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Posts Tagged ‘कॉमनवेल्थ खेल’

विश्व फुटबाल कप की धूमधाम खतम होने बाद दक्षिण अफ्रीका में गर्व और संतोष के बजाय मायूसी और चिंता छाई है तथा कई सवाल खड़े हो रहे हैं। मायूसी महज इस बात की नहीं है कि अफ्रीका की कोई टीम सेमी-फाईनल तक भी नहीं पहुंच पाई। चिंता यह भी है कि इस आयोजन के लिए बने विशाल महंगे स्टेडियमों का अब क्या होगा और उनका रखरखाव कैसे होगा ? खबरों से लगता है कि ये स्टेडियम सफेद हाथी साबित होने वाले हैं, जिन्हें पालना और खिलाना इस गरीब देश की मुसीबत बन जाएगा।
इस आयोजन के लिए दक्षिण अफ्रीका ने नौ शहरों में दस ‘विश्व स्तरीय’ स्टेडियम बनाने पर करीब 150 करोड़ डॉलर (7,000 करोड़ रु) खर्च किए। किन्तु अब विश्वकप की प्रतियोगिता खतम होने पर उनका कोई उपयोग नहीं बचा। इन स्टेडियमों की क्षमता 40 हजार से लेकर 95 हजार दर्शकों तक हैं। आने वाले कई बरसों तक वहां इतने बड़े मैच इक्का-दुक्का ही होंगे, जिनमें इन स्टेडियमों का आधा या चैथाई उपयोग भी हो सके। पोलोकवान नामक शहर में 16.8 करोड़ डॉलर (756 करोड़ रु.) से बना 40 हजार दर्शकों का विशाल स्टेडियम है, किन्तु उस पूरे इलाके में फुटबाल या रगबी की एक भी पेशेवर टीम नहीं है। इस स्टेडियम की देखभाल पर प्रतिवर्ष 2.16 करोड़ डॉलर (100 करोड़ रु.) खर्च होंगे। यह सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाएगा।
बड़े शहरों के स्टेडियमों को फुटबाल या रगबी मैचों या सांस्कृतिक आयोजनों के लिए देने का विचार किया जा रहा है, किन्तु उससे समस्या हल नहीं होगी। जाहिर है कि विश्वकप के जोश में दक्षिण अफ्रीका सरकार ने पहले इस समस्या पर गौर नहीं किया। पूरे आयोजन पर करीब 420 करोड़ डॉलर (20,000 करोड़ रु.) खर्च हो चुका है। इस मौके पर आए पर्यटकों या टिकिट बिक्री से इसकी आधी कमाई भी नहीं हो पाई होगी।
थोड़ी पड़ताल करने पर पता चलता है कि लगभग खेलों के हर महा-आयोजन के बाद यही समस्या पैदा होती है। बीजिंग के 2008 ओलंपिक के बाद चीन भी इसी समस्या से जूझ रहा है। 50 करोड़ डॉलर (2250 करोड़ रु.) की लागत से बने मशहूर  विशाल ‘बर्ड्स नेस्ट’ नामक स्टेडियम के रखरखाव और कर्ज-किश्त भुगतान के लिए 2 करोड़ डॉलर (90 करोड़ रु.) जुटाने में पसीना आ रहा है। चीन ने कुल मिलाकर 31 स्टेडियम बनाए थे। इनके अलावा ओलंपिक के लिए चीन ने 680 हेक्टेयर में फैला एक विशाल वन पार्क भी 112 करोड़ डॉलर (5000 करोड़ रु.) की लागत से बनाया था। उसके रखरखाव के लिए डेढ़ करोड़ डॉलर (67 करोड़ रु.) की सालाना जरुरत है। चीन सरकार इन स्टेडियमों को मनोरंजन, संगीत कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों आदि के लिए किराए पर देने की कोशिश कर रही है और अमरीकी कंपनियों को ठेका दे रही है। यह साफ है कि इन स्टेडियमों का उपयोग खेलों में बिरले तौर पर ही होगा,जिनके लिए इनका निर्माण हुआ है।
बीजिंग ओलंपिक दुनिया का अभी तक का सबसे महंगा खेल आयोजन था, जिस पर 4400 करोड़ रु. (करीब 2,00,000 करोड़ रु.) खर्च हुआ। किन्तु इसके पहले के ओलंपिक भी आयोजक देशों के लिए मुसीबत बने थे। यूनान के मौजूदा आर्थिक संकट की शुरुआत एक तरह से 2004 के एथेन्स ओलंपिक से ही मानी जा सकती है, जिसे बाद में वैश्विक मंदी ने गंभीर रुप दे दिया। इसके स्टेडियमों के रखरखाव पर 7 करोड़ डॉलर (200 करोड़ रु.) प्रतिवर्ष का खर्च आ रहा है और वे बेकार पड़े हैं। 2004 के सिडनी ओलंपिक के बाद उस शहर के नागरिकों पर सालाना 3.2 करोड़ डॉलर (144 करोड़ रु.) का कर बोझ बढ़ गया। 1992 के बार्सीलोना ओलंपिक के बाद स्पेन पर 2 करोड़ डॉलर (90 करोड़ रु.) का कर्ज चढ़ा था। इन आयोजनों के पहले इनसे स्थानीय अर्थव्यवस्था में तेजी आने की दलील दी जाती है, किन्तु होता ठीक उल्टा है।
दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भी भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने की दलील दी जा रही है। किन्तु 4100 करोड़ रु. की विशाल राशि से जिन 11 स्टेडियमों व स्पर्धा-स्थलों और 1038 करोड़ रु. से जिस आलीशान खेलगांव को तैयार किया जा रहा है, क्या वे भी इस 12 दिवसीय आयोजन के बाद बेकार व बोझ नहीं हो जाएंगे ? फिर दिल्ली में तो इस आयोजन के बहाने कई चीजों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, जिनका खेलों से कोई लेना-देना नहीं है। इंदिरा  गांधी हवाई अड्डे का 9,000 करोड़ रु. का नया टर्मिनल, हजारों करोड़ों के नए फ्लाईओवर-पुल-पार्किंग स्थल-एक्सप्रेसवे, मेट्रो रेल का ताबड़तोड़ विस्तार, एक-एक करोड़ रु. की हजारों नयी आधुनिक बसें, दिल्ली का सौन्दर्यीकरण, आदि की लंबी सूची है। क्या पूरे भारत में दिल्ली ही सरकार को नजर आती है ? पूरा हिसाब लगाएं तो इस गरीब देश का एक से डेढ़ लाख करोड़ रुपया इस महायज्ञ में स्वाहा हो रहा है। जो सरकार खाद्य-अनुदानों की वृद्धि पर चिन्तित है, शिक्षा और शिक्षकों पर कंजूसी कर रही है, पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस में जनता को कोई राहत नहीं देना चाहती है, उसने राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर अपना खजाना खोल दिया है और उसकी दरियादिली का कोई हिसाब नहीं है।
हमारा 1982 के एशियाई खेलों के आयोजन का क्या अनुभव है ? उस वक्त भी विशाल पैसा खर्च करके बनाए गए स्टेडियम और खेलगांव बाद में बेकार पड़े रहे।  हमें फिर से भारी पैसा फूंक कर नए स्टेडियम व नया खेलगांव  बनाना पड़ रहे हैं। इससे भी खेलों को बढ़ावा मिलने का दावा था, किन्तु एशियाड के बाद न तो अंतरराष्ट्रीय पदक तालिकाओं में 100 करोड़ आबादी के इस देश की दयनीय हालत में कोई सुधार हुआ और न देश के अंदर खेलों की कोई स्वस्थ संस्कृति व परंपरा बनी। यह भी सवाल है कि जिस बेतहाशा तेजी से ये खेल खर्चीले व महंगे होते जा रहे हैं, उनमें गरीब देशों के साधारण लोगों की कोई जगह और भागीदारी कभी बन सकेगी या नहीं ? वे दर्शक और उपभोक्ता जरुर बनते जा रहे हैं। आखिर इस विश्वकप में यूरोप के दबदबे, लातीनी अमरीका के पिछड़ने और अफ्रीका के बाहर होने का एक कारण पैसा भी है। कोच, प्रशिक्षण, विशेष सुविधाएं सबके लिए पैसा चाहिए। कुल मिलाकर आधुनिक खेल व उनके आयोजन अब तेजी से पैसे के खेल बनते जा रहे हैं। उन पर झूठी शान और सतही राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का मुलम्मा जरुर चढ़ा दिया जाता है। ऐसा ही एक पैसे का बड़ा खेल दिल्ली में इस वर्ष होने वाला है। इस महाखर्चीले आयोजन से देश खेलों व खिलाड़ियों का भला हो या न हो,आयोजको की पीढ़ियां जरुर तर जाएंगी। उनके व्यक्तिगत हितों के साथ ठेकेदारों, व्यापारियों, विज्ञापनदाताओं और मीडिया कंपनियों के हित भी जुड़ गए हैं, जिन्हें मोटी कमाई नजर आ रही है।
यदि भारत या दक्षिण अफ्रीका की सरकारों को वास्तव में खेलों को बढ़ावा देना तथा विश्व स्तरीय खिलाड़ी तैयार करना होता तो वे ऐसे महाखर्चीले यज्ञों और सफेद हाथियों पर पैसा फूंकने के बजाय गांवो-कस्बों में खेल मैदान, स्टेडियम,प्रशिक्षण और स्थानीय खेल स्पर्धाओं पर खर्च करती। किन्तु उनका इरादा तो कुछ और ही दिखाई देता है। विश्वकप फाईनल के पहले ही दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जेकब जुमा ने पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एक बैठक ली। उन्होंने कहा – ‘हमने दिखा दिया है कि हम सफल आयोजन और आतिथ्य कर सकते हैं, अब आप आइए, हमारे देश में पूंजी लगाइए और कमाइए।’
इसी तरह की भाषा में दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल आयोजन का एक मकसद बताया गया है कि इससे दिल्ली व भारत को ‘दुनिया की मंजिल’ (ग्लोबल डेस्टिनेशन) बनाने में मदद मिलेगी। यानी विदेशी पूंजी को लुभाने के लिए यह पूरा तमाशा है। यही असली एजेण्डा है, चाहे इसके लिए गरीब देश का खजाना ही क्यों न लुटाना पड़े। बारह दिन के आयोजन व तामझाम से जो वाहवाही व मदहोशी पैदा होगी, उसमें आम जनता थोड़े समय के लिए अपने कष्ट भूल जाएगी। महंगाई, बेकारी, आतंकवाद-माओवाद आदि पर सरकार की घोर असफलता के मुद्दे भी नैपथ्य में चले जाएंगे। यह दूसरा एजेण्डा है। सफेद हाथी, फिजूलखर्च, कर्ज व दिवालियापन की जहां  तक बात है, उन्हें बाद में देखा जाएगा।   
(ईमेल -  sjpsunil@gmail.com )

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लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।
- सुनील
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111
मोबाईल 09425040452 

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