे तो उसकी रिपोर्ट संगठन को क्यों नहीं दी गई ? यह बात सिर्फ पदाधिकारियों तक क्यों सीमित रही ? हम राजनीति करते हैं कोई मठ नहीं चलाते । हमारी राजनीति में नीतिगत बातों का जरूरी स्थान है। उतावलापन उनमें होता है जो जमीन से जुड़े नहीं होते।

    लालबिहारी राजभर

विष्णुदेवजी ने कहा था ,‘घूस नहीं देकर आओगे तो उस बात के लिए मैं लड़ूंगा।’

    शैलेश (वियुस,आमंत्रित)

” धीरज धरहिं,सो उतरहिं पारा”
रामजनम (महामन्त्री ) -

    जिला/राज्य इकाइयां व्यक्तिवाद और तदर्थवाद से चल रही हैं । मुझे भी टटोला जा रहा था। दल के अध्यक्ष और महामंत्री उसे ठीक से नहीं चला रहे हैं। राष्ट्रीय परिषद के बाद कार्यक्रम हो ।
    रामछबीला साहनी (अध्यक्षता)

हम विलय के पक्ष में नहीं हैं । उस दल से वार्ता कर सकते हैं। झंडा-बैनर के साथ दूसरे दल के कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए।
बैठक में बलिया के साथी सुनील कुमार पाण्डे को राज्य समिति का सदस्य बनाया गया।
रामजनम ने सूचित किया कि २३ से २७ फरवरी देवरिया में जीरो बजट खेती पर शिबिर होगा।

    इस बैठक में सजप-उ.प्र. राज्य समिति ने सर्व सम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किया है :

सजप-उ.प्र की यह स्पष्ट मान्यता है कि अरविंद केजरीवाल की प्रस्तावित पार्टी की विभिन्न मसलों पर नीतियां अस्पष्ट और अज्ञात हैं। इस परिस्थिति में दल के साथी यदि सजप के झंडे-बैनर के साथ यदि उनके दल के कार्यक्रम में भाग लेते हैं तो दल का नुकसान होगा।अतः दल के राष्ट्रीय नेतृत्व से यह आग्रह है कि उन साथियों को तत्काल सावधान करें कि वे २६ नवंबर को दल के झंडे-बैनर का प्रयोग न करें।
सजप उ.प्र. ने यह फैसला किया है कि सजप के किसी अन्य दल में विलय का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए। अन्य दल/समूह से दल के संवाद में यह ध्यान रखा जाए कि सजप से अधिक से अधिक लोग इस संवाद में भाग लें । तथा संवाद की सूचना राष्ट्रीय कार्यकारिणी , दल की इकाइयों को समय-समय पर देते रहें ।
सजप उ.प्र प्रस्ताव करती है दल में जान फूंकने के लिए राष्ट्रीय परिषद कार्यक्रम का आवाहन करे।

Read Full Post »

यह एक कठिन चुनौती है, जिसकी पर्याप्त तैयारी न होने से निराशा ही हाथ लगेगी, इसकी आशंका है। 1977 के बाद ऐसा ही हुआ था। खास तौर पर अन्ना टीम को निम्न सवालों का सामना करना होगा।
1.    राजनैतिक विकल्प तैयार करने के लिए अन्ना टीम को अपनी नीतियों और वैचारिक दृष्टि को स्पष्ट करना होगा। पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, नवउदारवाद, वैश्वीकरण-निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों, कंपनी राज और विकास के आधुनिक माॅडल के बारे में उनकी क्या सोच है ?
2.    सामाजिक न्याय, जाति प्रथा, स्त्री-पुरुष भेद, आरक्षण नीति, मनुवादी-ब्राम्हणवादी व्यवस्था आदि के बारे मंे उनकी क्या राय है ?
3.    अन्ना आंदोलन ने देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम की भावना को जगाने की कोशिश की है, जिसका स्वागत है। किन्तु उनको स्पष्ट करना होगा कि उनका राष्ट्रवाद उग्र व संकीर्ण होगा या उदात्त और सहिष्णु होगा ? यह विविधता, बहुलता और विकेन्द्रीकरण पर आधारित होगा या नहीं ? इसमें हाशिए पर रहने वाले छोटे और अल्पसंख्यक समुदायों की बराबरीपूर्ण व सम्मानपूर्ण जगह होगी या नहीं ? साम्प्रदायिकता के सवाल पर भी उन्हें अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी।
4.    आज के चुनाव दो नंबरी धन, गुण्डों, जातिवाद, साम्प्रदायिकता और कार्यकर्ताओं की फौज के बल पर जीते जाते हैं। अन्ना टीम इसका मुकाबला कैसे करेगी ? गांव-गांव, मोहल्ले-मोहल्ले मंे समर्पित व ईमानदार कार्यकर्ता कहां से लाएगी ? क्या एक वैकल्पिक राजनैतिक संस्कृति और कार्यशैली बनाने के बारे मंे उन्होंने सोचा है ? क्या इसका कोई अनुभव उनके पास है ? यदि नहीं, तो अनुभव की कमी को कैसे दूर करेंगे ?
5.    देश में पहले से अनेक संगठन और समूह जमीन पर जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं और वैकल्पिक राजनीति के प्रयोग कर रहे हैं। क्या अन्ना टीम उनके साथ कोई संवाद कायम करेगी  ? लोहिया, जेपी, शंकर गुहा नियोगी, किशन पटनायक एवं सच्चिदानंद सिन्हा जैसे विचारकों और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, समता संगठन व समाजवादी जन परिषद जैसे संगठनों ने वैकल्पिक राजनीति पर काफी सोचा है और प्रयोग किए हैं। क्या अन्ना के साथी उनके अनुभवों से सीखने और उनके साथ बराबरी का रिश्ता कायम करने के लिए तैयार हैं ?
6.    अन्ना ने कहा है कि वे अच्छे और ईमानदार उम्मीदवारों का चुनाव करेंगे। इसकी क्या कसौटी होगी और क्या गारंटी होगी ? व्यक्तिगत रुप से तो मनमोहन सिंह, ममता बनर्जी और नरेन्द्र मोदी भी ईमानदार हैं। क्या देश चलाने के लिए व्यक्तिगत ईमानदारी पर्याप्त है ?
7.    अन्ना टीम की नजर 2014 के लोकसभा चुनावों पर मालूम होती है। किन्तु वैकल्पिक राजनीति खड़ी करके सफलता पाने के लिए इतना समय काफी अपर्याप्त है। अन्ना टीम की कितनी लंबी तैयारी है ? क्या वे इस बात के लिए तैयार हैं कि चुनाव में उनके अधिकांश उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो जाए ? क्या इससे उन्हें झटका नहीं लगेगा और वे निराश होकर चुप नहीं बैठ जाएंगे ? या चुनावी सफलता पाने के लिए वे भी सिद्धांतों से समझौता नहीं कर लेगें ? क्या वे इसके लिए गलत तत्वों से हाथ नहीं मिलाते जाएंगे और क्या गलत प्रवृत्तियों को अनदेखा नहीं करते जाएंगे ? दोनों स्थितियों में क्या वे देश मंे परिवर्तन चाहने वाली जनता के बीच निराशा की लहर नहीं पैदा करेंगे ?
8.    एक वैकल्पिक राजनीति के लिए जन आंदोलन, रचनात्मक कार्य, वैचारिक स्पष्टता, नीचे से संगठन निर्माण तथा चुनावी अनुभव इन पांचों मोर्चों पर काम करने की जरुरत है। इसके बारे में क्या अन्ना टीम की कोई योजना है और यदि है तो क्या ? व्यवस्था परिवर्तन कैसे होगा, इसका कोई रोडमेप उनके पास है ?
ये सवाल आज कई लोगों के मन में है और इनके जवाब पर अन्ना आंदोलन का भविष्य निर्भर करता है।

Read Full Post »

ईसा मसीह स्वयं  पैदाइशी तौर पर यहूदी थे । वैसे ही नया दल बनाने की घोषणा करने वाले  केजरीवाल का कार्यक्रम लाजमी तौर पर  ‘इन्डिया अगेंस्ट करप्शन’ द्वारा बुलाया गया था – नए दल द्वारा नहीं  । नए दल का नाम ,संविधान और शायद पदाधिकारियों की सूची नवम्बर 26 को घोषित  किए जाएंगे – यह उस मंच से  परसों घोषित किया गया । कल के ‘दी हिन्दू ‘ मे  यह पहले पेज की मुख्य खबर में था  । खबर के अनुसार दल के नाम ,संविधान और पदाधिकारियों केके नाम आदि की घोषणा ”नवम्बर 26 ,अम्बेडकर जयन्ती ” के दिन होंगी । क्या यह सामान्य सी चूक थी ? दल का नाम आदि कब घोषित होगा यह भली प्रकार सोचा गया होगा । उसकी तिथि भी अच्छी तरह सोच-विचार कर तय की गई होगी । राजनीति में कदम रख रहे रहे हैं तो ‘राजनैतिक रूप से सही’ कदम के तौर पर बाबासाहब से जोड़ना भी लगा होगा। तब ? क्या पता ‘दी हिन्दू’ वालों ने यह गलती की हो?

केजरीवाल की अब तक की एक-सूत्री मांग लोकपाल  के  42 साल पहले जब जयप्रकाश लोकपाल की मांग करते थे तब भी वे योरप में कुछ स्थानों पर लागू ओमबड्समन की चर्चा करते थे। प्रशासन के अलावा संस्थाएं भी ओमबड्समन रखती हैं। भारतीय मीडिया जगत में ‘दी हिन्दू’ एक मात्र संस्था है-जहां लोकपाल,लोकायुक्त,ओमबड्समन से मिलता जुलता एक निष्पक्ष अधिकारी बतौर ’रीडर्स एडिटर ‘ नियुक्त है । अभी तीन दिन पहले ही श्री पनीरसेल्वन इस पद पर नियुक्त हुए हैं । तो हमने उनसे तत्काल पूछा की कल अक्टूबर 3 ,2012 के अखबार में पहले पन्ने के मुख्य समाचार में यह जो कहा गया है – कि ”अम्बेडकर जयन्ती नवम्बर 26” को है यह यह उस जलसे वालों की गलती है या अखबार की ? हमने यह भी गुजारिश की मेहरबानी कर इस मसले  की हकीकत का  सार्वजनिक तौर पर ऐलान करें चूंकि की यह देश के एक बड़े  नेता के प्रति कथित ‘नई  राजनीति’ के दावेदारों की अक्षम्य उपेक्षा को दरसाता है । हमने यह इ-पत्र  लिखा :

To,
Readers’ Editor,
The Hindu.
Dear Sir ,
I want to draw your attention to the main news on page 1, Delhi edition,dated October 3,2012 with the heading ‘Kejriwal launches party,vo
ws to defeat ‘VIP system’. The news declares November 26 as ‘Ambedkar Jayanti’ which is factually wrong and shows ignorance about one of our national leaders . It should be made clear by you to the readers in general and the public in general whether this mistake is committed by the proposed new party or by The Hindu.
With regards,
Sincerely yours,
Aflatoon,
Member,National Executive,
Samajwadi Janaparishad.

आज अक्टूबर 4 ,2012 के अखबार (छपे संस्करण में) मेरे ख़त का जवाब आ गया है। ‘नवम्बर 26 को को अम्बेडकर जयन्ती बताने का का सन्दर्भ गलत है।विशेष संवाददाता का की सफाई  : यह (नवम्बर 26 को अम्बेडकर जयन्ती बताना ‘इंडिया  अगेंस्ट करप्शन ‘ के जलसे  के मंच से हुआ था।

>> In “Kejriwal launches party , vows to defeat ‘VIP system’ (page1,Oct 3,2012), the reference to November 26 as Ambedkar Jayanti is incorrect. The Special Correspondent’s clarification : It (November 26 as Ambedkar Jayanti remark ) was made from the dais during the India Against Corruption function.

 

तो भाई ‘द हिन्दू ‘ के लोकपाल जिन्हें  रीडर्स एडिटर कहा जाता है, ने यह साफ़ कर दिया कि अम्बेडकर जयन्ती की बाबत गलत सूचना इस नए दल वालों की थी।  अरविंद केजरीवाल एक समूह का प्रमुख विचारक माना जाता रहा है, उसके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में उस समूह के मकसद के अनुरूप भाषण करता रहा है । यह समूह है – आरक्षण का विरोध करने के लिए बना समूह – यूथ फॉर इक्वालिटी  – मकसद है गैर-बराबरी कायम रखना और और नाम धरा है ‘बराबरी’ ! अन्ना के साथ जब पहली बार जंतर-मंतर पर जब केजरीवाल पहली बार धरना दे रहे थे तब इसी समूह से जुडे लड़के ‘ आरक्षण संवैधानिक भ्रष्टाचार है’ के नारे पहने हुए थे । नए दल के नजरिए में आरक्षण के समर्थन में वचन हैं । दूसरे के नजरिए को पचाने में वक्त लग सकता है? उस बीच के वक्त में ऐसी चूक हो सकती है? अगर महात्मा फुले की पुण्य तिथि  नवम्बर 28 से कन्फ्यूजिया रहे हों ? वह भी 26 नहीं 28 है।

परसों शाम मुझे योगेन्द्र यादव का इमेल मिला।केजरीवाल की प्रस्तावित पार्टी का दस्तावेज उसके साथ संलग्न था। सुनते  हैं  कि यह ड्राफ्ट भी योगेन्द्र का लिखा  । ऐसा होने पर  वे इस नई  प्रक्रिया के मात्र  प्रेक्षक नहीं रह जायेंगे ।   योगेन्द्र यादव ने केजरीवाल के मंच से बताया की वे समाजवादी जनपरिषद के सदस्य हैं । समाजवादी जनपरिषद के सक्रीय सदस्यों की भी एक आचार संहिता है। कथित नए दल की प्रस्तावित हल्की-फुल्की और त्रुटि -पूर्ण आचार संहिता की भांति  नहीं है समाजवादी जनपरिषद की आचार-संहिता। बिहार आन्दोलन के वरिष्ट साथी बिपेंद्र कुमार ने बताया की’वी आई पी संस्कृति’ के निषेध के लिए इस नए समूह की घोषणा कितनी हास्यास्पद है।दरअसल जड़ से कटा होने के कारण ऐसा होता है- ”हमारे विधायक और सांसद लाल बत्ती नहीं लगायेंगे” जोश में कह दिया । कहीं भी विधायक-सांसद यदि उन पर मंत्री जैसी जिम्मेदारी न हो तो बत्ती नहीं लगाते। शेषन , खैरनार,अनादी  साहू जैसे नौकराशाहों से इस पूर्व नौकरशाह और एन जी ओ संचालक की स्थिति मिलती जुलती हो यह बहुत मुमकिन है। स्वयंसेवी सन्स्थाओं  की पृष्टभूमि वाले राजनैतिक कर्मियों और उनसे अलग सच्चे अर्थों में राजनैतिक कर्मियों के बारे में किशन पटनायक ने हमें साफ़ समझ दी है :

‘वही एन जी ओ कार्यकर्ताओं को पाल पोस सकते हैं जो विदेशी दाता सम्स्थाओँ से पैसा प्राप्त करते हैं ।धनी देशों के एनजीओ के बारे हम कम जानते हैं। अधिकाँश दाताओं का उद्देश्य रहता है की उनके पैसे से जो सार्वजनिक कार्य होता है वह नवउदारवाद  और पूंजीवाद का समर्थक हो ।जो सचमुच लोकतंत्र  का कार्यकर्ता है उसके राजनैतिक खर्च के लिए या न्यूनतम पारिवारिक खर्च के लिए इन देशों में पैसे का कोई स्थायी या सुरक्षित बंदोबस्त नहीं होता है। देश में हजारों ऐसे कार्यकर्ता हैं जो पूंजीवाद विरोधी राजनीति में जहां एक ओर  पूंजीवाद और राज्य-शक्ति के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर अपने मामूली खर्च के लिए इमानदारी से स्खलित न होने का संघर्ष  जीवन भर कर रहे हैं ।उनमें से एक-एक का जीवन एक संवेदनापूर्ण किस्सा है , गाथा है , जो अभी तक न विद्वानों के शास्त्र का विषय बना है , न साहित्यिकों की कहानियों का विषय।हमारे लिए हैं वे हैं लोकतंत्र के आलोक-स्तम्भ ।”

इस बुनियादी समझ के साथ समाजवादी जनपरिषद ने सक्रीय सदस्यों  के लिए बनी अपनी आचार-संहिता में :

दल के संविधान की 3.1.(2) के अनुसार सक्रिय सदस्य दल द्वारा स्वीकृत आचरण संहिता का पालन करेगा। दल की आचरण संहिता पर हमे फक्र है तथा नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए इसे हम अनिवार्य मानते हैं। इसे यहाँ पूरा दे रहा हूँ :

समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सक्रिय सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह-

1.1 जनेऊ जैसे जातिश्रेष्ठता के चिह्न धारण नहीं करेगा।

1.2 छुआछूत का किसी भी रूप में पालन नहीं करेगा।

1.3 जाति आधारित गालियों का प्रयोग नहीं करेगा ।

1.4 दबी हुई जातियों को छोड़कर किसी भी अन्य जाति विशेष संगठन की सदस्यता स्वीकार नहीं करेगा।

2.1 दहेज नहीं लेगा ।

2.2 औरत की पिटाई नहीं करेगा और औरत(नारी) विरोधी गालियों का व्यवहार नहीं करेगा।

2.3 एक पत्नी या पति के रहते दूसरी शादी नहीम करेगा और न ही उस स्थिति में बिना शादी के किसी अन्य महिला/पुरुष के साथ घर बसाएगा ।

3 धार्मिक या सांप्रदायिक द्वेष फैलाने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होगा ।

4 समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह ऐसे किसी गैरसरकारी स्वैच्छिक संस्था (  NGO ), जो मुख्यत: विदेशी धन पर निर्भर हो,

(क) का संचालन नहीं करेगा ।

(ख) की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली समिति का सदस्य नहीं होगा।

(ग) से आजीविका नहीं कमाएगा ।

5.1 सदस्यता-ग्रहण/नवीनीकरण के समय अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति व आय की घोषणा करेगा ।

5.2 अपनी व्यक्तिगत आय का कम से कम एक प्रतिशत नियमित रूप से समाजवादी जनपरिषद को देगा।

5.3 विधायक या सांसद  चुने जाने पर अपनी सुविधाओं का उतना अंश दल को देगा जो राष्ट्रीय  कार्यकारिणी द्वारा तय किया जायेगा।

बहरहाल योगेन्द्र यादव पर समाजवादी जनपरिषद के सक्रीय सदस्यों के लिए बनी ऊपर दी गयी आचार संहिता लागू नहीं है । इसकी धारा 4 से भी मुक्त हैं ,वे। सिर्फ सक्रीय सदस्य ही दल की जिम्मेदारियां लेता है ।किसी प्रस्तावित दल  के दस्तावेज का ड्राफ्ट बना कर  प्रेक्षक की सीमा का उल्लंघन किया अथवा नहीं यह दिल्ली की इकाई तय करेगी । दल का सदस्य जिस स्तर  का होता है उस स्तर  की समिति उससे जुड़े अनुशासन को देखती है ।

 

Read Full Post »

Read Full Post »

वाराणसी कैंट विधान-सभा क्षेत्र से समाजवादी जनपरिषद (प्रत्याशी – अफलातून ) का चुनाव-खर्च व आय

चुनाव खर्च हेतु चन्दा

डॉ बी. के. यादव                     1000

जगनारायण सिंह                  1000

राजेन्द्र                                    2000

डॉ के के मिश्रा                          1000

प्रो . विपिन  त्रिपाठी                                 500

डॉ श्रीकृष्ण सिंह                                        500

अजीत सिंह                             5000

रमेश गिनोडिया                      11000

चचा                                         25 ,000

नचिकेता                                  10 ,000

अनूप सर्राफ                             28 ,800

दल                                           10 ,000

डॉ अशोक अग्रवाल                     5 ,000

जीतेंद्र गुप्ता                              11 ,000

अशोक सेकसरिया                     4000

डॉ राजीव                                   11 ,000

अनिल त्रिपाठी                            5000

महेश पांडे                                    5000

डॉ संघमित्रा                             11 ,000

विनोद सिंह (WNT)                    500

पवन कुमार                                1000

डॉ स्वाति                                      1400

दीपक पटेल                                     500

डॉ आई एस गंभीर                       2000

_______________________________

कुल आय                           1,72200

खर्च

नुक्कड़ सभाएं (आठ )          21 ,940

परचा -स्टीकर                         6019

वाहन – इंधन                         28 ,869 .20

बैनर-झंडा                             1436

पार्टी   कार्यकर्ताओं का दौरा      2468

कार्यकर्ताओं पर व्यय                13000

जमानत राशि                           10000

अन्य फुटकर खर्च                      1952

__________________________________

कुल खर्च                                       85 ,684

__________________________________

हमारी मांग थी की चुनावी तंत्र हर उम्मीदवार को एक हिसाबनावीस मुहैया कराए । आयोग तो जब मानेगा तब मानेगा लेकिन दल के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ सोमनाथ त्रिपाठी ने स्वयं यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई ।

Read Full Post »

Reblogged from समाजवादी जनपरिषद:

अखबार की वह खबर हैरान करने वाली थी। मैंने सोचा कि शायद छपाई की कोई गलती है या दशमलव बिन्दु इधर-उधर हो गया है। लेकिन दूसरे अखबार में भी देखा। वह सच थी। यह खबर चालू वित्त वर्ष की प्रथम छ:माही में अग्रिम आयकर जमा करने वाले शीर्षस्थ लोगों के बारे में थी। इनमें दूसरे नंबर पर आंध्रप्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री के बेटे जगनमोहन रेड्डी का नाम था। सबसे ज्यादा आयकर जमा करने वाले सौ लोगों की सूची में वह एकमात्र नेता है, बाकी लोग फिल्मी सितारे, क्रिकेट खिलाड़ी और उद्योगपति-व्यवसायी है। लेकिन ज्यादा हैरत-भरी बात जगनमोहन रेड्डी द्वारा अदा किए गए कर की राशि में वृ्द्धि है। पिछले वर्ष उसने मात्र 2.9 लाख रु.

Read more… 22 more words

उ.प्र. विधान सभा चुनाव २०१२ के मौके पर ,फिर प्रकाशित .

Read Full Post »

“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।

Read Full Post »

शहीद शंकर गुहानियोगी

उनकी हत्या के सप्ताह भर पहले मैं उनके साथ कुछ समय था । होशंगाबाद जिले में गिरफ़्तार हमारे साथी के समर्थन में वे आए थे। होशंगाबाद स्टेशन पर अपना सीधा-सादा एयर बैग पलिटफार्म पर छोड़कर उन्होंने कहा ,’चलो चाय पीते हैं’।मैंने बैग का ध्यान दिलाया तो बोले कि देश भर में इतना भय फैला रखा है कि कोई उसे नहीं छूएगा। हम चाय पीकर आए, बैग ज्यों का त्यों था। वैसे भी उसमें किताबें और एक जोड़ा कपड़ा था। उन्हें मुख्यमन्त्री सुन्दरलाल पटवा से मिलना था। मुख्यमन्त्री के सचिव ने नाम लिख लेने के बाद कहा,’पद-वद बताइए’। नियोगी ने तत्काल अत्यन्त सहजता से कहा,’बता देना गुहा और नियोगी’। पूंजीपतियों द्वारा कराई गई हत्या के दिन भी इस शेर के कमरे की खि्ड़की खुली थी । दल्ली राजहरा के असंगठित मजदूरों को जब भिलाई स्टील प्लान्ट के मजदूर के बराबर मजदूरी दिलाई तब हड़ताल को मुख्य ताकत किसान संगठन द्वारा दिए गए राशन से मिलती ्थी। वेतन बढ़ा तब दो अक्टूबर के दिन २०-२५ हजार मजदूरों ्की रै्ली में नियोगी ने कहा कि शराब पीने के पक्ष में आकर लोग बोलें। फिर अन्त में समझाया कि बढ़ा वेतन दारू कीमत अदा करने में फिर उन्हीं उद्योगपतियों के पास न चला जाए। उनक यूनियन ने शानदार ’शहीद अस्पताल ’ बनाया । विनायक सेन उसके पहले डाक्टरों में थे। विधायक बनाने वाली पहली यूनियन। शहीद नियोगी- लाल जोहार ।

Read Full Post »

चुनावों के करीब जाति-संगठनों के सम्मेलनों में जो प्रस्ताव पारित किए जाते हैं उनमें – ‘हमारी जाति के लोगों को सभी दल अधिक-से-अधिक टिकट दें ‘ टाइप प्रस्ताव प्रमुख होता है । इन संगठनों का एक मुख्य दावा रहता है कि वे अराजनैतिक हैं । सभी दलों से बिरादरी के लोगों के लिए टिकट मांगना अराजनीति है । चुनावों में यह जाति-संगठन अलग-अलग दलों द्वारा उनकी जाति के कितने और किन्हें उम्मीदवार बनाया गया है इसका ऐलान भी करते हैं । विभिन्न दलों के कार्यकर्ता इन संगठनों में एक साथ शामिल रहते हैं ।
एक लक्ष्यीय ‘अराजनैतिक’ संगठनों की इन जाति-संगठनों से कितनी समानता है ! ‘राजनीति धोखा है , धक्का मारो मौका है ‘ का नारा भी लगायेंगे और यह भी कहेंगे , ‘ जो दल हमारी मांग मान लेगा उसे राजनैतिक फायदा मिलेगा ‘ । स्वयंसेवी संस्थाओं के कर्ता-धर्ता तमाम भ्रष्ट दलों के भ्रष्ट नेताओं से नाता रखते हैं । सत्ता के गलियारों में अब इनकी ‘ सलाहकार परिषद ‘ की कोठरियां भी बन गई हैं । इसी प्रकार शिक्षा पर केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड में भी स्वयंसेवी-अराजनैतिकों की नुमाइन्दगी होती है ।
जमीनी-स्तर पर काम करने वाली इन संस्थाओं का समाज-अर्थनीति की खूफियागिरी में किस प्रकार की भूमिका हो सकती है इसके कु्छ उदाहरण देखिए :
भारत में जब इलेक्ट्रानिक्स के क्षेत्र में तेज प्रगति हो रही थी तब एक विदेशी फन्डिंग एजेन्सी ने एक स्वयंसेवी संस्था को ‘इलेक्ट्रानिक्स उद्योग में महिलाओं की स्थिति ‘ पर एक प्रोजेक्ट दिया । महिलाओं के नाम पर मिले प्रोजेक्ट के बहाने फन्डिंग एजेन्सी को उद्योग से जुडे अन्य जमीनी तथ्य हासिल करने थे ।
७वें दशक की शुरुआत में गुजरात में पिछडे वर्गों को ’बक्शी-पंच’ (बक्शी आयोग) के आधार पर आरक्षण दिया गया। गुजरात के पटेलों के नेतृत्व में इसका विरोध हुआ। मेरे भाई अहमदाबाद में पत्रकार थे और अतिरिक्त आमदनी के लिए एक इंग्लैण्ड के पैसे से चलने वाली संस्था में अनुवाद का अंशकालिक काम कर रहे थे। यह संस्था उनसे गुजरात के छोटे कस्बों के अखबारों में छप रही आरक्षण विरोधी खबरों का अनुवाद करा के अपने दानदाताओं को भेज रहे थी । जो तथ्य और सूचनायें और रपट जमीनी-स्तर से मिलनी हैं उन्हें इन संस्थाओं की मदद से आसानी से हासिल किया जाता है ।
जिन बातों पर आम दिनों में ज्यादा ध्यान नहीं जाता है उन पर इस खास दौर में जाएगा , उम्मीद है ।

Read Full Post »

अन्ना एवं साथियों के नाम एक पत्र
आदरणीय अन्ना हजारे, प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, अरविंद केजरीवाल एवं साथी,
16, अगस्त, 2011 से एक प्रभावी एवं स्वतंत्र लोकपाल के कानून के लिए आप फिर से अनशन सत्याग्रह शुरु करने जा रहे है। भ्रष्टाचार, अनाचार, कुशासन और नैतिक पतन में आकंठ डूबे इस देश में आपने एक ठोस मुद्दे को लेकर मजबूती से जो मोर्चा खोला है, उसके लिए हम आपको बधाई देते है। आपके माध्यम से देश में एक नई चेतना और उम्मीद का संचार हुआ है।
यह सही है कि महज लोकपाल की एक संस्था बन जाने से देश में भ्रष्टाचार खतम नहीं हो जाएगा। किंतु भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में यह एक शुरुआत हो सकती है। निष्पक्ष, प्रभावी, स्वतंत्र व स्वायत्त लोकपाल और लोकायुक्त की संस्थाएं केन्द्र और प्रांतीय स्तरों पर कायम होने से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने में मदद जरुर मिलेगी। ठीक उसी तरह जैसे आज उच्च न्यायालयों, सर्वोच्च न्यायालय एवं महालेखा नियंत्रक-परीक्षक जैसी संस्थाओं से कुछ मदद मिल जाती है या सूचना के अधिकार का कानून बनने से भी कुछ मदद मिली है।
किंतु यह भी सही है कि केन्द्र सरकार, सत्ता दल और विपक्षी दलों में एक सही व प्रभावी लोकपाल संस्था को बनाने की कोई इच्छा एवं क्षमता नहीं बची है। आप जैसा लोकपाल कानून बनाना चाहते है, वैसा कानून देश की मौजूदा सरकार या मौजूदा संसद बनाएगी, इसकी उम्मीद नहीं के बराबर है। इसका कारण साफ है। आज की संसद एक पतनशील, सिद्धांतहीन, भ्रष्ट और यथास्थितिवादी राजनीति की उपज है। इससे अपने स्वार्थों पर कुठारघात करने वाले कदमों की उम्मीद नहीं की जा सकती।
दूसरी ओर, यह भी सही है कि हमारी आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून बनाने का काम संसद एवं प्रांतीय विधानसभाओं का है। इसलिए आप संसद से , सांसदों से और राजनैतिक दलों से कोई विशेष कानून बनाने की अपील तो कर सकते है (जो आपने उनसे मिलकर की भी है), किंतु इस बारे में कोई आदेश नहीं दे सकते, फैसला नहीं ले सकते या जिद नहीं कर सकते। इसलिए यदि आप 16 अगस्त से जन लोकपाल विधेयक की अपनी मांग को लेकर आमरण अनशन करते है, तो यह एक अनुचित हठ की श्रेणी में आ जाएगा। यह अलोकतांत्रिक भी है, क्योंकि इस विधेयक के बारे में देश के अन्य लोगों की राय अलग-अलग भी हो सकती है।
आपने पिछली बार अप्रैल में जब अनशन किया था, तब बात अलग थी। तब आपकी मांग लोकपाल विधेयक का मसविदा बनाने के लिए समिति के गठन की थी। आपको मिले जनसमर्थन के कारण सरकार को मांग स्वीकार करनी पड़ी। अब इस समिति की प्रक्रिया से जो भी नतीजा निकला है, उसमें केन्द्र सरकार ने बदमाशी की है और अड़ियल रवैया अपनाया है, फिर भी उसका उपाय यह नहीं है कि आप अपने मसविदे को मनवाने के लिए दुबारा आमरण अनशन पर बैठ जाए।
यदि इस तरह देश में अलग-अलग व्यक्ति और समूह कुछ खास तरह का कानून बनवाने के लिए आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे तो क्या हालत पैदा हौंगे, इसकी कल्पना आप कर सकते है। यह भी गौरतलब है कि आधुनिक काल में सत्याग्रह के जनक माने जाने वाले महात्मा गांधी ने कभी भी किसी मांग को लेकर उपवास नहीं किए। उनके उपवास आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और देश की आत्मा को जगाने के लिए होते थे।
इसलिए समाजवादी जन परिषद (जो कि समाजवादी विचार और देश में एक वैकल्पिक क्रांतिकारी राजनीति के लिए समर्पित एक राजनैतिक दल है) की और से हम आपसे अपील करते है कि कृपया 16 अगस्त से आमरण अनशन न करें। इसके बजाय सांसदो व नेताओं की अतंरात्मा को जगाने के लिए, उन पर नैतिक दबाव बनाने के लिए और देश को झकझोरने के लिए आप तीन दिन का सांकेतिक अनशन करें।
यदि इस के बाद भी इन सांसदों को सद्बुद्धि नहीं आती है, तो आप इस लड़ाई को देश की जनता के बीच ले जाएं। इसके लिए एक जनमत-संग्रह की मांग को लेकर आप पूरे देश में घूमे। आप यदि पदयात्रा करते है तो आपको जबरदस्त जनसमर्थन मिलेगा। अभी तक आपको जो समर्थन मिला है, वह ज्यादातर पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग का है। अब इस मुहिम को दिल्ली से बाहर देश के कोने-कोने में गरीब व निम्न मध्यम वर्ग के करोडों लोगों के बीच ले जाने की जरुरत है।
यदि आप ऐसा करेंगे, तो आप पाएंगे कि इस देश में भ्रष्टाचार की समस्या के कई रुप, आयाम व चेहरे है। देश के साधारण नागरिक रोज जिस भ्रष्टाचार व कुशासन से जूझते है, उसका गहरा रिश्ता उस जन-विरोधी केन्द्रीकृत प्रशासनिक ढ़ाचे व दर्रे से है जो हमें अंग्रेजी राज से विरासत में मिला है और जिसे आजादी मिलने के बाद बुनियादी रुप से बदलने का काम नहीं हुआ। भारत का लोकतांत्रिक ढ़ांचा भी काफी केन्द्रीकृत है, जिसकी सीमाओं का
अहसास आपको भी इस लड़ाई के दरम्यान हुआ होगा। इसके निर्वाचित प्रतिनिधियों के आचरण-कर्म तथा आम जनता की समस्याओं-आकांक्षाओं के बीच गहरी खाई बन गई है।
इसलिए भारत के संविधान के अच्छे प्रावधानों को संजोते हुए भी लोकतांत्रिक ढ़ांचे में सुधार का मुद्दा आपके एजेण्डे में जोड़ना लाजमी होगा। मोटे तौर पर ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की नकल पर बने इस ढ़ांचे की जगह, गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ और लोहिया के ‘चौखम्भा राज’ की कल्पना से मदद लेते हुए, क्रांतिकारी ढ़ंग से सत्ता का विकेन्द्रीकरण करना होगा। अहम मसलों पर जनमत-संग्रह की व्यवस्था भी होनी चाहिए, जो दुनिया के कई देशों में मौजूद है।
इसी के साथ, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को परिणिति की ओर ले जाने के लिए आज की भ्रष्ट, स्वार्थी व सिद्धांतहीन राजनीति का भी विकल्प तैयार करना जरुरी है। राजनीति से ही देश चलता है। यदि राजनीति ऐसी ही रही तो देश कभी भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो सकता। इसलिए स्वयं को अराजनैतिक कहने के बजाय आपको यह चुनौती स्वीकार करनी पड़ेगी। कपिल सिब्बल ने चुनाव लड़ने की जो चुनौती आपको दी है, उसका दीर्घकाल में यही जवाब है कि आप देश की जनता को जगाते हुए, नए ढ़ांचों के निर्माण की मुहिम चलाते हुए, एक देशभक्त, जनमुखी और परिवर्तनकामी राजनीति खड़ी करें।
भ्रष्टाचार व महाघोटालों की जो बाढ़ पिछले कुछ सालों से देश में आई है, उसका सीधा रिश्ता उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण-बाजारीकरण-कंपनीकरण की नीतियों से भी है। स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, खनिज आदि का बाजार बनने से जो भ्रष्टाचार, लूट तथा कदाचार फैला है, उस पर भी आपका ध्यान होगा। घोर गैरबराबरी, विलासिता व उपभोक्ता संस्कृति के रहते भी देश में सदाचार कायम होना मुश्किल है। यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को आपको व्यवस्था-परिवर्तन की लड़ाई बनाना होगा। ऐसी हालत में यह लड़ाई शोषण, अन्याय, अत्याचार, विस्थापन, गरीबी, मंहगाई, कंपनी राज तथा साम्राज्यवाद के खिलाफ देश की मेहनतकश जनता की लड़ाई से जुड़ जाएगी। तभी एक क्रांतिकारी जनशक्ति भी तैयार हो सकेगी।
यदि आप ऐसा करते है तो आपको समाजवादी जन परिषद का ही नहीं, देश के अनेक जन संगठनों तथा करोड़ों लोगों का पूरा सहयोग व समर्थन मिलेगा।
क्रांतिकारी शुभकामनाओं के साथ,
लिंगराज     सुनील     सोमनाथ त्रिपाठी     अजीत झा     विश्वनाथ बागी        संजीव साने
अध्यक्ष     उपाध्यक्ष     महामंत्री                सचिव           संगठन मंत्री              उपाध्यक्ष

( लिप्यांतर श्री प्रवीण त्रिवेदी के सहयोग से साभार )

Read Full Post »

Older Posts »

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 2,815 other followers

%d bloggers like this: