हिन्दुस्तानी में कहावत है – खोदा पहाड़ निकली चुहिया – लम्बे तथा कठिन रियाज के बाद जब नतीजा अपेक्षतया बहुत कम निकलता है – उन हालात में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है ।
न्यायमूर्ती एम.एस. लिबर्हान ने १७ साल परिश्रम किया जिस दरमियान शुरुआती तीन माह की नियुक्ति के उनके कार्यकाल को ४० बार बढ़ाया गया , उन्होंने १०२९ पृष्टों की एक रिपोर्ट तैयार की जो उन तमाम हकीकतों और हालात का तफ़सील से ब्यौरा देती है जिनके के कारण १९९२ में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया । उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले नहीं है बल्कि स्पष्ट तथा बुलन्द हैं : यह विध्वंस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था – ” यह एक संयुक्त उद्यम था “- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , विश्व हिन्दू परिषद ,शिव सेना तथा भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा यह षड़यन्त्र रचा गया था , इनमें से अन्त में उल्लिखित संगठन को रिपोर्ट ने सही ही आर.एस.एस का मोहरा बताया है ।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन निर्भीक तथ्यान्वेषणों के बावजूद जो सिफारिशें दी गई हुई हैं वे फुस्स अथवा कायराना हैं तथा उनका इन निष्कपट निष्कर्षों से कोई मेल नहीं बैठता । देश को साम्प्रदायिक महाविपदा के मुहाने पर ढकलने के लिए ६८ व्यक्तियों को दोषी पाए जाने के बावजूद श्री लिब्रहान अब तक विध्वंस-मामले में आरोपित होने से बच रहे लोगों के खिलाफ़ आरोप दाखिल करने की संस्तुति नहीं करते हैं न ही वे आपराधिक कार्रवाई को तेजी से निपटाने की बात करते हैं ।
षड़यंत्र की बाबत ’ संयुक्त उद्यम ’का जुमला बार – बार दोहराने की वजह से यह चौंकाने वाली बात लगती है । १९९९ में तत्कालीन युगोस्लाविया की बाबत टैडिक फैसले के बाद से सीधी भागीदारी न होने के बावजूद जिन लोगों ने जानबूझकर इन कृत्यों को बढ़ावा दिया हो तथा जो लोग इन कृत्यों में लिप्त संगठनों के शीर्ष पर होते हैं उन पर दायित्व डालने की अन्तर्राष्ट्रीय फौजदारी कानून में सामूहिक अपराधों के ऐसे मामलों की बाबत बाद के वर्षों में एक धारणा विकसित हुई है ।
यदि श्री लिब्रहान ने अपनी सिफारिशों में इस विचार को लागू किया होता तथा इस बात पर जोर दिया होता कि राजनेता , पुलिस अफ़सर, और नौकरशाह जिस व्यापक दण्डाभाव का लाभ लेते आए हैं उस का अन्त हो तो यह मुल्क उनका एहसान मानता । परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है । धर्म तथा राजनीति को अलग रखने तथा अन्य कुछ अन्य ढीले ढाले सुझाव देने के उपरान्त , यह रिपोर्ट विध्वंस मामले में तात्कालिक न्याय सुनिश्चित करने अथवा देश को इस त्रासदी की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए संस्तुति देने से खुद को बचा ले गई है ।
शायद श्री लिब्रहान अथवा उनके कमीशन की यह इतनी कमी नहीं है जितना हमारी पुलिस तथा न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था द्वारा उन्हीं नतीजों पर पहुंच कर फिर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करने की अक्षमता का दोष है ।
दसवें अध्याय में न्यायमूर्ति लिब्रहान सदोषता की बाबत एक निश्चयात्मक वक्तव्य देते हैं : ” किसी औचित्यपूर्ण सन्देह से परे यह स्थापित है कि यह ’संयुक्त-सामान्य-उद्यम’ विध्वंस की पूर्व नियोजित कार्रवाई थी जिसकी तात्कालिक रहनुमाई विनय कटियार , परमहंस रामचन्द्र दास , अशोक सिंघल , चम्पत राय , श्रीषचन्द दीक्षित , बी. पी. सिंघल तथा आचार्य गिरिराज कर रहे थे । यह सब मौके पर मौजूद नेता थे जिन्हें आर.एस.एस.एस द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित करना था । लालकृष्ण अडवाणी मुरली मनोहर जोशी तथा अन्य उनके स्थानापन्न दायित्व के कारण दोषमुक्त नहीं हैं वे भी आर.एस.एस. द्वारा निर्देशित भूमिका को स्वेच्छा से कबूले हुए सह-षड़यन्त्रकारी हैं । अयोध्या अभियान को उनका निश्चित समर्थन तथा दीर्घकाल तक चले अभियान के निर्णायक चरण में उनकी सशरीर मौजूदगी से यह अकाट्य रूप से स्थापित हो चुका है ।
मेरा यह निष्कर्ष है कि आर.एस.एस. , भाजपा , विहिप , शिव सेना तथा उनके वे पदाधिकारी जिनका इस रिपोर्ट में नाम दिया गया है ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मन्त्री कल्याण सिंह के साथ आपराधिक गठजोड़ स्थापित कर विवादित जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए एक ’संयुक्त-समान-उद्यम’(Joint Common Enterprise) स्थापित कर लिया था । उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल करने का काम किया तथा लोकतंत्र को नष्ट करने की सोची समझी कार्रवाई में लिप्त रहे । “
मस्जिद गिराया जाना , “धार्मिक , राजनैतिक , तथा भीड़-तंत्र के सर्वमन्दिरों को एक साथ समेटने वाले संगठित व सुनियोजित षड़यन्त्र का चरम बिन्दु था ” । न्यायमूर्ति लिबर्हान यह सही ही नोट किया कि, ” कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उन्हें सुरक्षित रखा जा सके एवं आगे के राजनैतिक इस्तेमाल के लिए उनकी सेक्युलर विश्वसनीयता को बचाये रखा जा सके । “इस प्रकार श्री अडवाणी और श्री जोशी इस दूसरे दर्जे के भाग रहे हों परन्तु वे भी राजनैतिक तथा कानूनी दायित्व से नहीं बच सकते , बावजूद इसके कि वे संघ परिवार द्वारा प्रदत्त ’मुमकिन इन्कार’ की ढाल से लैस हों ।
आज ,सत्रह साल बीत जाने के बाद , इस संयुक्त उद्यम में लिप्त कई अपराधी मर चुके हैं । परन्तु कई इस बिना पर फले फूले हैं कि वे कानून के ऊपर हैं । इस मुल्क के द्वारा न्यायमूर्ति लिबर्हान की इन सिफ़ारिशों के माध्यम से ’इस चूहे को निकालने के लिए ’ चाहे जितनी भी झूठी निन्दा हो , इस रपट में वह खजाना है जिसकी मदद से कोई ख्यातिनाम जाँच एजेन्सी ठोस षड़यन्त्र का मामला बना सकती है । ऐसे कई किरदार जिनकी स्मृति इस आयोग के समक्ष धूमिल हो गयी थी , नार्को विश्लेषण समेत पुलिस की पारंगत पूछताछ , के समक्ष ज्यादा देर न टिक पायें । उत्तर प्रदेश सरकार यदि गंभीर हो तो पूरक आरोप पत्र दाखिल कर सकती है तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के मामले को त्वरित-ट्रैक न्यायालय में ले जा सकती है ताकि आखिरकार न्याय हो सके ।
( मूल अंग्रेजी लेख )
