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Posts Tagged ‘यात्री सुरक्षा’

पिछले एक माह में रेल गाड़ियों के टकराने की कई दर्दनाक घटनायें हुई है । ज्यादातर घटनायें उत्तर प्रदेश में हुई हैं , दो यात्री ढ़ोने वाली गाड़ियों के बीच हुई हैं तथा कोहरे की वजह से हुई हैं । इनमें दर्जनों यात्रियों की मृत्यु हुई हैं । खानापुरी करने वाली अन्तरिम जाँच रपटें भी आने लगीं हैं । इन रपटों में सुरक्षा तथा गाड़ी चलाने के मौजूदा नियमों की अनदेखी करने का दोषी किन्हीं अदना कर्मचारियों को ठहरा कर कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है । घटना होते ही निलम्बित किए गए अधिकारियों का निलम्बन वापस होने की प्रक्रिया भी इन अन्तरिम रपटों के आने के बाद शुरु हो जाती होगी । बहरहाल , इससे ज्यादा गंभीर विचार करने का सामर्थ्य शीर्ष पर बैठे लोगों में शायद नहीं है । जहाँ विचार करने में सिर खपाने की भी आवश्यकता न हो वहाँ भी फैसले लेने में शीर्षस्थ हुक्मरान कितना उपेक्षापूर्ण रुख अपनाये रहते हैं उसका नमूना रेल – सुरक्षा का मामला है। डिविजनल रेल प्रबन्धकों से ऊपर बैठे लोगों पर इन घटनाओं तथा इनमें मरे निरीह लोगों की मौत की जिम्मेदारी हमारी रेल व्यवस्था नहीं डालना चाहती ।

मगध तथा गोरखधाम की टक्कर


भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा चन्द्रयान भेजने से ज्यादा महत्वपूर्ण मैं कोंकण रेलवे से जुड़ें उन वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और इन्जीनियरों की खोज को मानता हूँ जिन्होंने रेल गाड़ियों के न टकराने के लिए एक अचूक सिस्टम की खोज की है , उसका पेटेन्ट न सिर्फ़ अपने देश में हासिल किया है अपितु चीन और रूस में भी प्राप्त किया है । कोंकण रेलवे तथा पूर्वोत्तर सीमान्त रेलवे ने इस सिस्टम को अपना भी लिया है । इस सुरक्षा पद्धति का नाम भी सुन्दर है – रक्षा कवच ! इस सुरक्षा व्यवस्था की खोज यदि किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने की होती अथवा अम्बानी – टाटा – मित्तल ने इसका पेटेन्ट कराया होता तब ही उसे पूरे देश में लागू करने का निर्णय हो पाता ? शायद इसलिए कि रेल भवन में बैठे टेक्नॉक्रैट्स – और नौकरशाहों (और शायद मन्त्री ) को अपने प्रस्ताव के हक में करने की ’तिकड़म’ की विशिष्टता निजी क्षेत्रों को कोंकण रेल जैसे निगमों से अधिक होती है । गौरतलब यह भी है कि कोंकण रेलवे ने जब यह कामयाबी हासिल की थी तब भी ममता बनर्जी रेल महकमे की मन्त्री थीं । तब काबीना स्तर की नहीं राज्य मन्त्री थीं ।
सरसरी तौर पर ’रक्षा कवच’ की इन विशेषताओं को आम आदमी भी समझ सकता है:
मौजूदा सुरक्षा उपायों के बावजूद मानव-भूल तथा सीमाओं के कारण रेलों के टकराने की घटनाओं से बचने का यह अतिरिक्त उपाय है । ’जिन से बचा जा सकता था’ और जिन से ’नहीं बचा जा सकता था’ दुर्घटनाओं की इन दो श्रेणियों का अप्रैल १९९७ से ३ जनवरी २००२ के बीच हुई रेलों की १२८ टक्करों का रेलवे बोर्ड के सुरक्षा निदेशालय ने विश्लेषण किया था । यह पाया गया कि ’रक्षा कवच’ अपनाने से इनमें से ८२ फीसदी दुर्घटनायें नहीं होतीं । शेष १८ फीसदी घटनायें टलने लायक न थी क्योंकि वे ब्रेक फेल होने , संकेतों के अनुरूप कार्र्रवाई हेतु पर्याप्त समय के अभाव अथवा ब्रेक लगाने के बाद रुकने के लिए जितनी दूरी होनी चाहिए उससे कम होने के कारण हुई थीं ।
’रक्षा कवच’ के द्वारा न सिर्फ़ एक पटरी पर आमने-सामने की टक्कर , आगे-पीछे की टक्कर टाली जा सकती है अपितु मानव रहित क्रासिंग पर होने वाली वाहनों से टक्कर तथा बगल की पटरी से उतरी हुई गाड़ियों से टक्कर भी टाली जा सकती है ।
’ रक्षा कवच ’ टक्कर निरोधक उपकरणों का नेटवर्क है । यह उपकरण इंजन , गार्ड के डिब्बे,पटरी के बगले के केबिनों में या स्टेशन ,लोको शेड में लगे होते हैं तथा तीन किलोमीटर की परिधि में रेडियो सिगनल के जरिए काम करते हैं । चूंकि ’रक्षा कवच’ विकेन्द्रित नियन्त्रण पर आधारित है इसलिए टकराने की जोखिम वाली दोनों गाड़ियों में यह लगा होना चाहिए ।
’ रक्षा कवच ’ के तहत ट्रेन में लगे उपकरणों के रूप में कम्प्यूटर भी लगे होते हैं जो ट्रेन का लोकेशन , गति , चलने की अवधि आदि ’ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम’ से प्राप्त करते हैं । कोंकण रेलवे के एक और पेटेंट – ’ डेवियेशन काउन्ट थियरी ’ द्वारा उसे पटरी परिवर्तन से सम्बन्धित सूचना मिलती है ।
उपकरणों में टकराने का जोखिम का आकलन होते ही अपने आप ब्रेक लग जाता है इसके लिए किसी इंसान को डेटा एन्टरी नहीं करनी पड़ती ।
रक्षा कवच सड़क का प्रयोग करने वालों (मानव रहित क्रासिंग पर भी) को ट्रेन के आने की चेतावनी दे देता है । कोहरे के बीच आ रहे स्टेशन की चेतावनी की इसकी पद्धति के कारण विस्फोटक की आवाज की चेतावनी की जरूरत नहीं पड़ती ।( कोहरे के दिनों में पटरियों पर तेज आवाज करने वाला विस्फोटक लगाया जाता है ताकि उस पर से गाड़ी गुजरते ही उसकी आवाज से चालक सचेत हो जाए।)’रक्षा कवच’ अपनाने से रेल की पटरियों पर विस्फोटक को स्थापित करने में लगने वाला मानव प्रयास भी बच जाता है ।
ड्राईवर , गार्ड और स्टेशन मास्टरों के पास ऐसे मानवचलित उपकरण भी होते हैं जो खतरे की स्थिति में तीन किलोमीटर की परिधि में आने वाली गाड़ियों को रोक दे ।
कोंकण रेलवे के इस ’रक्षा कवच’ से अलग एक रक्षा कवच से मैं पहले भी प्रभावित हुआ था। उसका अनुकरण भी रेलवे को देश भर में करना चाहिए था, अब तक नहीं किया है । उससे भी नागरिकों की सेहत पर अनुकूल असर होता है । इस दूसरे कवच को न अपनाने के पीछे किस प्रकार के निहित स्वार्थ हो सकते हैं उसका अन्दाज लगाना सरल है । कोंकण रेल के स्टेशनों पर लगे पीने के पानी के नलों पर एक सूचना हिन्दी , मराठी और अंग्रेजी में लगी होती थी – ’यह पानी विश्व स्तरीय जाँच से गुजरा है , आपको पीने का पानी खरीदने की आवश्यकता नहीं है’ । बोतलबंद पानी बेचने वालों का धन्धा मुख्यत: रेलवे स्टेशनों पर बिक्री से चलता है जब गाड़ी के आने पर नल से पानी आना बन्द हो जाता है तथा गरीब आदमी भी पानी खरीदने के लिए मजबूर हो जाता है ।
राजनैतिक हल्कों में नैतिकता जब बची थी तब रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया था। ममता बनर्जी और लालू यादव सरीखों से लाल बहादुर शास्त्री की तुलना करना मुमकिन नहीं है । यात्रियों की जान-माल की रक्षा की न्यूनतम कार्यकुशलता की उम्मीद तो करनी ही होगी।

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