जिलाधिकारी,मऊ।
इस संदेश द्वारा मैं आज सुबह घटित एक आपराधिक घटना की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं।हमारे पंजीकृत राजनैतिक दल-समाजवादी जनपरिषद के प्रान्तीय संगठन मन्त्री साथी विक्रमा मौर्य अपने गांव के स्व. राजेन्द्र मौर्य की हत्या में गवाह हैं और गवाही दे चुके हैं।इस हत्या के नामजद अभियुक्तों द्वारा उन्हें गवाही न देने के लिए धमकाया जा रहा था जिसकी सूचना उन्होंने प्रशासन को दी थी।यह अभियुक्त जमानत पर रिहा हैं तथा आज एक सूमो वाहन पर सवार होकर चौथी मील के निकट साइकिल पर सिपाह जा रहे साथी विक्रमा मौर्य पर हत्या की नियत से इन लोगों ने वाहन चढ़ा दिया।वे पलट कर जब दूसरी बार विक्रमा पर गाड़ी चढ़ाने जा रहे थे तब प्रत्यक्षद्र्शियों के शोर मचाने से भाग गये।पूर्व बी.डी.सी. सदस्य विक्रमा मऊ सदर अस्पताल में जीवन संघर्ष कर रहे हैं। आप से निवेदन है कि शासकीय अधिवक्ता द्वारा हत्या के मामले में जमानत पर रिहा इन लोगों की जमानत रद्द करवाने के लिए आवेदन का निर्देश दें।तथ सुनिश्चित करें कि विक्रमा मौर्य द्वारा मधुबन थाने में दी गई तहरीर पर मुकदमा कायम कर तत्काल कार्रवाई हो।
विनीत,
अफलातून,
सदस्य,राष्ट्रीय कार्यकारिणी,समाजवादी जनपरिषद.
5जी एफ रीडर्स फ्लैट,जोधपुर कॉलॉनी,का,हि.वि.वि.,
वाराणसी – 221005,फोन – 08004085923
इन्हें भेजिए,बात कीजिए ः
मुख्यमन्त्री ,उत्तर प्रदेश ई-मेल cmup@nic.in
पुलिस महानिरीक्षक,वाराणसी जोन – ईमेल igzonevns@up.nic.in
जिलाधिकारी मऊ , फोन- 09454417523 , ईमेल – dmmau@nic.in
पुलिस अधीक्षक मऊ, मो. 09454400292 , Email – spmau@up.nic.in
Posts Tagged ‘समाजवादी जनपरिषद’
संगठन मंत्री साथी विक्रमा मौर्य पर प्राणघातक हमला/ साथ दीजिए
Posted in criminalisation, samajwadi janparishad, tagged विक्रमा मौर्य, समाजवादी जनपरिषद, हमला on मार्च 21, 2013 | 5 Comments »
चुनाव का तजुर्बा
Posted in election, tagged अफलातून, चुनाव, विधान सभा, समाजवादी जनपरिषद, समीक्षा on मार्च 24, 2012 | 6 Comments »
हम यह मान कर चले थे की आम जनता खुद से राजनीति को काफी दूर महसूस करने लगी है । राजनीति का मकसद जब स्पष्ट होता है तब समाज का हर तबका उससे जुड़ जाता है । राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में समाज का हर तबका राजनीति से जुड़ गया था क्योंकि उसका मकसद स्पष्ट था – देश को गुलामी के जुए से मुक्त कराना । हमने सोचा था कि चुनाव लड़कर आम आदमी को राजनीति से जोड़ने की कोशिश करेंगे । समाजवादी जनपरिषद की राजनीति का मकसद है नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना । लगभग सवा तीन लाख मतदाताओं के विधान सभा क्षेत्र में समाजवादी जनपरिषद के प्रत्याशी के रूप में मुझे मात्र ६३२ वोट मिले । जाति , सम्प्रदाय , पैसे के आधार पर राजनीति की मुख्यधारा के दलों से जुड़ना अधिकतर लोगों ने पसंद किया । लोगबाग प्रचलित राजनीति से मजबूती से जुड़े हैं । मुख्यधारा के दल राजनीति का जो भी उद्देश्य लेकर चल रहे हैं जनता को उससे परहेज नहीं है । लोगों में हमारी राजनीति के प्रति यकीन पैदा करने के लिए जो न्यूनतम ताकत आवश्यक है वह हम नहीं जुटा पाए हैं ।
हमें मिले वोट अललटप्पू ढंग से नहीं पड़े थे । जिन इलाकों में दल का काम था अथवा साथियों का निजी संपर्क था वहीं से यह वोट आए । गिने – गिनाए । हमारे संभावित मतदाताओं पर नोंच-खसोट भी हुई , जिसे रोकने के लिए हमने प्रयास नहीं किए थे । जिस छोटे से क्षेत्र में हमारे दल ने काम किया था और पहचान भी थी उसके बाहर कम समय देने पर कुछ वोट बढ़ जाते।
एक मित्र ने सही कहा कि लड़ नहीं पाए लेकिन ललकारा तो खूब ! इस बार सर्वाधिक नुक्कड़ सभाएं हमने ही कीं । बड़े दलों के बड़े नेताओं की रैलियाँ हुईं लेकिन नुक्कड़ सभाएं बिलकुल नहीं हुईं । १३ दिनों के लिए रखे गए एक वाहन के खर्च के बाद सबसे बड़ा खर्च नुक्कड़ सभाओं पर ही हुआ । हमारे परचे भी पसंद किए गए ।
पुरे चुनाव में यह हमेशा लगा कि तीसरी शक्ति के फलने-फूलने की गुंजाइश है । वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों व् साम्प्रदायिकता के विरुद्ध और सामाजिक न्याय के हक़ में खड़ी होने वाली तीसरी शक्ति । इस ताकत को खडा करने में राजनैतिक रूप से सचेत युवा और महिला संगठन बहुत कारगर साबित होंगे । वर्ग संगठनों की मजबूती होने पर लोग उस शक्ति को आपका आधार मान लेते हैं । ऐसा आधार जाति-सम्प्रदाय के आधार से बेहतर है ।
करीब एक लाख रुपये चुनाव में खर्च हुए । चन्दा इससे कुछ अधिक हुआ । चंदे का बड़ा हिस्सा बनारस के बाहर रहने वाले मित्रों से आया । १९७७ में मेरे साथ स्कूल पास करके जो मित्र निकले थे उनका सहयोग अधिक था ।
चुनाव-तंत्र की कमियाँ उजागर हुईं ।यह कमी थी – जायज चुनावी खर्च का फालतू छिद्रान्वेषण और नाजायज खर्च रोक पानी में पूरी विफलता । दलों द्वारा चुनाव खर्च की कोई सीमा निर्धारित नहीं है। कांग्रेस ने उम्मीदवारों को खर्च की अधिकतम सीमा (१६ लाख रूपए) से दुगने ज्यादा रकम प्रत्येक प्रत्याशी को दी थी । राजनैतिक समझ के अभाव में चुनाव तंत्र सुधार के नाम पर ऐसे कई कदम उठाता है जो छोटे दलों के विरुद्ध तथा भ्रष्ट राजनीति के पक्ष में होते हैं । लोकतंत्र का यह आवश्यक पर्व धारा १४४ के तहत नियंत्रित था।चार से अधिक लोगों के इकट्ठे होकर कुछ भी सार्वजनिक तौर पर करने के लिए पुलिस और प्रशासन से अनुमति लीजिए । गैर – मान्यताप्राप्त दलों के लिए मात्र १५ दिन प्रचार के लिए मिलते हैं । इन छोटे दलों को चुनाव चिह्न भी इस पखवाड़े के शुरुआत में ही मिलता है । इस अवधि में तीन बार चुनाव- खर्च बताने रिटर्निंग अफसर के दफ्तर जाना पड़ता है । खर्च – प्रेक्षक का आग्रह था की जिला प्रशासन द्वारा निर्धारित दरों पर ही खर्च दिखाया जाए , भले ही वास्तव में वह उससे कम या ज्यादा हो । इस प्रकार चुनाव – तंत्र झूट बोलने का आग्रह करता है।
मीडिया की भूमिका पक्षपातपूर्ण , मुनाफाखोर और अलोकतांत्रिक थी । पिछले चुनाव में ‘पेड़ न्यूज’ की काफी चर्चा हो गई थी। हमने भी चुनाव आयोग और प्रेस परिषद् में शिकायत दर्ज कराई थी। इस बार इसकी निगरानी के लिए जिला-स्तर पर एक समिति बना दी गई थी । मनमानी खबरें पैसे लेकर छापने में कुछ कमी जरूर आई । इसकी भरपाई बड़े अखबारों ने हर प्रत्याशी से पचीस हजार रुपये लेकर और छोटे अखबारों ने पंद्रह हजार रूपए लेकर की । जिन प्रत्याशियों ने इतना पैसा नहीं दिया उनकी खबरों का ‘ब्लैक आउट ‘ हुआ । स्थानीय अखबारों के इस रवैये का असर राष्ट्रीय अखबारों पर नहीं था । हिन्दू ,स्टार न्यूज, एनडीटीवी ,आज तक पर हमारी उम्मीदवारी ‘खबर’ मानी गई -
http://www.thehindu.com/news/states/other-states/article2889442.ece
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चुनाव के लिए जन संपर्क के दौरान महसूस हुआ कि लोग प्रत्याशियों की बात बहुत ही ध्यान से सुनते हैं । नई राजनैतिक संस्कृति की बात से प्रभावित होकर जिन मुष्टिमेय लोगों ने वोट दिया उनमें से एक ने बताया कि १९७७ के बाद वे पहली बार वोट देने गए । मुझे याद आया कि मेरे सर्वोदयी पिता पहले चुनाव से ही मतदान की उम्र पार कर चुके थे लेकिन पहली बार वोट देने १९७७ में ही गए थे – कुछ दूर तक कंधे पर हल लिए किसान का जनता पार्टी झंडा उठा कर भी ।
अयोध्या फैसले पर समाजवादी जनपरिषद का वक्तव्य
Posted in communalism, half pant, tagged ayodhya judgement, अखंडता, अयोध्या फैसला, एकता, मन्दिर मस्जिद विवाद, समाजवादी जनपरिषद, साम्प्रदायिकता, communalism, mandir masjid dispute, samajwadi janaparishad, secularism on अक्टूबर 15, 2010 | 3 Comments »
30 सितंबर, 2010 को अयोध्या विवाद के विषय में लखनऊ उच्च न्यायालय के फैसले के बाद देश ने राहत की सांस ली है। तीनों पक्षों को एक तिहाई – एक तिहाई भूमि बांटने के इस फैसले के कारण कोई भी पक्ष पूरी हार – जीत का दावा नहीं कर पाया। कोई खून-खराबा या उपद्रव इसलिए भी नहीं हुआ, क्योंकि देश की आम जनता इस विवाद से तंग आ चुकी है और इसको लेकर अब कोई बखेड़े, दंगों या मार-काट के पक्ष में नहीं है।
किन्तु इस फैसले से कोई पक्ष संतुष्ट नहीं है और यह तय है कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाएगा और इसमें कई साल और लग सकते हैं। इस विवाद का फैसला चाहे सर्वोच्च न्यायालय से हो चाहे आपसी समझौते से, किन्तु अब यह तय हो जाना चाहिए कि इसका व इस तरह के विवादों का फैसला सड़कों पर खून – खच्चर व मारकाट से नहीं होगा। ऐसा कोई नया विवाद नहीं उठाया जाएगा। धार्मिक कट्टरता और उन्माद फैलाने वाली फिरकापरस्त ताकतों को देश को बंधक बनाने, पीछे ले जाने और अपना उल्लू सीधा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
इस फैसले को लेकर कुछ चिन्ताजनक बातें हैं । एक तो यह कि इसमें जमीन एवं सम्पत्ति के मुकदमे को हल करने के लिए आस्था और धार्मिक विश्वास को आधार बनाया गया है, जो एक खतरनाक शुरुआत है। ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ की जिस रपट का इसमें सहारा लिया गया है, वह भी काफी विवादास्पद रही है।
दूसरी बात यह है कि 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद को तोड़ने की जो गुण्डागर्दी की गई, इसके दोषियों को अभी तक सजा नहीं मिली है। यह घटना करीब-करीब वैसी ही थी, जैसी अफगानिस्तान में तालिबान शासकों द्वारा बुद्ध की मूर्ति को तोड़ने की। यह भारत के संविधान के खिलाफ थी और भारत की विविधता वाली संस्कृति पर तथा इसकी धर्मनिरपेक्षता पर गहरी चोट थी। अडवाणी, सिंघल जैसे लोग इस फैसले के आने के बाद अपने इस अपराधिक कृत्य को फिर से उचित ठहरा रहे हैं। इस घटना के बाद देश में कई जगह दंगे हुए थे, किन्तु उनके दोषियों को भी अभी तक सजा नहीं मिली है। मुम्बई दंगों के बारे में श्रीकृष्ण आयोग की रपट पर भी कार्रवाई नहीं हुई है। इसी तरह से 1949 में मस्जिद परिसर में रातोंरात राम की मूर्ति रखने वालों को भी सजा नहीं मिली है। ऐसा ही चलता रहा तो भारत के अंदर इंसाफ पाने में अल्पसंख्यकों का भरोसा खतम होता जाएगा। इन घटनाओं से बहुसंख्यक कट्टरता और अल्पसंख्यक कट्टरता दोनों को बल मिल सकता है, जो भारत राष्ट्र के भविष्य के लिए खतरनाक है।
ऐसी हालत मे, समाजवादी जन परिषद देश के सभी लोगों और इस विवाद के सभी पक्षों से अपील करती है कि -
1. इस मौके की तरह आगे भी भविष्य में इस विवाद को न्यायालय से या आपसी समझौते से सुलझाने के रास्ते को ही मान्य किया जाए। यदि कोई आपसी समझौता नहीं होता है तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सभी मंजूर करें।
2. किसी भी हालत में इस विवाद या ऐसे अन्य विवादों को लेकर हिंसा, मारकाट, बलप्रयोग, नफरत व उन्माद फैलाने का काम न किया जाए। धार्मिक विवादों को लेकर राजनीति बंद की जाए। जो ऐसा करने की कोशिश करते हैं, उन्हें जनता मजबूती से ठुकराए।
3. मंदिर, मस्जिद या अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर कोई नया विवाद न खड़ा किया जाए। वर्ष 1993 में भारतीय संसद यह कानून बना चुकी है कि (अयोध्या विवाद को छोड़कर) भारत में धर्मस्थलों की जो स्थिति 15, अगस्त, 1947 को थी, उसे बरकरार रखा जाएगा। इस कानून का सभी सम्मान व पालन करें।
4. 6 दिसंबर, 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस, उसके बाद के दंगो तथा ऐसी अन्य हिंसा के दोषियों को शीघ्र सजा दी जाए।
लिंगराज सुनील सोमनाथ त्रिपाठी अजित झा
अध्यक्ष उपाध्यक्ष महामन्त्री मन्त्री
खेल महायज्ञों के सफेद हाथी : सुनील
Posted in commonwealth games, consumerism, corporatisation, tagged कॉमनवेल्थ, कॉमनवेल्थ खेल, फिजूलखर्ची, बरबादी, राष्ट्रमण्डल खेल, समाजवादी जनपरिषद, सु्नील, स्टेडियम, commonwealth games, cwg, samajwadi janparishad, sunil on जुलाई 19, 2010 | 2 Comments »
विश्व फुटबाल कप की धूमधाम खतम होने बाद दक्षिण अफ्रीका में गर्व और संतोष के बजाय मायूसी और चिंता छाई है तथा कई सवाल खड़े हो रहे हैं। मायूसी महज इस बात की नहीं है कि अफ्रीका की कोई टीम सेमी-फाईनल तक भी नहीं पहुंच पाई। चिंता यह भी है कि इस आयोजन के लिए बने विशाल महंगे स्टेडियमों का अब क्या होगा और उनका रखरखाव कैसे होगा ? खबरों से लगता है कि ये स्टेडियम सफेद हाथी साबित होने वाले हैं, जिन्हें पालना और खिलाना इस गरीब देश की मुसीबत बन जाएगा।
इस आयोजन के लिए दक्षिण अफ्रीका ने नौ शहरों में दस ‘विश्व स्तरीय’ स्टेडियम बनाने पर करीब 150 करोड़ डॉलर (7,000 करोड़ रु) खर्च किए। किन्तु अब विश्वकप की प्रतियोगिता खतम होने पर उनका कोई उपयोग नहीं बचा। इन स्टेडियमों की क्षमता 40 हजार से लेकर 95 हजार दर्शकों तक हैं। आने वाले कई बरसों तक वहां इतने बड़े मैच इक्का-दुक्का ही होंगे, जिनमें इन स्टेडियमों का आधा या चैथाई उपयोग भी हो सके। पोलोकवान नामक शहर में 16.8 करोड़ डॉलर (756 करोड़ रु.) से बना 40 हजार दर्शकों का विशाल स्टेडियम है, किन्तु उस पूरे इलाके में फुटबाल या रगबी की एक भी पेशेवर टीम नहीं है। इस स्टेडियम की देखभाल पर प्रतिवर्ष 2.16 करोड़ डॉलर (100 करोड़ रु.) खर्च होंगे। यह सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाएगा।
बड़े शहरों के स्टेडियमों को फुटबाल या रगबी मैचों या सांस्कृतिक आयोजनों के लिए देने का विचार किया जा रहा है, किन्तु उससे समस्या हल नहीं होगी। जाहिर है कि विश्वकप के जोश में दक्षिण अफ्रीका सरकार ने पहले इस समस्या पर गौर नहीं किया। पूरे आयोजन पर करीब 420 करोड़ डॉलर (20,000 करोड़ रु.) खर्च हो चुका है। इस मौके पर आए पर्यटकों या टिकिट बिक्री से इसकी आधी कमाई भी नहीं हो पाई होगी।
थोड़ी पड़ताल करने पर पता चलता है कि लगभग खेलों के हर महा-आयोजन के बाद यही समस्या पैदा होती है। बीजिंग के 2008 ओलंपिक के बाद चीन भी इसी समस्या से जूझ रहा है। 50 करोड़ डॉलर (2250 करोड़ रु.) की लागत से बने मशहूर विशाल ‘बर्ड्स नेस्ट’ नामक स्टेडियम के रखरखाव और कर्ज-किश्त भुगतान के लिए 2 करोड़ डॉलर (90 करोड़ रु.) जुटाने में पसीना आ रहा है। चीन ने कुल मिलाकर 31 स्टेडियम बनाए थे। इनके अलावा ओलंपिक के लिए चीन ने 680 हेक्टेयर में फैला एक विशाल वन पार्क भी 112 करोड़ डॉलर (5000 करोड़ रु.) की लागत से बनाया था। उसके रखरखाव के लिए डेढ़ करोड़ डॉलर (67 करोड़ रु.) की सालाना जरुरत है। चीन सरकार इन स्टेडियमों को मनोरंजन, संगीत कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों आदि के लिए किराए पर देने की कोशिश कर रही है और अमरीकी कंपनियों को ठेका दे रही है। यह साफ है कि इन स्टेडियमों का उपयोग खेलों में बिरले तौर पर ही होगा,जिनके लिए इनका निर्माण हुआ है।
बीजिंग ओलंपिक दुनिया का अभी तक का सबसे महंगा खेल आयोजन था, जिस पर 4400 करोड़ रु. (करीब 2,00,000 करोड़ रु.) खर्च हुआ। किन्तु इसके पहले के ओलंपिक भी आयोजक देशों के लिए मुसीबत बने थे। यूनान के मौजूदा आर्थिक संकट की शुरुआत एक तरह से 2004 के एथेन्स ओलंपिक से ही मानी जा सकती है, जिसे बाद में वैश्विक मंदी ने गंभीर रुप दे दिया। इसके स्टेडियमों के रखरखाव पर 7 करोड़ डॉलर (200 करोड़ रु.) प्रतिवर्ष का खर्च आ रहा है और वे बेकार पड़े हैं। 2004 के सिडनी ओलंपिक के बाद उस शहर के नागरिकों पर सालाना 3.2 करोड़ डॉलर (144 करोड़ रु.) का कर बोझ बढ़ गया। 1992 के बार्सीलोना ओलंपिक के बाद स्पेन पर 2 करोड़ डॉलर (90 करोड़ रु.) का कर्ज चढ़ा था। इन आयोजनों के पहले इनसे स्थानीय अर्थव्यवस्था में तेजी आने की दलील दी जाती है, किन्तु होता ठीक उल्टा है।
दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भी भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने की दलील दी जा रही है। किन्तु 4100 करोड़ रु. की विशाल राशि से जिन 11 स्टेडियमों व स्पर्धा-स्थलों और 1038 करोड़ रु. से जिस आलीशान खेलगांव को तैयार किया जा रहा है, क्या वे भी इस 12 दिवसीय आयोजन के बाद बेकार व बोझ नहीं हो जाएंगे ? फिर दिल्ली में तो इस आयोजन के बहाने कई चीजों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, जिनका खेलों से कोई लेना-देना नहीं है। इंदिरा गांधी हवाई अड्डे का 9,000 करोड़ रु. का नया टर्मिनल, हजारों करोड़ों के नए फ्लाईओवर-पुल-पार्किंग स्थल-एक्सप्रेसवे, मेट्रो रेल का ताबड़तोड़ विस्तार, एक-एक करोड़ रु. की हजारों नयी आधुनिक बसें, दिल्ली का सौन्दर्यीकरण, आदि की लंबी सूची है। क्या पूरे भारत में दिल्ली ही सरकार को नजर आती है ? पूरा हिसाब लगाएं तो इस गरीब देश का एक से डेढ़ लाख करोड़ रुपया इस महायज्ञ में स्वाहा हो रहा है। जो सरकार खाद्य-अनुदानों की वृद्धि पर चिन्तित है, शिक्षा और शिक्षकों पर कंजूसी कर रही है, पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस में जनता को कोई राहत नहीं देना चाहती है, उसने राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर अपना खजाना खोल दिया है और उसकी दरियादिली का कोई हिसाब नहीं है।
हमारा 1982 के एशियाई खेलों के आयोजन का क्या अनुभव है ? उस वक्त भी विशाल पैसा खर्च करके बनाए गए स्टेडियम और खेलगांव बाद में बेकार पड़े रहे। हमें फिर से भारी पैसा फूंक कर नए स्टेडियम व नया खेलगांव बनाना पड़ रहे हैं। इससे भी खेलों को बढ़ावा मिलने का दावा था, किन्तु एशियाड के बाद न तो अंतरराष्ट्रीय पदक तालिकाओं में 100 करोड़ आबादी के इस देश की दयनीय हालत में कोई सुधार हुआ और न देश के अंदर खेलों की कोई स्वस्थ संस्कृति व परंपरा बनी। यह भी सवाल है कि जिस बेतहाशा तेजी से ये खेल खर्चीले व महंगे होते जा रहे हैं, उनमें गरीब देशों के साधारण लोगों की कोई जगह और भागीदारी कभी बन सकेगी या नहीं ? वे दर्शक और उपभोक्ता जरुर बनते जा रहे हैं। आखिर इस विश्वकप में यूरोप के दबदबे, लातीनी अमरीका के पिछड़ने और अफ्रीका के बाहर होने का एक कारण पैसा भी है। कोच, प्रशिक्षण, विशेष सुविधाएं सबके लिए पैसा चाहिए। कुल मिलाकर आधुनिक खेल व उनके आयोजन अब तेजी से पैसे के खेल बनते जा रहे हैं। उन पर झूठी शान और सतही राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का मुलम्मा जरुर चढ़ा दिया जाता है। ऐसा ही एक पैसे का बड़ा खेल दिल्ली में इस वर्ष होने वाला है। इस महाखर्चीले आयोजन से देश खेलों व खिलाड़ियों का भला हो या न हो,आयोजको की पीढ़ियां जरुर तर जाएंगी। उनके व्यक्तिगत हितों के साथ ठेकेदारों, व्यापारियों, विज्ञापनदाताओं और मीडिया कंपनियों के हित भी जुड़ गए हैं, जिन्हें मोटी कमाई नजर आ रही है।
यदि भारत या दक्षिण अफ्रीका की सरकारों को वास्तव में खेलों को बढ़ावा देना तथा विश्व स्तरीय खिलाड़ी तैयार करना होता तो वे ऐसे महाखर्चीले यज्ञों और सफेद हाथियों पर पैसा फूंकने के बजाय गांवो-कस्बों में खेल मैदान, स्टेडियम,प्रशिक्षण और स्थानीय खेल स्पर्धाओं पर खर्च करती। किन्तु उनका इरादा तो कुछ और ही दिखाई देता है। विश्वकप फाईनल के पहले ही दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जेकब जुमा ने पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एक बैठक ली। उन्होंने कहा – ‘हमने दिखा दिया है कि हम सफल आयोजन और आतिथ्य कर सकते हैं, अब आप आइए, हमारे देश में पूंजी लगाइए और कमाइए।’
इसी तरह की भाषा में दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल आयोजन का एक मकसद बताया गया है कि इससे दिल्ली व भारत को ‘दुनिया की मंजिल’ (ग्लोबल डेस्टिनेशन) बनाने में मदद मिलेगी। यानी विदेशी पूंजी को लुभाने के लिए यह पूरा तमाशा है। यही असली एजेण्डा है, चाहे इसके लिए गरीब देश का खजाना ही क्यों न लुटाना पड़े। बारह दिन के आयोजन व तामझाम से जो वाहवाही व मदहोशी पैदा होगी, उसमें आम जनता थोड़े समय के लिए अपने कष्ट भूल जाएगी। महंगाई, बेकारी, आतंकवाद-माओवाद आदि पर सरकार की घोर असफलता के मुद्दे भी नैपथ्य में चले जाएंगे। यह दूसरा एजेण्डा है। सफेद हाथी, फिजूलखर्च, कर्ज व दिवालियापन की जहां तक बात है, उन्हें बाद में देखा जाएगा।
(ईमेल - sjpsunil@gmail.com )
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लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।
- सुनील
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111
मोबाईल 09425040452
मध्यप्रदेश में नई राजनीति की शुरूआत : बाबा मायाराम
Posted in displacement, election, environment, madhya pradesh, news, politics, samajwadi janparishad, tribal, tagged किसान आदिवासी संगठन, पंचायत चुनाव, फागराम, मध्य प्रदेश, समाजवादी जनपरिषद, madhya pradesh, mayaram, panchayat elections, phagram, samajwadi janaparishad on जनवरी 7, 2010 | 5 Comments »
आम के पेड़ के नीचे बैठक चल रही है। इसमें दूर-दूर के गांव के लोग आए हैं। बातचीत हो रही है। यह दृश्य मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के आदिवासी बहुल केसला विकासखंड स्थित किसान आदिवासी संगठन के कार्यालय का है। यहां 5 जनवरी को किसान आदिवासी संगठन की मासिक बैठक थी जिसमें कई गांव के स्त्री-पुरुष एकत्र हुए थे। जिसमें केसला, सोहागपुर और बोरी अभयारण्य के लोग भी शामिल थे। इस बार मुद्दा था- पंचायत के उम्मीदवार का चुनाव प्रचार कैसे किया जाए? यहां 21 जनवरी को वोट पडेंगे।
बैठक में फैसला लिया गया कि कोई भी उम्मीदवार चुनाव में घर से पैसा नहीं लगाएगा। इसके लिए गांव-गांव से चंदा इकट्ठा किया जाएगा। चुनाव में मुर्गा-मटन की पारटी नहीं दी जाएगी बल्कि संगठन के लोग इसका विरोध करेंगे। गांव-गांव में साइकिल यात्रा निकालकर प्रचार किया जाएगा। यहां किसान आदिवासी संगठन के समर्थन से एक जिला पंचायत सदस्य और चार जनपद सदस्य के उम्मीदवार खड़े किए गए हैं।
सतपुड़ा की घाटी में किसान आदिवासी संगठन पिछले 25 बरस से आदिवासियों और किसानों के हक और इज्जत की लड़ाई लड़ रहा है। यह इलाका एक तरह से उजड़े और भगाए गए लोगों का ही है। यहां के आदिवासियों को अलग-अलग परियोजनाओं से विस्थापन की पीड़ा से गुजरना पड़ा है। इस संगठन की शुरूआत करने वालों में इटारसी के समाजवादी युवक राजनारायण थे। बाद मे सुनील आए और यहीं के होकर रह गए। उनकी पत्नी स्मिता भी इस संघर्ष का हिस्सा बनीं। राजनारायण अब नहीं है उनकी एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है। लेकिन स्थानीय आदिवासी युवाओं की भागीदारी ने संगठन में नए तेवर दिए।
इन विस्थापितों की लड़ाई भी इसी संगठन के नेतृत्व में लड़ी गई जिसमें सफलता भी मिली। तवा जलाशय में आदिवासियों को मछली का अधिकार मिला जो वर्ष 1996 से वर्ष 2006 तक चला। आदिवासियों की मछुआ सहकारिता ने बहुत ही शानदार काम किया जिसकी सराहना भी हुई। लेकिन अब यह अधिकार उनसे छिन गया है। तवा जलाषय में अब मछली पकड़ने पर रोक है। हालांकि अवैध रूप से मछली की चोरी का नेटवर्क बन गया है।
लेकिन अब आदिवासी पंचायतों में अपने प्रतिनिधित्व के लिए खड़े हैं। इसमें पिछली बार उन्हें सफलता भी मिली थी। उनके के ही बीच के आदिवासी नेता फागराम जनपद उपाध्यक्ष भी बने। इस बार फागराम जिला पंचायत सदस्य के लिए उम्मीदवार हैं। फागराम की पहचान इलाके में तेजतर्रार, निडर और ईमानदार नेता के रूप में हैं। फागराम केसला के पास भुमकापुरा के रहने वाले हैं। वे पूर्व में विधानसभा का चुनाव में उम्मीदवार भी रह चुके हैं। 
संगठन के पर्चे में जनता को याद दिलाया गया है कि उनके संघर्ष की लड़ाई को जिन प्रतिनिधियों ने लड़ा है, उसे मजबूत करने की जरूरत है। चाहे वन अधिकार की लड़ाई हो या मजदूरों की मजदूरी का भुगतान, चाहे बुजुर्गों को पेंशन का मामला हो या गरीबी रेखा में नाम जुड़वाना हो, सोसायटी में राषन की मांग हो या घूसखोरी का विरोध, यह सब किसने किया है?
जाहिर है किसान आदिवासी संगठन ही इसकी लड़ाई लड़ता है। किसान आदिवासी संगठन राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी जन परिषद से जुड़ा है। समाजवादी जन परिषद एक पंजीकृत राजनैतिक दल है जिसकी स्थापना 1995 में हुई थी। समाजवादी चिंतक किशन पटनायक इसके संस्थापकों में हैं। किशन जी स्वयं कई बार इस इलाके में आ चुके हैं और उन्होंने आदिवासियों की हक और इज्जत की लड़ाई को अपना समर्थन दिया है।
सतपुड़ा की जंगल पट्टी में मुख्य रूप से गोंड और कोरकू निवास करते हैं जबकि मैदानी क्षेत्र में गैर आदिवासी। नर्मदा भी यहां से गुजरती है जिसका कछार उपजाउ है। सतपुड़ा की रानी के नाम से प्रसिद्ध पचमढ़ी भी यहीं है।
होशंगाबाद जिला राजनैतिक रूप से भिन्न रहा है। यह जिला कभी समाजवादी आंदोलन का भी केन्द्र रहा है। हरिविष्णु कामथ को संसद में भेजने का काम इसी जिले ने किया है। कुछ समर्पित युवक-युवतियों ने 1970 के दशक में स्वयंसेवी संस्था किशोर भारती को खड़ा किया था जिसने कृषि के अलावा षिक्षा की नई पद्धति होषंगाबाद विज्ञान की शुरूआत भी यहीं से की , जो अन्तरराष्ट्रीय पटल भी चर्चित रही। अब नई राजनीति की धारा भी यहीं से बह रही है।
इस बैठक में मौजूद रावल सिंह कहता है उम्मीदवार ऐसा हो जो गरीबों के लिए लड़ सके, अड़ सके और बोल सके। रावल सिंह खुद की स्कूली शिक्षा नहीं के बराबर है। लेकिन उन्होंने संगठन के कार्यकर्ता के रूप में काम करते-करते पढ़ना-लिखना सीख लिया है।
समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सुनील कहते है कि हम पंचायत चुनाव में झूठे वायदे नहीं करेंगे। जो लड़ाई संगठन ने लड़ी है, वह दूसरों ने नहीं लड़ी। प्रतिनिधि ऐसा हो जो गांव की सलाह में चले। पंचायतों में चुप रहने वाले दब्बू और स्वार्थी प्रतिनिधि नहीं चाहिए। वे कहते है कि यह सत्य, न्याय व जनता की लड़ाई है।
अगर ये प्रतिनिधि निर्वाचित होते हैं तो राजनीति में यह नई शुरूआत होगी। आज जब राजनीति में सभी दल और पार्टियां भले ही अलग-अलग बैनर और झंडे तले चुनाव लड़ें लेकिन व्यवहार में एक जैसे हो गए हैं। उनमें किसी भी तरह का फर्क जनता नहीं देख पाती हैं। जनता के दुख दर्द कम नहीं कर पाते। पांच साल तक जनता से दूर रहते हैं।
मध्यप्रदेश में जमीनी स्तर पर वंचितों, दलितों, आदिवासियों, किसानों और विस्थापितों के संघर्श करने वाले कई जन संगठन व जन आंदोलन हैं। यह मायने में मध्यप्रदेश जन संगठनों की राजधानी है। यह नई राजनैतिक संस्कृति की शुरूआत भी है। यह राजनीति में स्वागत योग्य कदम है।
वरिष्ट समाजवादी अश्विनी कुमार नहीं रहे
Posted in samajwadi janparishad, tagged अश्विनी कुमार, समाजवादी जनपरिषद on जनवरी 1, 2010 | 18 Comments »
वरिष्ट समाजवादी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अश्विनी कुमार कल रात गुजर गये । वे पिछले कुछ समय से सदर अस्पताल गोरखपुर में भर्ती थे । वे ८२ वर्ष के थे । राष्ट्रीय आन्दोलन में उनकी पहली भागीदारी हुई थी जब कक्षा नौ के छात्र थे । अश्विनी कुमार ’भारत छोड़ो आन्दोल” के दौरान भी जेल में रहे । आज़ादी के बाद जब समाजवादियों ने कांग्रेसियों से अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया तब वे जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में इस दल में शामिल हो गये । नागपुर में १९५६ में जब इस दल का विभाजन हुआ तब वे डॉ. लोहिया के नेतृत्व में रहे । आजादी के बाद हुए समाजवादी आन्दोलनों और जन आन्दोलनों में वे एक दर्जन बार जेल गये । १९६७ की गैर कांग्रेसवादी लहर में गोरखपुर जिल्रे के कौड़ीराम विधान सभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गये थे ।
१९७९ से १९९० तक वे सोशलिस्ट पार्टी (रमाकान्त पाण्डे) से जुड़े रहे । साथी विष्णुदेव गुप्त के सम्पर्क और प्रयास के फलस्वरूप अश्विनी कुमार समाजवादी जनपरिषद की स्थापना के समय से इसमें शरीक हुए । वे मृत्यु परन्त सजप में सक्रिय रहे । वे दो बार दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चुने गये थे । उनका जीवन अत्यन्त सादगीपूर्ण था । बढ़्ती उम्र के बावजूद वे दल तथा जन आन्दोलन के राष्ट्रीय समन्वय के कार्यक्रमों में जरूर पहुँचते थे । दल की सदस्यता बनाने में उन्होंने हमेशा अनुकरणीय रुचि ली तथा अपने प्रभाव से उन्होंने तरुणों को दल से जोड़ा ।
कार्यक्रमों ,प्रस्तावों की बाबत अश्विनी कुमार हमेशा अपनी पैनी विश्लेषणात्मक मेधा और लम्बे राजनैतिक तजुर्बे से अपने विचार बुलन्दी से दल के मंच पर रखते थे ।
अश्विनी कुमार ने आगरा विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की थी तथा कुछ समय अध्यापन भी किया था ।
दल के प्रान्तीय महामन्त्री विक्रमा मौर्य ने आज जब उनसे नये साल पर शुभ कामना देने के लिए सम्पर्क किया तब यह दुखद समाचार उन्हें प्राप्त हुआ । खबर सुनते ही विक्रमा मौर्य ,जयप्रकाश सिंह , जीतेन्द्र त्यागी आदि दल के साथी अश्विनी कुमारजी के कार्यक्षेत्र कौड़ीराम पहुंच गये ।
शमीम मोदी पर हमले की जाँच सी.बी.आई को
Posted in madhya pradesh, politics, samajwadi janparishad, women, tagged महाराष्ट्र सरकार, शमीम मोदी, समाजवादी जनपरिषद, सीबीआई, हमला, हरदा on अगस्त 30, 2009 | 5 Comments »
महाराष्ट्र सरकार ने समाजवादी जनपरिषद की नेता शमीम मोदी पर ठाणे जिले के वाशी में हुए प्राण घातक हमले की जाँच केन्द्रीय जाँच ब्यूरो से कराने की सिफारिश की है । शेतकारी कामगार पार्टी के नेता श्री एन.डी. पाटिल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमण्डल को महाराष्ट्र के गृह मन्त्री श्री जयन्त पाटील ने यह बात बताई है । प्रतिनिधिमण्दल में समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष संजीव साने तथा महाराष्ट्र इकाई के पूर्व अध्यक्ष शिवाजी गायकवाड़ शामिल थे ।
गौरतलब है कि समाजवादी जनपरिषद मध्य प्रदेश की उपाध्यक्ष शमीम मोदी पर गत २३ जुलाई को कातिलाना हमला हुआ था । शमीम ने आशंका प्रकट की थी कि हरदा के भाजपा विधायक और म.प्र. शासन के पूर्व मन्त्री कमल पटेल तथा जंगल की अवैध कटाई से जुड़े हरदा के आरा मशीन मालिकों के नेता नटवर पटेल का इस हमले के पीछे हाथ है । शमीम हरदा – बेतूल जिलों में मजदूरों ,महिलाओं,आदिवासी तथा किसानों के संघर्षों की रहनुमाई करती आई है ।
इस हमले की प्रतिक्रिया देश भर में हुई तथा महाराष्ट्र शासन से हमलावरों को पकड़ने की माँग की गई । स्थानीय पुलिस की असफलता को देखते हुए जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो से कराई जाए यह मांग जोर पकड़ रही थी ।
१० – ११ अगस्त को शमीम के कार्यक्षेत्र हरदा में हुई दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में तय किया गया था कि देश भर में २३ -से ३० अगस्त तक इस हमले के प्रतिकार में कार्यक्रम लिए जाएंगे । इस फैसले के अनुरूप भोपाल , मुम्बई,हरदा , खण्डवा ,बैतूल ,इटारसी,केरल और दिल्ली में धरना ,सभा ,प्रदर्शन के कार्यक्रम हुए ।
समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनील , श्रमिक आदिवासी संगठन के अनुराग तथा किसान आदिवासी संगठन से जुड़े जनपद उपाध्यक्ष फागराम ने महाराष्ट्र सरकार के निर्णय का स्वागत किया है ।
ब्लॉग पाठकों द्वारा दिए गए नैतिक समर्थन का हम शुक्रगुजार हैं ।
हम लड़ेंगे – हम जीतेंगे !
शमीम मोदी पर प्राण घातक हमला
Posted in criminalisation, madhya pradesh, politics, samajwadi janparishad, women, tagged attack, मध्य प्रदेश, वसई, शमीम, शमीम मोदी, समाजवादी जनपरिषद, हमला, criminalisation, madhya pradesh, samajwadi janaparishad, shamim on जुलाई 27, 2009 | 25 Comments »
[ इस चिट्ठे के पाठक हमारे दल समाजवादी जनपरिषद की प्रान्तीय उपाध्यक्ष साथी शमीम मोदी की हिम्मत और उनके संघर्ष से अच्छी तरह परिचित हैं । हिन्दी चिट्ठों के पाठकों ने शमीम की जेल यात्रा के दौरान उनके प्रति समर्थन भी जताया था ।
गत दिनों उन्होंने प्रतिष्ठित शोध संस्थान टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ ,मुम्बई में बतौर एसिस्टेन्ट प्रोफेसर काम करना शुरु किया है । वे अपने बेटे पलाश के साथ मुम्बई के निकट वसई में किराये के फ्लैट में रह रही थीं ।
मध्य प्रदेश की पिछली सरकार में मन्त्री रहे जंगल की अवैध कटाई और अवैध खनन से जुड़े माफिया कमल पटेल के कारनामों के खिलाफ़ सड़क से उच्च न्यायालय तक शमीम ने बुलन्द आवाज उठाई । फलस्वरूप हत्या के एक मामले में कमल पटेल के लड़के को लम्बे समय तक गिरफ़्तारी से बचा रहने के बाद हाल ही में जेल जाना पड़ा ।
गत दिनों जिस हाउसिंग सोसाईटी में वे रहती थीं उसीके चौकीदार द्वारा उन पर चाकू से प्राणघातक हमला किया गया । शमीम ने पूरी बहादुरी और मुस्तैदी के साथ हत्या की नियत से हुए इस हमले का मुकाबला किया । उनके पति और दल के नेता साथी अनुराग ने इसका विवरण भेजा है वह दहला देने वाला है । हम शमीम के साहस , जीवट और हिम्मत को सलाम करते हैं । आप सबसे अपील है कि महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री को पत्र या ईमेल भेजकर हमलावर की गिरफ़्तारी की मांग करें ताकि उसके पीछे के षड़यन्त्र का पर्दाफाश हो सके । कमल पटेल जैसे देश के शत्रुओं को हम सावधान भी कर देना चाहते हैं कि हम गांधी - लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले जुल्मी से टकराना और जुल्म खत्म करना जानते हैं । प्रस्तुत है अनुराग के पत्र के आधार पर घटना का विवरण । ]
मित्रों ,
यह शमीम ही थी जो पूरे शरीर पर हुए इन घातक प्रहारों को झेल कर बची रही । ज़ख्मों का अन्दाज उसे लगे ११८ टाँकों से लगाया जा सकता है । घटना का विवरण नीचे मुताबिक है -
२३ जुलाई को हाउसिंग सोसाइटी का चौकीदार दोपहर करीब सवा तीन बजे हमारे किराये के इस फ्लैट में पानी आपूर्ति देखने के बहाने आया । शमीम यह गौर नहीं कर पाई कि घुसते वक्त उसने दरवाजा अन्दर से लॉक कर दिया था । फ्लैट के अन्दर बनी ओवरहेड टंकी से पानी आ रहा है या नहीं यह देखते वक्त वह शमीम का गला दबाने लगा। उसकी पकड़ छुड़ाने में शमीम की दो उँगलियों की हड्डियाँ टूट गईं । फिर उसके बाल पकड़कर जमीन पर सिर पटका और एक बैटन(जो वह साथ में लाया था) से बुरी तरह वार

भोपाल में शमीम की रिहाई के लिए
करने लगा । वह इतनी ताकत से मार रहा था कि कुछ समय बाद वह बैटन टूट गया । शमीम की चोटों से बहुत तेजी से खून बह रहा था । शमीम ने हमलावर से कई बार पूछा कि उसे पैसा चाहिए या वह बलात्कार करना चाहता है । इस पर वह साफ़ साफ़ इनकार करता रहा । शमीम ने सोचा कि वह मरा हुआ होने का बहाना कर लेटी रहेगी लेकिन इसके बावजूद उसने मारना न छोड़ा तथा एक लोहा-काट आरी (जो साथ में लाया था ) से गले में तथा कपड़े उठा कर पेट में चीरा लगाया । आलमारी में लगे आईने में शमीम अपनी श्वास नली देख पा रही थी । अब शमीम ने सोचा कि बिना लड़े कुछ न होगा । उसने हमालावर से के हाथ से आरी छीन ली और रक्षार्थ वार किया । इससे वह कुछ सहमा और उसने कहा कि रुपये दे दो । शमीम ने पर्स से तीन हजार रुपये निकाल कर उसे दे दिए । लेकिन उसने एक बार भी घर में लॉकर के बारे में नहीं पूछा । अपने बचाव में शमीम ने उससे कहा कि वह उसे कमरे में बाहर से बन्द करके चला जाए । वह रक्तस्राव से मर जाएगी । शमीम अपना होश संभाले हुए थी । वह पलाश के कमरे में बन्द हो गयी (जो कमरा हकीकत में अन्दर से ही बन्द होता है )। हमलावर बाहर से कुन्डी लगा कर चला गया । शमीम ने तय कर लिया था कि वह होशोहवास में रहेगी और हर बार जब वह चोट करता , वह उठ कर खड़ी हो जाती । हमलावर के जाने के बाद वह कमरे से बाहर आई और पहले पड़ोसियों , फिर मुझको और अपने माता-पिता को खबर दी। अस्पताल ले जाते तक वह पूरी तरह होश में रही ।

दाँए से बाँए:शमीम,पन्नालाल सुराणा,स्मिता
कुछ सवाल उठते हैं : चौकीदार ने लॉकर खोलने की कोशिश नहीं की जो वहीं था जहाँ वह शमीम पर वार कर रहा था । उसने पैसे कहां रखे हैं इसके बारे में बिलकुल नहीं पूछा । वह गालियाँ नहीं दे रहा था और उसके शरीर को किसी और मंशा से स्पर्श नहीं कर रहा था । यदि वह मानसिक रोगी या वहशी होता तो शायद शमीम उससे नहीं निपट पाती । वह सिर्फ़ जान से मारने की बात कह रहा था । शमीम के एक भी सवाल का वह जवाब नहीं दे रहा था । सेल-फोन और लैपटॉप वहीं थे लेकिन उसने उन्हें नहीं छूआ । इन परिस्थितियों में हमें लगता है कि इसके पीछे कोई राजनैतिक षड़यन्त्र हो सकता है ।
शमीम को मध्य प्रदेश के पूर्व राजस्व मन्त्री कमल पटेल और उसके बेटे सन्दीप पटेल से जान से मारने की धमकियाँ मिलती रही हैं । इसकी शिकायत हमने स्थानीय पुलिस से लेकर पुलिस महानिदेशक से की हैं । मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देश पर २००५ की शुरुआत से २००७ के अन्त तक उसे सुरक्षा मुहैय्या कराई गई थी । इसलिए हमें उन पर शक है । हमले के पीछे उनका हाथ हो सकता है ।
पेशेवर तरीके से कराई गयी हत्या न लगे इस लिए इस गैर पेशेवर व्यक्ति को इस काम के लिए चुना गया होगा । जब तक राकेश नेपाली नामक यह हमलावर गिरफ़्तार नहीं होता वास्तविक मन्शा पर से परदा नहीं उठेगा ।
हम सबको महाराष्ट्र शासन और मुख्यमन्त्री पर उसकी गिरफ़्तारी के लिए दबाव बनाना होगा ।
अनुराग मोदी
शमीम मोदी के संघर्ष से जुड़ी खबरें और आलेख :
’सत्याग्रही’ शिवराज के राज में
म.प्र. विधानसभा चुनाव: घोषणा पत्र क्यों ?
Posted in samajwadi janparishad, tagged assemble elections, घोषणापत्र, चुनाव, मध्य प्रदेश, विधान सभा, समाजवादी जनपरिषद, madhya pradesh, manifesto, samajwadi janparishad on नवम्बर 14, 2008 | 11 Comments »
घोषणा पत्र क्यों ?
आमतौर पर पार्टियों के लिए चुनाव घोषणापत्र एक रस्म अदायगी होता है । चुनाव के बाद वे इसे भूल जाती हैं । जो पार्टी सरकार बनाती है , वे अपनी घोषणाओं को लागू करने की कोई जरूरत नहीं समझती है । कई दफ़े वे अपने घोषणा पत्र के खिलाफ़ काम करती हैं । जो पार्टी हार जाती है , वह भी अपने घोषणापत्र के मुद्दों को लेकर आवाज उठाने और संघर्ष करने के बजाय चुपचाप बैठकर पांच साल तक तमाशा देखती है ।
समाजवादी जनपरिषद यह घोषणापत्र पूरी गंभीरता से मध्य प्रदेश की जनता के सामने पेश कर रही है । इसमें न केवल प्रदेश की मौजूदा खराब हालत के बारे में विश्लेषण है , और मौजूदा सरकारों और पार्टियों की नीतियों पर टिप्पणी है , बल्कि मध्यप्रदेश की जनता की मुक्ति कैसे होगी , मध्यप्रदेश का विकास कैसे होगा , नया मध्यप्रदेश कैसे बनेगा , इस बारे में समाजवादी जनपरिषद की समझ तथा कार्य योजना का यह एक दस्तावेज है । बड़ी पार्टियों द्वारा उछाले गए नकली मुद्दों और नारों को एक तरफ करके जनता के असली मुद्दों को सामने लाने की एक ईमानदार कोशिश है ।
समाजवादी जनपरिषद जीते या हारे , इस घोषणापत्र में घोषित मुद्दों , नीतियों व घोषणाओं को लेकर वह लगातार विधानसभा के अंदर व बाहर संघर्ष करेगी । यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा , जब तक जनता की छाती पर चढ़कर उसका खून चूसने वाले भ्रष्टाचारियों , बेईमानों , लुटेरों का राज खतम नहीं हो जाता और मेहनतकश लोगों की बराबरी एवं हक वाली एक नयी क्रांतिकारी व्यवस्था कायम नहीं हो जाती ।
मध्यप्रदेश के राजनैतिक हालात
जो हालत भारत की राजनीति की है , वही कमोबेश मध्यप्रदेश की है , बल्कि यहाँ पर पिछले काफी समय दो पार्टियों का एकाधिकार होने से हालत और खराब है । कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों अदल-बदल कर इस प्रदेश पर राज कर रही हैं । दोनों की नीतियों , चरित्र व आचरण में कोई खास फर्क नहीं है । दोनों ने मिलकर प्रदेश की जनता को फुटबॉल बना दिया है । जनता एक से त्रस्त होकर दूसरी पार्टी को सत्ता में लाती है , फिर उनसे परेशान होकर वापस पहली को गद्दी पर बैठाती है । जो पार्टी सरकार में नहीं होती है , वह जनता के मुद्दों और कष्टों को लेकर कोई जोरदार आन्दोलन करने की जरूरत नहीं समझती , बल्कि वह चाहती है कि जनता की परेशानी बढ़े , जिससे उन्हें वापस सत्ता में आने का मौका मिले ।
कांग्रेस ने सड़क , बिजली , पानी , शिक्षा और स्वास्थ्य का निजीकरण शुरु किया जिसे भाजपा ने आगे बढ़ाया । मतलब जनता की इन जरूरी आवश्यकताओं को पूरा करने की जवाबदारी सरकार की बजाए निजी कम्पनियों ( सेठों ) की हो गयी । यह कम्पनियां यह सुविधायें उन्हीं लोगों को देंगी जो उसका , उनकी तय की गई दरों पर भुगतान कर सकेगा।
सरकारी स्कूलों में मास्टर और किताबें नहीं हैं । चारों तरफ़ निजी स्कूलों का बोलबाला है । अस्पतालों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, लोग प्रायवेट डॉक्टरों से भरोसे इलाज करा रहे हैं । बात यहीं रुक जाती है ऐसा नहीं है । प्रदेश की लाखों एकड़ जमीन भूमिहीनों को देने के बजाए बड़ी बड़ी कम्पनियों को लम्बी लीज पर दी जा रही है ।
प्रदेश सरकार की सारी योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई हैं । चाहे वो रोजगार गारंटी योजना हो , या शक्तिमान या जननी सुरक्षा । न तो रोजगार गारंटी में पूरा काम मिल रहा है न मजदूरी । सरकार ने रही सही कसर गरीबी रेखा से लोगों के नाम काटकर पूरी कर दी है । प्रदेश में भूख और कुपोषण से बच्चों की मौत का ताण्डव चल रहा है । ” गरीब की थाली नहीं रहेगी खाली” का जो नारा भाजपा ने दिया था वो उलटा हो गया । प्रदेश का किसान खाद , बिजली पानी के साथ-साथ समर्थन मूल्य और समय पर अपनी फसल का भुगतान पाने के लिए भटकता रहा । राजनैतिक विकल्पहीनता और जड़ता की इस हालत को बदलना जरूरी है । समाजवादी जनपरिषद इसके लिए पूरी कोशिश करेगी ।
[ जारी ]
चरम गुलामी : जब गुलामी भाने लगती है , बौद्धिक साम्राज्यवाद(३):अफ़लातून
Posted in corporatisation, globalisation, kishan patanayak, samajwadi janparishad, tagged आचार संहिता, बौद्धिक गुलामी, समाजवादी जनपरिषद, साधारण/सक्रिय सदस्य on फ़रवरी 19, 2008 | 6 Comments »
‘ विचारधारा और इतिहास के अंत की ‘ घोषणाओं का वैश्वीकरण के हक़ में एक निश्चित बौद्धिक सहयोग है । फोर्ड फाउन्डेशन पोषित एक शोध में पुराने राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के स्थान पर राज्य-राष्ट्र और ‘मल्टीनेशनल स्टेट’ जैसी अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कस्मीर और उत्तर-पूर्वी भारत के उदाहरण दिए गए हैं । ऐसे विद्वानों द्वारा तमिलनाडु के हिन्दी विरोधी आन्दोलन में बहुराष्त्रीय राज्य के तत्व होने की बात कही गई है । गुलामी के चरम दौर को समझाते हुए किशन पटनायक कहते थे कि उसमें गुलामी का अहसास भी नहीं रह जाता है । अहसास रहने पर मानव-स्वभाव मुक्ति के लिए उद्यत होता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया था कि गुलामी में एक प्रकार की सुरक्षा का अहसास रहता है। बौद्धिक गुलामी के बारे में भी ये सामान्य बातें लागू होती हैं ।
सरकार द्वारा लिए गए विदेशी धन से चलने वाली प्राथमिक शिक्षा परियोजनाओं में अदना नौकरी करने और शोध परियोजनाओं का परिचालन करने फर्क को नजरन्दाज नहीं किया जाना चाहिए , पर छोटी-बड़ी किसी भी विदेशी मदद से चलने वाली परियोजनाओं में यदि भारत के प्रगतिशील कहे जाने वाले समाज विज्ञानी शरीक हों तब उनकी गतिविधियों और भूमिका की जांच का एक तरीका अवश्य होना चाहिए(कि.प.)।कम्युनिस्ट पार्टियों में जांच का एक तरीका मौजूद है। जो समूह वैश्वीकरण का मुकम्मल विकल्प देने की विचारधारा से लैस होने का दावा करते हैं उन्हें बौद्धिक साम्राज्यवाद के इन पहलुओं के प्रति सचेत रहना होगा ।
विदेशी दानदाता संस्थाओं के द्वारा ‘मानवीय चेहरे वाला वैश्वीकरण’ और ‘न्यायपूर्ण वैश्वीकरण’ की घोषणाएं की जा रही हैं जिनका मकसद वैश्वीकरण विरोधी जन-उभार को दिग्भ्रमित करना है। हालांकि गौण या हाशिए के मसलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कुछ ऊपरी तौर पर प्रगतिशील दिखने वाले अध्ययनों और आन्दोलनों को बढ़ावा दिया जाता है। ‘सबऑल्टर्न स्टडीज़’ इसका नमूना है। पूंजीवाद के समक्ष जब भी संकट आता है वह अपने बचाव के लिए ऐसे कदम उठाता है । महान आर्थिक मन्दी के बाद के दौर में जिस तरह कल्याणकारी राज्य के कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए ठीक उसी तरह ‘मानवीय चेहरे वाला वैश्वी करण’ मौजूदा दौर में चलाया जा रहा है ।
- अफ़लातून , राज्य अध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद – उत्तर प्रदेश
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समाजवादी जनपरिषद की बाबत अविनाश द्वारा उद्धृत जनसत्ता की कतरन में उन्हें कुछ भ्रम हुआ है।भ्रम का मुख्य आधार मेरे इन विचारों और सीएसडीएस से जुड़े दल के सदस्य का होना है। इस बाबत स्पष्ट हो कि:
दल के संविधान की 3.1.(2) के अनुसार सक्रिय सदस्य दल द्वारा स्वीकृत आचरण संहिता का पालन करेगा। दल की आचरण संहिता पर हमे फक्र है तथा नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए इसे हम अनिवार्य मानते हैं। इसे यहाँ पूरा दे रहा हूँ :
समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सक्रिय सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह-
1.1 जनेऊ जैसे जातिश्रेष्ठता के चिह्न धारण नहीं करेगा।
1.2 छुआछूत का किसी भी रूप में पालन नहीं करेगा।
1.3 जाति आधारित गालियों का प्रयोग नहीं करेगा ।
1.4 दबी हुई जातियों को छोड़कर किसी भी अन्य जाति विशेष संगठन की सदस्यता स्वीकार नहीं करेगा।
2.1 दहेज नहीं लेगा ।
2.2 औरत की पिटाई नहीं करेगा और औरत(नारी) विरोधी गालियों का व्यवहार नहीं करेगा।
2.3 एक पत्नी या पति के रहते दूसरी शादी नहीम करेगा और न ही उस स्थिति में बिना शादी के किसी अन्य महिला/पुरुष के साथ घर बसाएगा ।
3 धार्मिक या सांप्रदायिक द्वेष फैलाने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होगा ।
4 समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह ऐसे किसी गैरसरकारी स्वैच्छिक संस्था ( NGO ), जो मुख्यत: विदेशी धन पर निर्भर हो,
(क) का संचालन नहीं करेगा ।
(ख) की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली समिति का सदस्य नहीं होगा।
(ग) से आजीविका नहीं कमाएगा ।
5.1 सदस्यता-ग्रहण/नवीनीकरण के समय अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति व आय की घोषणा करेगा ।
5.2 अपनी व्यक्तिगत आय का कम से कम एक प्रतिशत नियमित रूप से समाजवादी जनपरिषद को देगा।
5.3 विधायक या साम्सद चुने जाने पर अपनी सुविधाओं का उतना अंश दल को देगा जो राष्त्रीय कार्यकारिणी द्वारा तय किया जायेगा।
उपर्युक्त आचरण संहिता के प्रावधान को न मानना दल की न्यूनतम कसुटी का उल्लंघन माना जाएगा और यह दल द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अनुशासनात्मक कार्यवाही का आधार होगा।



