[ फारसी के विद्वान श्री राकेश भट्ट अनेक सामाजिक कामों से जुड़े रहे हैं । इन दिनों बी.बी.सी के लिए खाड़ी के मुस्लिम देशों की खबरों का विश्लेषण करते हैं । सत्य के आग्रह के कारण कोई साढ़े चार साल तक ईरान की जेलों में भी रहे हैं ।
भयानक घटनाएं घटी हैं , पिछले दिनों । इनके प्रति अपना आक्रोश जताने ऐसे लोग भी सड़कों पर उतरे हैं , जिनकी उमर अभी - अभी वोट डालने की हुई है । उन्होंने बिना तोड़ - फोड़ किए , बिना बसें जलाए , बिना पत्थर फेंके ज्यादा बड़ी चोट की है सरकारों पर । इंडिया गेट , जंतर- मंतर , विजय - चौक - सब जगह ये लोग इकट्ठे होते रहे । न्याय तो दूर ठीक से सहानुभूति भी नहीं मिल पाई । लोगों का गुस्सा फांसी की मांग तक गया है , इस ताजी घटना में । पर न यह पहली थी और न अंतिम । कुमार प्रशांत के शब्दों में कहें तो 'असफल सरकारों और निराश लोगों का समीकरण हमें ऐसे ही बर्बर समाज की ओर ले जाएगा ।' सन १९९४ में घटी एक ऐसी घटना पर एक बेहद खामोश टिप्पणी कर रहे हैं श्री राकेश भट्ट । - संपादक ,गांधी-मार्ग ,२२३ दीनदयाल उपाध्याय मार्ग,नई दिल्ली - ११०००२ ]
हाजी हुसैन बहुत कम बोलते थे । हां, कभी – कभी वो जेल के बरामदे में किसी कैदी से यह जरूर पूछ लेते थे कि घर में सब राजी – खुशी तो है ना ? हर कैदी इसका झूठा जवाब दे देता था – हां ! इस सवाल से कैदी को थोड़ी-सी राहत तो मिलती थी कि चलो कोई तो है जो उसके परिवार के बारे में चिंतित है और फिर हाजी हुसैन तो जेलर थे । हाजी हुसैन भी इस जवाब की सच्चाई को जानते थे , लेकिन ‘अल हमदुल्लिलाह’, ईश्वर तेरा भला करे कहते हुए चले जाते थे ।
यूं तो मैं जेल में उदास नहीं रहता था । लेकिन १९९४ दिसंबर महीने की एक सुबह को बहुत उदास हुआ । दिसंबर महीने में ईरान की राजधानी तेहरान गच्च बर्फ से ढक जाती है । एविन नाम का यह जेल पहाड़ियों के बीच बना हुआ है । यहां तो मौसम और भी ठंडा हो जाता है । शायद केदारनाथ – बदरीनाथ जैसी ठंड , कुछ – कुछ मेरे ननिहाल खतस्यूं सिरकोट (श्रीकोट) जैसी ।
मुझे तारीख तो ठीक याद नहीं है । लेकिन दिन याद है – बृहस्पतिवार , क्योंकि कल ही परिवार के साथ मेरी मुलाकात का दिन था । हर बुधवार को मेरी पत्नी ही आया करती थी । अन्य रिश्तेदारों को मुलाकात की मंजूरी नहीं थी । मुलाकात के समय शीशे के आरपार हम एक दूसरे को देख सकते थे । लेकिन बात दोनों तरफ रखे टेलीफोन के जरिए ही हो पाती थी । हम दोनों बहुत संयम से बातें करते थे क्योंकि ये बातें रिकार्ड होती थीं । हमारी बातों का केन्द्र अक्सर हमारी बेटी ही हुआ करती थी – जिसकी शैतानियों का जिक्र जिंदगी की तल्खियों को भुलाने में कारगर होता था – भली ही मुलाकात सात मिनटों के लिए ही क्यों न हो । हां , ठीक सात मिनट के बाद लाइन काट दी जाती थी। और इस ओर मैं हलो… हलो कहता और उस ओर से वह । लेकिन शीशे की मोटी दीवार के कारण आवाज आरपार नहीं हो पाती थी । लेकिन जो सुना नहीं जा सकता वह समझ में आ जाता था । रिश्तों के आगे भाषा की औकात बौनी पड़ती है , यह सुना जरूर था लेकिन देखा वहीं पर । खैर!
जिक्र उदासी का चल रहा था । हुआ यूं कि जेल में सुबह की हाजरी के बाद मैं नाश्ता करने लगा । एक अन्य कैदी साथी अखबार पढ़ रहा था। उसने बताया कि एक खबर हिंदुस्तान के बारे में भी छपी है । ईरान में हिंदुस्तान को बहुत इज्जत के साथ देखा जाता है । मैंने सोचा शायद कोई इसी तरह की खबर होगी , जिसमें अतिशयोक्तियों के साथ हिंदुस्तान की तारीफ की गई होगी । मैंने अपनी जगह बैठ कर कहा कि खबर का शीर्षक पढ़ दो अभी – पूरी खबर बाद में पढ़ूंगा । उसने खबर का शीर्षक पढ़ा । ‘तज्जवोज बा बानुवान-ए-जोम्बिश-ए-उत्तराखंड’ यानी उत्तराखंड आंदोलन की महिलाओं के साथ दुराचार । कमरे के सभी कैदियों ने यह खबर सुनी तो उनको विश्वास ही नहीं हुआ । ईरान के लोग समझते हैं कि हिंदुस्तान में महिलाओं की बहुत इज्जत होती है । मैंने अखबार लिया और खबर पढ़ी । खबर शायद चार या पांच पंक्तियों से बड़ी नहीं थी । इसमें करीब दो महीने पुरानी घटना का संक्षिप्त विवरण था : हिंदुस्तान के मुजफ्फरनगर शहर में पुलिस आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाई । कुछ आंदोलनकारी शहीद हुए और पुलिस ने महिलाओं के साथ ज्यादती की । उस वक्त न जाने और कोई क्यों याद नहीं आया । लेकिन अपना गांव बहुत याद आया । बूढ़ी दादी की लगाई हुई ‘पीपल चौंरी’ , कांडा के मंदिर के रास्ते की ‘डूंडी कुलैं’ और गांव का नागरजा , गांव , पीपल , कुलैं और एक खामोश खुदा । मेरी याद में कहीं भी इंसान नहीं था ।
कैदी खामोशी की जबान को पहचानता है । इसीलिए किसी ने मुझसे इसके बारे में पूछा नहीं । उन कैदियों ने मेरी खामोशी को अपनी खामोशी का सहारा दिया । मैं कुछ देर के बाद लाईब्रेरी चला गया । कुरान की हर उस आयत (श्लोक) को पढ़ने लगा , जिसमें निर्दोष पर जुल्म करने वालों की सजा के बारे में लिखा था । बहुत सी ऐसी आयतें थीं । एक आयत मन छू गयी । कुरान के ५वें अध्याय की ३२वीं आयत – ‘यदि कोई किसी निर्दोष व्यक्ति का कत्ल करता है तो समझो कि उसने समस्त मनुष्यता का कत्ल किया है ।’ शायद मन कुछ हल्का जरूर हुआ,मगर उदास ही रहा । दिन के खाने पर भी नहीं गया और शायद लाइब्रेरी के बड़े से हॉल में मैं ही अकेला रह गया था ।
अचानक देखा कि मेरे सामने हाजी हुसैन खड़े थे । मैंने उन्हें सलाम किया और उन्होंने भी वलैकुम अस्सलाम कह कर जवाब दिया । हिंदुस्तानियों को ईरान में हिंदी कहा जाता है । उन्होंने पूछा : हिंदी , आज उदास दिख रहे हो । मैंने कहा – ‘हां हाजी ! उन्होंने मेरी उदासी का कारण पूछा तो मैंने कारण बता दिया । उन्होंने ढाढ़स बंधाते हुए कुरान की एक आयत कही जिसका मतलब है कि – ‘जिन पर अत्याचार हुए हैं , वे अब खुदा के अजीज बन चुके हैं और जो शहीद हुए हैं वे खुदा के पहलू में जिंदा हैं ।’ फिर कुछ क्षणों के बाद उन्होंने कहा कि आज शाम की नमाज के वक्त एक दुआ पढ़नी है तो मैं भी मौजूद रहूं । हां – ठीक है हाजी, मैं आ जाऊंगा। मुझे लगा कि वे मुझसे नमाज के बाद कोई दुआ पढ़वाना चाहते हैं । मेरे कुरान के प्रवचन और दुआ जेल में काफी पसंद किए जाते थे ।
शाम की नमाज पर मैं मौजूद हुआ । हाजी हुसैन भी थे । इमाम ने नमाज पढ़ाई और हाजी हुसैन को दुआ पढ़ने के लिए बुलाया । मुझे लगा कि हाजी हुसैन अब मेरा नाम पुकारेंगे और मुझसे दुआ पढ़ने के लिए कहेंगे । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । उन्होंने खुद दुआ पढ़नी शुरु की । इसे मैं पहले भी कई बार पढ़ चुका था , सुन चुका था । लेकिन फिर अचानक उन्होंने कहा – खुदाया यहां जो लोग तेरी शरण में इकट्ठा हुए हैं,उनमें तेरा एक बंदा हिंद देश का वासी है। उसके देश में कुछ बहनों पर अत्याचार हुआ है । तू तो सबसे बड़ा न्यायकर्ता है । उन अत्याचारियों का नाश कर और जो मजलूम बहनें हैं , उनके दुखों का अंत कर, आमीन ! या रब्ब अल -आलमीन ! ऐसा ही हो ! हे समस्त ब्रह्मांडों के स्वामी !
फिर उन्होंने मेरा नाम पुकार कर मुझे बुलाया और कहा कि यदि मैं शहीदों और पीड़ित महिलाओं के नाम जानता हूं तो एक-एक नाम लेकर हम दुआ को दुहरा सकते हैं । मैंने कहा-’मैं नाम नहीं जानता , आप सबका धन्यवाद ।’
रात को जब सोया तो मेरे एक पहलू में मेरा गांव था तो दूसरे पहलू में गांव का नागरजा , बूढ़ी दादी की लगाई हुई ‘पीपल चौंरी’ और कांदा के मंदिर के रास्ते की ‘डूंडी कुलैं’ ।
और इस बार एक इंसान भी शामिल था इनमें – हाजी हुसैन !
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