जयप्रकाश : जन्मजात योद्धा : महात्मा गांधी

गांधीजी की नजर में जेपी
जयप्रकाश जमजात योद्धा है , उसने अपने देश की मुक्ति के लिए सबकुछ का त्याग किया है । परिश्रम और प्रयत्न करने से वह कभी चूकता नहीं । कष्त और यातना सहने की उसकी क्षमता का कोई जवाब नहीं ।
- महात्मा गांधी
यह संघर्ष केवल सीमित उद्देश्यों के लिए नहीं हो [...]

खादी की राखी और खादी की रक्षा

प्यारे आफ़्लू,                                                                      वेड़छी/०१/०८/०९
रक्षाबन्धन के बहाने कम से कम एक पत्र लिख देती हूँ – मुझे ही आश्चर्य होता है । फोन, ईमेल , चैट का जमाना है । पिछले एक सप्ताह से बारिश के कारण ’मोडेम’ खराब हो गया है । फोन दो दिनों से कर्कश स्वर से नाम के वास्ते चालू हुआ है। कभी [...]

‘हिन्द स्वराज’ का रूप और प्रेस की आजादी पर गांधीजी

जो महत्व कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के लिए मार्क्स और एंगेल्स के ’कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ का है ,बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा लाहौर के जाति तोड़क सम्मेलन(जिसमें आयोजकों ने उन्हें बुलाने के बाद फिर निमन्त्रण वापस ले लिया था) के लिए लिखे गये ’भारत में जाति-प्रथा का उच्छेद’ नामक पुस्तिका का जो महत्व हर [...]

लोगों की एक गंभीर भूल : महात्मा गांधी

” हम एक अरसे से इस बात को मानने के आदी बन गये हैं कि आम जनता को सत्ता या हुकूमत सिर्फ़ धारासभाओं के (विधायिका) जरिये मिलती है । इस खयाल को मैं अपने लोगों की एक गंभीर भूल मानता रहा हूँ । इस भ्रम या भूल की वजह या तो हमारी जड़ता है या [...]

जारी है पूंजी का ‘आदिम संचय’ प्राकृतिक दोहन द्वारा:ले. सुनील (३)

इस सैद्धान्तिक अन्तर्विरोध का हल खोजने की कोशिश में हम एक नये सत्य पर पहुचते हैं । दरअसल पूंजीवाद का तीन – चार सौ सालों का पूरा इतिहास देखें, तो वह लगातार प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्जा करने और उससे लोगों को बेदखल करने का इतिहास है । एशिया व अफ्रीका [...]

इंग्लैण्ड और अमरिका जैसा बनाने का मतलब

गांधी की कलम से
*…… भारत को इंगलैण्ड और अमरीका के जैसा बनाने का मतलब है ऐसे नए देशों की तलाश करना जिनका शोषण किया जा सके । अभी तक तो लगता है कि पश्चिमी राष्ट्रों ने योरोप के बाहर के देशों का , शोषण के लिए , आपस में बंटवारा कर लिया है और तलाश [...]

गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ (३) : अफ़लातून

    लोकनायक जयप्रकाश और महात्मा गांधी के जीवन और विचार यात्राओं के विकासक्रम को नजरअन्दाज करके विसंगतिपूर्ण उद्धरण प्रस्तुत किए जाँए तो बहुत आसानी से जे.पी को मार्क्सवादी और गांधीजी को जाति – प्रथा का पक्षधर होने के भ्रामक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं । गांधी जी को इस प्रकार की विसंगतियों की परवाह नहीं [...]