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Posts Tagged ‘मध्य प्रदेश’

आम के पेड़ के नीचे बैठक चल रही है। इसमें दूर-दूर के गांव के लोग आए हैं। बातचीत हो रही है। यह दृश्य मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के आदिवासी बहुल केसला विकासखंड स्थित किसान आदिवासी संगठन के कार्यालय का है। यहां 5 जनवरी को किसान आदिवासी संगठन की मासिक बैठक थी जिसमें कई गांव के स्त्री-पुरुष एकत्र हुए थे। जिसमें केसला, सोहागपुर और बोरी अभयारण्य के लोग भी शामिल थे। इस बार मुद्दा था- पंचायत के उम्मीदवार का चुनाव प्रचार कैसे किया जाए? यहां 21 जनवरी को वोट पडेंगे।

बैठक में फैसला लिया गया कि कोई भी उम्मीदवार चुनाव में घर से पैसा नहीं लगाएगा। इसके लिए गांव-गांव से चंदा इकट्ठा किया जाएगा। चुनाव में मुर्गा-मटन की पारटी नहीं दी जाएगी बल्कि संगठन के लोग इसका विरोध करेंगे। गांव-गांव में साइकिल यात्रा निकालकर प्रचार किया जाएगा। यहां किसान आदिवासी संगठन के समर्थन से एक जिला पंचायत सदस्य और चार जनपद सदस्य के उम्मीदवार खड़े किए गए हैं।

सतपुड़ा की घाटी में किसान आदिवासी संगठन पिछले 25 बरस से आदिवासियों और किसानों के हक और इज्जत की लड़ाई लड़ रहा है। यह इलाका एक तरह से उजड़े और भगाए गए लोगों का ही है। यहां के आदिवासियों को अलग-अलग परियोजनाओं से विस्थापन की पीड़ा से गुजरना पड़ा है। इस संगठन की शुरूआत करने वालों में इटारसी के समाजवादी युवक राजनारायण थे। बाद मे सुनील आए और यहीं के होकर रह गए। उनकी पत्नी स्मिता भी इस संघर्ष का हिस्सा बनीं। राजनारायण अब नहीं है उनकी एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है। लेकिन स्थानीय आदिवासी युवाओं की भागीदारी ने संगठन में नए तेवर दिए।

इन विस्थापितों की लड़ाई भी इसी संगठन के नेतृत्व में लड़ी गई जिसमें सफलता भी मिली। तवा जलाशय में आदिवासियों को मछली का अधिकार मिला जो वर्ष 1996 से वर्ष 2006 तक चला। आदिवासियों की मछुआ सहकारिता ने बहुत ही शानदार काम किया जिसकी सराहना भी हुई। लेकिन अब यह अधिकार उनसे छिन गया है। तवा जलाषय में अब मछली पकड़ने पर रोक है। हालांकि अवैध रूप से मछली की चोरी का नेटवर्क बन गया है।

लेकिन अब आदिवासी पंचायतों में अपने प्रतिनिधित्व के लिए खड़े हैं। इसमें पिछली बार उन्हें सफलता भी मिली थी। उनके के ही बीच के आदिवासी नेता फागराम जनपद उपाध्यक्ष भी बने। इस बार फागराम जिला पंचायत सदस्य के लिए उम्मीदवार हैं। फागराम की पहचान इलाके में तेजतर्रार, निडर और ईमानदार नेता के रूप में हैं। फागराम केसला के पास भुमकापुरा के रहने वाले हैं। वे पूर्व में विधानसभा का चुनाव में उम्मीदवार भी रह चुके हैं।

संगठन के पर्चे में जनता को याद दिलाया गया है कि उनके संघर्ष की लड़ाई को जिन प्रतिनिधियों ने लड़ा है, उसे मजबूत करने की जरूरत है। चाहे वन अधिकार की लड़ाई हो या मजदूरों की मजदूरी का भुगतान, चाहे बुजुर्गों को पेंशन का मामला हो या गरीबी रेखा में नाम जुड़वाना हो, सोसायटी में राषन की मांग हो या घूसखोरी का विरोध, यह सब किसने किया है?

जाहिर है किसान आदिवासी संगठन ही इसकी लड़ाई लड़ता है। किसान आदिवासी संगठन राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी जन परिषद से जुड़ा है। समाजवादी जन परिषद एक पंजीकृत राजनैतिक दल है जिसकी स्थापना 1995 में हुई थी। समाजवादी चिंतक किशन पटनायक इसके संस्थापकों में हैं। किशन जी स्वयं कई बार इस इलाके में आ चुके हैं और उन्होंने आदिवासियों की हक और इज्जत की लड़ाई को अपना समर्थन दिया है।

सतपुड़ा की जंगल पट्टी में मुख्य रूप से गोंड और कोरकू निवास करते हैं जबकि मैदानी क्षेत्र में गैर आदिवासी। नर्मदा भी यहां से गुजरती है जिसका कछार उपजाउ है। सतपुड़ा की रानी के नाम से प्रसिद्ध पचमढ़ी भी यहीं है।

होशंगाबाद जिला राजनैतिक रूप से भिन्न रहा है। यह जिला कभी समाजवादी आंदोलन का भी केन्द्र रहा है। हरिविष्णु कामथ को संसद में भेजने का काम इसी जिले ने किया है। कुछ समर्पित युवक-युवतियों ने 1970 के दशक में स्वयंसेवी संस्था किशोर भारती को खड़ा किया था जिसने कृषि के अलावा षिक्षा की नई पद्धति होषंगाबाद विज्ञान की शुरूआत भी यहीं से की , जो अन्तरराष्ट्रीय पटल भी चर्चित रही। अब नई राजनीति की धारा भी यहीं से बह रही है।

इस बैठक में मौजूद रावल सिंह कहता है उम्मीदवार ऐसा हो जो गरीबों के लिए लड़ सके, अड़ सके और बोल सके। रावल सिंह खुद की स्कूली शिक्षा नहीं के बराबर है। लेकिन उन्होंने संगठन के कार्यकर्ता के रूप में काम करते-करते पढ़ना-लिखना सीख लिया है।

समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सुनील कहते है कि हम पंचायत चुनाव में झूठे वायदे नहीं करेंगे। जो लड़ाई संगठन ने लड़ी है, वह दूसरों ने नहीं लड़ी। प्रतिनिधि ऐसा हो जो गांव की सलाह में चले। पंचायतों में चुप रहने वाले दब्बू और स्वार्थी प्रतिनिधि नहीं चाहिए। वे कहते है कि यह सत्य, न्याय व जनता की लड़ाई है।

फागराम

अगर ये प्रतिनिधि निर्वाचित होते हैं तो राजनीति में यह नई शुरूआत होगी। आज जब राजनीति में सभी दल और पार्टियां भले ही अलग-अलग बैनर और झंडे तले चुनाव लड़ें लेकिन व्यवहार में एक जैसे हो गए हैं। उनमें किसी भी तरह का फर्क जनता नहीं देख पाती हैं। जनता के दुख दर्द कम नहीं कर पाते। पांच साल तक जनता से दूर रहते हैं।

मध्यप्रदेश में जमीनी स्तर पर वंचितों, दलितों, आदिवासियों, किसानों और विस्थापितों के संघर्श करने वाले कई जन संगठन व जन आंदोलन हैं। यह मायने में मध्यप्रदेश जन संगठनों की राजधानी है। यह नई राजनैतिक संस्कृति की शुरूआत भी है। यह राजनीति में स्वागत योग्य कदम है।

- बाबा मायाराम की रपट । साभार जुगनु

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[ इस चिट्ठे के पाठक हमारे दल समाजवादी जनपरिषद की प्रान्तीय उपाध्यक्ष साथी शमीम मोदी की हिम्मत और उनके संघर्ष से अच्छी तरह परिचित हैं । हिन्दी चिट्ठों के पाठकों ने शमीम की जेल यात्रा के दौरान उनके प्रति समर्थन भी जताया था ।

गत दिनों उन्होंने प्रतिष्ठित शोध संस्थान टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ ,मुम्बई में बतौर एसिस्टेन्ट प्रोफेसर काम करना शुरु किया है । वे अपने बेटे पलाश के साथ मुम्बई के निकट वसई में किराये के फ्लैट में रह रही थीं ।

मध्य प्रदेश की पिछली सरकार में मन्त्री रहे जंगल की अवैध कटाई और अवैध खनन से जुड़े माफिया कमल पटेल के कारनामों के खिलाफ़ सड़क से उच्च न्यायालय तक शमीम ने बुलन्द आवाज उठाई । फलस्वरूप हत्या के एक मामले में कमल पटेल के लड़के को लम्बे समय तक गिरफ़्तारी से बचा रहने के बाद हाल ही में जेल जाना पड़ा ।

गत दिनों जिस हाउसिंग सोसाईटी में वे रहती थीं उसीके चौकीदार द्वारा उन पर चाकू से प्राणघातक हमला किया गया । शमीम ने पूरी बहादुरी और मुस्तैदी के साथ हत्या की नियत से हुए इस हमले का मुकाबला किया । उनके पति और दल के नेता साथी अनुराग ने इसका विवरण भेजा है वह दहला देने वाला है । हम शमीम के साहस , जीवट और हिम्मत को सलाम करते हैं । आप सबसे अपील है कि महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री को पत्र या ईमेल भेजकर हमलावर की गिरफ़्तारी की मांग करें ताकि उसके पीछे के षड़यन्त्र का पर्दाफाश हो सके । कमल पटेल जैसे देश के शत्रुओं को हम सावधान भी कर देना चाहते हैं कि हम गांधी - लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले जुल्मी से टकराना और जुल्म खत्म करना जानते हैं । प्रस्तुत है अनुराग के पत्र के आधार पर घटना का विवरण । ]

मित्रों ,

यह शमीम ही थी जो पूरे शरीर पर हुए इन घातक प्रहारों को झेल कर बची रही ।  ज़ख्मों का अन्दाज उसे लगे ११८ टाँकों से लगाया जा सकता है । घटना का विवरण नीचे मुताबिक है -

२३ जुलाई को हाउसिंग सोसाइटी का चौकीदार दोपहर करीब सवा तीन बजे हमारे किराये के इस फ्लैट में पानी आपूर्ति देखने के बहाने आया । शमीम यह गौर नहीं कर पाई कि घुसते वक्त उसने दरवाजा अन्दर से लॉक कर दिया था । फ्लैट के अन्दर बनी ओवरहेड टंकी से पानी आ रहा है या नहीं यह देखते वक्त वह शमीम का गला दबाने लगा। उसकी पकड़ छुड़ाने में शमीम की दो उँगलियों की हड्डियाँ टूट गईं । फिर उसके बाल पकड़कर जमीन पर सिर पटका और एक बैटन(जो वह साथ में लाया था) से बुरी तरह वार

भोपाल में शमीम की रिहाई के लिए

भोपाल में शमीम की रिहाई के लिए

करने लगा । वह इतनी ताकत से मार रहा था कि कुछ समय बाद वह बैटन टूट गया । शमीम की चोटों से बहुत तेजी से खून बह रहा था । शमीम ने हमलावर से कई बार पूछा कि उसे पैसा चाहिए या वह बलात्कार करना चाहता है । इस पर वह साफ़ साफ़ इनकार करता रहा ।  शमीम ने सोचा कि वह मरा हुआ होने का बहाना कर लेटी रहेगी लेकिन इसके बावजूद उसने मारना न छोड़ा तथा एक लोहा-काट आरी (जो साथ में लाया था ) से गले में तथा कपड़े उठा कर पेट में चीरा लगाया । आलमारी में लगे आईने में शमीम अपनी श्वास नली देख पा रही थी ।  अब शमीम ने सोचा कि बिना लड़े कुछ न होगा । उसने हमालावर से के हाथ से आरी छीन ली और रक्षार्थ वार किया । इससे वह कुछ सहमा और उसने कहा कि रुपये दे दो । शमीम ने पर्स से तीन हजार रुपये निकाल कर उसे दे दिए । लेकिन उसने एक बार भी घर में लॉकर के बारे में नहीं पूछा । अपने बचाव में शमीम ने उससे कहा कि वह उसे कमरे में बाहर से बन्द करके चला जाए । वह रक्तस्राव से मर जाएगी । शमीम अपना होश संभाले हुए थी । वह पलाश के कमरे में बन्द हो गयी (जो कमरा हकीकत में अन्दर से ही बन्द होता है )। हमलावर बाहर से कुन्डी लगा कर चला गया । शमीम ने तय कर लिया था कि वह होशोहवास में रहेगी और हर बार जब वह चोट करता , वह उठ कर खड़ी हो जाती । हमलावर के जाने के बाद वह कमरे से बाहर आई और पहले पड़ोसियों , फिर मुझको और अपने माता-पिता को खबर दी। अस्पताल ले जाते तक वह पूरी तरह होश में रही ।

दाँए से बाँए:शमीम,पन्नालाल सुराणा,स्मिता

दाँए से बाँए:शमीम,पन्नालाल सुराणा,स्मिता

कुछ सवाल उठते हैं :   चौकीदार ने लॉकर खोलने की कोशिश नहीं की जो वहीं था जहाँ वह शमीम पर वार कर रहा था । उसने पैसे कहां रखे हैं इसके बारे में बिलकुल नहीं पूछा । वह गालियाँ नहीं दे रहा था और उसके शरीर को किसी और मंशा से स्पर्श नहीं कर रहा था । यदि वह मानसिक रोगी या वहशी होता तो शायद शमीम उससे नहीं निपट पाती । वह सिर्फ़ जान से मारने की बात कह रहा था । शमीम के एक भी सवाल का वह जवाब नहीं दे रहा था ।  सेल-फोन और लैपटॉप वहीं थे लेकिन उसने उन्हें नहीं छूआ । इन परिस्थितियों में हमें लगता है कि इसके पीछे कोई राजनैतिक षड़यन्त्र हो सकता है ।

शमीम को मध्य प्रदेश के पूर्व राजस्व मन्त्री कमल पटेल और उसके बेटे सन्दीप पटेल से जान से मारने की धमकियाँ मिलती रही हैं । इसकी शिकायत हमने स्थानीय पुलिस से लेकर पुलिस महानिदेशक से की हैं । मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देश पर २००५ की शुरुआत से २००७ के अन्त तक उसे सुरक्षा मुहैय्या कराई गई थी । इसलिए हमें उन पर शक है । हमले के पीछे उनका हाथ हो सकता है ।

पेशेवर तरीके से कराई गयी हत्या न लगे इस लिए इस गैर पेशेवर व्यक्ति को इस काम के लिए चुना गया होगा । जब तक राकेश नेपाली नामक यह हमलावर गिरफ़्तार नहीं होता वास्तविक मन्शा पर से परदा नहीं उठेगा ।

हम सबको महाराष्ट्र शासन और मुख्यमन्त्री पर उसकी गिरफ़्तारी के लिए दबाव बनाना होगा ।

अनुराग मोदी

शमीम मोदी के संघर्ष से जुड़ी खबरें और आलेख :

लोकतंत्र का जिला – बदर

’सत्याग्रही’ शिवराज के राज में

चिट्ठालोक की चेतना को प्रणाम

शमीम मोदी की रिहाई का आदेश


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गत १० फरवरी से हरदा और होशंगाबाद की जेलों में फर्जी मामलों में बन्द समाजवादी जनपरिषद , म. प्र. की उपाध्यक्ष साथी शमीम मोदी की जमानत की अर्जी जबलपुर उच्च न्यायालय ने मंजूर कर ली है ।
शमीम की गिरफ़्तारी के विरुद्ध देश भर में कार्यक्रम आयोजित किए गए । आज दिल्ली में मध्य प्रदेश भवन पर विभिन्न जन संगठनों के करीब ३५ लोगों ने प्रदर्शन किया और आवासी आयुक्त को एक ज्ञापन सौंप कर फर्जी मुकदमे वापस लेने की माँग की । शमीम की मातृ-संस्था टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेस के शिक्षकों द्वारा प्रस्तुत ऑनलाइन प्रतिवेदन पर अब तक ४८४ लोगों ने समर्थन जताया है । हिन्दी चिट्ठेकारों ने भी प्रतिवेदन पर समर्थन जताया है ।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ८ मार्च को शमीम के कार्य क्षेत्र हरदा में ‘लड़ेंगे – जीतेंगे’ की भावना से दमन के विरुद्ध महिलाओं की एक रैली आयोजित की गयी है ।

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साभार : NDTV , Youtube.

शमीम की गिरफ्तारी पर मेरी रपट पढ़ें ।

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घोषणा पत्र क्यों ?

    आमतौर पर पार्टियों के लिए चुनाव घोषणापत्र एक रस्म अदायगी होता है । चुनाव के बाद वे इसे भूल जाती हैं । जो पार्टी सरकार बनाती है , वे अपनी घोषणाओं को लागू करने की कोई जरूरत नहीं समझती है । कई दफ़े वे अपने घोषणा पत्र के खिलाफ़ काम करती हैं । जो पार्टी हार जाती है , वह भी अपने घोषणापत्र के मुद्दों को लेकर आवाज उठाने और संघर्ष करने के बजाय चुपचाप बैठकर पांच साल तक तमाशा देखती है ।

    समाजवादी जनपरिषद यह घोषणापत्र पूरी गंभीरता से मध्य प्रदेश की जनता के सामने पेश कर रही है । इसमें न केवल प्रदेश की मौजूदा खराब हालत के बारे में विश्लेषण है , और मौजूदा सरकारों और पार्टियों की नीतियों पर टिप्पणी है , बल्कि मध्यप्रदेश की जनता की मुक्ति कैसे होगी , मध्यप्रदेश का विकास कैसे होगा , नया मध्यप्रदेश कैसे बनेगा , इस बारे में समाजवादी जनपरिषद की समझ तथा कार्य योजना का यह एक दस्तावेज है । बड़ी पार्टियों द्वारा उछाले गए नकली मुद्दों और नारों को एक तरफ करके जनता के असली मुद्दों को सामने लाने की एक ईमानदार कोशिश है ।

    समाजवादी जनपरिषद जीते या हारे , इस घोषणापत्र में घोषित मुद्दों , नीतियों व घोषणाओं को लेकर वह लगातार विधानसभा के अंदर व बाहर संघर्ष करेगी । यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा , जब तक जनता की छाती पर चढ़कर उसका खून चूसने वाले भ्रष्टाचारियों , बेईमानों , लुटेरों का राज खतम नहीं हो जाता और मेहनतकश लोगों की बराबरी एवं हक वाली एक नयी क्रांतिकारी व्यवस्था कायम नहीं हो जाती ।

मध्यप्रदेश के राजनैतिक हालात

    जो हालत भारत की राजनीति की है , वही कमोबेश मध्यप्रदेश की है , बल्कि यहाँ पर पिछले काफी समय दो पार्टियों का एकाधिकार होने से हालत और खराब है । कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों अदल-बदल कर इस प्रदेश पर राज कर रही हैं । दोनों की नीतियों , चरित्र व आचरण में कोई खास फर्क नहीं है । दोनों ने मिलकर प्रदेश की जनता को फुटबॉल बना दिया है । जनता एक से त्रस्त होकर दूसरी पार्टी को सत्ता में लाती है , फिर उनसे परेशान होकर वापस पहली को गद्दी पर बैठाती है । जो पार्टी सरकार में नहीं होती है , वह जनता के मुद्दों और कष्टों को लेकर कोई जोरदार आन्दोलन करने की जरूरत नहीं समझती , बल्कि वह चाहती है कि जनता की परेशानी बढ़े , जिससे उन्हें वापस सत्ता में आने का मौका मिले ।

    कांग्रेस ने सड़क , बिजली , पानी , शिक्षा और स्वास्थ्य का निजीकरण शुरु किया जिसे भाजपा ने आगे बढ़ाया । मतलब जनता की इन जरूरी आवश्यकताओं को पूरा करने की जवाबदारी सरकार की बजाए निजी कम्पनियों ( सेठों ) की हो गयी ।  यह कम्पनियां यह सुविधायें उन्हीं लोगों को देंगी जो उसका , उनकी तय की गई दरों पर भुगतान कर सकेगा।

    सरकारी स्कूलों में मास्टर और किताबें नहीं हैं । चारों तरफ़ निजी स्कूलों का बोलबाला है । अस्पतालों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, लोग प्रायवेट डॉक्टरों से भरोसे इलाज करा रहे हैं । बात यहीं रुक जाती है ऐसा नहीं है । प्रदेश की लाखों एकड़ जमीन भूमिहीनों को देने के बजाए बड़ी बड़ी कम्पनियों को लम्बी लीज पर दी जा रही है ।

    प्रदेश सरकार की सारी योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई हैं । चाहे वो रोजगार गारंटी योजना हो , या शक्तिमान या जननी सुरक्षा । न तो रोजगार गारंटी में पूरा काम मिल रहा है न मजदूरी । सरकार ने रही सही कसर गरीबी रेखा से लोगों के नाम काटकर पूरी कर दी है ।  प्रदेश में भूख और कुपोषण से बच्चों की मौत का ताण्डव चल रहा है । ” गरीब की थाली नहीं रहेगी खाली” का जो नारा भाजपा ने दिया था वो उलटा हो गया । प्रदेश का किसान खाद , बिजली पानी के साथ-साथ समर्थन मूल्य और समय पर अपनी फसल का भुगतान पाने के लिए भटकता रहा । राजनैतिक विकल्पहीनता और जड़ता की इस हालत को बदलना जरूरी है । समाजवादी जनपरिषद इसके लिए पूरी कोशिश करेगी ।

[ जारी ]

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